राजस्थान : गाँवों में तेज़ी से फैलता कोरोना संक्रमण; ना टीका मिल रहा, ना इलाज

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ज़रूरत इस बात की है कि गाँव-गाँव में कोरोना का संक्रमण जैसे फैल रहा है, उससे लोगों की जान कैसे बचायी जाये.. मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 16, 2021 || जयपुर : इस साल मार्च में फिर से कोरोना की रफ़्तार तेज़ हुई। शुरुआती दौर में शहरी इलाक़ों में ही कोरोना का प्रकोप सामने आया। लेकिन इसके बाद धीरे-धीरे कोरोना संक्रमण का विस्तार ग्रामीण इलाक़ों में होता चला गया। आँकड़ों में यह संख्या अभी भी भले कम नज़र आ रही है लेकिन इसकी रफ़्तार चिंता में डालने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि गाँवों में कोरोना फैलने के पीछे शादियों में उमड़ी भीड़, निस्तेज प्रशासन सबसे बड़ा कारण रहा है। शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में लोगों की भागीदारी ने कोरोना को तेज़ी से बढ़ाया। इसके अलावा शहरों के आसपास बसे क़स्बे और गाँव भी कोरोना के वाहक बने और कोरोना संक्रमितों की मृत्यु के बाद परिजनों और गाँव वालों की दकियानूसी सोच भी है। कोई माने या ना माने अब गाँवों में कोरोना बेकाबू हो रहा है। दूर दराज में बसे गाँवों से जो ख़बरें आ रही हैं, उसके अनुसार गाँव के गाँव कोरोना संक्रमित हो रहे हैं और लोगों की हालत गंभीर हो रही है। वास्तविकता यह है कि स्थानीय प्रशासन जाँच के आँकड़े छुपा रहा है। गाँवों में जो टेस्टिंग होनी चाहिए, वह नहीं की जा रही है। कई गाँवों में लोग संक्रमित हो रहे हैं। सरकार कम जाँच करके ख़ुश है कि कोरोना संक्रमण के आँकड़े कम हो रहे हैं। लेकिन यह जान के साथ खेलने की तरह है। यही कारण है कि ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना के मरीज़ बढ़ते जा रहे हैं। ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना को लेकर जागरूकता का अभाव है। कोरोना संक्रमित मरीज़ इस बात को लेकर भयभीत रहते हैं कि कोरोना संक्रमित के तौर पर पहचान होने के बाद गाँव में उन्हें इसके लिए ज़िम्मेदार मान लिया जायेगा। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग जाँच से बच रहे हैं और जब तक संभव हो, अस्पताल जाने से भी बच रहे हैं। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर रघु शर्मा कहते हैं कि गाँवों में संक्रमण के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखकर ही सरकार ने सर्वे करवाना शुरू किया है, इस दौरान ‘इन्फ्लुएंज़ा जैसे लक्षण’ (आईएलआई) वाले कम से कम छह लाख आईएलआई मरीज़ों को अबतक चिह्नित किया गया है। स्वास्थ्य मंत्री मानते हैं कि महामारी तेज़ी से गाँवों को भी अपनी चपेट में ले रही है, जो चिंताजनक है। रघु शर्मा ने फ़ोन पर बीबीसी को बताया कि छोटे-छोटे गाँवों में केस मिल रहे हैं और मौत की रिपोर्ट्स भी सामने आ रही हैं। इस सवाल पर कि क्या सरकार ने गाँवों में जाँच की संख्या कम कर दी हैं, रघु शर्मा कहते हैं, अब सबसे ज़्यादा जाँच हो रही हैं। छुट्टी वाले दिन संभव है कुछ कम हो, लेकिन इन दिनों हम 99 हज़ार सैंपल तक प्रतिदिन जाँच कर रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार राज्य में चिकित्सा विभाग की क्षमता नहीं है ज़रूरत के अनुसार जाँच कराने की। अब मामला बहुत बढ़ चुका है। गाँवों से सूचना आ रही है कि कोई व्यक्ति तीन दिन से बीमार था और चौथे दिन मर गया। एक-एक गाँव में हफ्तेभर में तीन-तीन चार-चार मोतें हो रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि दूर-दराज में बसे गाँवों में न तो इलाज की व्यवस्था है और ना ही जाँच की। यही कारण है कि राज्य सरकार ने गाँवों में केवल लक्षण के आधार पर, बिना किसी जाँच के ही लोगों को कोरोना की दवा पहुँचाने के निर्देश जारी कर दिये हैं। सूत्र बताते हैं कि ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना के लक्षण वाले मरीज़ों की बड़ी संख्या है। ये जाँच कराने के लिए नहीं आ रहे हैं और कुछ दिनों में घर में ही दम तोड़ देते हैं। इनकी मौत अस्पताल में होती तो सरकारी आँकड़ों में कोविड से मौत का आँकड़ा बढ़ जाता। इन हालात में हम लोग कम से कम संसाधनों में अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। सूत्रों का यह भी कहना है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) स्तर पर विटामीन ‘सी’ की दवाई तक भी ठीक से नहीं दे पा रहे हैं, तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) पर क्या ही हाल होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अधिकारी, जैसे डाक्टरों और नर्सों का कहना है कि जयपुर और बड़े शहरों में कमरों में बैठे हुए अधिकारी ख़ुद डरे हुए हैं और वहाँ से व्हॉट्सऐप से इंस्ट्रक्शन दे रहे हैं। सबने अपने परिवारों को सेफ़ किया हुआ है। इनको गाँवों की स्थिति से कोई लेना देना नहीं है। जाँच का समय और संख्या कम करने से मरीज़ कम सामने आ रहे हैं, इस सवाल पर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता कहते हैं कि गाँवों में मेडिकल सीमित स्टाफ है और जाँच करने के बाद सैंपल पहुँचाने होते हैं। राज्य के चिकित्सा मंत्री का कहना है कि ‘हम आदेश जारी कर अब एंटिजन टेस्ट शुरू करने जा रहे हैं। हम चिकित्सा शिक्षा के इंटर्न्स की मदद से ओपीडी 12 घंटे करने पर भी विचार कर रहे हैं।’ सरकार ने सीएचसी को कोविड केयर सेंटर में तब्दील किया है। पटवारी, स्कूल के प्रिंसिपल, ग्राम सेवकों के ज़रिए राज्य भर में सर्वे करवाया जा रहा है। जागरूकता के लिए विज्ञापन और लाउडस्पीकर्स से ऐलान करवाने की बात भी प्रशासन कह रहा है। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि चिकित्सा से जुड़े विशेष तरह के मामले को पटवारी और हेडमास्टर कितना समझ पाएँगे, इसको लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कितना हास्यास्पद है कि कोटा जैसे शहरों में आरएसी के जवानों को कोरोना संक्रमितों के शवों की पैकिंग्स में लगा दिया । फिर फजीहत होती देखकर यह आदेश वापस लिया गया… सरकार ने 24 मई तक लॉकडाउन लगाया हुआ है। सार्वजनिक वाहन, निजी वाहन, धार्मिक स्थान, स्कूल-कॉलेज, बाज़ार सब बंद हैं। राज्य की सीमाओं पर चेकिंग की जा रही है, एक ज़िले से दूरे ज़िले और गाँव से दूसरे गाँव तक जाने पर भी पाबंदी है। इस बीच राजस्थान में शादियों का मौसम शुरू हो गया है। हालाँकि शादियों पर सरकार के आदेशानुसार पाबंदी लगा दी गयी है लेकिन कई लोगों का कहना है कि ये सुपर स्प्रेडर का काम कर रहे हैं। निस्तेज प्रशासन तमाशबीन बना है और संक्रमण सातवें आसमान पर! 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