नेहरू की जनतांत्रिक विरासत और स्वघोषित,राष्ट्रवादी राजनेताओं की बर्बर होती मानवीय संवेदनाओं का ह्रास

24 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || अक्टूबर 26 , 2020 || जयपुर : यह लेख जवाहरलाल नेहरू पर है, क्रांतिकारी साथी इसमें दक्षिणपंथी भटकाव न खोजें, बल्कि एक वस्तुनिषठ विश्लेषण के रूप में पढ़ें। नेहरू क्रांतिकारी नहीं, सामाजिक जनतंत्रवादी थे। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा के वर्चस्व में एनडीए सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद से ही प्रधानमंत्री और सत्ताधारी दल हर समस्या का दोष प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू के मत्थे मढ़ते रहे हैं। नेहरू का चरित्र हनन सोसल मीडिया पर आईटी सेल के योद्धाओं का शगल बन गया है। 15 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर से भाग्य को चुनौती देने वाले, जवाहरलाल नेहरू बौदधिक क्षमता से संपन्न, स्पष्ट अंतःदृष्टि और दूरदृष्टि तथा मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत, एक युगद्रष्टा प्रधानमंत्री रहे हैं। इस लेख का मकसद जवाहलाल नेहरू की राजनैतिक यात्रा का विस्तृत वर्णन या स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर चर्चा नहीं है, इसका मकसद स्वतंत्र भारत में उनकी जनतांत्रिक विरासत का उल्लेख करना है। नेहरू के पहले, कालजयी भाषण और राष्ट्र निर्माण की उनकी समझ और संकल्पों की चर्चा के पहले स्वघोषित, राष्ट्रवादी राजनेताओं की बर्बर होती मानवीय संवेदनाओं को देखते हुए, नेहरूजी की मानवीय संवेदनाओं की बात करना वाजिब होगा। 1970 के दशक में इलाहाबाद में नेहरू और निराला तथा नेहरू और फिराक़ को लेकर कई किंवदंतियां प्रचलित थी. उनमें से एक है: नेहरूजी इलाहाबाद में किसी सभा को संबोधित कर रहे थे। निराला जी उन दिनों, कहा जाता है मानसिक विक्षिप्तता की अवस्था में थे। भाषण के दौरान नेहरूजी की निगाह श्रोताओं के पीछे सुरक्षाकर्मियों से उलझते दूधियों की तरह लुंगी-बंडी में, लंबे बाल-दाढ़ी वाले एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति पर पड़ी। वे सारे प्रोटोकोल की ऐसी-तैसी करते पुलिस वालों को डांटते हुए उनके पास पहुँचे और उन्हें मंच पर ले आये। वह व्यक्ति हिंदी के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ थे। निराला ‘क्यों बे गुलाब…’; ‘यदि होता लखपति कुमार, शिक्षा पाता सात समुद्र पार, करता साम्यवाद का व्यापार ……’ जैसी कविताओं के जरिए नेहरू पर कटाक्ष करने में नहीं चूकते थे। साहित्यकारों पर लगातार हमलों के मौजूदा माहौल में, साहित्य का सम्मान करने वाले, एक संवेदनशील प्रधान मंत्री की याद आना लाजमी है। इसमें कितना सच है पता नहीं, लेकिन नेहरूजी के प्रयाग हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष को निरालाजी की आजीविका के लिए मानदेय की व्यवस्था के आवेदन के पत्र की बात आँखों देखा सच है। पत्र शब्दशः तो नहीं याद, आशय था कि वे (साहित्य सभा के अध्यक्ष) जानते ही होंगे कि इलाहाबाद में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ नाम के हिंदी के एक महान कवि रहते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। यदि उनके संस्थान में 100 रूपये (शायद) के मासिक मानदेय का कोई प्रावधान हो तो उन्हें दिया जाये और यदि ऐसे प्रावधान बनाने में केंद्र सरकार की सहायता की जरूरत होगी तो पूरी की जायेगी। उन्होंने यह भी लिखा कि यह राशि उन्हें न देकर महादेवी वर्मा को दी जाये क्योंकि वे दरियादिल इंसान हैं, एक ही दिन में लुटा देंगे। महादेवी वर्मा उनका ख्याल रखती हैं। [यह पत्र नेहरू मेमोरियल म्यूजियम येंड लाइब्रेरी (तीनमूर्ति भवन, नई दिल्ली) में प्राइवेट पेपर्स सेक्सन में है।] कुछ साल पहले नेहरू जी के नवउदारवादी वारिस, मनमोहन सिंह भले ही ऑक्सफोर्ड में मानद डिग्री लेते हुए, भारत को विकसित करने के लिए औपनिवेशिक प्रभुओं का आभार व्यक्त कर आये, लेकिन हकीकत यह है कि 1947 में जब अंग्रेज शासक विखंडित भारत छोड़कर गए तो देश की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक योगदान 6.3% था। गौरतलब है कि उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों तक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का मतलब होता था भारत और पूर्वी एशिया, खासकर चीन के साथ व्यापार। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत के उत्पादों का हिस्सा लगभग एक-तिहाई था। 1947 में न सिर्फ अर्थव्यवस्था पस्त थी और लोग बदहाल थे, निरक्षरता और अशिक्षा सर्वव्यापी थी। लाल किले की प्राचीर से भाग्य से टक्कर वाले भाषण के कुछ महीनों पहले (22 जनवरी 1947) संविधान सभा में, “उद्देश्य और लक्ष्य ( एम्स येंड ऑब्जेक्टिव्स)” के प्रस्ताव पर बहस के समापन भाषण में नेहरू ने कहा था, “इस सदन का पहला काम है, एक नए संविधान के जरिए भारत को मुक्त करना; भूखों का पेट भरना; नंगों का तन ढकना; और हर भारतीय को अपनी क्षमतायें विकसित करने का उपयुक्त अवसर प्रदान करना।” नेहरू मानते थे कि आजाद भारत की सरकार का काम सार्थक आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए लोगों के शरीर और मन-मस्तिष्क की मुक्ति है। नेहरू ने जब सत्ता संभाला तो कांग्रेस नेतृत्व में वल्लभ भाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे दक्षिणपंथी और पुरानपंथी नेताओं की भरमार थी। नेहरू के पास न तो तैयारी थी न साहस कि औपनिवेशिक राज्य मशीनरी को भंग कर जनवादी विकल्प अपनाते जैसा 1871 में पेरिस कम्यून ने किया था, या फिर 1917 में रूस के बॉलशेविकों ने और 1949 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने। मार्क्स ने फ्रांस में गृहयुद्ध (1872) में लिखा है कि गुलामी का औजार रहा राज्यतंत्र मुक्ति के माध्यम में नहीं तब्दील हो सकता। लूट और दमन के सिद्धांत पर टिके औपनिवेशिक राज्यतंत्र की बात ही छोड़िए। जो सेना 15 अगस्त 1947 तक औपनिवेशिक सरकार की देशभक्त थी, उसके बाद राष्टीय सरकार की ‘देशभक्त’ हो गयी और आजाद भारत में पहली देशभक्ति का काम किसानों के तेलंगाना आंदोलन के बर्बर दमन का किया। जो भ्रष्ट और औपनिवेशिक वफादारी की नौकरशाही औपनिवेशिक लूट का प्रबंधन करती थी उसे जनपक्षीय परिप्रेक्ष्य से राष्ट्रनिर्माण की प्रतिबद्ध मशीनरी में बदलना असंभव सा था, लेकिन नेहरू ने यह असंभव बीड़ा उठाया और काफी हद तक सफल रहे। क्रांतिकारियों को फांसी और काले पानी की सजा सुनाने वाली न्यायपालिका का क्रांतिकारी कायाकल्प नहीं हो सकता था, लेकिन नेहरू ने भरपूर कोशिस की और काफी हद तक सफल रहे। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि नेहरू क्रांतिकारी नहीं बुर्जुआ जनतांत्रिक बुद्धिजीवी और राजनेता थे। नेहरू शासन को इन्ही औपनिवेशिक राज्य-मशीनरियों से ‘राष्ट्र-निर्माण’ यानि औद्योगिक पूंजीवाद का विकास और समतामूलक, सामासिक संस्कृति का निर्माण करना था। जाहिर है, मुश्किल काम था। उन्होंने औपनिवेशिक राज्य मशीनरी को राष्ट्र-निर्माण का माध्यम बनाने की भरसक कोशिस की और अपनी अंतर्दृष्टि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रेरक व्यक्तित्व के चलते काफी हद तक सफल रहे। कांग्रेस की आँतरिक राजनीति में नेहरू और सुभाष चंद्र बोस दोनों ही कांग्रेस के वामपंथी खेमे के प्रतिनिधि माने जाते थे। दोनों ही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में, 1934 में सिविल नाफरमानी आंदोलन की वापसी के बाद, “मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित” युवा कांग्रेसी स्त्री-पुरुषों द्वारा गठित कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी का समर्थन भी लेते रहे और दूरी भी बनाए रहे। भगत सिंह ने 1928 में किरती पत्रिका में एक लेख में सुभाषचंद्र बोस को संकीर्ण, राष्ट्रवादी सोच वाला तथा नेहरू को एक प्रगतिशील और अंतर्राष्ट्रीय सोच वाला नेता बताया था। सुब्रह्मण्यम् स्वामी नामक एक ‘देशभक्त’ ने जेयनयू आंदोलन के दौरान एक शगूफा छोड़ा था कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदलकर किसी ‘विद्वान’ के नाम पर कर देना चाहिए। 1997 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने गोरखपुर विश्वविद्यालय का नाम किसी संघी विद्वान के नाम रखना चाहा और उसका नाम दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय रख दिया। उपाध्याय जी की विद्वता मानवता को खंड-खंड करते, इनके संग्रह, समग्र मानवतावाद में संग्रहित है, जिसके विस्तार में जाने की न तो गुंजाइश है न ही जरूरत, इसमें मनुस्मृति को न्याय की दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संहिता बताया गया है और बुद्ध को ‘मातृ-धर्म का गद्दार’ तथा समानता को अप्राकृतिक। नेहरू की विद्वता और सूक्ष्म अंतरदृष्टि की प्रामाणिक सनद के रूप में उनकी रचनायें और काम विश्वपटल पर मौजूद हैं। साहित्य जगत में नेहरू की एक आत्मकथा (ऐन ऑटोबायोग्राफी) की गणना लगभग इसी शीर्षक (द ऑटोबायोग्राफी ) से छपी 19वीं शताब्दी के उदारवादी चिंतक जॉन स्टुआर्ट मिल की आत्मकथा की तरह कालजयी आत्मकथाओं में होती है। विश्व इतिहास की झलकियां (ग्लिंप्सेज ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री) तथा भारत की खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) भी कालजयी रचनायें हैं। हिंदुत्ववादी तथाकथित ‘देशभक्त’ नेहरू का अक्सर रईसजादे या विदेश में पढ़कर यूरोपीय सोच वाले नेता के रूप में मजाक बनाते हैं। जी, जवाहरलाल नेहरू एक नामी-गिरामी और धनी वकील, मोतीलाल नेहरू के बेटे के रूप में पैदा हुए, जिसमें न तो उनका कोई योगदान था, न ही अपराध, सो इसके लिए न तो उनकी प्रशंसा होनी चाहिए न आलोचना। इतना जरूर है कि यदि किसी दूर-दराज के गाँव के किसी साधारण किसान के घर में पैदा हुए होते तो उच्च शिक्षा न पाते और राष्ट्रीय आंदोलन में या प्रधानमंत्री के रूप में इतनी निर्णायक भूमिका निभा पाते कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह होता तो वह होता बेकार की बात है। सैकड़ों राजे-रजवाड़े, जिनमें से ज्यादातर के वारिस देशभक्ति की दुकानें खोलकर बैठ गए हैं; हजारों रईसजादे, पढ़-लिख कर या बिना उसके ही आखिर तक पूरी वफादारी से अंग्रेजीराज की सेवा करते रहे –प्रशासन/फौज/पुलिस के अधिकारी के रूप में कुछ सर; रायबहादुर; खानबहादुर आदि बनकर। आजादी के बाद इनकी देशभक्ति बदल गयी, हृदय परिवर्तन हो गया और औपनिवेशिक भारत के वफादार से भारतीय गणतंत्र के वफादार बन गए। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि नेहरू क्रांतिकारी नहीं थे, जनपक्षीय उदारवादी थे, जो राज्य को सामाजिक क्रांति के वाहक के रूप में देखते थे। वे न लेनिन थे न माओ, न ही उनके पीछे कोई क्रांतिकारी जनसेना थी। उसी राज्य मशीनरी के बल पर गणतंत्र का विकास नेहरू का चुनाव नहीं मजबूरी थी। पिता की छत्रछाया में वकालत करने की बजाय असहयोग आंदोलन में कूदना उनकी मजबूरी नहीं चुनाव था। उन्होंने या खुद कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके उनके पिता ने देश की कोई संपत्ति नहीं हड़पा। मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद में एक विशाल, भव्य स्वराज-भवन बनवाया तथा राष्ट्रीय आंदोलन यानि कांग्रेस को दे दिया। बगल में अपने लिए दूसरा अपेक्षाकृत छोटा किंतु उतना ही भव्य आनंदभवन बनावाया जिसे अपने बेटे के लिए छोड़ गए और बेटे ने देश को दे दिया। उसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है, जो इलाहाबाद का एक पर्यटन आकर्षण है तथा देश के राजस्व का छोटा सा स्रोत। पढ़ाई-लिखाई तथा आंदोलन में शिरकत से नेहरू ने दुनिया को एक वैज्ञानिक दृष्टि से जानने-समझने और बदलने की समझ हासिल किया और जल्दी ही आंदोलन के प्रमुख नेता बन गये। अपने पिता की नरमपंथी नीतियों का खुलकर विरोध किया। तमाम वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं की अनिच्छा के बावजूद वे 40 साल की उम्र में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बने और पूर्ण-स्वराज का नारा बुलंद किया और कांग्रेस पर नीतिगत बदलाव का दबाव बनाया। गाँधीजी को कहना पड़ा कि यदि साल भर में साम्राज्य के आधीन स्वशासन (डोमेनियन स्टेटस) की मांग न मानी गयी तो वे खुद पूर्ण स्वराज का परचम फहरायेंगे। और जैसा कि इतिहास बन चुका है, 26 जनवरी 1930 को लाहौर अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू ने तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वराज की घोषणा की और इसीलिए यह तारीख गणतंत्र दिवस के लिए चुनी गयी। नेहरू के पहले अध्यक्षीय काल में उन्हीं की पहल पर कांग्रेस का कायाकल्प हो गया और कांग्रेस के तत्कालीन प्रस्ताव और दस्तावेज संविधान के महत्वपूर्ण श्रोत बने। उन्होने घोषित किया कि कांग्रेस के लक्ष्य हैं: धार्मिक स्वतंत्रता; विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; संगठन बनाने और सभा की स्वतंत्रता; जाति, धर्म, रंग, पंथ के आधार पर भेदभाव की मनाही; कानून के समक्ष संपूर्ण स्वतंत्रता एवं समानता; क्षेत्रीय भाषा-संस्कृति की सुरक्षा; किसान-मजदूरों के हितों की सुरक्षा; छुआ-छूत का उन्मूलन; सार्वभौमिक मताधिकार; उद्योगों का राष्ट्रीयकरण; समाजवाद और एक धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण। ये भारतीय गणतंत्र के निर्माण के भी प्रमुख लक्ष्य रहे हैं लेकिन आज फासीवाद की आहटों से भयभीत हैं। ये लक्ष्य 1929-31 के दौरान नेहरू द्वारा तैयार ड्राफ्ट प्रस्ताव, ‘मौलिक अधिकार और आर्थिक नीति’ के प्रमुख घटक थे। गाँधी के नेतृत्व में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने इस पर मुहर लगा दी। लेकिन वल्लभ भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, रागोपालाचारी जैसे बहुत से रसूखदार, पुरानपंथी, दक्षिणपंथी नेता इसके विरुद्ध थे। नेहरू को सुभाष बोस और मौलाना आजाद का समर्थन हासिल था। इन लोगों को ज्यादा परेशानी समाजवाद और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के प्रवधानों से थी। कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सीयसपी) के समर्थन से 1936 में राजेंद्र प्रसाद को हटाकर नेहरू दुबारा कांग्रेस अध्यक्ष बने। नेहरू की कांग्रेस कार्यकारिणी कमेटी में आचार्य नरेंद्रदेव और जयप्रकाश नारायण समेत सीयसपी के कई सदस्य शामिल थे। सीयसपी के तत्वाधान में 1934-42 का समय किसान-मजदूरों और छात्रों की अपने-अपने और राष्ट्रीय आंदोलन में संगठित भागीदारी की दृष्टि से क्रांतिकारी दौर था। कम्युनिस्ट पार्टी अवैध थी, उसके सदस्य भी निजी हैसियत से सीयसपी में शामिल थे। ईयमयस नंबूदरीपाद संस्थापक सहसचिवों में एक थे। सीयसपी के नेतृत्व में किसान; मजदूर; छात्र राष्ट्रीय राजनीति में संगठित ताकत के रूप में उभरे और 1942 में, कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा युद्ध के समर्थन के बावजूद, ये संगठन भारत छोड़ो आंदोलन में निर्णायक शक्तियां थीं। मजदूरों के संगठन आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के नेतृत्व में कई सफल हड़तालें हुईं। आल इंडिया किसाम सभा (एआईकेयस) इतना मजबूत हो गया कि 1937 में इसके संस्थापक अध्यक्ष स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में पटना में, पारंपरिक लाठी-डंडों के साथ लाखों किसानों के जुलूस ने अंग्रेजों और कांग्रेस नेतृत्व दोनों के ही मिजाज खट्टा कर दिया था। उस समय 1935 के संविधान के तहत पटना में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में कांग्रेस की प्रांतीय सरकार थी। 1936 में सीयसपी के ही तत्वाधान में छात्रों के राष्ट्रीय संगठन आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेसन (एआईयसयफ) का गठन हुआ जो कि आजादी के पहले और बाद में छात्र आँदोलनों की अलख जगाता रहा। सांस्कृतिक संगठन इप्टा और मुंशी प्रेमचंद के नेतृत्व में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) इसी दौर में गठित हुए। नेहरू सीयसपी में शरीक नहीं थे लेकिन वैचारिक सहमति थी। सीयसपी ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में हमेशा नेहरू का साथ दिया। सीयसपी इस दौर में एक निर्णायक ताकत बन चुकी थी। 1938 के हरिपुरा और 1939 में त्रिपुरी काग्रेस में तो प्रकारांतर से सीधे गाँधी के विरुद्ध सुभाष बोस की जीत उनकी लोकप्रियता का नहीं सीयसपी के समर्थन का परिणाम था। 1939 की त्रिपुरा कांग्रेस में सीयसपी के गाँधी प्रेम और उसूलों की दुविधा और किंकर्तव्यविमूढ़ता के फलस्वरूप ‘तटस्थता’ की उनकी ‘अराजनैतिक’ फैसले के चलते ही, कांग्रेस अध्यक्ष के पर कतरने वाला कुख्यात पंत (गोविंद बल्लभ) प्रस्ताव पारित हो सका, और बोस ने कांग्रस में गाँधीवादी खेमे से, जनाधार बढ़ाकर निपटने की बजाय हिटलर की मदद से अंग्रजी राज से लड़ने के लिए आजादहिंद फौज बनाया। इसके गुण-दोष में यहां जाने की गुंजाइश नहीं है। भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार नेहरू ने भी भगत सिंह की तरह जेल को पुस्तकालय बनाया बाकी पढ़ाई-लिखाई के अलावा भावी पीढ़ियों के लिए एक क्लासिक आत्मकथा की रचना की जो निजी जीवन की घटनाओं के विवरण के साथ समकालिक समाज, राजनीति और इतिहास के गतिविज्ञान की विवेकसम्मत विवेचना भी है। कांग्रेस के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन के चलते कांग्रेस के ज्यादातर दिग्गज जेल में थे और जयप्रकाश नारायण समेत बहुत से भूमिगत। उस समय हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग सांप्रदायिक नफरत और अविश्वास फैला रहे थे। सावरकर सभायें करके अंग्रेजी सेना में हिदुओं को भर्ती होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। आरयसयस और जमात-ए-इस्लामी भी यही कर रहे थे साथ-साथ दंगों की तैयारी। धर्म के आधार पर दो-देश के सिद्धांत के तहत देश का बंटवारा नहीं रुक सका। अंग्रेज और उनके एजेंट के रूप में काम कर रही सांप्रदायिक ताकतें साझी ऐतिहासिक विरासत और सामासिक संस्कृति को खंडित करने में कामयाब हुए। देश को खंड-खंड करने की साम्राज्यवादी साजिश के जितने बड़े किरदार निजाम-ए-इलाही के नारे के साथ पाकिस्तान के पैरोकार थे उतने ही बड़े हिंदू राष्ट्र के नारे के साथ अखंड भारत के पैरोकार। बंटवारे और अभूतपूर्व नरसंहार तथा विस्थापन की अभूतपूर्व त्रासदी पर बहुत लिखा जा चुका है। आजादी की लड़ाई एक देश लड़ा आजाद उसमें से दो देश हुए। कांग्रेस ने नेहरू को प्रधान मंत्री चुना। नेहरू ने 1946 जुलाई में ही रजवाड़ों को भावी भारतीय गणतंत्र में शामिल होने की चेतावनी दी थी। 22 जनवरी 1947 के संविधान सभा में उपरोक्त वक्तव्य में स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय गणतंत्र में राजाओं के दैविक अधिकार अस्वीकार्य होंगे। मई 1947 में उन्होने घोषित किया था कि जो भी राजा संविधान सभा में शिरकत नहीं करेगा उसे शत्रु-राज्य माना जायेगा। संविधान सभा के कई सदस्य 1935 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत संघात्मक ढांचे में राजाओं के स्वतंत्र अस्तित्व के पक्षधर थे लेकिन अंततः नेहरू की बात मान ली गयी। संविधान सभा में और उसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में जमींदारी उंमूलन समेत प्रगतिशील और जनपक्षीय प्रावधानों और अधिनियमों को पारित कराने में कांग्रेस के दक्षिणपंथी खेमें के अवरोधों पर चर्चा की गुंजाइश नहीं है। नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में लालकिले से अपने पहले भाषण में कहा था, “आज की इस पवित्र घड़ी में हम भारत, उसके लोगों और सबसे ऊपर मानवता की सेवा का संकल्प लेते हैं।” संविधान सभा में भारतीय गणतंत्र के उद्देश्य और लक्ष्य पर समापन बहस में नेहरू के उपरोक्त जिन संकल्पों के अंतर्दृष्टि की बात की गयी है, उनमें ज्यादा ध्यान आर्थिक विकास और शिक्षा पर दिया गया। 200 साल की औपनिवेशिक लूट और तकनीकी ज्ञान में पिछड़ेपन के फलस्वरूप अर्थ व्यवस्था बिलकुल जर्जर हो चुकी थी। 1960 के दशक की मेरे बचपन की यादों में गाँव में सबके पास जूते नहीं होते थे। निरक्षरता और अशिक्षा आसमान पर थीं। मेरे गाँव में कोई ग्रेजुएट नहीं था लेकिन ‘ऊँची’ जातियों के ज्यादातर पुरुष साक्षर थे। नेहरू ने सोवियत संघ की अपनी यात्रा में उसकी नियोजित अर्थव्यवस्था का गहन अध्ययन किया था। गौरतलब है कि 1917 की क्रांति के बाद सोवियत संघ की आर्थिक हालात खस्ताहाल थे। औद्योगिक विकास नगण्य था। सही मायने में देखें तो 1920 के दशक में शुरू हुई पहली पंचवर्षीय योजना के बाद ही राज्यनियंत्रित औद्योगिक पूंजी का विकास शुरू हुआ। सोवियत संविधान की एक प्रमुख बात थी, हर हाथ को काम की गारंटी, यानि काम का अधिकार, जो कोई भी पूंजीवादी देश अपने नागरिकों को कभी नहीं दे सकता क्योंकि ‘कार्यबल की आरक्षित फौज’ – बेरोजगारी — पूंजीवाद का नीतिगत दोष नहीं बल्कि इसकी अंतर्निहित प्रवृत्ति है। गौरतलब है कि निजी पूंजी और मुनाफे के सिद्धांत पर आधारित, लगभग 2 शताब्दी पुराना पूंजीवाद पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में जब संकट से जूझ रहा था, राज्य नियंत्रित, जनोंमुख औद्योगिक विकास के चलते सोवियत संघ, दूसरे विश्वयुद्ध तक एक विशाल आर्थिक और सैनिक शक्ति बन चुका था। सोवियत संघ की यात्रा के बाद नेहरू समाजवादी अर्थव्यवस्था के प्रशंसक बन गए और प्रधानमंत्री के रूप में, कांग्रेस के भीतर और बाहर दक्षिणपंथी ताकतों के विरोध के बादजूद राज्य-नियंत्रित, नियोजित आर्थिक विकास का रास्ता अपनाया और पहली पंचवर्षीय योजना पूरी होते-होते नवजात भारतीय गणतंत्र की रेंगती अर्थव्यवस्था, लड़खड़ाते हुए ही सही, अपने पैरों पर खड़ी होने लगी। देश के कोने-कोने में नए स्कूल, कॉलेज एवं उच्च शिक्षा के अन्य संस्थान बनना शुरू हुए। धीरे-धीरे साक्षरता और उच्च शिक्षा का प्रसार होने लगा। नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राज्य भारतीय सामाज से ज्यादा प्रगतिशील बन गया और समाजसुधार का वाहक भी। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि 1947 में संकल्पों से झलकती अंर्दृष्टि आर्थिक विकास पर केंद्रित हो गयी। और कोई रास्ता नहीं था। औपनिवेशिक विरासत में मिले औपनिवेशिक शासन तंत्र के बूते औपनिवेशिक राज्य का जनतांत्रिक गणतंत्र में; एक दरिद्रता से जर्जर अर्थव्यवस्था का आत्मनिर्भर औद्योगिक अर्थव्यवस्था में; तथा निरक्षरता से ओतप्रोत, ऐतिहासिक कारणों से पिछड़ेपन से पीड़ित समाज का आधुनिक शिक्षित समाज में संक्रमण जटिल संक्रमण था। नेहरू की अंतर्दृष्टि और दूरदृष्टि ने जटिलतायें कुछ कम की। राज्य की वैधता ही आर्थिक विकास पर टिकी थी, जिसके लिए भारी पैमाने पर औद्योगीकरण और उसके लिए व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत थी। यूरोप और अमेरिका में, अधिकतम निजी मुनाफा कमाने और बाजार की राज्य के हस्तक्षेप से स्वतंत्रता के ऐडम स्मिथ के सिद्धांत पर आधारित पूंजीवाद अपने ही अंतर्विरोधों के भार से दब कर दम तोड़ रहा था। इसे धराशायी होने से बचाने और इसमें फिर से जान डालने के लिए केन्स के सिद्धांत पर आधारित हस्तक्षेपी राज्य और राज्य नियंत्रित कल्याकारी आर्थिक और राजनैतिक नीतियां अपनायी गयीं। लेकिन भारत में पूंजीवाद लगभग था ही नहीं, तो धराशायी होने से बचाने का सवाल ही नहीं था, सवाल पूंजीवाद के निर्माण का था। औपनिवेशिक शासन का चीन के विरुद्ध ‘अफीम युद्ध’ के दौरान अफीम तस्करी की ‘तथाकथित आदिम संचय’ से शुरू करके टाटा-बिड़ला जैसे देशी पूंजीपतियों का उदय हो चुका था लेकिन इस बड़े पैमाने पर निवेश की न तो उनकी क्षमता थी न ही नीयत। जाहिर है इसका उत्तरदायित्व राज्य को ही उठाना था। हो सकता है सोवियत संघ के राज्य नियंत्रित नियोजित अर्थ व्यवस्था से प्रभावित होने के चलते नेहरू वैसे भी कल्याणकारी राज्य चुनते, लेकिन उनके पास चुनाव का विकल्प ही नहीं था। दूसरी पंचवर्षीय योजना ने तो भारत के औद्योगिक नक्शा ही बदल दिया। अन्य पूर्व-उपनिवोशों की निर्यात पर निर्भरता के विपरीत भारत ने कम समय में ही मशीने निर्मित करने की क्षमता विकसित कर ली। हालात ये हो गए कि आपूर्ति इफरात हो गयी लेकिन सामानुपातिक मांग नहीं निर्मित हो सकी। बहुमत कृषि पर निर्भर था और कृषि में विकास नहीं हुआ। इसलिए कि औद्योगिक उत्पादों और सेवाओं के उपभोग के लिए क्रयशक्ति नहीं थी। भूमि सुधार की जरूरत आजादी के पहले से ही महसूस की जा रही थी और आजादी के बाद केंद्र और प्रांत सरकारों ने इस दिशा में कई कानून बनाए लेकिन उन्हें समग्रता में कार्यरूप नहीं दिया जा सका। इसका मुख्य कारण था, जमींदारों और बड़े किसानों की कांग्रेस में गहरी पैठ। ‘हर भारतीय को अपनी क्षमता विकसित करने का समग्र अवसर प्रदान करने’ का संकल्प स्वप्न ही बना रहा। देश अपेक्षाकृत समृद्ध हुआ लेकिन न गरीबी मिटी न असमानता घटी। 1954 में समाज का समाजवादी स्वरूप (सोसलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी) की घोषणा नारेबाजी बन कर रह गयी। जो लोग आजादी की लड़ाई के दौरान, प्रकारांतर से राष्ट्रवादी आंदोलन के विरुद्ध अंग्रजी राज की बांटो और राज करो नीति के वाहक थे और समाज में सांप्रदायिक जहर फैलाने के कसूरवार और अभूतपूर्व रक्तपात और अविश्सनीय स्तर पर विस्थापन के साथ मुल्क विखंडन के जिम्मेदार, वे गाँधी-नेहरू पर तुष्टीकरण का आरोप लगाने लगे और गाँधी जी को पाकिस्तान-परस्त खलनायक के रूप में चित्रित करने लगे। मंटो से लेकर असगर वजाहत तक कितने ही लोग इतिहास और संस्कृति के विखंडन की भयावह त्रासदी का हृदय विदारक चित्रण कहानी-उपन्यासों में कर चुके हैं। देश के बंटवारे ने सीमा के दोनों ही तरफ नफरत के बीज बो दिए जिसका इस्तेमाल शासक वर्ग आजतक कर रहे हैं। सर्वविदित है कि सावरकर के सहयोगी और आरयसयस के बौद्धिक प्रकोष्ठ के पदाधिकारी रह चुके एक धर्मोंमादी, नाथूराम गोडसे ने गाँधीजी की 1848 में हत्या कर दी। उसके बाद उमड़ा शोकाकुल जनसैलाब, नेहरू-पटेल के कुशल नेतृत्व के चलते किसी क्रिया-प्रतिक्रिया के तांडव से लगभग अछूता रहा। दोनों ही समुदायों के धर्मोंमादी उत्पातियों पर गाज गिरी। आरयसयस को अवैध घोषित कर दिया गया और इनके नेताओं को बंद कर दिया गया। गाँधी की शहादत से शोकाकुल समाज इनके प्रति घृणा से भर उठा। गोलवल्कर समेत आरयसयस नेताओं की मिन्नतों, पार्टी के अंदर और बाहर दक्षिणपंथियों के दबाव तथा अपनी भलमनसाहत और सदाशयता के चलते नफरत का जहर फैलाने वाले संगठनों से पाबंदी उठाना, नेहरू सरकार की एक बड़ी राजनैतिक गलती थी। पटेल की 1950 में मृत्यु हो गयी थी और 1952 के पहले संसदीय चुनाव के बाद राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बन गये। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद, नेहरू के नेतृत्व में 1952 के पहले संसदीय चुनाव में कांग्रेस को इतना व्यापक बहुमत मिला कि संसद लगभग विपक्ष-विहीन थी। लेकिन हिंदुत्व और इस्लामी कट्टरपंथी बिल्कुल ही नदारत नहीं थे। हिंदू महासभा और जनसंघ तथा मुस्लिम लीग भी क्रमशः 4,3,1 सीटों पर विजयी हुए थे। कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव में भागीदारी नहीं की थी, दक्षिणपंथी दबाव में कांग्रेस से अलग हुई कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी अभी तक एक सुगठित पार्टी के रूप गठित नहीं हो पायी थी। वर्कर्स येंड पीजेंट पार्टी और रिवल्यूसलरी सोसलिस्ट पार्टी जैसे छोटे-मोटे वामपंथी संगठनों की भी संसद में उपस्थिति दर्ज हुई। पहली पंचवर्षीय परियोजना की उपलब्धियों के नाम पर 1957 के दूसरे चुनाव में भी नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को लगभग 70% सीटें मिली। आरयसयस की संसदीय शाखा, जनसंघ को 4 सीटें मिली थीं। प्रमुख विपक्ष वामपंथी पार्टियाँ थीं (सपीआई 27; प्रजा सोसलिस्ट पार्टी 19; फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सिस्ट) 2; पीजेंट्स येंड वर्कर्स पार्टी 4)। मुस्लिम लीग ने अपनी एक सीट बरकरार रखा। ‘राष्ट्र-निर्माण’ के उत्साह में लोगों ने दक्षिणपंथी आक्रामता को खारिज कर दिया था। इस चुनाव में एक अनहोनी सी हो गयी। केरल की 101 सदस्यों वाली विधान सभा में, पहला चुनाव लड़ने वाली सीपीआई को लगभग 41% मतों के साथ 60 सीटें मिलीं और 18% मतों के साथ प्रजा सोसलिस्ट पार्टी को 9। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने अकेले बहुमत के बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन की साझी विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए पीयसपी (प्रजा सोसलिस्ट पार्टी) के साथ, कई किसान-मजदूर-छात्र आँदोलनों का नेतृत्व कर चुके तथा सीयसपी के संस्थापक सहसचिव, ईयमयस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में संयुक्त सरकार बनाया। सरकार में बने रहने के मुद्दे पर पीयसपी में विवाद हुआ। राम मनोहर लोहिया को पार्टी से निकाल दिया गया और पीयसपी दो-फाड़ हो गयी, जिस पर चर्चा की गुंजाइश यहाँ नहीं है। केरल सरकार ने नेहरू के संकल्पों को कार्यरूप देने का प्रयास किया और सबसे पहले शिक्षा और भूमि-सुधार पर ध्यान केंद्रित किया। दो कदम बढ़ी ही थी कि 1959 में कांग्रेस अध्यक्ष, इंदिरा गाँधी के दबाव में, केरल सरकार को भंग कर, नेहरू ने जीवन की भयंकर धृतराष्ट्रीय राजनैतिक गलती की। यह नेहरू के अन्यथा साफ-सुथरे; विवेकसम्मत; लोकतांत्रिक व्यक्तिव्य पर बड़ा सा काला धब्बा है। नेहरू की विदेशनीति के विस्तार में जाने की न गुंजाइश है न ही जरूरत। पंचशील के सिद्धांत और गुनिरपेक्षता की अवधारणा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और राजनय के इतिहास में नेहरू का अभूतपूर्व योगदान है। शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों को चुनौती देते हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन नाम से एक तीसरी स्वतंत्र शक्ति खड़ी करना नेहरू की अंत:दृष्टि, राजनैतिक साहस और दूरदृष्टि का परिचायक है। 1962 के तीसरे चुनाव में भी नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला लेकिन पिछले चुनाव से थोड़ा कम। कम्युनिस्ट और सोसलिस्ट पिछले चुनाव की संख्या पर टिके रहे लेकिन भारतीय जनसंघ 4 से 14 पर पहुँच गयी तथा पहुँच बढ़ाने के मुद्दे तलाशने लगी और 1966 में गोरक्षा के नाम पर साधू-संतों का जुलूस निकाला। एक और प्रतिगामी बात हुई इस चुनाव में, मीनू मसानी के नेतृत्व में राजे-रजवाड़ों की दक्षिणपंथी स्वतंत्र पार्टी को 18 सीटें मिलीं। 1962 में पंचशील के सिद्धांत नाकाम होते दिखे और चीन से युद्ध न टल सका। युद्ध की तबाही से आहत देश के घावों पर मरहम लगाते हुए, आखिरी दिनों में नेहरूजी, जैसा कि युद्ध के बाद के उनके वक्तव्यों से लगता है, आजादी के संकल्पों को पूरा न करने के मलाल में रहे और 5 मई 1964 को हृदयगति रुक गयी और एक बार फिर शोकाकुल देश अनिश्चितता के भंवर में फंसता दिखा। एक युद्ध की तबाही और नेहरूजी के निधन के शोक से मुल्क अभी उबर नहीं पाया था कि 1965 में एक और युद्ध में फंस गया, इस बार पाकिस्तान के साथ। यद्यपि कुल मिलाकर नेहरू शासन की सबसे बड़ी नाकामी रही, संविधान के भाग 4 में वर्णित राज्य की नीति-निर्देशक सिद्धांतों को अमली जामा न पहना पाना, खासकर 1960 तक सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा का संकल्प, जो आज नेहरूजी की मृत्यु के 56 साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया, फिर भी शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के मामले में एक लंबी दूरी तय हुई। तमाम नए स्कूल-कॉलेजों के अलावा कई नए विश्वविद्यालय खुले; आईआईटी, आल इंडिया इल्स्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, इंडियन इन्स्टीच्युट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज स्थापित हुए; विश्वविद्यालय अनुदान आयोग; इंडियन कौंसिल ऑफ सोसल साइंस रिसर्च; इंडियन कौंसिल ऑफ अग्रीकल्चरल सिसर्च; इंडियन कौंसिल ऑफ साइंस येंड इंडस्ट्रियल रिसर्च आदि की सांस्थानिक शुरुआत इसी दौर की देन है। इन संस्थानों की स्वायत्तता और स्थापना के मकसदों पर खतरे के घने बादल मंड़रा रहे हैं। नेहरू शासन की एक महत्वपूर्ण कामायाबी थी सामाजिक चेतना के पिछड़ेपन को चीरते हुए सामासिक संस्कृति का निर्माण जो नेहरूवादी आर्थिक नीतियों की तिलांजलि के साथ धसकने लगी है। नेहरू की नीतियों को तिलांजलि देने और पलटने की शुरुआत 1991 में विश्वबैंक आरोपित भूमंडलीकरण की शर्तों पर अंगूठा लगाकर उन्ही की विरासत के दावेदारों ने किया और मौजूदा शासन तो उसे इतिहास से मिटाने के फेर में है। नेहरूजी और क्या-क्या कर सकते थे और क्या-क्या करना चाहिए था या क्या-क्या नहीं किया, जैसे सवालों का कोई मतलब नहीं है। नेहरू दुर्लभ अंतःदृष्टि के एक सामाजिक जनतंत्रवादी थे जो संसदीय रास्ते से, राज्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन करना चाहते थे; वैज्ञानिक शिक्षा के माध्यम से अंधविशवासों और धर्मांधता से जकड़े समाज को एक प्रगतिशील समाज बनाना चाहते थे। नेहरू किन-किन कारणों से क्या-क्या नहीं कर पाये, यह एक अलग चर्चा का विषय है। इस लेख का समापन करते हुए कहा जा सकता है कि नेहरू ने गुलामी से आजादी में संक्रमण की प्रक्रिया को एक प्रगतिशील दिशा दी; गुलामी की मार से कहारते, अविकसित मुल्क को एक औद्योगिक तथा आत्मनिर्भर मुल्क बनाया। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि वांछनीय स्तर के औद्योगीकरण के लिए निजी पूंजीपतियों की न तो शक्ति थी न इच्छा। भेल, सेल, ओयनजीसी सरीखे नवरत्न जिसे बेचकर मौजूदा सरकारें देश की ‘आय’ बढ़ाने की जुगत में लगी हैं, नेहरू शासन की देन हैं। भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में महाशक्तियों के वर्चस्व को चुनौती देने की शक्ति नेहरू के ही नेतृत्व में अर्जित किया जिसे हाल की सरकारें विश्व बैंक के पास गिरवी रखने की तिकड़मों में लगी हैं। देश के लिए निर्भीक, चिंतनशील, जिम्मेदार नागरिक बनाने और नए-नए ज्ञान के अन्वेषण के लिए, स्वायत्त विश्वविद्यालयों की अवधारणा नेहरू के ही तार्किक दिमाग की उपज है, जिसे मौजूदा सरकार नेस्त-नाबूद करने पर तुली है। भारतीय गणतंत्र के सत्तरवें वर्ष में, प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, भारत के पहले प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि के इस वाक्य से कलम को विराम देना चाहूँगा कि जवाहरलाल नेहरू देश के एक मात्र दूरदर्शी प्रधानमंत्री हुए हैं जिन्होने जनतांत्रिक और सामाजिक न्याय की अवधारणाओं को संस्थागत रास्ते पर अग्रसरकिया। आज जब इन संस्थानों और मूल्यों पर फासीवादी खतरे के बादल मड़रा रहे हों, तो नेहरूजी की याद जरूरी लगती है।

लेखक: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग में प्राध्यापक रहे ईश मिश्रा सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहते हैं। ईमेल : mishraish@gmail.com

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This