दृष्टिकोण : न लगता आपातकाल तो आरएसएस-संघी भारत को 1975 में ही बना देते पाकिस्तान – : – एक रिपोर्ट

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‘आरएसएस सदैव निरंकुश शासन का हिमायती रहा है, और लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों का जानी-दुश्मन’

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 22, 2021 || जयपुर : इंदिरा गाँधी ने 25-26 जून, 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया था। यह 19 महीने तक लागू रहा। इस दौर को काले दिन के रूप में याद किया जाता है। पर, यह सौ फीसदी सच है कि आपातकाल न लगता तो संघी भारत को 1975 में ही बना देते पाकिस्तान! आरएसएस का पुराना चलन है कि वह हुक़्मरानों के के तलवे चाटने में अग्रणी रहा है, माफीनामा आरएसएस के नॉबेल कृत्यों में है, आरएसएस सदैव निरंकुश शासन का हिमायती रहा है, और लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों का जानी-दुश्मन।

यही वजह है कि आरएसएस के किसी भी नेता ने जंग-ए-आज़ादी में भी कोई शिरक़त नहीं की। ऐसे में आज आरएसएस और बीजेपी के लोग ये किस मुँह से कह सकते हैं कि आरएसएस ने आपातकाल के दमन का सामना जम कर किया था। यह आरएसएस की सर्वोच्च ढ़कोसलेबाजी है! आरएसएस के बारे में इंदिरा की दूर-दृष्टि इंदिरा विरोधी अभियान में जनसंघ, समाजवादी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शामिल थे। बाद में, संघ माफीनामा देकर अलग हो गया और संजय गाँधी के तलवे चाटने लगा। इंदिरा विरोधी आंदोलन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। जयप्रकाश नारायण ने सभी शासकीय कर्मचारियों से अपील की कि वे इंदिरा के आदेशों का पालन न करें। यहाँ तक कि उन्होंने इस तरह का आह्वान फौज और पुलिस से भी किया।

जयप्रकाश नारायण के इस रवैये का उल्लेख करते हुए प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचन्द्र गुहा अपनी किताब “इंडिया आफ्टर गाँधी” में लिखते हैं कि ऐसा लगता था कि राज्य सत्ता ही गायब हो जाएगी। जयप्रकाश ने पुलिस और फौज से कहा कि वह “अनैतिक आदेशों को न मानें”। यद्यपि जयप्रकाश नारायण ने ‘अनैतिक आदेशों’ की परिभाषा नहीं दी थी। पुलिस और फौज को शासन के आदेशों को न मानने का आह्वान अपने आप में एक अनैतिक कृत्य था। शायद इसके चलते इंदिरा जी के सामने कोई अन्य विकल्प नहीं था और अंततः उन्हें आपातकाल लागू करना पड़ा। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करने के अतिरिक्त कोई भी विकल्प नहीं बचा था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का दावा है कि उसने आपातकाल का बहादुरी के साथ मुक़ाबला किया और भारी दमन का सामना किया।

उस दौर के अनेक कथानक हैं, जो आरएसएस के इन दावों को झुठलाते हैं। यहाँ मूकनायक मीडिया ऐसे दो दृष्टांतों का उल्लेख कर रहे हैं। इनमें से एक वरिष्ठ पत्रकार और विचारक प्रभाष जोशी हैं और दूसरे, पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) के उप प्रमुख टी. वी. राजेश्वर है। आपातकाल जिस समय घोषित किया गया था राजेश्वर आईबी के उप प्रमुख थे। बिनोवा भावे को तत्कालीन संघ प्रमुख दत्तात्रेय देवरस की चिट्ठी इंदिरा गाँधी के जवाब नहीं देने के बाद देवरस ने विनोबा भावे से संपर्क किया जिन्होंने आपातकाल का आध्यात्मिक समर्थन किया था और इंदिरा गाँधी का पक्ष लिया था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 12 जनवरी, 1976 में, आचार्य विनोबा भावे से गिड़गिड़ाते हुए आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गाँधी को सुझाव दें।

भावे ने भी पत्र का जवाब नहीं दिया, हताश देवरस ने उन्हे एक और पत्र में लिखा; “ अखबारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधान मंत्री (इंदिरा गाँधी) 24 जनवरी को वर्धा पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो गलत धारणा घर कर गई है। आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों में बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रगति और विकास में सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।” माफ़ीनामे पर जेल से छूटे राजेश्वर ने बताया कि किस तरह आरएसएस ने इंदिरा गाँधी के दमनकारी शासन के सामने घुटने टेक दिए थे और इंदिरा गाँधी एवं उनके पुत्र संजय गाँधी को 20-सूत्री कार्यक्रम पूरी वफ़ादारी के साथ लागू करने का आश्वासन था। आएसएस के अनेक ‘स्वयंसेवक’ 20-सूत्री कार्यक्रम को लागू करने के रूप में माफ़ीनामे पर दस्तख़त कर जेल से छूटे थे। दिलचस्प बात यह है कि आरएसएस के ऐसे लोग आपातकाल के दौरान उत्पीड़न के एवज़ में आज मासिक पेंशन ले रहे हैं।

बीजेपी शासित राज्यों, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उन लोगों को 10,000 रुपये मासिक पेंशन देने का फैसला लिया गया है जिन्हें आपातकालीन के दौरान एक महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया था। आरएसएस से जुड़े जो लोग इस दौरान एक माह से कम अवधि के जेल गए थे उन्हें बतौर 5,000 रुपये पेंशन देना तय किया गया है। इस नियम में उन ‘स्वयंसेवकों’ का ख्याल रखा गया है, जिन्होंने केवल एक या दो महीने जेल में रहने के बाद घबरा कर दया याचिका पेश करते हुए माफ़ीनामे पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इंदिरा गाँधी को संघ प्रमुख दत्तात्रेय देवरस की चिट्ठी प्रभाश जोशी का लेख अंग्रेजी साप्ताहिक ‘तहलका’ में आपातकाल की 25 वीं वर्षगाँठ पर छपा थाi। उनके मुताबिक़, ‘उस समय के आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस ने संजय गाँधी के कुख्यात 20-सूत्री कार्यक्रम को लागू करने में सहयोग करने के लिए इंदिरा गाँधी को एक पत्र लिखा था। यह है आरएसएस का असली चरित्र…आप उनके काम करने के अंदाज़ और तौर तरीकों को देख सकते हैं।’

प्रभाष जोशी ने आगे लिखा, ‘आरएसएस ने आपातकाल लागू होने के बाद उसके ख़िलाफ़ किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं किया। तब, भाजपा आपात काल के खिलाफ संघर्ष की याद को अपनाने की कोशिश क्यों कर रही है?’ इंदिरा गाँधी से आरएसएस द्वारा गोपनीय संपर्क की कोशिश, इंदिरा ने नकारा राजेश्वर ने मशहूर पत्रकार, करण थापर के साथ एक मुलाकात में खुलासा किया कि देवरस ने ‘गोपनीय तरीके से प्रधानमंत्री आवास के साथ संपर्क बनाया और देश में अनुशासन लागू करने के लिए सरकार ने जो सख़्त कदम उठाए थे उनमें से कई का मजबूती के साथ समर्थन किया था।’ संघ प्रमुख देवरस ने की इंदिरा की तारीफ़ राजेश्वर ने यह तथ्य भी साझा किया है कि आपातकाल के बाद भी ‘संघ (आरएसएस) ने आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को अपना समर्थन विशेष रूप से व्यक्त किया था।’ यह खास तौर पर गौरतलब है कि जो सुब्रमण्यम स्वामी अब आरएसएस के प्यारे हैं, उन्होंने भी कहा था कि आपातकाल के दौरान आरएसएस के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष के साथ गद्दारी की थी।

आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक, मधुकर दत्तात्रय देवरस ने आपातकाल लगने के दो महीने के भीतर इंदिरा गाँधी को पहला पत्र लिखा था। यह वह समय था जब राजकीय आतंक चरम पर था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 22 अगस्त, 1975 की शुरुआत ही इंदिरा की प्रशंसा के साथ की। मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल किले से देश के नाम आपके संबोधन को जेल (यरवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फ़ैसला किया। मधुकर दत्तात्रय देवरस, आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक संजय गाँधी को देवरस का ख़त इंदिरा गाँधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा को एक और पत्र लिखा।

इस पत्र की शुरुआत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के ख़िलाफ़ दिए गए निर्णय के लिए बधाई के साथ की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनको चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य करार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट के सभी पांच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।’

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