वैचारिकी : डॉ अंबेडकर जीते जी, आरएसएस के चंगुल में नहीं आये, पर अब अंबेडकर को आरएसएस से बचाना होगा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || दिसंबर 06, 2020 || जयपुर : सर्वविदित है कि आज के ब्राह्मणों के पूर्वज आर्य चाव से गोमांस खाते थे और डॉ अंबेडकर भी गोमांस के शौक़ीन थे। गोमांस खाने वाले अंबेडकर आरएसएस के प्रिय कैसे हो सकते हैं ? आरएसएस को सर्वाधिक खतरा अंबेडकर कि विचारधारा और अंबेडकरवादियों से है। फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर ‘विद्वान सर्वत्र पूज्यते’ के आधार पर डॉ अंबेडकर की जयजयकार की जा रही है, तो उनके जीते जी उनकी जयजयकार क्यों नहीं की गयी थी ? इस सवाल पर गौर करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह विद्वान सर्वत्र पूज्यते का मामला नहीं है। मामला असल में वोट का है। आरएसएस और भाजपा जानते हैं कि डॉ अंबेडकर वोट दिला सकते हैं। इसलिए उनकी जयजयकार जरूरी है। इसी परिप्रेक्ष्य में जब हम डॉ अंबेडकर को देखते हैं, तो बीफ वे भी खाते थे। और “अछूत कौन” किताब में उन्होंने यह भी साबित किया है कि प्राचीन भारत में आर्य और ब्राह्मण भी गोमांस खाते थे। जब वे जीवित थे तो हिंदू धर्मगुरुओं और नेताओं ने उनके ख़िलाफ़ जमीन-आसमान एक कर दिया था। हिंदू कोड बिल के दौरान उन्होंने उनके पुतले जलवाये थे। आज वही आरएसएस और हिंदू नेता डॉ अंबेडकर की जयजयकार कर रहे हैं ? लेकिन खतरनाक यह है कि वोट के साथ आरएसएस का एक और खेल चल रहा है। उसको जानना-समझना जरूरी है। यह सिर्फ वोट की ही राजनीति नहीं है कि आज डॉ अंबेडकर आरएसएस और हिंदू राजनीति के लिए रातोंरात इतने महत्वपूर्ण हो गये कि उनकी प्रतिमा का दूध से अभिषेक किया जाने लगा? या उनकी जयंती पर खिचड़ी का समरसता भोज दिया जाने गया ? या फिर उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर घड़ियाली आँसू बहाये जाये। उनका जगराता किया जाने लगा और भजन संध्या आयोंजित की जाने लगी ? इतना प्यार कैसे उमड़ पड़ा अंबेडकर के लिए ? क्या यह अंबेडकर को ठिकाने लगाने का काम तो नहीं है? ब्राह्मणों ने हर उस क्रांतिकारी नायक को ठिकाने लगाया है, जिससे उन्हें खतरा था। उन्होंने बुद्ध को विष्णु का अवतार बताया और ठिकाने लगा दिया। उन्होंने कबीर को विधवा ब्राह्मणी का औरस पुत्र और ब्राह्मण रामानन्द का शिष्य बताया और ठिकाने लगा दिया। उन्होंने रैदास को पूर्व जन्म का ब्राह्मण रामानन्द का शिष्य बताया, पेट में जनेऊ दिखायी और ठिकाने लगा दिया। अब कबीर और रैदास क्रांतिकारी नहीं रहे, राम के भक्त हो गये। दलित लेखक लाख पर्दा हटाते रहें, पर आम जनता कबीर और रैदास की क्रांति को भुला चुकी है। यही अब डॉ अंबेडकर के साथ भी होने वाला है। उन्हें पूजा की वस्तु बनाने की प्रक्रिया शुरु हो गयी है। हालांकि इसकी शुरुआत राजनीति में दशकों पहले हो चुकी थी, जब धड़ाधड़ जगह-जगह उनकी मूर्तियाँ खड़ी करने का सिलसिला शुरु हुआ था। दलित नेताओं के द्वारा उन मूर्तियों पर साल में दो बार ; 14 अप्रेल और 6 दिसम्बर को फूलमालाएँ चढ़ाने का काम होता था और उनके नाम के जयकारे लगाये जाते थे। इसके सिवा वे कुछ नहीं करते थे। वे अंबेडकर की विचारधारा को न खुद जानते थे और न जनता को बताते थे। ऐसी स्थिति में वही होना था, जो आज भाजपा और आरएसएस के लोग कर रहे हैं। पर इसके परिणाम दलित वर्गों के लिए बहुत घातक होंगे। आरएसएस के लेखकों और इतिहासकारों ने तो बहुत सालों से डॉ अंबेडकर को विचारधारा के स्तर पर हिंदू राष्ट्रवादी साबित करना शुरु कर दिया है। प्रमाण के लिए उनके ऑर्गनाइजर, पांचजन्य और दलित आंदोलन पत्रिकाओं के अगले-पिछले अंकों को देखा जा सकता है। वे जो साबित कर रहे हैं, उनमें डॉ अंबेडकर मुस्लिम विरोधी थे, इस्लाम के कटु आलोचक थे, गीता से प्रेरणा लेने वाले थे और राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। आगे चलकर वे इन स्थापनाओं में भी सफल हो जाएँगे कि डॉ अंबेडकर में ब्राह्मण मस्तिष्क था, क्योंकि उनके गुरु ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी ब्राह्मण थी और उन्हें बौद्ध धर्म की ओंर भी ब्राह्मण भिक्षु ही ले गये थे। निश्चित रूप से आज के दलित बुद्धिजीवी इसका खंडन करेंगे। हो सकता है आगे भी एकाध पीढ़ी तक यह खण्डन चले। पर उनका खेल एक दो पीढ़ियों के लिए नहीं है। वे अगली सौ पीढ़ियों को तैयार करने के लिए काम करते हैं। इसलिए डॉ अंबेडकर के प्रति आरएसएस और भाजपा के इस आकस्मिक प्रेम को अभी विफल करना होगा। इसका एक ही रास्ता है डॉ अंबेडकर की मूल विचारधारा को जनता तक ले जाना और उन्हें पूजा की वस्तु बनाने से रोकना। साभार : इनपुट कँवल भारती

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