लेटरल एंट्री दूसरी किश्त : बिना परीक्षा आईएएस बनाना संविधान के खिलाफ, लेटरल एंट्री में आरक्षण-व्यवस्था का उल्लंघन – प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 28 अप्रैल 2024 | जयपुर – दिल्ली – मुंबई : बिना परीक्षा के ही आईएएस बनाना संविधान पर करारा प्रहार है। देश के सबसे उत्तम व विश्वसनीय परीक्षा यूपीएससी में 90 सीट रिजर्व रख बिना परीक्षा के देश के सर्वोच्च पद आईएएस बनाना सरकार द्वारा संविधान पर करारा प्रहार है। आयोग ने अक्टूबर 2021 में फिर से विभिन्न केंद्र सरकार के विभागों में संयुक्त सचिव (3), निदेशक (19), और उप सचिव (9) के रूप में नियुक्ति के लिए 31 उम्मीदवारों की सिफारिश की थी।

इस मनमानी प्रक्रिया से कई सवाल उठाते हैं; मसलन प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया गया महत्वकांक्षी कदम लेटरल एंट्री से आरक्षण को खतरा है? क्या सीनियर अधिकारियों के पद पर सीधी नियुक्ति की इस प्रक्रिया से मौजूदा व्यवस्था प्रभावित होगी? क्या इस नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रहेगी? क्या लेटरल एंट्री ब्यूरोक्रेसी में निजीकरण की एक कोशिश है? क्या यह वंचित वर्गों के लिए दिए गए आरक्षण को दरकिनार और कम करने की एक और चाल नहीं है?

बिना परीक्षा आईएएस बनाना संविधान के खिलाफ

MOOKNAYAKMEDIA 51 300x195 लेटरल एंट्री दूसरी किश्त : बिना परीक्षा आईएएस बनाना संविधान के खिलाफ, लेटरल एंट्री में आरक्षण व्यवस्था का उल्लंघन   प्रोफ़ेसर राम लखन मीणाप्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने जयपुर में आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि एक ओर जहां देश भर में चपरासी के रिक्त के लिए एमए, बीटेक, एमटेक जैसी डिग्री वाले लाइन लगाए हुए हैं। वहीं दूसरी ओर देश में बगैर परीक्षा (पैराशूट बाबू की एंट्री) लिए सरकार के चहेते लोगों एवं परिजनों को आईएएस  बनवाना देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

2018 में, केंद्र सरकार ने पार्श्व प्रवेश योजना के माध्यम से संयुक्त सचिव और निदेशक स्तर पर निजी क्षेत्र के पेशेवरों को सरकार के प्रशासनिक ढांचे में शामिल करने का निर्णय लिया है। इसी पृष्ठभूमि में पोस्ट में किया गया दावा तभी से शेयर किया जा रहा है।

आईएएस में बैक डोर एंट्री (पार्श्व प्रवेश) कैसे हुई 

इससे पहले नीति आयोग ने अपने तीन साल के एक्शन एजेंडा और शासन पर सचिवों के क्षेत्रीय समूह (एसजीओएस) ने फरवरी 2017 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में केंद्र सरकार में मध्य और वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर कर्मियों को शामिल करने की सिफारिश की थी।

तदनुसार, केंद्र सरकार ने 2018 में सैद्धांतिक रूप से, चिन्हित मंत्रालयों/विभागों में संयुक्त सचिव के 10 पदों और उप सचिव/निदेशक स्तर के 40 पदों पर बाहरी विशेषज्ञों को नियुक्त करने का निर्णय लिया है। सरकार ने संसद में इसकी पुष्टि की है।

निजी क्षेत्र के 25 विशेषज्ञ जल्द ही केंद्र में प्रमुख पदों पर शामिल होंगे, जो मोदी सरकार की शासन में आसानी को और बेहतर बनाने के लिए ऐसी प्रतिभाओं को शामिल करने की महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति (एसीसी) ने मार्च 2024 में केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में तीन संयुक्त सचिवों और 22 निदेशकों/उप सचिवों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है।

Picture 1 लेटरल एंट्री दूसरी किश्त : बिना परीक्षा आईएएस बनाना संविधान के खिलाफ, लेटरल एंट्री में आरक्षण व्यवस्था का उल्लंघन   प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा

बाद के वर्षों में, ‘2019 में पार्श्व भर्ती के माध्यम से भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों में संयुक्त सचिव के रूप में नियुक्ति के लिए 9 उम्मीदवारों का चयन किया गया। इसके अलावा, 2021 में पार्श्व भर्ती के माध्यम से नियुक्ति के लिए 31 उम्मीदवारों का चयन किया गया है, जिसमें 3 उम्मीदवार शामिल हैं। संयुक्त सचिव पद के लिए 19, निदेशक पद के लिए 19 और उप सचिव पद के लिए 9 सीटें हैं।’

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इसके अलावा, विभिन्न विभागों/मंत्रालयों के तहत भर्तियों और विभिन्न पदों का विवरण यहां और यहां देखा जा सकता है । लेटरल एंट्री की दूसरी किश्त के रूप में मार्च 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति (एसीसी) ने केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में तीन संयुक्त सचिवों और 22 निदेशकों/उप सचिवों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है।

लेटरल एंट्री में आरक्षण-व्यवस्था का उल्लंघन 

लेटरल एंट्री सिस्टम के तहत सरकारी विभागों में आईएएस या अन्य किसी प्रतियोगी परीक्षा दिए बिना भी सीधे वरिष्ठ अधिकारी बना जा सकता है और इसमें उपसचिव, निदेशक, संयुक्त सचिव और यहां तक की सीधे सचिव भी बनाया जा सकता है। केंद्र सरकार के आला अधिकारी के मुताबिक इन पदों पर सीधी भर्ती के लिए वांछित योग्यता जरूरी है; जैसे उम्र सीमा, कार्यकुशलता, शैक्षिक योग्यता, कार्यानुभव आदि शामिल है।

लेटरल एंट्री के तहत जो उम्मीदवार आवेदन करते हैं। उनके प्रार्थना पत्रों पर केंद्रीय लोकसेवा आयोग बारीकी से जांच कर विचार करता है और फिर जो उम्मीदवार योग्य होते हैं उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है। केंद्र सरकार के जिन मंत्रालयों में इनकी तैनाती की जा रही है उनमें कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग, वाणिज्य मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, कानून और न्याय मंत्रालय, उपभोक्ता खाद्य मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय, स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय, यातायात और हाईवे मंत्रालय, नागरिक उड्डयन आदि शामिल हैं।

इन भर्तियों पर आरक्षण या जाति-आधारित कोटा लागू नहीं होता है। आरक्षित पदों पर पार्श्व प्रवेश के प्रभाव पर लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए, सरकार ने कहा है कि वह पार्श्व प्रवेश योजना के माध्यम से नियुक्त व्यक्तियों की श्रेणी पर कोई केंद्रीकृत डेटा नहीं रखती है। इसका तात्पर्य यह है कि इन पदों पर भर्ती करते समय जाति/धर्म कोई मानदंड नहीं है।

IAS No exam Upeer castes LS 2 लेटरल एंट्री दूसरी किश्त : बिना परीक्षा आईएएस बनाना संविधान के खिलाफ, लेटरल एंट्री में आरक्षण व्यवस्था का उल्लंघन   प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा

सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए – प्रोफ़ेसर मीणा

यह पार्श्व प्रवेश पदों को भरने के लिए यूपीएससी द्वारा जारी भर्ती अधिसूचनाओं ( यहां और यहां ) से भी स्पष्ट है। इस अधिसूचना में पात्रता मानदंड में जाति/धर्म का कोई उल्लेख नहीं है। उपर्युक्त लोकसभा उत्तर में, सरकार ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि नियमित पदों में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों में कोई कमी नहीं होगी क्योंकि पार्श्व प्रवेश भर्ती अनुबंध के आधार पर नियुक्त की जाती है।

प्रोफ़ेसर मीणा ने यह भी कहा इसका मतलब यह है कि लेटरल एंट्री के माध्यम से भर्ती का आरक्षित पदों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिनकी भर्ती आमतौर पर यूपीएससी द्वारा आयोजित परीक्षा के माध्यम से की जाती है। पर सबसे बड़ा सवाल है कि केंद्र सरकार के मंत्री संसद में झूठ बोल रहे हैं, यदि ऐसा है तो यूपीएससी के विज्ञापनों में लैटरल एंट्री के एवज में एससी एसटी ओबीसी का बैकलॉग क्यों नहीं दर्शाया जाता है।

यह भी पढ़ें : आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाना राहुल गाँधी का मास्टर स्ट्रोक से मोदी की बेचैनी बढ़ी

प्रोफ़ेसर मीणा ने कहा कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि बीजेपी-आरएसएस में बैठे रसूखदार लोग बगैर सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा आईएएस बना रहे हैं और संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। देश के संविधान का लगातार हनन मामले पर सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए।

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