गहलोत सरकार को दूर करनी होगी कॉलेजों में प्रोफ़ेसर के पदों को भरने की आरक्षण की प्रक्रियागत खामियाँ

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || नवंबर 11, 2020 || जयपुर : राजस्थान सरकार ने भले ही कॉलेजों में प्रोफेसरों के पदों का सृजन कर दिया है , किंतु उनको भरने के लिए सुस्पष्ट प्रक्रिया का उल्लेख नहीं किया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रोफेसरों के पदों को किस स्तर पर भरा जायेगा। चूँकि यूजीसी ने प्रोफेसरों के पदों को भरने के लिए प्रमोशन और सीधी भर्ती (डायरेक्ट रिक्रूटमेंट) की प्रक्रिया कमोबेश एक समान है।

ऐसे में राज्य सरकार को तय करना होगा कि यह प्रक्रिया वह आरपीएससी के स्तर पर करवायेगी या कॉलेज शिक्षा निदेशालय के स्तर पर क्योंकि बिना साक्षात्कार के प्रोफ़ेसर पर नियुक्ति नहीं हो सकती है। आरक्षण की व्यवस्था लागू करनी होगी । यह भी पढ़ें : कॉलेजों में प्रोफेसर्स के 477पद सृजित, आरक्षित-वर्गों के हितों पर कुठाराघात, भर्ती-प्रक्रिया दिशाहीन साक्षात्कार की प्रक्रिया में तीन विशेषज्ञों को बुलाना होगा।

वहीं, प्रोफ़ेसर रेंक के एससी / एसटी के ऑब्जर्वर को भी साक्षात्कारों में बुलाना होगा। महाविद्यालयों में आचार्य पद के उपरान्त प्राचार्य पद पर पदोन्नति होती है और जब एससी/एसटी वर्ग के संकाय सदस्य आचार्य बनने से ही वंचित हो जायेगें तो इस स्थिति में एससी / एसटी वर्ग के लोग प्राचार्य कैसे बन पायेगें।

यह विचारणीय है। एससी / एसटी / ओबीसी के लोगों में इस बात को लेकर घोर असंतोष एवम् गुस्सा है। राज्य सरकार ने 200 अंक रोस्टर प्रणाली को स्वीकार कर लिया है और इसके अनुरूप विषयवार उपलब्धता एक इकाई कदापी नहीं हो सकती क्योंकि राजस्थान में समस्त राजकीय महाविद्यालय कॉलेज शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित है। अतः सम्पूर्ण कॉलेज शिक्षा विभाग को एक इकाई मानते हुए पर सृजित किये गये प्रोफेसर्स के पदों में आरक्षण-व्यवस्था को लागू करनी होगी।

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चयन की यह प्रक्रिया यहीं ख़त्म नहीं होगी और राज्य सरकार को इससे भी जूझना पड़ेगा कि कॉलेज शिक्षा में कार्यरत 80-85 फीसदी शिक्षक खुद पीएच-डी धारक नहीं है और अधिकांश को शोधार्थियों को उनके शोध-कार्यों में निर्देशित करने का अनुभव नहीं है। जबकि यूजीसी की अधिसूचना के अनुसार प्रोफ़ेसर के पद की चयन-प्रक्रिया (सीएएस पदोन्नति एवम् सीधी-भर्ती) में शामिल होने के लिए किसी भी शिक्षक द्वारा उनके निर्देशन में कम-से-कम तीन पीएच-डी अवार्ड होने की अपरिहार्यता है।

और माननीय राजस्थान हाईकोर्ट की डिविजनल बेंच राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति जेपी सिंघल बनाम राज्य सरकार में अपने निर्णय में कह चुकी है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार यूजीसी की अधिसूचनाओं को लागू करने के लिए बाध्य है। हाँ, तीन पीएच-डी अवार्ड होने की अपरिहार्यता को कम कर सकती है। यह भी पढ़ें : राजस्थान के कॉलेजों में शिक्षक प्रोफ़ेसर बन सकेंगे,किंतु पीएचडी अनिवार्य,आरक्षित-वर्गो को होगा नुकसान इसी निर्णय के आलोक में राज्य सरकार ने राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति में दस वर्ष के प्रोफ़ेसर के पर के रूप में अनुभव की बाध्यताओं संबंधी बिल राज्य विधानसभा में जुलाई 2019 में पारित किया है और यह कानून अब पूर्णतया राज्य में लागू है।

वहीं, राज्य सरकार द्वारा यूजीसी के निर्देशानुसार पीजी कॉलेजों में रिसर्च केंद्रों की स्थापना करनी है। किंतु इस पर भी राज्य सरकार अभी तक पूर्णत मौन साढ़े हुए है। सूत्रों का कहना है कि केवल राजस्थान विश्वविद्यालय ने ही इस दिशा में कदम उठाये हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि इस दिशा में तत्काल कोई कारगर कदम उठाये और सभी पीजी कॉलेजों में रिसर्च केंद्रों की स्थापना करें ताकि ग्रामीण परिवेश के शोधार्थियों और शिक्षकों को फायदा मिल सके।

प्रोफ़ेसर के पदों पर आरक्षण की व्यवस्था का जिक्र नहीं प्रोफ़ेसर के पदों पर एससी / एसटी / ओबीसी और आर्थिक रूप से पिछड़ों एवम् शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था का जिक्र नहीं किया गया है। संवैधानिक रूप से सभी पदों में क्रमशः 15%, 12%, 22%, 10% और 3% (वर्टिकल) आरक्षण देने की बाध्यता है। ऐसे में आरक्षण का प्रावधान नहीं करना दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे आरक्षित-वर्गों में व्यापक असंतोष है।

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