आदिवासी युवतियों पर बिल गेट्स का जबरन वैक्सीन ट्रायल, ज़िंदा लाश बनाने का दोषी कौन ? बिल गेट्स का भारत के आदिवासियों पर अत्याचार

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || मई 30, 2021 || दिल्ली – जयपुर : दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों की सूची में सर्वोच्च स्थान से बाहर हो चुके बिल गेट्स आजकल भारत के आदिवासियों पर अत्याचार करने वालों की सूची में सर्वोच्च स्थान पा रहे हैं। वैक्सीन ट्रायल में ग़रीबों और वंचितों को निशाना बनाया जाता है। छत्तीसगढ़ सहित देश के आदिवासी अंचलों में ग़रीब महिलाओं की दु:खद मौत से साबित हुआ है कि अब भी ऐसा हो रहा है।

कई गलत कामों में से, माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स को भारत में ट्विटर द्वारा अब 2009 में अपने एनजीओ बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (बीएमजीएफ) के माध्यम से आदिवासी बच्चों पर स्वदेशी टीकों के परीक्षण और नसबंदी के एक कार्यक्रम के वित्तपोषण के लिए खींचा जा रहा है। प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि “ऐसा इसलिए है क्योंकि मान लिया गया कि महिलाओं का इसका विरोध करने की संभावना कम है।”

141114150511 women protesting in bilaspur chhattisgarh 624x351 alokputul 300x169 आदिवासी युवतियों पर बिल गेट्स का जबरन वैक्सीन ट्रायल, ज़िंदा लाश बनाने का दोषी कौन ? बिल गेट्स का भारत के आदिवासियों पर अत्याचारआज ट्विटर पर एक ज्वलंत मुद्दे पर फोकस करते हुए #ArrestBillGates ट्रेंड कर रहा है क्योंकि कुछ लोगों का दावा है कि BMGF ने अपने माता-पिता की सहमति के बिना, सबसे गरीब आदिवासी बच्चों में से कुछ पर एक वैक्सीन का अनधिकृत नैदानिक परीक्षण किया।

ट्विटर सोशल मीडिया पर सामाजिक मुद्दों की पैरवी करने वाले हंसराज मीना का कहना है कि बिल गेट्स आरएसएस के इशारे पर जनसंख्या नियंत्रण के एजेंडे पर काम कर रहा है। इसका शिकार सबसे पहले भारत में आदिवासी लड़कियों को बनाया जा रहा है। इसमें स्वदेशी वैक्सीन के परीक्षण के नाम पर जबरन नसबंदी करके ज़िंदा लाश बना दिया जाता है।

यह अमानवीय कृत्य है। आखिर सरकारों द्वारा उन्हें इतनी खुली छूट क्यों मिली? वस्तुत: ग्रेटगेमइंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, सिएटल स्थित एक एनजीओ, प्रोग्राम फॉर एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी इन हेल्थ (पीएटीएच) ने बीएमजीएफ द्वारा वित्त पोषण की मदद से 10-14 साल की 14,000 आदिवासी लड़कियों को ह्यूमन पेपिलोमावायरस (एचपीवी) वैक्सीन देने के लिए एक परियोजना को अंजाम दिया।

रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि कई बीमार पड़ गये थे और चार लड़कियों की मौत भी हो गयी थी, जिन्हें गार्डासिल का इंजेक्शन लगाने के बाद उनके परिवारों को पता नहीं था कि बच्चों को यह दवा दी जा रही है। ऐसा माना जाता है कि ज्यादातर लड़कियों के माता-पिता को ट्रायल के बारे में पता नहीं था क्योंकि लड़कियां सरकारी छात्रावासों में रहती थीं।

एक अन्य ट्विट में हंसराज मीना का कहना है कि विश्व स्तरीय चुप्पी अकल्पनीय है। यह एक ऐसी कहानी है जहाँ एक विदेशी संस्था 14,000 भारतीय आदिवासी लड़कियों को गिनी पिग के रूप में इस्तेमाल करती है। कई की मौत हो गयी और कई के गंभीर दुष्प्रभावी हुई हैं। लेकिन कंपनी और उसकी दवा समृद्ध और लाखों कमाती है।

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