मंडल Vs कमंडल 2.0 एनडीए इंडिया फिर से आमने-सामने, मंडल के विरोध में आडवाणी ने कमंडल की राजनीति छेड़ी, नरसिम्‍हा राव सरकार ने बढ़ाई थी ओबीसी आरक्षण की सीमा

मंडल बनाम कमंडल
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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 12 मई 2024 | दिल्ली – जयपुर – मुंबई (मंडल – कमंडल 2.0) : यह लोकसभा चुनाव विचारधाराओं के तीव्र टकराव के लिए तैयार है क्योंकि आगामी लोकसभा चुनावों के लिए मंच तैयार है। उत्तर प्रदेश, जो लोकसभा में 80 सांसद भेजता है, सहित हिंदी पट्टी में दो राजनीतिक घटनाएं देखी जा रही हैं।

मंडल बनाम कमंडल 2.0 एनडीए इंडिया फिर से आमने-सामने

MOOKNAYAKMEDIA 10 Copy 300x195 मंडल Vs कमंडल 2.0 एनडीए इंडिया फिर से आमने सामने, मंडल के विरोध में आडवाणी ने कमंडल की राजनीति छेड़ी, नरसिम्‍हा राव सरकार ने बढ़ाई थी ओबीसी आरक्षण की सीमानरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तहत राजनीतिक लामबंदी, जो अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक के लिए नेतृत्व कर रही है, और एक प्रयास जाति जनगणना की मांग को लागू करके 28-पार्टी विपक्षी गठबंधन भारत द्वारा पहचान की राजनीति को पुनर्जीवित करने के लिए, उनका मानना ​​​​है कि इसमें मोदी को प्रधान मंत्री के रूप में तीसरे कार्यकाल से वंचित करने की क्षमता है।

कई लोग इसे ‘मंडल बनाम कमंडल’ राजनीति की वापसी करार देते हैं; लेकिन यह दोनों के बीच एक सरल तुलना होगी, क्योंकि 2024 का ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ उनके 1990 के दशक के अवतार से उल्लेखनीय रूप से भिन्न हैं। मंडल बनाम कमंडल की पहली लड़ाई 1990 में हुई थी, जो 10 सालों तक चली थी।

एक तरफ जाति आधारित मंडल कमीशन की रिपोर्ट थी, तो दूसरी तरफ राममंदिर का उग्र हिंदुत्व मुद्दा। ‘जब तक समाज में विषमता है, तब तक समाजिक न्याय की आवश्यकता है।’ पर मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद इसने देश के राजनीतिक एजेंडा को बदल दिया।

हिंदी हार्टलैंड में जहां ओबीसी वोटर्स सबसे अधिक प्रभावी हैं, वहां लोकसभा की 225 सीटें हैं। बीजेपी और उसके गठबंधन को 2019 में इनमें से 203 सीटों पर जीत मिली थी। इसी तरह महाराष्ट्र की 48 सीटों में से एनडीए को 41 सीटों पर जीत मिली थी। विपक्ष यहां इस बार ओबीसी कार्ड खेलकर समीकरण को बिगाड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।

संक्षेप में, भारत में हर पार्टी ने हमें बेवकूफ बनाने और सत्ता का आनंद लेने के लिए हमेशा एक समूह के लोगों को दूसरे के खिलाफ है। कुछ लोग समाज को क्षैतिज रूप से जातियों की कई परतों में विभाजित कर रहे हैं जबकि अन्य इसे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के दो हिस्सों में विभाजित कर रहे हैं।

शायद ही कोई इस बारे में बात कर रहा है कि लोगों के लिए वास्तव में क्या मायने रखता है। जीडीपी वृद्धि के सभी शानदार आंकड़ों के बावजूद, हमारी अधिकांश आबादी बेहद गरीब है और ऐसी स्थितियों में रहती है जो युद्धग्रस्त सीरिया, अफगानिस्तान या उप-सहारा अफ्रीका को शर्मिंदा कर सकती हैं। यह निंदनीय है कि आजादी के 75 साल बाद भी औसत मतदाता को धार्मिक दंगों और जाति युद्धों के बीच चयन करना पड़ता है।

मंडल बनाम कमंडल पार्ट-2 की मुख्य बातें…

  • मंडल और कमंडल की लड़ाई में पहली बार कांग्रेस सीधे तौर पर शामिल है। कांग्रेस जातीय जनगणना की मांग अब खुलकर कर रही है। कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ बने गठबंधन में भी शामिल है।
  • कमंडल की लड़ाई में बीजेपी के साथ रहने वाली शिवसेना (ठाकरे) अब मंडल की लड़ाई लड़ रही है। बालासाहेब ठाकरे के सियासी वारिस उद्धव भी जाति आधार पर हिस्सेदारी देने का समर्थन कर रहे हैं।
  • मंडल कमीशन के सूत्रधार माने जाने वाले रामविलास पासवान के सियासी वारिस अब कमंडल खेमे में है। लोजपा के चिराग और पशुपति गुट अभी एनडीए का हिस्सा है।
  • मंडल बनाम कमंडल की इस लड़ाई में पहली बार अटल बिहारी वाजपेई, वीपी सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, शरद यादव और मुलायम सिंह यादव नहीं होंगे। मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई के पार्ट-1 में ये सभी मुख्य किरदार थे।
  • मंडल बनाम कमंडल की इस लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान में बीजेपी की मजबूत सरकार केंद्र में है। 1990 में जनता पार्टी की सरकार थी और उस वक्त कांग्रेस काफी मजबूती स्थिति में था।

कमंडल की काट में विपक्ष की रणनीति क्या है?

कमंडल के खिलाफ विपक्षी मोर्चे ने मंडल की बिसात बिछाई है। यानी धर्म की राजनीति को काटने के लिए जाति का हथियार चला गया है। शुरुआत बिहार से हुई है, जहां हाल ही में जातीय सर्वे कराया गया है। विपक्षी दलों की कोशिश जातीय जनगणना के सहारे बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल को साधने की रणनीति है। इन सभी राज्यों में ओबीसी जातियों का दबदबा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 40 प्रतिशत आबादी ओबीसी जातियों की हैं।

अकेले बिहार में ओबीसी वर्ग की संख्या 63 प्रतिशत के आसपास है। थॉमसन-रॉयटर्स ने उत्तर प्रदेश में जातियों को लेकर एक सर्वे किया था। इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब 40 प्रतिशत आबादी पिछड़े समुदायों की है। बिहार में लोकसभा की 40 सीट है, जिसमें से विपक्ष के पास सिर्फ 17 सीटें हैं। मध्य प्रदेश में 29 सीटें हैं और यहां पर विपक्ष के पास सिर्फ 1 सीट है। 25 सीटों वाली राजस्थान और 10 सीटों वाली हरियाणा में विपक्ष के एक भी सांसद नहीं हैं।

मंडल के विरोध में आडवाणी ने कमंडल की राजनीति छेड़ी

मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के विरोध में आत्मदाह की कोशिश करने वाले दिल्‍ली के छात्र राजीव गोस्वामी को देखने के लिए भाजपा नेता लालकृष्‍ण आडवाणी अस्पताल पहुंचे थे। वो जब पहुंचे तो छात्रों ने उन्‍हें घेर लिया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। दरअसल जनता पार्टी, भाजपा के बाहरी समर्थन के साथ सत्‍ता में थी।

लेखक और राजनीतिज्ञ डॉ. प्रेम कुमार मणि बताते हैं, ‘छात्रों का आंदोलन उग्र हो चुका था। बीजेपी को लग रहा था कि अगर वो आरक्षण के फैसले पर वीपी सिंह का साथ देती है, तो सवर्ण बीजेपी का विरोध कर सकते हैं। ऐसा होने पर उसके वोट भी बंट सकते हैं।’

आडवाणी ने इस घटना के बाद एक रणनीति बनाई। उन्‍होंने मंडल से सबका ध्‍यान हटाने के लिए कमंडल की राजनीति शुरू की। आडवाणी ने 12 सितंबर 1990 को राम मंदिर के लिए रथ यात्रा करने की घोषणा की। 25 सितंबर को गुजरात के सोमनाथ से यात्रा शुरू हुई। आडवाणी ने 12 सितंबर 1990 को राम मंदिर के लिए रथ यात्रा करने की घोषणा की।

4444 1715435035 मंडल Vs कमंडल 2.0 एनडीए इंडिया फिर से आमने सामने, मंडल के विरोध में आडवाणी ने कमंडल की राजनीति छेड़ी, नरसिम्‍हा राव सरकार ने बढ़ाई थी ओबीसी आरक्षण की सीमा

आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद गिरी वीपी सिंह की सरकार

रथयात्रा जब बिहार होते हुए उत्‍तर प्रदेश पहुंचने को थी, तब यूपी के सीएम मुलायम ने बयान दिया, ‘अयोध्या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।’ ऐसा कह कर मुलायम ने आडवाणी को अयोध्या आकर दिखाने की चुनौती दी। हालांकि यूपी पहुंचने से पहले ही 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आधी रात को रथ यात्रा रोक ली और आडवाणी को समस्तीपुर से गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया।

इस घटना के बहाने बीजेपी ने जनता पार्टी को दिया अपना समर्थन वापस ले लिया और वीपी सिंह की सरकार गिर गई। इससे बीजेपी के सवर्ण वोट भी सधे रहे और मंडल की राजनीति कमंडल की ओर मुड़ने लगी। चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।

चंद्रशेखर बने देश के 8वें प्रधानमंत्री

वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद, जनता दल के नेता चंद्रशेखर 64 सांसदों के साथ पार्टी से अलग हो गए और समाजवादी जनता पार्टी बनाई। जिस कांग्रेस का विरोध करके जनता दल सत्ता में आई थी, उसी के समर्थन से 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर देश के आठवें प्रधानमंत्री बन गए।

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इस सबके बीच मंडल कमीशन का विरोध जारी रहा। इस विरोध प्रदर्शन के साथ ही साथ 17 जनवरी 1991 को केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्ग में शामिल समुदाय की लिस्ट तैयार की। महज तीन महीने बीते थे कि कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से भी समर्थन वापस ले लिया। अल्पमत में आने के बाद चंद्रशेखर को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा।

नरसिम्‍हा राव सरकार ने बढ़ाई आरक्षण की सीमा

सरकारें बदलती रहीं, लेकिन इस सबके बीच मंडल कमीशन के विरोध की आग नहीं बदली। 24 सितंबर 1991 को पटना में आरक्षण विरोधियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। पुलिस फायरिंग में चार छात्र मारे गए। अगले ही दिन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्‍हा राव ने सामाजिक शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान की और आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 59.5% करने का फैसला किया। जब ये खबर अखबारों में छपी तो एक बार फिर नॉर्थ दिल्ली के साथ-साथ साउथ दिल्ली में भी आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन तेज हो गए। यहां भी छात्रों पर पुलिस फायरिंग हुई और दो छात्रों की मौत हो गई।

आरक्षण विरोधी और समर्थक छात्रों में संघर्ष हुए

मंडल कमीशन को लेकर सवर्ण छात्रों के बढ़ते संघर्ष को देखकर ओबीसी वर्ग के छात्रों को लगा कि सरकार गिर सकती है। ऐसे में ओबीसी छात्रों का वर्ग मंडल कमीशन के समर्थन में आ गया। अगड़ी-पिछड़ी जातियों के छात्रों के साथ-साथ प्रोफेसर और शिक्षक भी दो हिस्‍सों में बंट गए और संघर्ष बढ़ गया। इसके चलते उदयपुर में कर्फ्यू भी लगाना पड़ा।

1 अक्टूबर 1991 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से आरक्षण के आर्थिक आधार का ब्‍योरा मांगा। अगले ही दिन गुजरात में सवर्ण और ओबीसी छात्रों में संघर्ष छिड़ गया और राज्‍य के सभी शैक्षणिक संस्थान बंद कर दिए गए। छात्रों का एक वर्ग मंडल कमीशन के समर्थन में आ गया। अगड़ी-पिछड़ी जातियों के छात्रों के साथ-साथ प्रोफेसर और शिक्षक भी दो हिस्‍सों में बंट गए।

66666 1715435094 मंडल Vs कमंडल 2.0 एनडीए इंडिया फिर से आमने सामने, मंडल के विरोध में आडवाणी ने कमंडल की राजनीति छेड़ी, नरसिम्‍हा राव सरकार ने बढ़ाई थी ओबीसी आरक्षण की सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा तय की

17 नवंबर को राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और उड़ीसा में एक बार फिर उग्र विरोध प्रदर्शन हुए। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 16 बसों में आग लगा दी गई जिसके बाद सौ लोग अरेस्ट हुए। दिल्‍ली यूनिवर्सिटी में 2 और छात्रों ने आत्‍मदाह की कोशिश की और पुलिस से झड़प में 50 से ज्‍यादा घायल हुए।

लगभग 1 साल बाद, 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वैध ठहराया। साथ ही आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत रखने और पिछड़ी जातियों के उच्च तबके को इससे अलग रखने का निर्देश दिया।

जाति जनगणना के मुद्दे पर ओबीसी, एससी और एसटी का एकीकरण भी इन समूहों के उप-वर्गीकरण के कारण गायब है, जिससे एकल राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र के रूप में ओबीसी या एससी का विचार पिघल रहा है। व्यक्तिगत जाति चेतना. भ्रष्टाचार और वंशवाद की राजनीति ने सामाजिक न्याय के मुद्दे को पुनर्जीवित करने के विपक्ष के अवसर को और कमजोर कर दिया।

यह भी पढ़ें : केजरीवाल को जमानत तो आदिवासी नेता हेमंत सोरेन को क्यों नहीं

1990 के दशक जैसी हलचलों की कमी, प्रति-लामबंदी की अनुपस्थिति और हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों का मतलब यह नहीं है कि पहचान की राजनीति कम हो गई है या जाति चेतना गायब हो गई है। ये शक्तिशाली राजनीतिक हथियार हैं जिन्होंने विपक्ष को 2014 के बाद पहली बार कहानी सेट करने का मौका दिया है; यह विपक्ष को भी एकजुट कर सकता है और भाजपा को चुनौती दे सकता है। 2024 का आम चुनाव हिंदुत्व और सामाजिक न्याय की विचारधाराओं के इर्द-गिर्द घूमने वाला है, जो अंततः भारत के लोकतंत्र के भविष्य को आकार देगा।

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