खोजी रिपोर्टिंग : सपोटरा में राजनीति ने एक आदिवासी गरीब किसान कैलाश को ‘कैसे बनाया बलि का बकरा’

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‘करौली जिले में सपोटरा तहसील के बूकना गाँव में बाबूलाल वैष्णव की संदिग्ध मृत्यु की तटस्थ और पारदर्शी जाँच की जरुरत ‘

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || अक्टूबर 13, 2020 || जयपुर : दिनांक 7 अक्टूबर 2020 को सुबह करीब 8:00 बजे स्वर्गीय बाबूलाल वैष्णव को खाली बोतल के साथ बूकाना-सपोटरा मोड़ पर उसी क्षेत्र के एक पूर्व सरपंच के पुत्र (न्यायिक प्रक्रिया में शामिल होने के कारण उनका नाम गोपनीय रखा है) ने व अन्य व्यक्तियों ने देखा था। उसके बाद स्व. बाबूलाल वैष्णव को सपोटरा के एक पेट्रोल पंप पर पेट्रोल लेने जाते हुए भी बूकना निवासी एक ट्रैक्टर वाले (न्यायिक प्रक्रिया में शामिल होने के कारण उनका नाम गोपनीय रखा है) ने देखा था। उसके पश्चात 8:55 से 9:00 मृतक ने पेट्रोल पंप से बोतल में पेट्रोल लिया। उक्त पंप वालों ने (सेल्समैन) ने बोतल में पेट्रोल भरने से साफ मना किया। परंतु मृतक वहीं पर खड़ा रहा।

इस बीच, पेट्रोल पंप के उक्त सेल्समेन ने तीन-चार मोटरसाइकिलों में पेट्रोल भरा। फिर भी मृतक द्वारा उस सेल्समेन से बार-बार आग्रह करने एवं बेहद इमरजेंसी की बात कहने पर तथा जिस मोटरसाइकिल पर बैठकर स्व.बाबूलाल वैष्णव वहाँ आया था, उसने भी उसे पेट्रोल देने की सिफारिश की तो मजबूरन सेल्समैन ने इमरजेंसी को भाँपते हुए उसे ₹100 का पेट्रोल दे दिया। उक्त घटनाक्रम के सभी सीसीटीवी फुटेज मूकनायक मीडिया ब्यूरो के पास मौजूद है, जिन्हें सीआईडी – सीबी के जाँच अधिकारी को अग्रिम जाँच के लिए सबूत के रूप में दिये जायेंगे। स्व. बाबूलाल वैष्णव द्वारा पेट्रोल लेकर वापस लौटते समय पास के ही एक मास्टरजी (नाम गोपनीय) ने उन्हें मोटरसाइकिल पर बिठाने का आग्रह किया था परंतु भवन नहीं बैठा।

इसके बाद मृतक को घटना स्थल पर जाते हुए भी अनेक लोगों ने देखा। और इसकी सूचना मृतक की पत्नी को दी। यह सूचना मिलते ही मृतक की पत्नी उनके पीछे-पीछे (कुछ दूर पीछे) भी जाते देखा था, जो स्व. बाबूलाल वैष्णव को रोकने का प्रयास कर रही थी। परंतु वे नहीं रुके। घटनास्थल पर जाकर मृतक ने कड़ब की झौली पर पेट्रोल छिड़का एवं शायद कुछ पेट्रोल खुद पर भी डालकर एलानिया धमकी देते हुए लाइटर से कड़ब में आग लगायी। क्योंकि मृतक पेट्रोल अपने ऊपर भी छिड़क चुका था और जब उसने कड़क में अपने ही लाइटर से आग लगायी तो खुद पर छिड़के हुए पेट्रोल की वजह से आग ने उनके शरीर को भी पकड़ लिया। क्योंकि पेट्रोल के कारण आग एकदम भभक उठी जिसे देखकर कुछ दूरी (लगभग 100-150 मीटर) पर कैलाश और उनकी बेटी/बेटियाँ कैलाश एवं उसके साथ टाटा (कड़ब का छप्पर) बनवा रही थी – आदि ने आग बुझाने की और बाबूलाल को बचाने की भरपूर कोशिश की। जिसमें कैलाश की बेटियों के हाथ भी झुलस गये हैं जिसको एएनआई न्यूज़ एजेंसी ने दिखाया है।

उक्त हृदयविदारक घटना के समय तुरंत नजदीकी दुकान से ललित एवं अन्य लोग भी पहुँच गये जिन्होंने भी आग बुझाने की कोशिश की एवं उसे तुरंत उपचार के लिए नजदीकी अस्पताल सपोटरा ले गये जिनमें महमूद (मीणा) और बिज्जू शामिल थे। बाद में, शुक्रवार को उपचार के दौरान जयपुर उनकी मृत्यु हो गयी। क्योंकि बाबूलाल वैष्णव की कैलाश मीणा से, कैलाश मीणा के पूर्वजों द्वारा मंदिर को दान की गयी मंदिर माफी भूमि के आस-पास की भूमि को लेकर विवाद चल रहा था तो उन्होंने अपने इकबालिया बयान में सारे प्रकरण को कैलाश की तरफ मोड़ दिया और उन पर आरोप लगाया कि आरोपी कैलाश ने ही इस हादसे को अंजाम दिया।

चूँकि घटना हृदय विदारक थी, मीडिया को टीआरपी मिलने का विश्वास था, राजनेताओं को राजनीति चमकाने की मन में लालसा थी, मनुवादी मानसिकताओं के लोग राज्य सरकार के विरुद्ध मुद्दों की तलाश में थे, मानवता मर चुकी थी, तथा अनेक अन्य कारणों की वजह से सारा का सारा मामला राष्ट्रीय स्तर पर छा गया। जिसको प्रेस और मीडिया की एक तरफ़ा और पूर्वाग्रही रिपोर्टिंग में देखा-सुना है। आरएसएस-भाजपा ने अपनी संकीर्ण सोच और गंदली मानसिकताओं के अनुरूप दो परिवारों के बीच भूमि विवाद से हुई सपोटरा के बुकना गाँव की दु:खद घटना को मीणा और वैष्णव (पुजारी) समाज के बीच जातीय विद्वेष का रूप देने का कुत्सित प्रयास किया है।

इससे एक तरफ राजस्थान की छवि अनावश्यक रूप से धूमिल हुई है। वहीं दूसरी तरफ न्याय और समन्वय की भावनाओं के लिए न्यौछावर होने वाले प्राचीनतम आदिवासी मीणा समुदाय को बदनाम करने का षड्यंत्र है। साथ ही, इसकी आड़ में राज्य में जनकल्याणकरी नीतियों का कार्यान्वयन करने वाली सरकार को राष्ट्रीय स्तर बदनाम करने की साजिश रची है। यह घटना कोई जातीय संघर्ष नहीं था, न ही कोई पूर्व नियोजित प्रकरण था। यह विवादित भूमि (मंदिर माफ़ी जनीं के आसा-पास सिवायचक) के टुकड़े पर कब्जे को लेकर दो परिवारों के बीच का झगड़ा था, जो हृदय विदारक घटना में बदल गया।

सपोटरा, करौली प्रकरण बहुत कुछ बयान कर रहा है। आरएसएस-बीजेपी के नेता प्रदेश के शांतिपूर्ण वातावरण को आग लगाने पर तुले हुए हैं, जो बिना किसी सबूत और तथ्यों की जानकारी लिये बगैर ही फैसला सुना देते है। शांतिप्रिय लोगों को भड़काने में लगे हैं और अपने ही निर्दोष लोगों को सरेआम अपराधी घोषित कर स्वयं मठाधीश बन रहे हैं। उनका बस एक ही मकसद है शांतिपूर्ण माहौल में आग लगाना! क्या उन पर क़ानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए! चूँकि, दोनों ही पक्ष बहुत गरीब हैं, ऐसी परिस्थियों में उन्हें सरकार सुरक्षा प्रदान करें, क्योंकि उनका जीवन खतरे में हो सकता है।

आरएसएस-बीजेपी के राजनेता उनके साथ घिनौना खेल खेल रहे हैं। बाहर से समुदाय विशेष (ब्राह्मण) के लोगों को बुलाकर गाँव में तनाव पैदा कर रहे हैं। दिल्ली से एक छुटभैया नेता आये और 25लाख देने की सुर्खियाँ बटोर ले गये, जबकि सूत्रों का कहना है कि वास्तविकता में उन्होंने मात्र 50हजार रुपए दिये हैं। संपूर्ण प्रकरण को ध्यान में रखते हुए इस मामले की तटस्थ और पारदर्शी जाँच सीआईडी-सीबी जाँच कर रही है ताकि कोई भी दोषी नहीं बचे और किसी निर्दोष को सजा नहीं हो, जिसका खामियाजा उनके मासूम परिजनों को जीवन भर भुगतना पड़े। (शेष अगले पोस्ट में…)

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