पपीता की खेती कर सकती है किसानों का कायापलट और मालामाल – पिंटू लाल मीणा, सहायक कृषि अधिकारी, धौलपुर

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || 19 जुलाई 2021|| जयपुर- सरमथुरा – धौलपुर : किसान खेती को लगातार घाटे का सौदा बता रहे हैं। सिंचाई, बीज और खाद के बढ़ते दाम और फसलों को बेचने के लिए आसान और सुलभ साधन न होने के कारण उनकी परेशानी लगातार बढ़ रही है।

इन समस्याओं से सहमत होने के बाद भी सहायक कृषि अधिकारी पिंटू लाल मीणा (Pintu Lal Meena, Assistant Agriculture Officer) का कहना है कि अगर किसान बदलते समय के साथ परंपरागत खेती छोड़कर आधुनिक तकनीक से व्यावसायिक खेती करें तो वे इसी खेती को मुनाफे का सौदा बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें गेंहू-धान जैसी परंपरागत फसलों की बजाय फल-फूल और सब्जी की खेती करने पर विचार करना चाहिए। पपीते की खेती ऐसा ही एक उपाय है जिसके माध्यम से किसान प्रति हेक्टेयर दो लाख रुपये प्रति वर्ष (सभी लागत खर्च निकालने के बाद) की शुद्ध कमाई कर सकते हैं। रेड लेडी पपीता की ही एक प्रजाति है जिसकी खेती किसानों को मालामाल बना सकती है। पपीते की खेती के लिए वैज्ञानिक इसे सबसे उपयुक्त मानते हैं।

पपीता की खेती क्यों है फायदेमंद पपीता आम के बाद विटामिन ए का सबसे अच्छा स्रोत है। यह कोलेस्ट्रोल, सुगर और वजन घटाने में भी मदद करता है, यही कारण है कि डॉक्टर भी इसे खाने की सलाह देते हैं। यह आंखों की रोशनी बढ़ाता है और महिलाओं के पीरियड्स के दौरान दर्द कम करता है। पपीते में पाया जाने वाला एन्जाइम ‘पपेन’ औषधीय गुणों से युक्त होता है। यही कारण है कि पपीते की मांग लगातार बढ़ रही है। बढ़ते बाज़ार की मांग को देखते हुए लोगों ने इसकी खेती की तरफ ध्यान दिया है और सिर्फ एक दशक में पपीते की खेती तीन गुना बढ़ गई है। भारत पपीता उत्पादन में विश्व में पहले नंबर पर (प्रति वर्ष 56.39 लाख टन) है। इसका विदेशों में निर्यात भी किया जाता है।

पपीते की खेती से किसानों को कितना लाभ भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान केंद्र (पूसा) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर कन्हैया सिंह ने अमर उजाला को बताया कि पपीते की फसल साल भर के अंदर ही फल देने लगती है, इसलिए इसे नकदी फसल समझा जा सकता है। इसको बेचने के लिए (कच्चे से लेकर पक्के होने तक) किसान भाइयों के पास लंबा समय होता है। इसलिए फसलों के उचित दाम मिलते हैं। 1.8X1.8 मीटर की दूरी पर पौधे लगाने के तरीके से खेती करने पर प्रति हेक्टेयर 65-70 हजार रुपये तक की लागत आती है, जबकि 1.25X1.25 मीटर की दूरी पर पेड़ लगाकर सघन तरीके से खेती करने पर 1.25 लाख रुपये तक की लागत आती है। लेकिन इससे न्यूनतम दो लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक की शुद्ध कमाई की जा सकती है।

पपीते को बोने का समय पपीता उष्ण कटिबंधीय फल है। इसकी अलग-अलग किस्मों को जून-जुलाई से लेकर अक्टूबर-नवंबर या फरवरी-मार्च तक बोया जा सकता है। पपीते की फसल पानी को लेकर बहुत संवेदनशील होती है। बुवाई से लेकर फल आने तक भी इसे उचित मात्रा में पानी चाहिए। पानी की कमी से पौधों और फलों की बढ़त पर असर पड़ता है, जबकि जल की अधिकता होने से पौधा नष्ट हो जाता है। यही कारण है कि इसकी खेती उन्हीं खेतों में की जानी चाहिए जहां पानी एकत्र न होता हो। गर्मी में हर हफ्ते तो ठंड में दो हफ्ते के बीच इनकी सिंचाई की व्यवस्था होनी चाहिए। पपीते की खेती में उन्नत किस्म की बीजों को अधिकृत जगहों से ही लेना चाहिए। बीजों को अच्छे जुताई किए हुए खेतों में एक सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए। बीजों को नुकसान से बचाने के लिए कीटनाशक-फफूंदनाशक दवाइयों का प्रयोग करना चाहिए।

पपीते का पौधा लगाने के लिए 60X60X60 सेंटीमीटर का गड्ढा बनाया जाना चाहिए। इसमें उचित मात्रा में नाइट्रोजन, फोस्फोरस और पोटाश और देशी खादों को डालकर 20 सेंटीमीटर की ऊंचाई का तैयार पौधा इनमें रोपना चाहिए। पपीते के बेहतर उत्पादन के लिए 22 डिग्री सेंटीग्रेड से लेकर 26 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान सबसे उपयुक्त होता है। इसके लिए सामान्य पीएच मान वाली बलुई दोमट मिट्टी बेहतर मानी जाती है। पपीते के पौधे में सफेद मक्खी से फैलने वाला वायरस के द्वारा होने वाला पर्ण संकुचन रोग और रिंग स्पॉट रोग लगता है। इससे बचाव के लिए डाइमथोएट (2 मिलीलीटर प्रतिलीटर पानी में) के घोल का छिड़काव करना चाहिए। उचित सलाह के लिए हमेशा कृषि वैज्ञानिकों या कृषि सलाहकार केंद्रो के संपर्क में रहना चाहिए। पपीता की देशी और विदेशी किस्में और उत्पादन पपीता की देशी और विदेशी अनेक किस्में उपलब्ध हैं।

देशी किस्मों में राची, बारवानी और मधु बिंदु लोकप्रिय हैं। विदेशी किस्मों में सोलों, सनराइज, सिन्टा और रेड लेडी प्रमुख हैं। रेड लेडी के एक पौधे से 100 किलोग्राम तक पपीता पैदा होता है। पूसा संस्थान द्वारा विकसित की गई पूसा नन्हा पपीते की सबसे बौनी प्रजाति है। यह केवल 30 सेंटीमीटर की ऊंचाई से ही फल देना शुरू कर देता है, जबकि को-7 गायनोडायोसिस प्रजाति का पौधा है जो जमीन से 52.2 सेंटीमीटर की ऊंचाई से फल देता है। पपीता की अन्य उन्नत प्रजाति निम्न हैं; 1. फल उत्पादन हेतु :- ताइवान , रेड लेडी -786, हानिड्यू (मधु बिंदु) , कुर्ग हनिड्यू , वाशिंगटन , कोयंबटूर -1 , CO. -3 , CO. -4, CO. – 6 , पंजाब स्वीट , पूसा डिलीशियस ,पूसा जाइंट , पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा, सूर्या, पंत पपीता आदि । 2. पपेन उत्पादक किस्मे :- पूसा मैजेस्टी , CO. -5, CO. -2 आदि । 3. उभयलिंगी किस्में :- पूसा डिलीशियस, पूसा मैजेस्टी, सूर्या, रेड लेडी, कुर्ग हनिड्यू आदि। 4. गमलों में लगाने हेतु :- पूसा नन्हा, पूसा ड्वार्फ आदि । इसके एक पेड़ से 112 से ज्यादा फल प्रतिवर्ष मिलते हैं।

इस प्रकार यह 340 टन प्रति हेक्टेयर तक की उपज देता है। अलग-अलग फलों की साइज़ 0.800 किलोग्राम से लेकर दो किलोग्राम तक होता है। आज के बाज़ार में पपीता 30 से 40 रूपये न्यूनतम में बिकता है, लेकिन थोक बाज़ार में आठ से दस रूपये प्रति किलो की दर से बेचने पर भी यह उपज तीन से साढ़े तीन लाख रुपये के बीच होती है। इस तरह सभी खर्चे काटने के बाद भी किसानों को दो लाख रुपये तक की बचत हो जाती है। पपीता की बुबाई पपीते का व्यवसाय उत्पादन बीजों द्वारा किया जाता है। इसके सफल उत्पादन के लिए यह जरूरी है कि बीज अच्छी क्वालिटी का हो। बीज के मामले में निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए :

1. बीज बोने का समय जुलाई से सितम्बर और फरवरी-मार्च होता है।

2. बीज अच्छी किस्म के अच्छे व स्वस्थ फलों से लेने चाहिए। चूंकि यह नई किस्म संकर प्रजाति की है, लिहाजा हर बार इसका नया बीज ही बोना चाहिए।

3. बीजों को क्यारियों, लकड़ी के बक्सों, मिट्‌टी के गमलों व पोलीथीन की थैलियों में बोया जा सकता है।

4. क्यारियाँ जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंची व 1 मीटर चौड़ी होनी चाहिए।

5. क्यारियों में गोबर की खाद, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट काफी मात्रा में मिलाना चाहिए। पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए और बीजों को 0.1 फीसदी कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए।

6. जब पौधे 8-10 सेंटीमीटर लंबे हो जाएँ, तो उन्हें क्यारी से पौलीथीन में स्थानांतरित कर देते हैं।

7. जब पौधे 15 सेंटीमीटर ऊँचे हो जाएँ, तब 0.3 फीसदी फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए। पपीता बीज एवम् बीजोपचार एक हैक्टर क्षेत्रफल के लिए 500 -600 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बोने से पूर्व बीज को 3 ग्राम केप्टान प्रति की. ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित कर लेना चाहिए।

पौध रोपण :- 45 X 45 X 45 सेमी . आकर के गड्ढ़े 1.5 X 1.5 या 2 X 2 मीटर की दुरी पर तैयार करें। प्रति गडढे में 10 की.ग्रा. सड़ी हुयी गोबर की खाद , 500 ग्राम जिप्सम , 50 ग्राम क्यूनालफास 1.5 % चूर्ण भर देना चाहिए। प्लास्टिक थैलियों में बीज रोपण इसके लिए 200 गेज और 20 x 15 सेमी आकर की थैलियों की जरुरत होती है । जिनको किसी कील से नीचे और साइड में छेड़ कर देते हैं तथा 1:1:1:1 पत्ती की खाद, रेट, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं । प्रत्येक थैली में दो या तीन बीज बो देते हैं। उचित ऊँचाई होने पर पौधों को खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं । प्रतिरोपण करते समय थाली के नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए।

सिंचाई :- पौधा लगाने के तुरन्त बाद सिंचाई करे ध्यान रहे पौधे के तने के पास पानी नही भरे। गर्मियों में 5-7 दिन के अंतराल पर एवम् सर्दियो में 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें । तुडाई एवम् उपज पौधे लगाने के 10 से 13 माह बाद फल तोडने लायक हो जाते है। फलों का रंग गहरा हरे रंग से बदलकर हल्‍का पीला होने लगता है तथा फलों पर नाखुन लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलता हो तो समझना चाहिए कि फल पक गया है । एक पौधे से औसतन 150 – 200 ग्राम पपेन प्राप्त हो जाती है प्रति पौधा 40 -70 किलो पति पौधा उपज प्राप्त हो जाती है। पपीते में लगने वाले किट, बीमारी एवं रोकथाम के लिए प्रमुख रूप से किसी कीड़े से नुकसान नहीं होता है परन्तु वायरस, रोग फैलाने में सहायक होते हैं।

इसमें निम्न रोग लगते हैं-

1. तने तथा जड़ के गलने से बीमारी:- इसमें भूमि के तल के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है और जड़ भी गलने लगती है। पत्तियाँ सुख जाती हैं और पौधा मर जाता है। इसके उपचार के लिए जल निकास में सुधार और ग्रसित पौधों को तुंरत उखाड़कर फेंक देना चाहिए। पौधों पर एक प्रतिशत बोर्डेक्स मिश्रण या कॉपर आक्सीक्लोराइड को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करने से काफ़ी रोकथाम होती है।

2. डेम्पिगऑफ:- इसमें नर्सरी में ही छोटे पौधे नीचे से गलकर मर जाते हैं। इससे बचने के लिए बीज बोने से पहले सेरेसान एग्रोसन जी.एन. से उपचारित करना चाहिए तथा सीड बेड को 2.5 % फार्मेल्डिहाइड घोल से उपचारित करना चाहिए।

3. मौजेक (पत्तियों का मुड़ना) : – इससे प्रभावित पत्तियों का रंग पीला हो जाता है व डंठल छोटा और आकर में सिकुड़ जाता है। इसके लिए 250 मि. ली. इमिडकलोरपीड 17.5 एस एल को 4 मिलीलीटर प्रति 15 ली. पानी के हिसाब से छिड़काव करें या एसिफेट 250 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना काफ़ी फायदेमंद होता है।

4. चैंपा : इस कीट के बच्चे व जवान दोनों पौधे के तमाम हिस्सों का रस चूसते हैं और विषाणु रोग फैलाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।

5. लाल मकड़ी : इस कीट का हमला पत्तियों व फलों की सतहों पर होता है। इसके प्रकोप के कारण पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बाद में लाल भूरे रंग की हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए थायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

6. पद विगलन : यह रोग पीथियम फ्रयूजेरियम नामक फफूंदी के कारण होता है। रोगी पौधें की बढ़वार रूक जाती है। पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौध सड़कर गिर जाता है। इसकी रोकथाम के लिए रोग वाले हिस्से को खुरचकर उस पर कार्बेंदाजीम 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

7. श्याम वर्ण: इस रोग का असर पत्तियों व फलों पर होता है, जिससे इनकी वृद्धि रूक जाती है। इससे फलों के ऊपर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए ब्लाईटाक्स 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

ऐसे समझे इसका लाभ:- पपीते की पौधे से पौधे और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1.5 X 1.5 या 2 X 2 मीटर रखते है। एक हैक्टेयर में 10,000 वर्ग मीटर होते है। एक बीघा में 2,500 वर्ग मीटर होते है तो एक बीघा में कितने पौधे लगेंगे कुल क्षेत्रफल मीटर में = ———————————————– पौधे से पौधे की दूरी मीटर में X पंक्ति से पंक्ति की दूरी मीटर में 2500 = —————- = 625 पौधे लगेंगें 2 X 2 2500 = ————— = 1,111 पौधे लगते है। 1.5 X 1.5 अब एक पौधे पर #औषतन 40-50 किलो फल लगते है अब आप सोचो यदि 625 X 50 = 31,250 किलो / बीघा 1,111 X 50 = 55,550 किलो / बीघा; यदि सामान्य दर थोक की 7-8 रुपये किलो रहे तो 31,250 X 8 = 2,50,000 रुपये 55,550 X 8 = 4,44,400 रुपये इसमें कुल खर्च एक बीघा में औषतन 50 -70 हजार रुपये अधिकतम होता है इससे अधिक नही होता, 2 X 2 मीटर की दूरी पर पौधे लगाने पर 2,50,000 – 70,000 = 1,80,000 शुद्ध आय यदि और भी कोई समस्या आ जाये या रेट कम मील तब भी हमे 1,50,000 रुपये का लाभ मिल जाता है जो कोई भी #परम्परागत फसल नही दे सकती। 1.5 X 1.5 मीटर की दूरी पर पौधे लगाने पर थोड़ी सघनता बढ़ जाती है और देखरेख अधिक करनी पड़ती है = 4,44,400 – 70,000 = 3, 34, 400 शुद्ध आय यदि और भी कोई समस्या आ जाये या रेट कम मील तब भी हमे 3,00,000 रुपये का लाभ मिल जाता है जो कोई भी #परम्परागत फसल नहीं दे सकती। अतिरिक्त लाभ पपीते के दो पौधों के बीच पर्याप्त जगह होती है।

इसलिए इनके बीच छोटे आकर के पौधे वाली सब्जियां किसान को अतिरिक्त आय देती हैं। इनके पेड़ों के बीच प्याज, पालक, मेथी, मटर या बीन की खेती की जा सकती है। केवल इन फसलों के माध्यम से भी किसान को अच्छा लाभ हो जाता है। इसे पपीते की खेती के साथ बोनस के रूप में देखा जा सकता है। पपीते की फसल के सावधानी यह रखनी चाहिए कि एक बार फसल लेने के बाद उसी खेत में तीन साल तक पपीते की खेती करने से बचना चाहिए क्योंकि एक ही जगह पर लगातार खेती करने से फलों का आकार छोटा होने लगता है।

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