नजरिया : करौली के जिलाधिकारी द्वारा एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त शिक्षक का निलंबन न्याय संगत है ?

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 18, 2021 || करौली – जयपुर : 15-16 मई को राजस्थान स्कूल शिक्षा के एक व्याख्याता पृथ्वीराज बैरवा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। बिना किसी तरह की सुनवाई का अवसर प्रदान किये करौली के जिला कलेक्टर सिद्धार्थ सिहाग ने उक्त शिक्षक को निलंबित कर दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िरकार जिलाधिकारी जैसा पद आरएसएस और एक विशेष जाति के दवाबों में क्यों काम करते हैं ? जिलाधिकारी का यह आदेश सोशल मीडिया पर वायरल होते देर नहीं लगी क्योंकि मामला अभिव्यक्ति की आजादी और पूर्वाग्रही ब्यूरोक्रेट की मनमानी का था। 17 अगस्त, 2018 को आरबीआई के अंशकालिक निदेशक एस गुरुमूर्ति ने ट्वीट किया था अपमान के इस उग्र रूप की गणना की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्था को बाधित करना होती है और यह धारा, इस तरह की गतिविधियों को दंडित करती है। संवैधानिक और क़ानूनी प्रावधान क्या कहते हैं ? इसलिए इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 19 (2) का संरक्षण अच्छी तरह से प्राप्त है, जोकि अनुच्छेद 19 (1) (a) द्वारा गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अभ्यास पर उचित प्रतिबंध लगाने वाले कानून को संरक्षण देता है।” अनुच्छेद 19 (1) देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है लेकिन भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 295-ए के अन्तर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं जहां कोई आरोपी व्यक्ति भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहात करने लिए जानबूझ कर और विद्वेषपूर्ण आशय से उस वर्ग के धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है या ऐसा करने का प्रयत्न करता है। यह अपमान उच्चारित या लिखित शब्दों या संकेतों द्वारा दृश्य रूपाणों द्वारा किया गया तो यह अपराध बन सकता है। भारत का कानून किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के पीछे की मंशा की जांच करता है। आर्टिकल 13 के अनुसार साविधान लागू होने की दिनांक से पहले जीतने भी धार्मिक ग्रन्थ, विधि कानून जो विषमता पर आधारित थे उन्हें *शून्य घोषित किया जाता है। यह भी पढ़ें : परशुराम द्वारा क्षत्रियों का नृशंसतापूर्ण कत्लेआम : गुलामगिरी अनुच्छेद 13 (1) :- इसमें कहा गया है कि भारतीय संविधान के लागू होने के ठीक पहले भारत में प्रचलित सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होंगी जहाँ तक कि वे संविधान भाग तीन के उपबंधों से असंगत हैं। भारतीय संविधान की धारा 51-ए(एच) के मुताबिक़ ‘वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानवता और सवाल व सुधार की भावना का विकास करना’ हर नागरिक का दायित्व है। लेकिन, देश के हुक्मरान अपने पूर्वाग्रहों और कामों के जरिए इस सिद्धांत का उल्लंघन कर रहे हैं। ऐसा करना न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि देश के लिए नुक़सानदेह भी है। एक शिक्षक पृथ्वीराज बैरवा ने सामिजिक मीडिया पर डाली पोस्ट के माध्यम से वही किया जो एक शिक्षक का दायित्व है। उन्होंने शायद जोतीबा फुले की गुलामगिरी पुस्तक पढ़ी होगी जिसमें परशुराम के दृष्टांत की तार्किक विवेचना की है। एक शिक्षक के तार्किक दृष्टिकोण पर एक अतार्किक ब्यूरोक्रेट की मनमानी शक्तियाँ और शास्तियाँ भारी पड़ रही है। किंतु सरकार में बैठे ऐसे ब्यूरोक्रेट लोग विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पर हमला कर रहे हैं। सरकार को अपनी छवि सुधारने के लिए सत्ता में बैठे आरएसएस के दलाल अफसरों पर लगाम कसनी होगी! अन्यथा बहुत देर हो जायेगी औरसरकार की कल्याणकारी नीतियों को ऐसे अफसर पलीता लगते रहेंगे। धार्मिक भावनाओं पर हाल ही में सुप्रीमकोर्ट का नजरिया अभी हाल ही में, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने राष्ट्रीय लॉकडाउन के बीच “रामायण” धारावाहिक देखने की खुद की एक तस्वीर को ट्वीट किया था। इस ट्वीट पर वकील प्रशांत भूषण द्वारा ट्विटर पर ही कथित रूप से एक आलोचनात्मक टिपण्णी की गयी थी, जिसके चलते उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई थी। दरअसल वकील प्रशांत भूषण ने अपने ट्विटर पर (केन्द्रीय मंत्री की तस्वीर के सम्बन्ध में) लिखा था, “लॉकडाउन के कारण करोड़ों भूखे और सैकड़ों मील घर के लिए चल रहे हैं, हमारे हृदयहीन मंत्री लोगों को रामायण और महाभारत की अफीम का सेवन करने और खिलाने के लिए मना रहे हैं!” यह आरोप लगाते हुए कि यह ट्वीट धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है, एक जयदेव रजनीकांत जोशी ने भक्तिनगर पुलिस स्टेशन, राजकोट, गुजरात में भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए के तहत उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में उन पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया है। हालाँकि, शुक्रवार (01 मई 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को गुजरात पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज FIR पर गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान कर दी थी। शिव शंकर बनाम एम्परर AIR 1940 Oudh 348 के मामले में आरोपी व्यक्ति ने एक अन्य व्यक्ति का जनेऊ खींच कर तोड़ दिया था, इसे “उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा” द्वारा धार्मिक भवना का अपमान नहीं माना गया था। जिलाधिकारी की मनमानी का मामला दुर्भाग्य से यह मामला समाज के एक ऐसे वर्ग का एक और उदाहरण है जो धर्म और धर्म ग्रंथों की ताकत को विज्ञान और संविधान में दी गई अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी से ऊपर मानता है। यह भी पढ़ें : गुलामगीरी : जोतीराव गोविंदराव फुले भारतीय संविधान के मुताबिक़ ‘वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानवता और सवाल व सुधार की भावना का विकास करना’ हर नागरिक का दायित्व है। लेकिन, देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बयानों और कामों के जरिए इस सिद्धांत का उल्लंघन कर रहे हैं। ऐसा करना न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि देश के लिए नुक़सानदेह भी है। कई दार्शनिक मतभेदों और दृष्टिकोणों के बावजूद वैज्ञानिक पद्धति सामाजिक परिवर्तन को बल देती है। उदाहरण के लिए धार्मिक ग्रंथों में समर्थित लैंगिक और जातीय भेदभाव को बदलते समाज में विरोध का सामना करना पड़ता है और सवाल उठाना सामाजिक विवेक का महत्वपूर्ण पहलू बन जाता है। इसलिए वैज्ञानिक प्रवृत्ति की अवधारणा मानवता, समानता, अधिकार और न्याय की आधुनिक अवधारणाओं से जुड़ी हुई है। लेकिन, दुख की बात ये है कि मौजूदा स्थितियां इशारा करती हैं कि हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं। उच्च शिक्षा के लिए फ़ंड घटाने, पंचगव्य जैसे छद्म-वैज्ञानिक कार्यों पर फ़ंड लगाने और सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की बयानबाज़ी विज्ञान और वैज्ञानिक प्रवृत्ति पर हमला करने से कम नहीं है। हो सकता है कि जिलाधाकारी की मनमानी थोड़े समय के लिए संकुचित हितों का पोषण कर दें लेकिन लंबे समय में इसके दुष्परिणाम अशोक गहलोत के जैसी कल्याणकारी सरकारों को भुगतने पड़ते हैं। मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दीजिए… उम्मीद है आप मिशन अंबेडकर से अवश्य जुड़ेंगे आप सब जानते हैं अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक ! 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