अंग्रेजों ने कहा था ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र नहीं होता, फादर स्टेन स्वामी की मौत से पुन: साबित

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‘सत्ता वह सब करती है जिससे उसका अस्तित्व बचा रहे, पर न्यायपालिका सत्ता की चड्डी पहनकर नाचेगी क्या ?’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || 06 जुलाई 2021|| जयपुर : भारतीय न्यायपालिका में आज किसका कब्ज़ा है यह किसी से भी छुपा नहीं है! देश की न्यायपालिका में ना तर्क चलता है, ना जवाबदेही और पारदर्शिता है, वहाँ सिर्फ एक चीज बखूबी चलती है और वह है जातीय मानसिकता। इसलिए जातीय मानसिकताओं ने शासक वर्ग कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और मीडिया में अपना गैंग बनाकर कब्जा कर रखा है। वह ‘सिस्टम’ जिसके इकोसिस्टम के हिसाब से पुलिस, जेल प्रशासन और यहाँ तक कि अदालत भी ढल चुकी लगती है। फादर स्टेन आदिवासियों के लोकतान्त्रिक अधिकारों, उनकी संस्कृति और परिवेश को बचाने के लिए निडरता के साथ खड़े रहे। आखिर किस गुनाह के लिए वे अपने जीवन के अंतिम 217 दिन जेलों में रहे? न चार्जशीट दायर हुई, न ट्रायल हुआ। न समय पर इलाज मिला और न ही जेल में एक आम क़ैदी को जो सुविधाएं मिलती हैं, वे मयस्सर हुईं। यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आदिवासियों के हित में लंबे समय से संघर्ष कर रहे फादर स्टेन को यूएपीए के तहत भीमा कोरेगांव मामले में अभियुक्त बनाया गया। उन्हें जिस तरह से और जिन परिस्थितियों में गिरफ्तार किया गया, उस पर सवाल उठे और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले के तौर पर देखा गया। 84 वर्ष की उम्र में फादर स्टैंड स्वामी की मौत हो गयी उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों के बीच सेवा और संघर्ष करते हुए बिताने के बाद पुणे यूएपीए के तहत राष्ट्रद्रोह मत लाकर भीमा कोरेगांव प्रकरण में गिरफ्तार किया गया था। फादर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। शायद भारत दुनिया के इकलौता देश है जिसमें पार्किंसन से पीड़ित 84साल का बुढा व्यक्ति उसके प्रधानमंत्री को मार सकता है। फादर स्टेन स्वामी की मौत को सभी संविधान में विश्वास रखने वाले नागरिक संस्थागत हत्या मान रहे हैं! इस हत्या के लिए किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए; यह यक्ष-प्रश्न है, सरकारी एजेंसी को या सरकार को या उन आदिवासियों को जिनके लिए जीवन भर संघर्ष किया और वे दुबककर पड़े रहे या फिर न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका इसके लिए जिम्मेदार है या फिर देश में वह न्याय पसंद लोग भी फादर स्टेन स्वामी की मौत के लिए जिम्मेदार है जो अपने घरों में चैन से रह रहे हैं। ऐसा व्यक्ति जो हाथ से गिलास उठा कर पानी नहीं पी सकता हो उसे इतने संगीन अपराध में इसलिए फंसा दिया गया क्योंकि वे आदिवासियों पर फर्जी मुकदमे लगाये जाने के खिलाफ सतत संघर्ष कर रहे थे। 2016 में उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें बताया गया था कि आदिवासियों के संसाधनों पर कब्जा कर उन्हें और अधिक कुपोषण में धकेला जा रहा है। पत्थलगड़ी आंदोलन में हजारों आदिवासियों को फंसाया गया। तब फादर की प्रेरणा से ही जनहित याचिका लगी। बाद में सरकार बदली बड़ी संख्या में फर्जी प्रकरणों में पकड़े गये आदिवासियों के लिए रिहाई हुई । झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और देश के तमाम आदिवासी क्षेत्रों में फादर की गिरफ्तारी के बाद से ही छुटमुट जन प्रतिरोध के कार्यक्रम चल रहे थे, जो उनके लिए जीवन दे चुके स्टेन स्वामी को जेल की सलाखों से बाहर निकालने के लिए नाकाफी थे। फादर की न्यायिक हिरासत में मौत में भारत की न्याय प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन्हें जमानत क्यों नहीं दी गयी। जमानत का विरोध करने वाले तथा जमानत नहीं देने वाले दोनों को ही फादर की मौत का जिम्मेदार माना जाना चाहिए। एनआईए के बारे में हाल ही में अखिल गोगोई के फैसले में खुद एनआईए कोर्ट ने कई सवाल खड़े किये। सवाल यह है कि वर्तमान न्याय व्यवस्था में क्या इस तरह की मौत के लिए किसी की जवाबदेही तय किये जाने का प्रावधान है। भारत की पुलिस हिरासत में 1700 से अधिक तथा जेलों में 2000 से अधिक मौतें सालाना होने की खबरें छपती रही है। सबसे दु:खद यह है कि आजादी के 74 वर्ष बाद आज तक हजारों विचाराधीन कैदियों की मौत हो गयी है। और आज तक किसी के भी सिर में जूं तक नहीं रेंगी है। उन कैदियों पर ना तो आरोप सिद्ध हुआ था और ना ही उन्हें अदालत में सजा सुनाई गयी और पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिए कमीशन की तमाम सिफारिशें सरकारी बाबू की अलमारियों में धूल खा रही है। सरकार चाहे कोई भी हो वह अपने विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए मीसा, टाडा, पोटा की तरह यूएपीए का दुरुपयोग करती रही है और आगे भी करती रहेंगी! पर क्या ऐसी सरकारों में कदाचित कोई संवेदना बची है? क्या ऐसी सरकारें देश की आजादी के शहीदों के बलिदान के साथ न्याय कर रही है? इसके सैकड़ों प्रमाण मौजूद होने के बावजूद भी सर्वोच्च न्यायालय यदि इस तरह का फैसला करें कि यूएपीए के प्रकरण में जमानत नहीं दी जानी चाहिए तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लगाना स्वभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने वाले अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने पर जिस तरह से अनौपचारिक तरीके से कानूनी रोक लगा रखी है, वह तार्किक और न्यायोचित है! पिछले कुछ महीनों से देश के विभिन्न उच्च न्यायालय में जो फैसले आये हैं उनसे थोड़ी-सी आशा बंधी है कि आने वाले समय में सर्वोच्च न्यायालय को भी अपने फैसले पर बड़ी बेंच बिठाकर पुनर्विचार करना होगा। फादर स्टैंड स्वामी की मौत के बाद तुरंत जो टिप्पणियाँ आयीं हैं , उनमें यहां तक कहा गया है कि व्यवस्था को चुनौती देने वालों को जेल में ही मार देना गुजरात मॉडल का स्वरूप है। इसे संघर्ष करने वालों को भयभीत करने की साजिश का एक हिस्सा बताया जा रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है दुनिया भर में बर्तन के लिए संघर्ष करने वाले कभी गोलियों का शिकारहुए, कभी फांसी पर चढ़ाए गये, इसके बावजूद कभी संघर्ष करने वालों की संख्या कम नहीं हुई। हिंसा से, गोली से या दमन से विचार को ना मारा जा सकता है और नष्ट नहीं किया जा सकता है। समाज को न्यायपूर्ण, शोषण मुक्त बनाने का विचार आदि-अनादि काल से लूट और अन्याय की व्यवस्था को चुनौती देता रहा है। फादर स्टेन स्वामी की संस्थागत के हत्या के बाद भी चुनौती देता रहेगा। संघर्ष जारी है, और भविष्य में भी जारी रहेगा। सनद रहे, उसे हिंसक राज्य से कभी खत्म नहीं किया जा सकता। बड़ा सवाल : आदिवासियों के लिए बोलने वाले कब तक रहेंगे जेलों में बंद? आतंकवाद से संबद्धता के आरोपों में जेल में बंद सबसे अधिक उम्र के फ़ादर स्टैन पर भीमा कोरेगांव हिंसा से संबद्धता के आरोप हैं। जाँचकर्ताओं का आरोप है कि भीमा कोरेगाँव की घटना से एक दिन पहले पुणे में एल्गार परिषद की बैठक में भाषण हुए और उस भाषण के नतीजे के तौर पर भीमा कोरेगाँव की घटना घटी थी। इस मामले में 16 अन्य बुद्धिजीवियों को भी पुलिस ने अलग-अलग समय पर गिरफ़्तार किया था। हालांकि इन सभी अभियुक्तों का कहना है कि उस घटना में इन सबका कोई हाथ नहीं है। फ़ादर स्टैन की ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए एनआईए ने कहा कि स्टै़न स्वामी आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने का बहाना करते रहे हैं। लोकतंत्र को खत्म करना उनका लक्ष्य रहा है। 84 साल के बुजुर्ग से लोकतंत्र को खतरा था। यह बात न विश्वसनीय लगती है और न ही अब कभी यह साबित हो पाएगी। मगर, अब भी वरवर राव जैसे बुजुर्ग और देश के मानवाधिकार कार्यकर्ता दर्जनों की संख्या में जेलों में बंद हैं। क्या उनकी जि़न्दगी को बचाने के लिए आवाज़ उठेगी? या वे भी बगैर किसी ट्रायल के आतंकवाद और देश विरोधी होने का आरोप लिए सिर्फ इसलिए चल बसेंगे कि उन्होंने जीवन भर कमजोर तबके के लिए अपनी आवाज़ें बुलंद कीं? 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