नजरिया : जनेऊ संस्कृति आठ पहर चौंसठ घड़ी, सरकारी संस्थाओं-कार्यालयों अपने कुत्सित करतब दिखा रही है !

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‘क्या वाकई मनुस्मृति मर चुकी है ? ऐसा नहीं हैं, वह राजस्थान हाईकोर्ट में खड़ी है, और आज भी वास्तव में हम मनुस्मृति से ही संचालित हो रहे हैं – करौली-प्रकरण इसकी बानगी है’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 19, 2021 || करौली – जयपुर : यह कहने वाले आपको हर जगह मिल जायेंगे जो कहते हैं कि मनुस्मृति और उसकी आज्ञाएँ कब की मर चुकी हैं। सबसे बड़ा ताज्जुब यह है कि ऐसा कहने वालों में बहुजन आबादी भी कम नहीं है। जो यह कहते फिरते हैं कि अब गड़े मुर्दे उखाडने से क्या फायदा ? लेकिन सच पूछे कि क्या वाकई मनुस्मृति मर चुकी है ? ऐसा कतई नहीं हैं, आज भी अनेक विश्वविद्यालयों में अनेकों स्वरूपों में मनुस्मृति पाठ्यपुस्तक के रूप में पढाई जाती है। जनेऊ संस्कृति आठ पहर, चौंसठ घड़ी शिक्षण संस्थाओं, सरकारी कार्यालयों और दैनिक व्यवहारों में अपने कुत्सित करतब दिखा रही है। जयपुर हाईकोर्ट के परिसर में आज भी मनु की मूर्ति भारत के संविधान को चिढ़ाते खड़ी है। यूँ तो आज नये-नये कानून बन गये हैं। परन्तु दुःख की बात है कि आज भी वास्तव में हम मनुस्मृति से ही संचालित हो रहे हैं। न जाने हम कब इस कब्र से बाहर निकलेंगे ? आपको शायद याद हो कि नोबेल पुरस्कार विजेता चर्चिल ने अमरीकी राष्ट्रपति रूजबेल्ट को लिखे पत्र में कहा था कि महाशक्तियों ने जापान पर परमाणु हमला करके उसे नष्ट किया उसकी कतई जरुरत नहीं थी । यदि जापान को समूल नष्ट ही करना था तो भारत से पाँच ब्राह्मण लेजाकर बसा देते , वे खुद-ब-खुद जापान को नष्ट कर देते! सोचो ? क्यों ? इससे पहले की हम मनुस्मृति क्यों जलायी गयी ? को जाने, मनुस्मृति का मकसद जान लेते हैं। मनुस्मृति संविधान इसलिए लिखा गया था कि हारे हुए बौद्ध / राक्षस / असुर / दलित / आदिवासी और पिछड़े फिर दोबारा संगठित होकर द्विजों के समक्ष अपना सिर न उठा पाएँ और उठाने की जुर्रत भी करें तो रोहित वेमुला, डॉ पायल तडवी, अनिल मीना, प्रोफ़ेसर राम लखन मीना और उमेश जोनवाल जैसे अनगिनत प्रतिभाशाली एवं होनहार व्यक्तियों की तरह उनका फन कुचल दिया जावे । जो इन जैसे होनहारों के साथ खड़े नहीं होते उन्हें परमानेंट गुलाम बनाने का ग्रन्थ है – मनुस्मृति। सर्वविदित है कि गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार की शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गयी है। उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया। किसी भी विकट परिस्थिति में शूद्र को अन्य किसी के कुएँ से पानी लेने की अनुमति नहीं है। मंदिर की झूठन तक उसकी नहीं है, मासूम बच्चे तक पानी पिने की वजह से मंदिर को चौखटों पर मारे-पीटे जाते हैं,हिंदुत्व का झंडा रत-दिन उठाने के बावजूद इंसान वो इतना भूखा है कि उसके लिए दिन में एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है। उसको कोई पोषण नहीं मिलता। वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं ? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है। पंडे-पुजारी ने उनको यही बताया है। यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है। तो एक तरफ़ तो पंडे-पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्यांकि वे कुपोषण का शिकार हैं। और आप सब के लिए एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है। बुद्धि बल वहीं खिलता है जहां वो सब कुछ होता है, जिसकी शरीर को जरूरत है। इतना ही नहीं इसके साथ-साथ ‘कुछ और’ भी चाहिए। ये जो ‘कुछ और’ और है, यही तो बुद्धि हो जाता है। बुद्धि एक लक्जरी है। एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है। बुद्धि विकसित करने के लिए उसके पास कोई ऊर्जा नहीं है। पर फिर भी इन सब विषमताओं के बावजूद दलित, आदिवासी और पिछड़ों के बच्चे सुविधाभोगियों को पछाड़ दे रहे हैं। यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है लेकिन यहां बुद्धिजीवी तो शीर्ष पर पहले से ही है। वास्तव में भारत में जबरदस्त महत्व का काम किया गया है। विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति (आरएसएस की भाषा में समरसता) बनाए रखें। और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था। हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी वास्तव में वैसे-के-वैसे पालन किये जा रहे हैं। जिस महापुरुष ने अपने ग्रंथों को रखने के लिए ‘राजगृह’ जैसा विशाल भवन बनवाया था, उसी ने 25 दिसंबर, 1927 के दिन एक पुस्तक जला दी थी। आखिर क्यों? जिस महापुरुष के पास उस ज़माने में लगभग तीस हज़ार से भी अधिक मूल्य की निजी पुस्तकें थीं, उसी ने एक दिन एक पुस्तक जला दी थी। आखिर क्यों ? जिस महापुरुष का पुस्तक-प्रेम संसार के अनेक विद्वानों के लिए नहीं, अनेक पुस्तक-प्रकाशकों और विक्रेताओं तक के लिए आश्चर्य का विषय था, उसी ने एक दिन एक पुस्तक जला दी थी। आखिर क्यों ? उस पुस्तक का नाम क्या था ? उसका नाम था ‘मनु-स्मृति’। आइये हम जाने कि मनुस्मृति क्यों जलायी गयी ? इस पुस्तक में ऐसा हलाहल विष भरा है कि जिसके चलते इस देश में कभी राष्ट्रीय एकीकरण का पौधा कभी पुष्पित और पल्लवित नहीं हो सकता ! वैसे तो इस पुस्तक में सृष्टि की उत्पत्ति की जानकारी भी दी गयी है लेकिन असलियत यह सब अज्ञानी मन के तुतलाने से अधिक कुछ भी नहीं हैं। मनुस्मृति की इतने बढ़-चढ़ कर ज्ञान की डींगें बघारी गयी है, उसका असली उद्देश्य जातिवाद का निर्माण और स्त्री को निंदनीय तथा निम्न बताना भर है। इसमें निहित आदेश निर्लज्जता से ब्राह्मणों के हित में हैं। प्रश्न है कि डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने आखिर यहीं पुस्तक क्यों जलायी ? इसका उत्तर साफ़ है कि जिस कारण महात्मा गांधी ने अनगिनत विदेशी कपड़े जलवाये थे। धर्मशास्त्र माने जाने वाले इस कुकृत्य को नष्ट करने के लिए क्या इसे जलाना अनिवार्य नहीं था ? कहने वाले कहते हैं कि आज मनुस्मृति को कौन जानता और मानता है, इसलिए अब मनुस्मृति पर हाथ धो कर पड़ने से क्या फायदा ? यह एक मरे हुए साँप को मारना है। हमारा कहना है कि कई साँप इतने जहरीले होते हैं कि उन्हें सिर्फ मारना ही पर्याप्त नहीं समझा जाता बल्कि उसके मृत शरीर से निकला जहर किसी को हानि न पहुंचा दे इसलिए उसे जलाना भी पड़ता है। वैसे मनुस्मृति जैसी घटिया किताब कि तुलना बेचारे साँप से करना मुझे अच्छा नहीं लग रहा। बेचारे साँप तो यूँ ही बदनाम हैं, और अधिकांश तो यूँ ही मार दिये जाते हैं। और इसीलिए रामास्वामी पेरियार को कहना पड़ा कि अगर आप रास्ते पर जा रहे हैं और आपको उस रास्ते में साँप और ब्राह्मण मिल जाये और उनमें से आपको किसी एक को मारने का भी विकल्प मिले तो आप साँप को छोड़कर ब्राह्मण को मरने का विकल्प चुनें, क्योंकि साँप किसी को तभी डसेगा जब आपसे उसकी जान को खतरा होगा जबकि ब्राह्मण तो आपको सदैव डसने / नुकसान पहुँचाने की फ़िराक में रहेगा। दूसरी बात यह है कि साँप के काटने से एकाध आदमी ही मरता हैं जबकि मनुस्मृति जैसे ग्रन्थ और उसके ज्ञाता ब्राह्मण तो दीर्घकाल तक पूरे समाज को डस लेते हैं। क्या ऐसे कृतियों की अंत्येष्टि यथासंभव किया जाना अनिवार्य नहीं हैं ? वैसे मनुस्मृति के अलावा भी हिंदुओं की तमाम स्मृतियाँ और ग्रन्थ में शूद्रों (आज के ओबीसी और दलित) तथा महिलाओं को हेय दृष्टि से देखते हुए उन्हें ताड़न का अधिकारी बताती है। बाबासाहेब ने 1927 में जो मनुस्मृति जलायी थी वह अकेली एक पुस्तक से घृणा होने के कारण नहीं, बल्कि इसे अन्य तमाम स्मृतियों और किताबों का प्रतिनिधि ग्रन्थ मानकर की थी। लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि देश में संविधान लागू होने के वर्षों बाद भी भारत सरकार आज तक इस राष्ट्र-विरोधी किताब पर प्रतिबन्ध लगाकर इसे जब्त नहीं कर रही। सन् 1920 के दशक के क्रांतिकारी अंबेडकर सन् 1920 के दशक में दलित आंदोलन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। महाराष्ट्र में लोग जाग उठे, विशेषकर जाति के नाम पर हिंसा और अछूत प्रथा के विरूद्ध। सन् 1910 के दशक में आंबेडकर की विचारधारा और उनकी सोच आकार ले रही थी। यह इससे स्पष्ट है कि उन्होंने दासता की प्रणालीगत प्रणाली के रूप में जाति की गहन विवेचना की। ये दोनों दशक आंबेडकर के जीवन का महत्वपूर्ण काल थे। सन् 1916 से लेकर सन् 1927 तक के 12 वर्षों में आंबेडकर के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आये । हम यह कह सकते हैं कि 1910 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर सन् 1920 के दशक के पूर्वार्ध तक उन्होंने हिन्दू धर्म के भीतर समानता की तलाश की। सन् 1927 आते-आते तक उन्होंने यह प्रयास बंद कर दिया क्योंकि उन्हें यह पक्का विश्वास हो गया कि हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में अछूतों की मुक्ति की कोई संभावना नहीं है। उन्हें यह अहसास हो गया कि चतुर्वर्ण की व्यवस्था को हिन्दू धर्म के दर्शन और सिद्धांत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनकी यह मान्यता बन गयी कि हर मनुष्य का लक्ष्य उसकी बुद्धि को जागृत करना होना चाहिए और किसी मनुष्य को दूसरे मनुष्य को उसके इस अधिकार का प्रयोग करने से नहीं रोकना चाहिए। मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दीजिए… उम्मीद है आप मिशन अंबेडकर से अवश्य जुड़ेंगे आप सब जानते हैं अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक ! मूकनायक मीडिया आपके लिए ले कर आता है, वे न्यूज़-स्टोरीज जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहाँ से जहाँ वे हो रही हैं।

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