Pay Back 2 Society : हर एक बहुजन सामाजिक कार्यकर्त्ता को पढ़नी होगी ‘मैं कांशीराम बोल रहा हूँ’ पुस्तक

इस ऐतिहासिक पुस्तक लेखक ‘ पम्मी लालो मज़ारा और हिंदी में अनुवाद डॉ गुरिन्द्र आज़ाद’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 21, 2021 || जयपुर : इस किताब में मान्यवर कांशीराम जी के अलग-अलग समय पर दिये वक्तव्यों को संकलित किया गया है, जो बेहद श्रमसाध्य कार्य है। हाँ, पुस्तक में अनुक्रमणिका होती तो बेहतर होता। कांशीराम जी अपनी एक बातचीत में कहते हैं, “संत रविदास, संत कबीर, संत नामदेव, संत फरीद और गुरु नानक देव जी आदि सभी कौन सी यूनिवर्सिटियों से पढ़े हुए थे?” ”क्या इन क्रांतिकारी महापुरुषों ने कहीं से पीएचडी की डिग्रियाँ हासिल की हुई थी? …क्या इन महापुरुषों को अक्ल और बुद्धि कम थी” इन पंक्तियों के अर्थ निकालने को आप स्वतंत्र हैं.. कुछ लोगों को बहुत ज्यादा डिग्रियों के होने का भ्रम होता है। इन पंक्तियों से डॉ अंबेडकर की सदगुरु रैदास और कबीर साहेब को लेकर सोच भी स्पष्ट हो जाती है। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक कांशीराम भले ही डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की तरह चिंतक और बुद्धिजीवी ना हों, लेकिन इस बारे में कई तर्क दिये जा सकते हैं कि कैसे अंबेडकर के बाद कांशीराम ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन लाने वाले की भूमिका निभायी है। बेशक अंबेडकर ने एक शानदार संविधान के जरिए इस परिवर्तन का ब्लूप्रिंट पेश किया । लेकिन ये कांशीराम ही थे जिन्होंने इसे राजनीति के धरातल पर उतारा है। बहुजन पुरखौती कांशीराम जानते थे कि सत्ता पाने के लिए दलितों को नए सिरे से तमाम सामाजिक प्रतीक, किस्से, नायक और यकीन मुहैया कराने होंगे। इसके लिए इतिहास की सबऑल्टर्न वाचिक परंपरा का सहारा लिया गया। दलित समाज से आते वीरों मसलन, ऊदा देवी, बिजली पासी, झलकारी बाई को सत्ता में आने पर वही मान दिया गया, जो अब तक दूसरे दलों के बड़े नेताओं और इतिहास पुरुषों को दिया जा रहा था। आगे मान्यवर कहते हैं- “अक्ल भी कम नहीं थी। इन्हें खुद तो अक्ल थी ही, बल्कि अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और रौशन दिमाग के सदके आने वाली हजारों पीढ़ियों को भी अक्ल दे गये! वास्तव में, इन महापुरुषों की सामाजिक देन है ही इतनी! तभी तो समाज इनके फलसफे को सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर, आज ही सिर झुका के नमन करता है।'(पृष्ठ-79) ‘द चमचा एज’ : चमचायुग कांशीराम का जन्म पंजाब के एक दलित परिवार में हुआ था। उन्होंने बीएससी की पढ़ाई करने के बाद क्लास वन अधिकारी की सरकारी नौकरी की। आज़ादी के बाद से ही आरक्षण होने के कारण सरकारी सेवा में दलित कर्मचारियों की संस्था होती थी। कांशीराम ने दलितों से जुड़े सवाल और अंबेडकर जयंती के दिन अवकाश घोषित करने की मांग उठाई। 1981 में उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति या डीएस4 की स्थापना की। 1982 में उन्होंने ‘द चमचा एज’ (चमचायुग) लिखा जिसमें उन्होंने उन दलित नेताओं की आलोचना की जो कांग्रेस जैसी परंपरागत मुख्यधारा की पार्टी के लिए काम करते हैं। 1983 में डीएस4 ने एक साइकिल रैली का आयोजन कर अपनी ताकत दिखायी। इस रैली में तीन लाख लोगों ने हिस्सा लिया था। 1984 में उन्होंने बीएसपी की स्थापना की। तब तक कांशीराम पूरी तरह से एक पूर्णकालिक राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता बन गये थे। उन्होंने तब कहा था कि अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूँ। उन्होंने तब मौजूदा पार्टियों में दलितों की जगह की पड़ताल की और बाद में अपनी अलग पार्टी खड़ा करने की जरूरत महसूस की। वो एक चिंतक भी थे और ज़मीनी कार्यकर्ता भी। बहुत कम समय में बीएसपी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी एक अलग छाप छोड़ी। उत्तर भारत की राजनीति में गैर-ब्राह्मणवाद की शब्दावली बीएसपी ही प्रचलन में लाई हालांकि मंडल दौर की पार्टियाँ भी सवर्ण जातियों के वर्चस्व के ख़िलाफ़ थीं। दक्षिण भारत में यह पहले से ही शुरू हो चुका था। कांशीराम का मानना था कि अपने हक़ के लिए लड़ना होगा, उसके लिए गिड़गिड़ाने से बात नहीं बनेगी। पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव हरवाने के लिए, और फिर तीसरे चुनाव से जीत मिलनी शुरू हो जाती है.. कांशीराम मायावती के मार्गदर्शक थे। मायावती ने कांशीराम की राजनीति को आगे बढ़ाया और बसपा को राजनीति में एक ताकत के रूप में खड़ा किया। लेकिन मायावती कांशीराम की तरह कभी भी एक राजनीतिक चिंतक नहीं रहीं। कांशीराम 2006 में मृत्यु से क़रीब तीन साल पहले से ही ‘एक्टिव’ नहीं थे। कांशीराम की मृत्यु के एक दशक बाद एक बार फिर संभावना जतायी जा रही थी कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मायावती सत्ता हासिल करने की प्रमुख दावेदार हैं। अनेक जानकार मानते थे कि बीएसपी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है। यदि ऐसा होता है तो इसीलिए कि कांशीराम की विरासत आज भी ज़िंदा है और बेहतर कर रही है। फिर भी इस बात को लेकर सवाल उठते हैं कि मायावती जिस तरह से ठाठ में रहती हैं उसे देखकर कांशीराम कितना खुश होते? जिस दौर में कांशीराम की विरासत मायावती के हाथों में आ रही थी । उस दौर में मायावती पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे। हालांकि बीएसपी इन सभी आरोपों को निराधार बताती है। मायावती को ही अपनी राजनीति का प्रतिनिधि क्यों चुना इस बात का जवाब हमें कभी नहीं मिल पायेगा कि अपनी बीमारी और मौत के कई साल पहले ही कांशीराम ने मायावती को ही अपनी राजनीति का प्रतिनिधि क्यों चुन लिया था। खैर उत्तर प्रदेश में दलितों को तो मजबूत बनाया ही, साथ ही साथ दूसरे राज्यों में भी वोट शेयर में इजाफा किया। व्यक्तिगत रूप से कांशीराम एक सादा जीवन जीते थे.. लेकिन इस बात को लेकर हमेशा बहस रही है कि धन-वैभव का प्रदर्शन भी दलित सशक्तिकरण का एक प्रतीक है। कांशीराम का मानना था कि दलित और दूसरी पिछड़ी जातियों की संख्या भारत की जनसंख्या की 85 फ़ीसदी है, लेकिन 15 फ़ीसदी सवर्ण जातियाँ उन पर शासन कर रही हैं। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी तो बना डाली, लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर पाना इतना आसान नहीं था। मुझे आज भी वह दिन याद है जब मेरे एक बहुत अजीज और मेरी मान्यवर कांशीराम से पहली मुलाकात करवाने वाले (जो कि मान्यवर कांशी के पूर्व सहयोगी रहे); भारत सिंह बघेल हमेशा कहते थे कि मान्यवर का मंत्र था कि पहला चुनाव हम हारेंगे, दूसरे चुनाव में हराएंगे और तीसरे चुनाव में जीतेंगे। उनका कहना था कि हम इस देश में बहुजन समाज को हुक्मरान बनाना चाहते हैं। लोकतंत्र में जिनकी संख्या ज़्यादा होती है उनको हुक्मरान होना चाहिए। इसीलिए उन्होंने एक नारा लगाया था ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी।’ उनका एक और नारा था ‘जो बहुजन की बात करेगा, वो दिल्ली पर राज करेगा।” मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दीजिए… उम्मीद है आप मिशन अंबेडकर से अवश्य जुड़ेंगे आप सब जानते हैं अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक ! मूकनायक मीडिया आपके लिए ले कर आता है, वे न्यूज़-स्टोरीज जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहाँ से जहाँ वे हो रही हैं। मूकनायक मीडिया यह सब तभी कर सकता है जब आप सभी बाबासाहब डॉ अंबेडकर के इस मिशन से आत्मीयता से जुड़ें ! हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरें आप तक पँहुचाने के लिए हमारा आर्थिक सहयोग करें। आप सब दानवीर हैं इसलिए आपसे मिशन अंबेडकर को आगे बढ़ाने हेतु आर्थिक मदद माँग रहे हैं। अत: अपनी इच्छानुसार PhonePay या Paytm 9999750166 पर 200, 500, 1000 या इससे भी इससे भी अधिक अपनी हेसियत के मुताबिक नीचे Donate link पर जाकर आर्थिक सहयोग दीजिए ताकि कारवाँ जारी रहे…

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