सपोटरा एक्सक्लूसिव रिपोर्ट : ‘बाबूलाल वैष्णव की मृत्यु पूर्व नियोजित षड्यंत्र था या आत्महत्या’

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || अक्टूबर 14, 2020 || जयपुर-सपोटरा : यह हादसा एवं घटनाक्रम एक मनुष्य के नाते हमें सोचने को मजबूर करता है कि मीडिया, राजनीति से जुड़े स्वार्थी लोग और सोशल मीडिया पर मसकारे पूर्ण खबरों को प्रचारित करने वाले अज्ञानी और षड्यंत्रकारी सब कैसे एक हादसे को हत्या के रूप में प्रसारित करते हैं। यह इसका अनूठा उदाहरण है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बाबूलाल वैष्णव की मृत्यु क्या एक पूर्व नियोजित षड्यंत्र था अथवा उसने आत्महत्या की थी। इन तथ्यों पर गहनता से विचार करने की किसी ने भी कतई कोशिश नहीं की। सभी लोग अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के साथ घटना स्थल बूकना गाँव पहुँचे और राजनीति चमकाने में लग गये। जबकि घटना से जुड़े तथ्यों का तार्किक विवेचन और उससे जुड़े सभी सबूतों का विश्लेषण करते हैं तो सामने आता है की यह हत्या तो लेश मात्र भी नहीं है और मौके पर उपलब्ध सबूत भी इस बात के गवाह हैं कि हत्या नहीं है बल्कि आत्महत्या के प्रयास में हुआ हादसा है। हादसे से जुड़ी कुछ तस्वीरें देखिए किंतु राजनीति का पराभव इतना रसातल में जा चुका है कि लाशों पर राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञ और कैलाश से व्यक्तिगत खुंदस रखने वाले मानसिक दिवालिये और अधकचरे लोगों ने इस घटना को एक संभावना के रूप में देखा और यत्किंचित स्वार्थों के कारण एक निर्दोष को ना केवल दोषी बना दिया । बल्कि उस पर और उसके परिवार के 9लोगों पर 302 जैसी संगीन धाराओं में मुकदमा भी दर्ज हो गया, जिसमें आरोपी कैलाश की वे बेटियाँ भी हैं जिन्होंने मानवीयता और मानवीय संवेदनाओं की धनी होने के कारण स्व. बाबूलाल वैष्णव को आग की लपटों से बचने की भरपूर कोशिशें की, जिनमें उनके हाथ तक जल चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली से पधारे राज्यसभा के एक सांसद और उनके आह्वान पर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, जातीय उन्माद फ़ैलाने की कोशिश करने वाले और अपने विरोधियों पर तंज कसने या उनको किसी न किसी तरह से घटना से जोड़ने की बदसूरत तस्वीर भी है। इतना ही नहीं, भरी सभा में आरोपी कैलाश को बिना किसी आरंभिक जाँच-पड़ताल और पूछताछ किये खुलेआम हत्यारा कह कर संबोधित किया। जिस आदिवासी समाज में किसी के हाथ से गिलहरी भी मर जाये तो उसका आदिवासी समुदाय उसे सांकेतिक रूप से अलगाव कर देता है, वहाँ किसी को हत्यारा कहना कितना दु:खदायी और पीड़ादायक रहा होगा। महत्वाकांक्षी राजनेताओं और उनके द्वारा बाहर से बुलाये गये जाति विशेष के लोगों ने कैलाश व उनके परिजनों को बिना किसी जाँच के ही हत्यारा बना दिया जो ना केवल गलत है बल्कि उनकी कुत्सित मानसिकता का परिचायक है कि कैलाश जैसे आदिवासियों की जिंदगियाँ बर्बाद होती है। राजनीतिज्ञ के आपसी मतभेदों के कारण किसी निर्दोष को के कैसे इस्तेमाल करते हैं । इससे कैलाश एवं उसके परिवार को अपूरणीय क्षति हुई है। साथ ही, उस प्राचीनतम आदिवासी मीणा समुदाय को भी राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी मिली है, वह अलग। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्तर के राजनेता जो संसद में उसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, हत्या जैसे जघन्य अपराध में बिना जाँच एवं सबूत के सार्वजनिक रूप से एलान करते हैं कि कैलाश हत्यारा है और उसको अप्रत्यक्ष रूप से सजा भी दे देते हैं। क्या यह सब उन्हें करना चाहिए था? क्या समुचित जाँच के लिए माँग नहीं करनी चाहिए थी? क्या उन्होंने जो किया वह सही था? या फिर उन्होंने मिली अप्रत्याशित हार का बदला लेने के लिए क्षेत्र के तथा मीणा समुदाय के लोगों को राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी के कलंक से सुशोभित कर दिया। इस प्रकरण में कौन आरोपी है, इसका फैसला तार्किक न्यायिक प्रणाली और तटस्थ एवं पारदर्शी जाँच प्रक्रिया के बाद ही संभव है। किसी को भी उससे पहले इस पर किसी तरह के दबाव, बयान आदि से बचना चाहिए। बल्कि बढ़प्पन दिखाते हुए कैलाश को हत्यारा बताने वालों को समाज से माफ़ी माँगनी चाहिए! क्या वे हिम्मत जूटा पायेंगे?

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