विश्वगुरु : श्मशानों में जलने केलिए जगह नहीं है,मौत केबाद शरीर कुत्ते और कव्वे नोच-नोचकर खा रहे हैं

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गंगा-यमुना में कोरोना संदिग्ध संक्रमितों की अधजली लाशें घाटों पर फेंकने से कुत्ते खाकर पूरे गाँव में घूमते हैं, मवेशी पानी पीते हैं, कितना खतरनाक, जानें विशेषज्ञों की राय मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 16, 2021 || बक्सर- जयपुर : ग़ाज़ीपुर का गहमर गाँव बिहार के बक्सर ज़िले से लगा हुआ है। गंगा नदी गहमर से होते हुए ही बिहार में प्रवेश करती है। बक्सर ज़िले में जब बड़ी संख्या में शव मिले थे तब भी यही आशंका जताई जा रही थी कि ये शव उत्तर प्रदेश के विभिन्न जगहों से बहकर यहाँ आये होंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि कोविड संक्रमण और अन्य तरह के बुख़ार की वजह से गाँवों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है। कोरोना संक्रमण से मारे गये लोगों की नदी में तैरती लाशों से से जनसाधारण पर बढ़े खतरों की आशंका के बारे में वरिष्ठ वैज्ञानिकों का कहना है कि जब वायरस को जानवरों के शरीर में होस्ट मिलेगा तब तक उसके फैलने या पनपने की आशंका ज्यादा है। अधजली लाशें ऐसे ही घाटों पर फेंकी रहती हैं, जिसे कुत्ते खाकर पूरे गाँव में घूमते हैं। गाँव घर में कई लोगों को सर्दी खाँसी हो गयी है और गंगा-यमुना के तराई गाँवों के अनेकों लोग भी पॉज़िटिव होकर मर गये। गंगा नदी में सड़ी हुयी इंसानों की बहती लाशो को देखकर भी अगर आप सवाल करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे तो यकीन मानिए आप ग़ुलामी की जिंदगी जी रहे हैं । श्मशानों में जलने के लिए जगह नहीं है। मौत के बाद शवों को कुत्ते और कव्वे नोच खा रहे और भक्त भक्ति में लीन हैं बक्सर ज़िले के सिविल सर्जन डॉ जितेंद्र नाथ ने बीबीसी को बताया कि ‘71 लाशों का पोस्टमार्टम किया है। बॉडी डिकम्पोज्ड हैं, इसलिए मृत्यु की वजह नहीं पता चल पायेगी। बाक़ी शवों का डीएनए कलेक्शन किया गया है।’ सिमरी पश्चिमी के ज़िला पार्षद विजय मिश्रा ने बीबीसी को बताया, ‘लोग ग़रीब हैं, दाह संस्कार नहीं कर पा रहे है। प्रशासन का भी कोई सहयोग नहीं मिल रहा है तो परिजन शव ऐसे ही गंगा जी में फेंक कर चले जा रहे है। घाट किनारे आकर शव लग रहे हैं। मानसिंह पट्टी, केशोपुर पंचायत जो गंगा से एकदम नज़दीक 100-150 मीटर की दूरी पर हैं, वहाँ दुर्गंध फैल रही है।’ केशोपुर पंचायत के योगेश कुमार यादव कॉलेज में पढ़ते हैं। उनका घर गाँव के घाट के एकदम पास है। वो बताते हैं, ‘हमारा पूरा वॉर्ड लाश की दुर्गंध से परेशान है। खाना तक नहीं खाया जाता। कोरोना के वक़्त में लोग लाश ऐसे ही फेंक कर चले जाते हैं, मना करने पर मानते नहीं हैं। रोज़ाना यहाँ लाशें दिखती हैं, प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है।’ चौसा श्मशान घाट पर गये पत्रकार किशोर कपींद्र बताते हैं, ‘यूपी से बहकर लाशें पहले भी आती रही हैं, लेकिन इस बार इनकी संख्या बहुत ज़्यादा है। कोरोना में लोगों की आर्थिक स्थिति भी बहुत ख़राब हुई है, जिसके चलते भी हमारी संस्कृति में परिजनों के शवों को जिस सम्मानित तरीक़े से विदाई देने की परंपरा रही है, उसका पालन हीं कर पा रहा है।’ आसपास के गाँवों द्वारा शवों को गंगा में बहाने के तथ्य निराधार है। हिंदू कर्मकांड के ज्ञाता और बक्सर के स्थानीय निवासी प्रभंजन भारद्वाज बताते हैं, ‘बिहार में अधिकांश जगह शव को जलाया जाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों जैसे साँप के काटने पर या विषम बीमारी जैसे कुष्ठ रोग, जिसमें छुआछूत की संभावना हो, वहाँ लाशों को डुबो दिया जाता है। ऐसी स्थिति में घड़े में पानी भरकर लाश के साथ बाँस से बाँध कर नदी में बीचों-बीच प्रवाहित कर दिया जाता है। ऐसे ही जिनकी मृत्यु साँप के काटने से होती है उन्हें केले के थम्ब के साथ बाँधकर प्रवाहित किया जाता है।’ मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दीजिए… उम्मीद है आप मिशन अंबेडकर से अवश्य जुड़ेंगे आप सब जानते हैं अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक ! मूकनायक मीडिया आपके लिए ले कर आता है, वे न्यूज़-स्टोरीज जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहाँ से जहाँ वे हो रही हैं। मूकनायक मीडिया यह सब तभी कर सकता है जब आप सभी बाबासाहब डॉ अंबेडकर के इस मिशन से आत्मीयता से जुड़ें ! हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरें आप तक पँहुचाने के लिए हमारा आर्थिक सहयोग करें। आप सब दानवीर हैं इसलिए आपसे मिशन अंबेडकर को आगे बढ़ाने हेतु आर्थिक मदद माँग रहे हैं। अत: अपनी इच्छानुसार PhonePay या Paytm 9999 750 166 पर 100, 500, 1000 या अपनी हेसियत के मुताबिक आर्थिक सहयोग दीजिए..

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