किसान आंदोलन: मोदीसरकार बाजार आधारित कृषि हेतु काम कर रही है नकि देशके 14करोड़ किसान परिवारों के लिए

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || दिसंबर 08, 2020 || जयपुर-सिंघु बॉर्डर : मोदी सरकार कह रही है कि हम मंडियों में सुधार के लिए यह कानून लेकर आ रहे हैं। लेकिन, सच तो यह है कि कानून में कहीं भी मंडियों की समस्याओं के सुधार का जिक्र तक नहीं है। सभी तीनों कृषि बिल मोदीजी के कॉपोर्रेट मित्रों अड़ानी-अंबानी की मिल्कियत बढ़ाने के लिए हैं ना कि किसानों की आय! हर बदलाव को सुधार नहीं कहा जा सकता है। कुछ विनाश का कारण भी बन सकते है। देश ने ऐति‍हासिक सुधार के नाम पर नोटबंदी को झेला और भयावह परिणाम देखने को मिले। इस एक कदम से लाखों नौकरियाँ और सैकड़ों जिंदगियाँ खत्म हो गयीं। जीएसटी को भारत की आर्थिक आजादी के रूप में दिखाया गया। दो फीसदी जीडीपी बढ़ाने का दावा किया गया। जीएसटी आधी रात में आ तो गया। लेकिन, कभी जीडीपी को ऊपर नहीं बढ़ा पाया। अलग से अर्थव्यवस्था को और नीचे लेकर चला गया। कोविड-19 से लड़ने के नाम पर पूरे देश में महज 4 घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन किया गया। 21 दिन की अभूतपूर्व लड़ाई बतायी गयी। कोरोना तो खत्म नहीं हुआ। लेकिन, हजारों प्रवासी मजदूरों की जिंदगियाँ देश की सड़कों पर खत्म हो गयीं। लाखों नौकरियाँ चली गयीं। अर्थव्यवस्था निगेटिव हो गयी। अब इतिहास बनाने के नाम पर किसानों को चुना गया है। सदन में तमाम हो-हल्‍ले के बीच किसानों की नई आर्थिक आजादी की कहानी लिखी जा चुकी है। एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने द्वारा लाये गये सुधारों को नई आजादी के रूप में प्रचारित किया है। लेकिन, सच कितना है, इसे लेकर कई सवाल हैं। संसद ने किसानों के लिए 3 नए कानून बनाए हैं। पहला है ”कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020”। इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है। किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पायेंगे। निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पायेंगे। लेकिन, सरकार ने इस कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है। इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गयी है। बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आये हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं। क्‍या होगा असर? यही खुली छूट आने वाले वक्त में एपीएमसी मंडियों की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी। एपीएमसी मंडी के बाहर नए बाजार पर पाबंदियाँ नहीं हैं और न ही कोई निगरानी। सरकार को अब बाजार में कारोबारियों के लेनदेन, कीमत और खरीद की मात्रा की जानकारी नहीं होगी। इससे खुद सरकार का नुकसान है कि वह बाजार में दखल करने के लिए कभी भी जरूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर पायेगी। इस कानून से एक बाजार की परिकल्पना भी झूठी बतायी जा रही है। यह कानून तो दो बाजारों की परिकल्पना को जन्म देगा। एक एपीएमसी बाजार और दूसरा खुला बाजार। दोनों के अपने नियम होंगे। खुला बाजार टैक्स के दायरे से बाहर होगा। सरकार कह रही है कि हम मंडियों में सुधार के लिए यह कानून लेकर आ रहे हैं। लेकिन, सच तो यह है कि कानून में कहीं भी मंडियों की समस्याओं के सुधार का जिक्र तक नहीं है। यह तर्क और तथ्य बिल्कुल सही है कि मंडी में पाँच आढ़ती मिलकर किसान की फसल तय करते थे। किसानों को परेशानी होती थी। लेकिन कानूनों में कहीं भी इस व्यवस्था को तो ठीक करने की बात ही नहीं कही गयी है। मंडी व्यवस्था में कमियाँ थीं। बिल्कुल ठीक तर्क है। किसान भी कह रहे हैं कि कमियाँ हैं तो ठीक कीजिए। मंडियों में किसान इंतजार इसलिए भी करता है क्योंकि पर्याप्त संख्या में मंडियाँ नहीं हैं। आप नई मंडियाँ बनायें। नियम के अनुसार, हर 5 किमी के रेडियस में एक मंडी। अभी वर्तमान में देश में कुल 7000 मंडियाँ हैं, लेकिन जरूरत 42000 मंडियों की है। आप इनका निर्माण करें। कम से कम हर किसान की पहुंच तक एक मंडी तो बना दें। संसद में भी तो लाखों कमियाँ हैं। क्या सुधार के नाम पर वहाँ भी एक समानांतर निजी संसद बनाई जा सकती है? फिर किसानों के साथ क्यों? क्‍या जिम्मेदारी से बचना चाहती है सरकार? आज सरकार अपनी जि‍म्मेदारी से भाग रही है। कृषि सुधार के नाम पर किसानों को निजी बाजार के हवाले कर रही है। हाल ही में देश के बड़े पूँजीजीपतियों ने रीटेल ट्रेड में आने के लिए कंपनियों का अधिग्रहण किया है। सबको पता है कि पूँजीजी से भरे ये लोग एक समानांतर मजबूत बाजार खड़ा कर देंगे। बची हुई मंडियाँ इनके प्रभाव के आगे खत्म होने लगेंगी। ठीक वैसे ही जैसे मजबूत निजी टेलीकॉम कंपनियों के आगे बीएसएनल समाप्त हो गयी। इसके साथ ही एमएसपी की पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। कारण है कि मंडियाँ ही एमएसपी को सुनिश्चित करती हैं। फिर किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचेगा। सरकार बंधन से मुक्त हो जायेगी। ठीक वैसे ही जैसे बिहार की सरकार किसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गयी है। वर्ष 2020 में बिहार में गेहूँ के कुल उत्पादन का 1% ही सरकारी खरीद हो पायी। बिहार में यही एपीएमसी कानून तो 2006 में ही खत्म किया गया था। सबसे कम कृषि आयों वाले राज्य में आज बिहार अग्रणी है। लेकिन आज यही कानून पूरे देश के लिए क्रांतिकारी बताया जा रहा है। कोई एक सफल उदाहरण नहीं है जहाँ खुले बाजारों ने किसानों को अमीर बनाया हो। बि‍हार है उदाहरण सरकार कह रही है कि निजी क्षेत्र के आने से किसानों को लंबे समय में फायदा होगा। यह दीर्घकालिक नीति है। लेकिन, बिहार में सरकारी मंडी व्यवस्था तो 2006 में ही खत्म हो गयी थी। 14 वर्ष बीत गये। यह लंबा समय ही है। अब जवाब है कि वहाँ कितना निवेश आया? वहाँ के किसानों को क्यों आज सबसे कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है? अगर वहाँ इसके बाद कृषि क्रांति आ गयी थी तो मजदूरों के पलायन का सबसे दर्दनाक चेहरा यहीं क्यों दिखा? क्यों नहीं बिहार कृषि आय में अग्रणी राज्य बना? क्यों नहीं वहाँ किसानों की आत्महत्यायें रुकीं? कई सवाल हैं। दूसरा कानून है- ”कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020”। इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है। इसे सामान्य भाषा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहते है। आप की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूँजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा। यह तो किसानों को बंधुआ मजदूर बनाने की शुरुआत जैसी है। चलिए हम मान लेते हैं कि देश के कुछ किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग चाहते हैं। लेकिन, कानून में किसानों को दोयम दर्जे का बना कर रख दिया गया है। सबसे अधिक कमजोर तो किसानों को कॉन्‍ट्रैक्ट फार्मिंग में किसान और ठेकेदार के बीच में विवाद निस्तारण के संदर्भ में है। विवाद की स्थिति में जो निस्तारण समिति बनेगी उसमें दोनों पक्षों के लोगों को रखा तो जाएगा। लेकिन, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पूँजीजी से भरा हुआ इंसान उस समिति में महंगे से महंगा वकील बैठा सकता है और फिर किसान उसे जवाब नहीं दे पायेगा। इस देश के अधिकतर किसान तो कॉन्ट्रैक्ट पढ़ भी नहीं पायेंगे। कितना समर्थ है किसान? कानून के अनुसार पहले विवाद कॉन्‍ट्रैक्‍ट कंपनी के साथ 30 दिन के अंदर किसान निपटाए और अगर नहीं हुआ तो देश की ब्यूरोक्रेसी में न्याय के लिए जाए। नहीं हुआ तो फिर 30 दिन के लिए एक ट्रि‍ब्यूनल के सामने पेश हो। हर जगह एसडीएम अधिकारी मौजूद रहेंगे। धारा 19 में किसान को सिविल कोर्ट के अधिकार से भी वंचित रखा गया है। कौन किसान चाहेगा कि वह महीनों लग कर सही दाम हासिल करे? वह तहसील जाने से ही घबराते हैं। उन्हें तो अगली फसल की ही चिंता होगी। तीसरा कानून है ”आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020”। यह न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि आम जन के लिए भी खतरनाक है। अब कृषि उपज जुटाने की कोई सीमा नहीं होगी। उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी। सरकार को पता नहीं चलेगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहाँ है? खुली छूट। यह तो जमाखोरी और कालाबाजारी को कानूनी मान्यता देने जैसा है। सरकार कानून में साफ लिखती है कि वह सिर्फ युद्ध या भुखमरी या किसी बहुत विषम परिस्थिति में रेगुलेट करेगी। सिर्फ दो कैटेगोरी में 50% (होर्टिकल्चर) और 100% (नॉन-पेरिशबल) के दाम बढ़ने पर रेगुलेट करेगी नहीं बल्कि कर सकती है कि बात कही गयी है। सरकार कह रही है कि इससे आम किसानों को फायदा ही तो है। वे सही दाम होने पर अपनी उपज बेचेंगे। लेकिन यहाँ मूल सवाल तो यह है कि देश के कितने किसानों के पास भंडारण की सुविधा है? हमारे यहाँ तो 80% तो छोटे और मझोले किसान हैं। साभार : द इकोनॉमिक टाइम्स हिंदी

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