दौसा में मेडिकल भर्ती में एससी-एसटी-ओबीसी उम्मीदवारों का कट ऑफ सामान्य वर्ग से ज़्यादा क्यों है?

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 06, 2021 || जयपुर : आरक्षितों की कटऑफ़ अनारक्षितों से ज्यादा रखना पूर्णत: असंवैधानिक है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय, दौसा द्वारा मेडिकल पदों पर की जा रही भर्तियों में एससी-एसटी-ओबीसी उम्मीदवारों का कट ऑफ सामान्य वर्ग से ज़्यादा क्यों है? राज्य सरकार को तत्काल इसका संज्ञान लेना चाहिए। आम समझ यह है कि आरक्षित वर्ग का कोई भी कैंडिडेट यदि सामान्य वर्ग के कैंडिडेट से ज़्यादा नंबर पाता है तो उसे अनारक्षित सीट पर नौकरी दी जायेगी। यह समझ इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के मुक़दमे में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच द्वारा दिये गये फ़ैसले से आयी है। इसमें कोर्ट कहता है क़ि आरक्षित वर्ग का कैंडिडेट यदि सामान्य वर्ग के कैंडिडेट से ज़्यादा नंबर पाता है, तो केंद्र एवं राज्य सरकारें उसकी अनारक्षित सीट पर भर्ती करेंगी। किंतु सीएमएचओ दौसा की कुछ और ही ठान रखी है, सरकार चुप है और जनप्रतिनिधियों खामोशी देखते ही बनती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के पीछे का तर्क है कि अनुच्छेद 16(4), जिसके तहत पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग) को आरक्षण दिया गया है, वह ‘कम्यूनल अवार्ड’ जैसा नहीं है। अगर सामान्य वर्ग से ज़्यादा नंबर लाने पर भी आरक्षित वर्ग के कैंडिडेट को अनारक्षित सीट पर नौकरी नहीं दी गयी, तो आरक्षण की व्यवस्था ‘कम्यूनल अवार्ड’ जैसी लागू मानी जायेगी, जिसको संविधान सभा ख़ारिज कर चुकी थी। कम्यूनल अवार्ड का मतलब है कि हर कटेगरी को अपने ही खांचे में रहना होगा। इंदिरा साहनी के फ़ैसले के आधार पर 17 सितम्बर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने फ़ैसला दिया है कि आरक्षित वर्ग का कैंडिडेट अनारक्षित सीट पर नियुक्त हो सकता है क्योंकि इस बेंच के अनुसार ‘हर प्रतिभागी सामान्य वर्ग का कैंडिडेट होता है, चाहे वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग का ही क्यों ना हो’। जस्टिस राव और जस्टिस गुप्ता की उक्त लाइन से यह साफ़ मतलब निकलता है कि आरक्षित वर्ग का कैंडिडेट अनारक्षित वर्ग में नौकरी पा सकता है, बशर्ते उसने सामान्य वर्ग के कट ऑफ के बराबर या फिर उससे ज़्यादा नंबर पाया हो। मनुवादी न्यायपालिका के कुछ निर्णयों की वजह से भ्रम फैला है, इसलिए आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के ज़्यादा नंबर मिलने के बाद भी अनारक्षित वर्ग में शामिल नहीं किया जा रहा है। पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, झारखंड, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों से लगातार ख़बरें आ रही हैं कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों का कट ऑफ सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से ज़्यादा है। ऐसे रिजल्ट का मतलब ये है कि अगर आप रिजर्व कटेगरी की हैं तो सलेक्ट होने के लिए आपको जनरल कटेगरी के कट ऑफ से ज्यादा नंबर लाने होंगे। किंतु एससी, एसटी और ओबीसी की उदासीनताओं और मनुवादी शक्तियों की अति सक्रियताओं की वजह से मिसाल के तौर पर निम्न मामलों में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया गया; 1. राजस्थान एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (आरएएस) परीक्षा, 2013 में ओबीसी कटेगरी का कट ऑफ 381 और जनरल कटेगरी का कट ऑफ 350 रहा। 2. रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के सब इंसपेक्टर के लिए बनी मेरिट लिस्ट में ओबीसी कटेगरी का कट ऑफ 95.53 प्रतिशत रहा जबकि इससे कम 94.59 परसेंट लाने वाले जनरल कटेगरी के कैंडिडेट सलेक्ट हो गये। 3. दिल्ली सरकार ने शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एससी कैंडिडेट की कट ऑफ 85.45 परसेंट निर्धारित की गयी, जबकि जनरल कटेगरी की कट ऑफ उससे काफी कम 80.96 परसेंट निर्धारित की गयी। 4. मध्य प्रदेश में टेक्सेसन असिस्टेंट की परीक्षा में भी ओबीसी का कट ऑफ जनरल से ऊपर चला गया। ऐसा कई राज्यों में हो रहा है। चूंकि वैधानिक प्रावधान यह है कि आरक्षित वर्ग का कैंडिडेट अगर सामान्य वर्ग के कैंडिडेट से ज़्यादा नंबर पता है, तो उसे अनारक्षित यानी जनरल सीट पर नौकरी दी जायेगी, न कि आरक्षित सीट पर। इसलिए जब किसी भी परीक्षा का परिणाम आता है, और उसमें पता चलता है कि एससी, एसटी या फिर ओबीसी का कट ऑफ़ सामान्य वर्ग से ज़्यादा है, तो काफ़ी हंगामा होता है। आरक्षित श्रेणी का कट ऑफ ज्यादा होने का मतलब प्रथम दृष्ट्या यह लगता है कि ऐसा होना आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव है। कुछ लोग षड्यंत्र के सिद्धांत का उपयोग करके यह भी बताने की कोशिश करते हैं कि दरअसल ऐसा एक साजिश के तहत किया जा रहा है, जिससे कि जनरल कटेगरी में किसी एससी-एसटी-ओबीसी को घुसने न दिया जाये। यानी पिछले दरवाज़े से सामान्य वर्ग को पचास प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाये। इसके साथ एक तर्क आरक्षण विरोधियों की तरफ से आ रहा है कि रिजर्व कैटेगरी के लोग अब पर्याप्त आगे बढ़ चुके हैं और अब उन्हें आरक्षण नहीं देना चाहिए। यह पूरा मुद्दा बार-बार सुर्ख़ियों में आया लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा हो क्यों रहा है? इस लेख में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का कट ऑफ़ सामान्य वर्ग से ज़्यादा जाना क्या किसी साजिश का हिस्सा है, या फिर इसके कुछ और कारण भी हो सकते हैं। मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दीजिए… उम्मीद है आप मिशन अंबेडकर से अवश्य जुड़ेंगे आप सब जानते हैं अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक ! मूकनायक मीडिया आपके लिए ले कर आता है, वे न्यूज़-स्टोरीज जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहाँ से जहाँ वे हो रही हैं। मूकनायक मीडिया यह सब तभी कर सकता है जब आप सभी बाबासाहब डॉ अंबेडकर के इस मिशन से आत्मीयता से जुड़ें ! हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरें आप तक पँहुचाने के लिए हमारा आर्थिक सहयोग करें। आप सब दानवीर हैं इसलिए आपसे मिशन अंबेडकर को आगे बढ़ाने हेतु आर्थिक मदद माँग रहे हैं। अत: अपनी इच्छानुसार PhonePay या Paytm 9999 750 166 पर 100, 500, 1000 या अपनी हेसियत के मुताबिक आर्थिक सहयोग दीजिए..

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