ट्राइबल वॉर : सिरोही-नरसंहार 1922 के नायक तेजा भील का नारा था ‘हमारी जमीन, ऊपज के हम मूल मालिक हैं!’

‘आदिवासी-यौद्धा तेजा भील की जयंती 16 मई 1896 पर उन्हें भावभीनी पुष्पांजलि’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 16, 2021 || सिरोही – जयपुर : महान स्वतंत्रता सेनानी, आदिवासी क्रांतिकारी, अप्रतीम शौर्य, निडरता और बलिदान की प्रतिमूर्ति, वीर योद्धा, तेजा भील सिरोही-नरसंहार 1922 के नायक थे। जलियावाला बाग जैसा था सिरोही के भूला का लीलूड़ी-बडली नरसंहार ( भूला वालोरिया भील आंदोलन / सिरोही नरंसहार) में 1200 भील शहीद हुए थे। इन निर्दोश आदिवासियों को गोलियों से मारा था अंग्रेजों ने। मई 1922 को भूला के लीलूडी बडली की तलाई में हुए नरसंहार की याद में हर साल भले ही बरसी मनाई जाती है। एक ऐसी घटना जो इतिहास में कही दर्ज नही हुई , मानगढ़ जैसी ही भयंकर नरसंहार सैंकड़ों भील आदिवासी समुदाय के लोगों का नरसंहार किया गया। बिडंबना देखिए कि राजस्थान के तथाकथित इतिहासकारों ने इस नरसंहार को एक पंक्ति में समेत दिया और राजस्थान के इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे बिलकुल नजरअंदाज कर इतिहास से ही ओझल कार दिया। राजस्थान के सिरोही जिले में, इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था जो मनुवादियों ने, आदिवासियों को कभी नहीं बताया, न ही इतिहास के पन्नों पर छापा गया, लेकिन हम हमारे पूर्वजों के इतिहास को ना मिटने देंगे, न ही किसी को भूलने देनी की, आदिवासी-युवाओं ने शपथ ली है । तेजा भील 16 मई 1896 को उदयपुर, राजस्थान के पास बीलोलिया गाँव में जन्मे। सिद्ध हत्याकांड तेजा भील के नाम से मशहूर है। 1917 में आदिवासी भीलों के साथ अन्याय हो रहा था। यह काम अंग्रेजों और जमीदार द्वारा किया जा रहा था। मुआवजा नहीं दिया जा रहा था, इसलिए आदिवासी भील समुदाय भूखा था। तो 1920 में आदिवासी किसान, मजदूर, श्रमिकों को मातृकुंडिया बुलाया गया और वहाँ मेवाड़, सिरोही, डूंगरपुर, ईडर, उदयपुर के लोग भारी संख्या में इकट्ठा हुए और आंदोलन की चिंगारी हुई। जो मकान मालिक काम का भुगतान नहीं करेगा, उसने ठान लिया है कि उसे काम नहीं करना है। उन दिनों भीलों का यह गीत हर एक की जुबां पर था । ‘भूलू गोम बलं…रे डोकलाला भोडा ना, भूलू गोम बलं…रे भूलू ने वलोलियु,भूलू गोम बलं…रे भाईयो भेला होइजो, भूलू गोम बलं…रे करवो एको करवो..जोहार।’ इसका अर्थ है:- भूला गाँव जलाया टोपी पहने हुए फ़ौज जिसे डोकलाला कहा जाता है संबोधन किया है, फिर भूला व वालोरिया दोनों गाँवों को जलाया गया,,भाईयो इकट्ठा होना है व अपने को एकता करनी है, अपने को तत्कालीन रियासती अंग्रेजी सरकार को भोग यानी टैक्स नही देना है, इस प्रकार दोनों बड़ी पालो के गाँवों को इकट्ठा होने, एकी करने व टैक्स न देने का संदेश है। आदिवासी समुदाय ने मकान मालिक पर असहयोगी आंदोलन शुरू किया। यही कारण है कि काम बंद हो गया। मकान मालिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों से शिकायत की। मकान मालिक ने कहा कि उनके पूर्वज तेजा भील है तो उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। तेजा भील को पकड़ने के लिए इंगस ने सेना बनायी और तेजा भील को पकड़ने गये तो वे उन्हें पकड़ नहीं पाये और अंग्रेज तेजा भील के बारे में पूछने गाँव-गाँव गये। पर उन्हें सफलता नहीं मिली। उनकी सूचना ना देने पर लोगों पर अत्याचार किया। अगर लोगों ने नहीं बताया तो आदिवासियों की कृषि पर टैक्स काफी हद तक बढ़ाया, और नुकसान होने लगा। तेजा भील को ये पता चल गया, उस पर तेजा ने कहा था अंग्रेजो पर टैक्स देना बंद करो। लोगों ने अंग्रेजों पर टैक्स देना बंद कर दिया। जब उन्होंने यह कहा बिजोलिया किसान आंदोलन 1921 में खड़ा हुआ। उस माध्यम से गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में आदिवासी एक होने लगे। अंग्रेजों को टैक्स देना बंद करने की खबर गाँव-गाँव में हवा की तरह फैल गयी। उस में हमारी जमीन, हमारी उपज के नारे के साथ जब आप “मूल मालिक” हैं तो अंग्रेजों और जमींदारों के दबाव के शिकार नहीं होना चाहिए। तेजा भील ने जनता को संदेश दिया कि हम उनका विरोध कर अपने देश से निकालना चाहते हैं। तभी तो अंग्रेज गुस्से में आ गये। सिरोही के दिवान रमाकांत मालविन 6 मई 1922 को तेजा भील से मिलने गये थे। अंग्रेजो ने बोलोलिया और भुला के आदिवासी गाँवों पर हमला कर झोपड़ी जला दी। जिससे आदिवासीयों को बहुत बड़ा नुकसान हुआ। उसका बदला लेने के लिए उदयपुर कैंप में चलकर अंग्रेजो के सारे खजाने लूट लिए और आदिवासीयों को वितरण किया। 14 मई 1922 को सिरोही में आदिवासी समुदाय की बड़ी बैठक शुरू की गई। अंग्रेजो को उसकी जानकारी मिली और अंग्रेजो ने सिरोही पर हमला किया दोनों पक्षों को बड़ी क्षति हुई। कई क्रांतिकारी और ब्रिटिश सैनिक मारे गये जिसे “सिरोही नरसंहार” कहा जाता है। इसका बदला लेने के लिए अन्याय और उत्पीड़न एक साथ आये जिससे आजादी और जल जंगल जमीन के लिए सबको एक करके भील का आंदोलन शुरू हुआ। इसका असर राजस्थान के अलावा गुजरात और महाराष्ट्र में भी हो रहा है। इस जांदोलन में टैक्स नहीं देंगे और मजदूरी नहीं करेंगे का नारा दिया गया। सदर का पहला आंदोलन निमड़ी गुजरात में भारी संख्या में उमड़े आदिवासी ब्रिटिश कैंपों पर आदिवासी टूटने लगे। ब्रिटिश सैनिक साईरवैरा दौड़ने लगे। कुछ नौकरियाँ छोड़ कर घर भागे। तेजा भील दूसरे राज्यों के अधिकारियों से बात कर रही थी ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उन्हें व्यवस्थित करने के लिए। तेजा भील रियासत जहागीदार से तालमेल बिठाकर अंग्रेज सैनिक गोलियाँ बरसाने लगे। इसमें 1200 आदिवासी भील मारे गये। कुछ आदिवासी क्रांतिकारी तेजा भील को उस जगह से गुमनाम जगह ले गये। उन्होंने उसे 18 साल के लिए गुमनाम रखा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा 2012-13 में पिण्डवाडा के लिलुडी बडली में आदिवासियों के बलिदान की स्मृति में शहीद स्मारक व आदिवासी आवासीय विद्यालय बनाने की घोषणा की गई थी। लेकिन शहीद स्मारक घोषणा होने के बाद भी बीच में अटक गया। बाद में राजस्थान में आयी भाजपा-वसुंधरा सरकार ने आदिवासियों के बलिदान की स्मृति में बनाये जा रहे शहीद स्मारक बनाने की स्वीकृति को निरस्त कर दिया। विधायक लोढा ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से पुन: आग्रह किया कि सैंकड़ों आदिवासियों के बलिदान की स्मृति में लीलुडी बडली पिण्डवाडा में बनने वाले शहीद स्मारक की पुन: स्वीकृति जारी की जाये। स्वीकृति पुन: जारी कार डी गयी है किंतु कार्य अभी तक आरंभ नहीं हुआ है। मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दीजिए… उम्मीद है आप मिशन अंबेडकर से अवश्य जुड़ेंगे आप सब जानते हैं अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक ! मूकनायक मीडिया आपके लिए ले कर आता है, वे न्यूज़-स्टोरीज जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहाँ से जहाँ वे हो रही हैं। मूकनायक मीडिया यह सब तभी कर सकता है जब आप सभी बाबासाहब डॉ अंबेडकर के इस मिशन से आत्मीयता से जुड़ें ! हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरें आप तक पँहुचाने के लिए हमारा आर्थिक सहयोग करें। आप सब दानवीर हैं इसलिए आपसे मिशन अंबेडकर को आगे बढ़ाने हेतु आर्थिक मदद माँग रहे हैं। अत: अपनी इच्छानुसार PhonePay या Paytm 9999 750 166 पर 100, 500, 1000 या अपनी हेसियत के मुताबिक आर्थिक सहयोग दीजिए..

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