रिपोर्ट : मोदी सल्तनत की आँखों के आगे अंधेरा छाने लग गया है, किसानों को धैर्य व संयमसे काम लेना होगा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || दिसंबर 12, 2020 || जयपुर- सिंघु बॉर्डर-दिल्ली : मोदी सरकार द्वारा दिये लिखित प्रस्ताव को किसानों द्वारा खारिज करने व आंदोलन को तेज करने की बात के बाद मोदी सल्तनत की आँखों के आगे अंधेरा छाने लग गया है। पंजाब की सियासत व पंजाबी कौम की तासीर बाकी देश से जुदा है। यह बात पूरे देश को जान लेनी चाहिए। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार के खिलाफ मुगलों से लड़ते हुए गुरु तेग बहादुर ने शहादत दी थी तो अन्याय व अत्याचार के खिलाफ गुरु गोविंदसिंह के दो पुत्रों ने चमकौर के युद्ध में शहादत दी औरएक ब्राह्मण की कारस्तानी भरी मुख़बिरी की वजह से उनके दो पुत्रों को औरंगजेब ने दीवार में चिनवा दिया था। 1699 में पाँच धर्मों के 5 वीरों अर्थात पंज प्यारों से खालसा पंथ की स्थापना की थी और सर्वधर्म समभाव की नींव रखी। इसी नींव की बुनियाद पर सिक्खिज्म,धर्म से परे हर अन्याय व अत्याचार के खिलाफ लड़ता रहा है। भारतीय किसान यूनियन “उग्राह” के प्रमुख जोगेन्द्रसिंह कहीं बिजी थे और सचिव गौरव बंसल को मीडिया मैनेजमेंट व मानवाधिकार दिवस पर कार्यक्रम करने को कह दिया। गौरव बंसल वामपंथी पृष्ठभूमि से है और लंबे समय से लोकतांत्रिक अधिकारों,मजदूरों के मसलों व किसानों के मुद्दे भी उठाते रहे है। टिकरी बॉर्डर के मुख्य मंच से 7-8 किमी पीछे की तरफ एक छोटा मंच चलता है और वहाँ पर डेमोक्रेटिक राइट के लिए आवाज उठाने वाले लोग भी आये थे।कुछ तख्तियां हाथों में थी। आरएसएससंघी टोले की आईटी सेल व गोदी मीडिया उन तख्तियों को लेकर टिटहरी की तरह एक पाँव आसमान की तरफ करके चिल्ला रहा है और समझ रहा है कि देश पर बहुत बड़ा संकट आ गया है और वो टालने के लिए आसमान को जमीं पर गिरने से रोक रहे है। मानव वृति होती है जो कई बार देश के कानूनों से परे सोचती है,व्यवहार करती है। भगतसिंह आज भी सरकारी दस्तावेजों में आतंकी है मगर पूरा देश गर्व करता है। संघी टोले के लोग भी भगतसिंह की फोटो वाली टी-शर्ट पहनकर फूंके की तरह फुले हुए घूमते नजर आते है। भिंडरावाले को सरकार आतंकी कहती है मगर सिक्ख कौम के कई लोग अन्याय व अत्याचार के खिलाफ शहीद मानते है।संघी टोला तो भारतीय कानूनों के तहत फाँसी पर लटकाये आजाद भारत के पहले आतंकी गोडसे की पूजा करता है व मंदिर तक बना रहा है। जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, बुद्धिजीवियों को सरकार नक्सलियों के साथ सम्बन्ध बताकर जेलों में डालकर बैठी है उनके साथ भी कई लोगों का मानना है कि अन्याय हो रहा है। आतंकवादी हमलों की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित, असीमानंद जब जेल में थे तो कई लोगों का मानना था कि सरकार जानबूझकर फँसा रही है और उनकी रिहाई की माँग करते थे। ऐसा नहीं है कि जो तख्तियां किसान आँदोलन के बीच जाकर ही पहली बार लहराई हो बल्कि इससे पहले कई मंचो से लेकर जंतर-मंतर पर भी कई बार धरने-प्रदर्शनों में इसी तरह की तख्तियों के साथ रिहाई की माँग की गई थी। 14अक्टूबर की भारत सरकार से जो किसान संगठनों की बात हुई थी उसके लिखित ड्राफ्ट में भी इन लोगों की रिहाई की माँग थी। अगर यह माँग गलत है व देशद्रोह है तो इन लोगों को पहले ही जेल में डाल देना चाहिए था! इन तख्तियों को लेकर संघी टोला व गोदी मीडिया जिस तरह हो-हल्ला कर रहा है,वो किसान आँदोलन को कमजोर करने,तोड़ने का रास्ता ढूंढ रहा है। एक वर्ग विशेष पंजाब के किसानों के सबसे बड़े किसान यूनियन को झंडा व वेशभूषा को लेकर टारगेट कर रहा है और बताया जा रहा है कि ये लोग शाहीन बाग में भी समर्थन देने आये थे। बिल्कुल आये थे और लंगर भी लगाया था। इन्होंने उत्तराखंड बाढ़ त्रासदी में भी लंगर लगाये थे और बिहार बाढ़ के समय भी। CAA-NRC के विरोध को लेकर पंजाब के मलेरकोटला में लाखों लोगों ने 2019 में प्रदर्शन किया था और उसमें सब धर्मों के किसान-मजदूर शामिल थे। पंजाब की तासीर धर्मों से परे मानवतावादी है और हर तरह के अन्याय व अत्याचार के खिलाफ लड़ने की है। बाकी राज्यों की जनता,विशेषकर हिंदी पट्टी के लोग इस बात को गहराई से नहीं जानते है। यही कारण है कि छोटी सी मीडिया द्वारा परोसी अफवाह पर विश्वास कर बैठती है और पंजाबी लोगों के खिलाफ एक धारणा बना लेती है। भाषा के आधार पर श्रीरामुलु की अनशन के दौरान मौत के बाद पहला राज्य बना था आँध्रप्रदेश। भाषा के आधार पर कई राज्य बने व कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच भाषा विशेष बोलने वाले क्षेत्र को लेकर अभी भी झगड़ा चल रहा है। फिर पंजाबी भाषा बोलने वालों की अलग पंजाबी सूबे की माँग करना गलत कैसे हो गया? 1956 से लेकर अभी तक यही माँग चल रही है और इसी के इर्द-गिर्द संघी टोले के लोग खेल रच रहे है। असल मे दिक्कत पंजाबी सूबे से नहीं अलग धर्म से है। यही कारण है कि सिक्ख कौम के किसानों को देखकर शुरुआत में खालिस्तानी,पाकिस्तानी लिंक का कहकर बदनाम करने की नाकाम कोशिश की गई थी मगर प्रतिक्रिया में हरियाणा,उत्तरप्रदेश व राजस्थान उठ खड़ा हुआ। फिर बातचीत को लंबी खींचकर आंदोलन को थकाने, गुटबाजी पैदा करने व किसान नेताओं को डराने/लालच देने का प्रयास किया गया मगर सब किसानों की एकजुटता व रोज बढ़ते समर्थन के कारण हवा-हवाई हो गया। 6 दिसंबर को पंजाब के मोगा में बाबा साहब के नाम पर फर्जी कार्यक्रम करके मजदूरों को किसानों के खिलाफ खड़ा करने का बीजेपी सांसद हंसराज हंस का शो भी फ्लॉप हो गया। पाकिस्तानी संसद में वोटिंग-वोटिंग की आवाज को मोदी-मोदी की आवाज बताकर झूठी अफवाह फैलाने वाला इंडिया टीवी का पद्मभूषण रजत शर्मा व तिहाड़ी चौधरी लाव-लश्कर के साथ फोटो/वीडियो के साथ मैदान में उतर पड़े तो सबसे तेज व आपको रखे सबसे आगे वाले भी पीछे कैसे रहते! ताजुब की बात यह है कि इन्हीं लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी पर कई सप्ताहों तक प्राइम टाइम करने वाले एनडीटीवी वाले रविशकुमार को भी ये तख्तियां अटपटी सी लगने लगी! बढ़ते जन समर्थन को रोकने के लिए इस तरह के ट्विस्ट बड़े मायने रखते है। तिल का ताड़ बनाने में माहिर आरएसएस धार्मिक ध्रुवीकरण की सत्ता व दलाल मीडिया सुअर की तरह किसान आँदोलन के आसपास बहती नालियों में गंदगी सूंघती फिर रही है। किसानों को धैर्य व संयम से काम लेना होगा, सावधानी व सतर्कता जरूरी है। ज्यादातर किसान इन बातों की गहराई को नहीं जानते और अभी भी अखबार में छपे व टीवी में दिखाये जा रहे प्रोपगेंडा को सत्य मानते है। आगे बंगाल व पंजाब के चुनाव है और सत्ता किसी भी हद तक जाने को तैयार है इसलिए बैठे-बिठाये अपनी तरफ से कोई मौका नहीं देना चाहिए। लंबा सफर है मीलों में मत बांटिए, कौम को कबीलों में मत बांटिए! बहता दरिया है यह मेरा भारत, इसे नदियों-झीलों में मत बांटिए!! साभार : प्रेमाराम सियाग (फेसबुक वाल से)

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