व्हाइट गोल्ड की तस्करी : वन विभाग की तस्करों से मिलीभगत, भोले-भाले आदिवासियों को जेलों में ठूँसा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || जून 16, 2021 || जयपुर – दिल्ली :अरावली की दुगर्भ पहाड़ी क्षेत्र में सालों से हो रहे गोंद तस्करी को रोकने के लिए पाली, उदयपुर व राजसमंद जिलों में वन विभाग की तस्करों से मिलीभगत के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है। इसके चलते सालाना लाखों रुपए का गोंद अवैध रूप से बाजार में पहुँच रहा हैं और प्रदेश की सरकार का राजस्व का नुकसान हो रहा हैं। पहाड़ी रेंज में आदिवासी परंपरागत तौर-तरीकों से जंगल से गोंद इकट्ठा कर जैसे-तैसे जीवन यापन करते हैं और वन विभाग की लापरवाही से जंगल को चीरने वाला गिरोह सक्रिय हो गया है। जंगलों के दुश्मन कई तस्कर आदिवासियों को चंद रुपयों का लालच देकर अमूल्य वन संपदा को लूट रहे हैं। वन विभाग की मिलीभगत से व्हाइट गोल्ड की तस्करी इससे जंगलों की खूबसूरती तो खराब हो ही रही है, लाखों रुपए का नुकसान भी हो रहा इसमें खुलेआम पेड़ों को चीरकर गोंद निकाला जा रहा है, जिसे स्थानीय लोग व्हाइट गोल्ड कहते हैं। लकड़ियाँ काटी जा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि वन्यजीव अभ्यारण कुंभलगढ़ के सादड़ी रेंज में बड़ी संख्या में अमूल्य सालर के कई पेड़ हैं। इसका गोंद अगरबत्ती, गुगल धूप व दवाइयाँ बनाने के काम आता हैं। इसके चलते बाजार में इसकी काफी डिमांड हैं। तस्कर पाली व उदयपुर जिले के भोले भाले कुछ आदिवासियों को चंद रुपयों का लालच देकर इन पेड़ों में अवैध रूप से ट्रेपिंग करवाकर गोंद लेकर उसकी तस्करी कर सालाना लाखों रुपए का वन विभाग को चूना लगा रहे हैं। फिर, अवैध रूप से सालर के पेड़ों को घाव देकर हो रही गोंद की तस्करी को रोकने में पाली, उदयपुर व राजसमंद का वन विभाग नाकाम साबित हो रहा हैं। पाली से जालोर, सिरोही, बाड़मेर गुजरात तक करीब 59 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अरावली पवर्तमाला फैली हुई हैं। कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभ्यारण क्षेत्र 610 वर्ग किलोमीटर फैला हुआ हैं। इसका काफी हिस्सा पाली जिले से होकर गुजरता हैं। जिले के सादड़ी रेंज के नाना, बेड़ा, गोरिया, भीमाणा, उदयपुर के सायरा, गोगुंदा व राजसमंद क्षेत्र में अरावली की पवर्तमाला में आदिवासी चोरी-छीपे सालर के पेड़ों में ट्रेपिंग कर गोंद निकाल उसे तस्करों तक पहुँचाते हैं। ऐसे सालर के पेड़ों से निकालते हैं गोंद राजस्थान के बड़े वन क्षेत्रों में कुम्भलगढ़ व रावली वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं। जिसमें 4 रेंज आती हैं । पाली जिले की सादड़ी, देसूरी, राजसमंद जिले की कुम्भलगढ़ व उदयपुर जिले की बोखाड़ा रेंज। यहाँ हजारों की संख्या में सालर के पेड़ हैं। गोंद को तस्करी गर्मी के मौसम होती है। किसी नुकीले हथियार से आदिवासी करीब एक से दो इंच तक पेड़ को चारों तरफ से छीलते हैं। जिससे अगले 15 दिनों में इनसे गोंद निकलकर एकत्र हो जाता हैं। इसके कच्चे माल की कीमत 400 रुपए किलो तक है। तस्कर इसे मार्केट में एक हजार से पन्द्रह सौ रुपए किलो में बेचते हैं। यह गोंद आयुर्वेदिक दवाइयों, गुगल धूप व अगरबत्ती बनाने का ज्यादा काम आता हैं। जानकारी मिलने पर करते हैं कार्रवाई राजसमंद के DFO फतेहसिंह राठौड़ ने बताया कुम्भगढ़ अभ्यारण क्षेत्र में जहाँ पैदल जाना भी मुशिकल होता हैं वहाँ आदिवासियों के जरिए कुछ लोग आदिवासियों को रुपयों का लालच देकर गोंद खरीदते हैं। अधिकतर मामलों में आदिवासी मौके ट्रेपिंग करते नहीं मिलते। इसलिए पकड़े नहीं जाते। हम इनसे गोंद खरीदने वालों को पकड़ना चाहते हैं। इसके साथ ही जन प्रतिनिधियों के जरिए इनसे समझाइश भी कर रहे हैं। जिससे ये सालर के पेड़ों से गोंद निकालने का काम बंद कर दे। डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। उम्मीद है आप बिरसा फुले अंबेडकर मिशन से अवश्य जुड़ेंगे, सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…

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