नोटबंदी के चार साल, युवाओं की एक पीढ़ी की बर्बादी बेमिशाल

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‘इतना संवेदना शून्य कोई लोकतांत्रिक शासक हो सकता है जो नोटबंदी जैसी आपदा से युवाओं को बर्बाद करके नाचे, और आँगन में मोर नचाये’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || नवंबर 08, 2020 || जयपुर : चार साल पहले आज ही के दिन नोटबंदी हुई थी। उसी दिन से सत्यानाश की कहानी शुरू हो गयी। कई तरह के दावे हुए कि ये ख़त्म हो जायेगा वो ख़त्म हो जायेगा। मूर्खतापूर्ण फ़ैसले को भी सही ठहराया गया। बड़े और कड़े निर्णय लेने की सनक का भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत गहरी क़ीमत चुकानी पड़ी है। दशकों की मेहनत एक रात के फ़ैसले से तबाह हो गयी। हफ़्तों लोग लाइन में लगे रहे। लोगों के घर में पड़े पैसे बर्बाद हो गये। सबको एक लाइन से काला धन करार दिया गया और काला धन कहीं और के लिए बच गया। उसके लिए बना इलेक्टोरल फंड, जिसमें पैसा देने वाले का नाम गुप्त कर दिया गया। अदनी राजनीतिक समझ और कूपमंडूक अर्थशास्त्रियों ने उस वक्त इस फ़ैसले को सबसे बड़ा फ़ैसला बताया गया। मगर अपनी मूर्खता की तबाही देख, सरकार भी भूल गयी, और उसके दलाल विशेषज्ञ अदानी-अंबानी के दरबारी बन गये। मोदी जी तो नोटबंदी का नाम नहीं लेते है। मिला क्या उस फ़ैसले से ? मोदी सरकार ने नोटबंदी कर लघु व छोटे उद्योगों की कमर तोड़ दी। हिन्दू मुस्लिम नफ़रत के नशे में लोग नहीं देख सके कि असंगठित क्षेत्र में मामूली कमाने वाले लोगों की कमाई घट गयी। उनका संभलना हुआ नहीं कि जीएसटी आई और फिर तालाबंदी। इन तीन चरणों में अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देश को बेरोज़गारी की आग में झोंक दिया। लाखों करोड़ों घरों में आज उदासी है। भारत को संभावनाओं का देश बनाने की जगह कपोर-कल्पनाओं का देश बना दिया। युवाओं की एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गयी। उनके सपनों में नफ़रत भर दी गयी। बुज़दिल बना दिये गये। उन्हें हर बात में धर्म की आड़ में छिपना बतला दिया। महान बनने की सनक का दूसरा नाम है नोटबंदी। स्तंभकार विजय शंकर सिंह का कहना है कि नोटबन्दी या विमुद्रीकरण का फैसला कैबिनेट का था या किचेन कैबिनेट का यह न तब पता लग पाया और न ही कोई आज बताने जा रहा है। जब कभी कोई किताब लिखी जायेगी या इस मास्टरस्ट्रोक से जुड़ा कोई नौकरशाह मुखर होगा और अपने महंगे संस्मरण की किताब अंग्रेजी में लिखेगा तो, हो सकता है, सारी बातें सामने आयें । पर इस विनाशकारी निर्णय की जिम्मेदारी कौन लेगा ? पूरी पार्टी ? या सरकार ? या सरकार के प्रमुख ? चर्चा तो यहां तक है कि कुछ चहेते पूंजीपतियों को तो इस कदम की जानकारी थी, पर देश के तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली इस जानकारी से अनभिज्ञ ही थे। तत्कालीन गवर्नर, आरबीआई को भी 8 नवम्बर को अपराह्न इस मास्टरस्ट्रोक की जिम्मेदारी दी गयी जबकि संविधान के अनुसार आरबीआई की मौद्रिक नीति और प्रशासन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। छोटे बच्चे तक जानते हैं हैं कि जब आर्थिक स्थितियाँ गड़बड़ होतीं हैं तो उसका परोक्ष प्रभाव अपराध और समाज पर भी पड़ता है। पर, जुमलों के मसीहा मोदी शायद यह आज तक नहीं जाँ पाये, या खुद अनजाने बन बैठे हैं, यही नोटबंदी के काल का यक्ष प्रश्न है। नोटबंदी जन्य आर्थिक गतिरोध से रोज़गार के अवसर कम हुए हैं, उद्योगों पर असर पड़ा है, उनमें मंदी आयी है, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में शून्य विकास दर आ चुकी है, बेरोजगारी तो बुरी तरह बढ़ गयी है और देश का आर्थिक ढांचा हिल गया है। इसका सीधा प्रभाव अपराध वृद्धि पर पड़ रहा है। मैं जब यह वाक्य लिख रहा हूँ तो, मेरे सामने, उनकी देहभाषा अब भी नाच रही है। देशवासियों से यही आखरी यक्ष प्रश्न दोहराता हूँ कि क्या इतना संवेदना से शून्य कोई लोकतांत्रिक शासक हो सकता है ? रवीश कुमार और विजय शंकर सिंह के लेखों पर आधरित आलेख

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