आजादी के बाद भी नदारद है शिक्षण-संस्थानों में सामाजिक अन्याय, 200 पॉइंट्स रोस्टर के दरकार

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 01, 2021 || जयपुर-दिल्ली : जब देश का संविधान बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी की अध्यक्षता में बन रहा था तब सामाजिक अन्याय को रोकने के लिए कई कानून बने थे। उसी कड़ी में सामाजिक अन्याय रोकने के लिये जातिगत आरक्षण अनुसूचित जाति(SC) के लिए और समाज से वंचित व जंगलो में कठिन परिस्थितियों में रहने वाली जातियों को क्षेत्र आधार पर अनुसूचित जनजातियों (ST) में रखा गया और बाबासाहब अम्बेडकर और जयपाल मुंडा ने अपने बौद्धिक-कौशल से आरक्षण का प्रावधान किया गया था। लेकिन विडम्बना देखिए 1950 से 1997 तक देश की शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान ही नहीं था । सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 1997 से देश की शिक्षण-संस्थाओं में आरक्षण लागू हुआ था । लेकिन मनुवादी ताकतों ने शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण तोड़मरोड़ के लागू किया । जबकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश संस्था को इकाई मानकर ही दिया था। लेकिन संस्थाओं में लगाया गया विभागवार आरक्षण व्यवस्था 1997 से 2006 तक शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की धज्जियाँ उड़ाई गई और ज्यादातर जगह SC/ST के कैंडिडेट्स को NFS कर दिया जाता था । 2012 में हमने लंबी लड़ाई लड़ी और संप्रग सरकार पर दवाब बनाकर 200 पॉइंट्स रोस्टर को सभी शिक्षण-संस्थानों को सांविधिक इकाई मानकर आरक्षण लागू करवाया जिसे मनुवादी न्याय-व्यवस्था ने इलाहबाद उच्च न्यायालय ने ख़त्म कर दिया । 2 अप्रेल 2018 के देशव्यापी आंदोलन से डरकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की । किंतु बहुजनों का सरकार पर जैसे ही दवाब कम हुआ मोदीसरकार ने कमजोर पैरवी करवाकर याचिका ख़ारिज करवा दी । इसी बीच 1990 में मंडल कमीशन के द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग(OBC) को भी संविधान सम्मत आरक्षण मिल गया था । जब प्रो सुखदेव थोराट यूजीसी के चेयरमैन बने तो यूजीसी की आरक्षण गाइडलाइन 2006 आई । लेकिन किसी भी शिक्षण संस्थान ने इसे लागू नहीं किया । इसके बाद 2007 में OBC का आरक्षण उच्च शिक्षण संस्थाओं में लगाया गया । अब देश की 85% से ज्यादा आबादी का आक्रोश और गुस्सा सरकार नहीं शह सकती थी तो सरकार ने 2013 में 200 पॉइंट रोस्टर आरक्षण को सख्ती से लगाने की कोशिश की थी । लेकिन शिक्षण-संस्थान और विश्वविद्यालय प्रशासन ने उस 200 पॉइंट रोस्टर आरक्षण को जिस हिसाब से लगाया उसके परखच्चे उड़ा दिये। 2013 में आरक्षण एक तरह से नए सिरे से लगाया गया और जो लोग रिटायर्ड हो गए उनका रोस्टर में कोई उल्लेख ही नहीं रखा गया । साथ ही 200 पॉइंट रोस्टर आरक्षण में बैकलॉग का प्रोविजन था लेकिन शिक्षण-संस्थानों के प्रशासन बैकलॉग को ही खा गया । 1997 से 2006 तक बहुत कम नियुक्तियां हुई थी और जहाँ हुई उसमें अधिकतर वंचित वर्गों के कैंडिडेट्स को NFS किया गया। 2007 के बाद जबसे OBC के आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई हैं तब से नियुक्तिया बहुत कम हुई हैं या यह कह सकते हैं कि नियुक्तियों का अकाल सा पड़ गया हैं। इसमें कई तरह की रुकावटें डाली गई कभी सरकार के द्वारा तो कभी कोर्ट के द्वारा। आपको बतला दूँ 1997 हो या 2007 नियुक्तियों में अड़ंगे ही लगाये गये हैं । यह एक कड़वी सच्चाई हैं कि मनुवादी मानसिकता और अनारक्षित वर्ग के लोग आरक्षण देना ही नहीं चाहते हैं। आरक्षण को रोकने के लिए ऐसी मानसिकता के लोग सरकारों / मंत्रालयों/ यूजीसी विश्वविद्यालय प्रशासनों या विभिन्न संस्थाओं की ट्रेड यूनियनों में बैठे होते हैं और आरक्षण रोकने के लिए हर एक हथकंडा अपनाते हैं। यही कारण हैं कि नियुक्ति नहीं होने के कारण आज शिक्षण-संस्थान में 50000 से अधिक एससी-एसटी के बैकलॉग ख़ाली है और उन पर शिक्षक एडहॉक पर बहुत लंबे समय से काम कर रहे है। मैंने राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में लड़ाई लड़कर 70 से अधिक आरक्षित पदों पर से सवर्णों को हटवाया । उन पदों पर दलित-आदिवासियों और बहुजनों की नियुक्तियाँ करवाई तो प्रशासन मेरे ही पीछे पद गया, पर मैं हार मानने वाला नहीं हूँ, संघर्ष जारी है । यह वीडियो भी देखें : राजस्थान विश्वविद्यालय में 200P के समर्थन में प्रदर्शन वस्तुतः उच्च शिक्षण संस्थानों में 70 के दशक में लगी नौकरियों में सवर्ण लोगों ने कब्ज़ा किया हुआ है । और वे अब सेवानिवृत्त हो रहे हैं तो उच्च शिक्षण संस्थानों में उनके वर्चस्व वे बनाये रखना चाहते हैं । इसलिए वे 200 पॉइंट रोस्टर को लागू होने देने नहीं चाहते हैं क्योंकि बैकलॉग के पदों पर बहुजनों की नियुक्तियाँ होनी है । और यदि अबकी बार सवर्ण कामयाब हो गये तो आने वाले 50 वर्षों तक आरक्षितों को ये नौकरियाँ मिलाने वाली नहीं है । 200 Vs 13 पॉइंट रोस्टर की कहानी आपके समक्ष प्रतुत कर रहा हूँ कि इस फैसले से पहले सेंट्रल यूनिवर्सिटी में शिक्षक पदों पर भर्तियां पूरी यूनिवर्सिटी या कॉलजों को इकाई मानकर होती थीं। इसके लिए संस्थान 200 प्वाइंट का रोस्टर सिस्टम मानते थे। इसमें एक से 200 तक पदों पर रिज़र्वेशन कैसे और किन पदों पर होगा, इसका क्रमवार ब्यौरा होता है। इस सिस्टम में पूरे संस्थान को यूनिट मानकर रिज़र्वेशन लागू किया जाता है, जिसमें 49.5 परसेंट पद रिज़र्व और 59.5% पद अनरिज़र्व होते थे (अब उसमें 10% सवर्ण आरक्षण अलग से लागू होगा) । लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि रिज़र्वेशन डिपार्टमेंट के आधार पर दिया जाएगा। इसके लिए 13 प्वाइंट का रोस्टर बनाया गया । इसके तहत चौथा पद ओबीसी को, सातवां पद एससी को, आठवां पद ओबीसी को दिया जाएगा। 14वां पद अगर डिपार्टमेंट आता है, तभी वह एसटी को मिलेगा। इनके अलावा सभी पद अनरिज़र्व घोषित कर दिए गए। अगर 13 प्वाइंट के रोस्टर के तहत रिज़र्वेशन को ईमानदारी से लागू कर भी दिया जाए तो भी वास्तविक रिज़र्वेशन 30 परसेंट के आसपास ही रह जाएगा, जबकि अभी केंद्र सरकार की नौकरियों में एससी-एसटी-ओबीसी के लिए 49.5% रिज़र्वेशन का प्रावधान है। आजादी के बाद से 70 वर्षों से सामाजिक अन्याय बहुत हो चुका हैं अब हम इस अन्याय को सहन नहीं कर सकते हैं। अब सामाजिक न्याय के लिए इस बार सरकार से सड़क से संसद तक संघर्ष करेंगें और साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों से अपील करेंगे। 200Point रोस्टर वाले मसले का फिलहाल एकमात्र समाधान मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अध्यादेश लाकर या कानून बनवाकर, देश के समस्त शैक्षणिक संस्थानों में सभी वर्गों का संवैधानिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करवाना ही है। इसीलिए हम सबकी कोशिश यही होनी चाहिए कि जबतक लोकसभा चुनाव की अधिसूचना नहीं जारी हो जाती तब तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय पर दबाव बनवाकर अध्यादेश या कानून बनवाया जाय ताकि वंचित वर्गों के साथ 70 सालों से जो सामाजिक अन्याय हो रहा हैं उसे रोका जा सके और वंचित वर्गों को सामाजिक न्याय मिल सकें।

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