मनुस्मृति नहीं, अंबेडकर स्मृति ‘संविधान’ से ही भारत विश्व गुरु बन सकता है – प्रोफ़ेसर राम लखन मीना

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || नवंबर 09, 2020 || जयपुर : आज की दुनिया का सबसे महान मार्गदर्शक ग्रंथ महाभारत है क्योंकि यह समय संघर्ष और सफलताओं को सभी सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों को प्रति ध्वनित करता है। ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि भारत समेत सभी छोटे-बड़े देश आज 21 वी शताब्दी के अंधेरे में भटक रहे हैं और सामाजिक आर्थिक गैर बराबरी के संक्रमण से जूझ रहे हैं। कोई लोकतंत्र के माध्यम से तो कोई तानाशाही के रथ पर बैठकर तो कोई धर्म जाति की नाव में चढ़कर अपने सुख साधन और संपूर्णता के स्वर्ग खोज रहा है। विश्वभर में वर्तमान में 204 देश है और इनमें भारत ही अकेला एक ऐसा चमत्कारी अजायबघर है, जो कौरव पांडवों का इतिहास बन कर भी अब विद्रूपता ओं से भरे समय में अपने झूठ और सच का युद्ध लड़ रहा है। आज भारत का लोकतंत्र इसलिए धर्म और आस्था के घाट पर बैठकर वर्तमान की राजनीति का चंदन घिस रहा है कि उसे सामाजिक‌-आर्थिक न्याय की महाभारत पढ़ने से डर लगता है। आश्चर्य तो यह है कि उसे अपनी 5000 साल की पुरानी सैंधव सभ्यता और संस्कृति को लेकर यह नहीं दिख रहा है कि बाल्मीकि और तुलसी रामायण में क्या फर्क है और मनुस्मृति और अंबेडकर स्मृति ‘संविधान’ के विवाद को समझना होगा। मनुस्मृति जहाँ शोषण, अत्याचार, अनाचार और अमानवीयता का पर्याय है, वहीं अंबेडकर स्मृति समता, समानता, न्याय, सदाचार और मानवीय जीवन-मूल्यों की संरक्षक है। आज भारत के लोकतंत्र का संकट यह है कि वह युधिष्ठिर और दुर्योधन में तथा द्रोपदी और गंधारी की मनोदशा में कोई अंतर नहीं जानता है। शक्ति, सत्ता, व्यक्ति-भक्ति और अनुरक्ति की श्रीमद् भगवत गीता को पढ़ते-पढ़ते वह बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के राजधर्म को भूल गया है। परिणाम यह है कि हम हजारों साल बाद भी भारत की वैदिक आत्मा को मानवाधिकारों के सामान्य गरिमा तक नहीं लौटा पा रहे हैं। हम इतने डरे हुए हैं कि हम अपनी पहचान तक को भी आज हिंदू-मुसलमान, सिख-ईसाई में तलाश रहे हैं। समय की यह महाभारत कुछ इस तरह से सामाजिक-आर्थिक असमानता को आगे बढ़ा रही है कि कोई यह नहीं बताता कि 21वीं शताब्दी का संघर्ष हम 14वीं या 15वीं शदी के अस्त्र-शस्त्रों से क्यों लड़ रहे हैं और विकास तथा परिवर्तन के वर्तमान सामाजिक सरोकारों की अनदेखी कैसे कर रहे हैं। हमारी विडंबना यह है कि हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है और इसमें 90% आबादी निर्धन और सर्वहाराओं की है। हम हजारों साल बाद भी बाल्मीकि, रविदास और दादू दयाल को शुद्र-दलित समझ कर अपमानित करते हैं। आज अमेरिका तक में श्वेत-अश्वेत और भारत में जातिभेद लोकतंत्र की राजनीति को हिंसक बना रहा है और इसाई- इस्लाम के नाम पर पूरी दुनिया की मानवता को प्रभुत्व के महासंग्राम में धकेल रहा है। भारत में हिंदी -हिंदू- हिंदुस्तान की महाभारत तो बहुत नई है लेकिन पाखंड यह है कि हम कुएं में मेंढक की तरह अपने सनातन और सद्भाव को राजनीति की संकीर्णता में धकेल रहे हैं। यह समय इसलिए मामूली नहीं है कि हम कोरोना के आतंक में जान और जहान की महाभारत लिख रहे हैं अपितु इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हमें अपने लोकतंत्र को आपदा से प्राप्त अवसर के अच्छे भविष्य में बदलना चाहिए। हमें संकट में भी अपनी असली हैसियत और विरासत जानने का मौका मिलता है। महाभारत की आज ये ही व्याख्या हो सकती है कि हम अपने मन की दुनिया को उन सब के लिए खोलें जो हजारों साल बाद भी भुखमरी, बेरोजगारी, सामाजिक और आर्थिक गुलामी से पीड़ित है और छल-बल से असहाय, अनाथ, मानवता का शोषण कर रहे हैं। नवरात्र की साधना के बाद भी आपको ऐसा क्यों नहीं लगता है कि हम नारी समाज के प्रति कई अपराधों और आतंकवादी है। दुर्गा सप्तशती के पाठ हमारे समाज में वर्तमान स्त्री को किस तरह स्थापित कर रहा है? यही आज भारत माता का सबसे बड़ा सवाल है। आजादी और संविधान के कंधों पर बैठा लोकतंत्र जब आपको याद दिला रहा है कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास ईमानदारी से स्थापित किये बिना, हम भारत के लोग कभी खुशहाल नहीं हो पायेंगे। महात्मा बुद्ध के मुखारविंद से निकला सत्व वाक्य ‘अत्त दीपो भव, भवतु सब्ब मंगलम’ का संदेश यही तो है कि अपना दीपक खुद बनो, और सामाजिक आर्थिक क्षमता विकसित किये बिना उद्धार संभव नहीं है। आज का मनुष्य यही तो जानना चाहता है कि यह गरीबी कहाँ से आती है और यह जल जंगल जमीन किसकी थाती है और सीता द्रौपदी भी हजारों साल बाद भी इस महान भारत में क्या चाहती है। इसलिए यह समय सबसे जवाब माँग रहा है क्योंकि हम चुप हैं, उदासीन है, और सच कहने से डरे हुए हैं। यदि हम भारत के 135 करोड़ देवी देवता सतर्क होते तो आज देश में भुखमरी, अराजकता, हिंसा और धर्म-जाति की गंदी राजनीति का गंदा खेल झूठ और पाखंड के प्रचार से चुनाव दर चुनाव नहीं जीत था और हम अपने ही घर में अपनी महाभारत नहीं हारते! चिंतक एवं विचारक श्री वेद व्यास के लेख पर आधारित आलेख

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