‘Imagine how much foreign exchange is losing by India for Taiwan 786Red Lady Papaya’ Pintu Lal Meena

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || 19 जुलाई 2021|| जयपुर- सरमथुरा – धौलपुर : सहायक कृषि अधिकारी पिंटू लाल मीणा (Pintu Lal Meena, Assistant Agriculture Officer) का कहना है कि अगर किसान बदलते समय के साथ परंपरागत खेती छोड़कर आधुनिक तकनीक से व्यावसायिक खेती करें तो वे इसी खेती को मुनाफे का सौदा बना सकते हैं। सबसे खास बात यह है कि ताइवान रेड लेडी 786 पपीता की फसल बहुत कम समय में ज्यादा मुनाफा देती है। आप इसकी खेती करके एक एकड़ में 4 लाख तक की कमाई कर सकते हैं। ज्ञात हो कि भारत हर वर्ष ताइवान से रेड लेडी 786 के बीज के लिए 100करोड़ से अधिक रूपए की कीमत चुकता है ।

ऐसे करें खेती ; पपीता फार्मिंग के लिए जलवायु या उचित वातावरण पपीते की खेती के लिहाज से भारत एक उपयुक्त जलवायु वाला देश है। इसे अधिकतम 38 से 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर भी उगाया जा सकते हैं। ऐसा तापमान लगभग पुरे भारत में पाया जाता है। पपीते की खेती के लिए न्यूनतम तापमान 5 डिग्री होना चाहिए। मतलब आप इसे पहाड़ों से सटे इलाकों में भी आसानी से उगा सकते हैं। इस लिहाज से आप भारत के किसी भी कोने में रहते हो तो आप पपीते की खेती कर सकते हो। पिछले कुछ वर्षों में पपीते की खेती की तरफ किसानों का रुझान बढ़ रहा है। पैदावार की दृष्टि से यह हमारे देश का पाँचवाँ लोकप्रिय फल है। यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फरवरी-मार्च से मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है, क्योंकि इसकी सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तापमान उपयुक्त है। पपीता विटामिन A और C का अच्छा स्रोत विटामिन के साथ पपीते में पपेन नामक एंजाइम पाया जाता है जो शरीर की अतरिक्त चर्बी को कम करता है। स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होने के साथ ही पपीता सबसे कम दिनों में तैयार होने वाले फलों में से एक है जो कच्चे और पके दोनों ही रूप में उपयोगी है। इसका आर्थिक महत्व ताजे फलों के अतिरिक्त पपेन के कारण भी है, जिसका प्रयोग बहुत से औद्योगिक कामों ( जैसे कि फ़ूड प्रोसेसिंग, कपडा उद्योग आदि ) में होता है। पपीता फार्मिंग के लिए जमीन/भूमि बलुई दोमट मिट्टी में मिलेगी अच्छी उपज पपीते की खेती के लिए बलुई दोमट प्रकार की मिट्टी सर्वोत्तम है। पपीते के खेतों में यह ध्यान रखना होगा की जल का भराव न होने पाये।

पपीते के लिहाज से मिट्टी की PH मान 6 से 7 तक होना चाहिए। बीज या पौधा लगाने से पहले भूमि की ठीक प्रकार से गहरी जुताई के साथ खर-पतवार को निकाल देना जरुरी होता है। किस्मों का चयन रेड लेडी 786 लाल परी – यूनाइटेड जेनेटिक्स (United Genetics ) विनायक – वी एन आर सीड्स ( VNR Seeds ) सपना – ईस्ट वेस्ट इंटरनेशनल ( East West International ) इन संकर बीजों की पैकिंग का आकार 50 बीज, 1 ग्राम, 5 ग्राम, 10 ग्राम, 500 बीज में होता है। उपरोक्त सभी वेराइटी पर्थेनोकार्पिक हैं अतः नर पौधों की कोई संभावना नहीं होगी। सभी पौधे मादा होते हैं और लगभग 1 क्विंटल प्रति पौधा होता है। अपनी जलवायु के हिसाब से करें किस्मों का चयन पपीते के किस्मों का चुनाव खेती के उद्देश्य के अनुसार करना जैसे कि अगर औद्योगिक प्रयोग के लिए वे किस्में जिनसे पपेन निकाला जाता है, पपेन किस्में कहलाती हैं। इस वर्ग की महत्वपूर्ण किस्में O – 2 AC O – 5 और C. O – 7 है। इसके साथ दूसरा महत्वपूर्ण वर्ग है फूड वेराइटी जिन्हे हम अपने घरों में सब्जी के रूप में या काट कर खाते हैं। इसके अंतर्गत परम्परागत पपीते की किस्में ( जैसे बड़वानी लाल, पीला वाशिंगटन, मधुबिंदु, कुर्ग हनीड्यू, को – 1 एंड 3 ) और नयी संकर किस्में जो उभयलिंगी होती हैं। पूसा नन्हा, पूसा डिलिशियस, CO – 7, पूसा मैजेस्टी आदि ) आती हैं। नर्सरी क्यारियों में लगाएं एक एकड़ के लिए 30 ग्राम बीज काफी हैं। एक एकड़ में तकरीबन 1200 पौधे ठीक रहते हैं। उन्नत किस्म के चयन के बाद बीजों को क्यारियों में नर्सरी बनाने के लिए बोना चाहिए, जो जमीं सतह से 15 सेंटीमीटर ऊँची व 1 मीटर चौड़ी तथा जिनमें गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट को अच्छी मात्रा में मिलाया गया हो।

पौधे को जड़ गलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फॉर्मलीन के 1 : 40 के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए। 1/2′ गहराई पर 3′ X 6′ के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बोयें और फिर 1/2′ गोबर की खाद से ढक कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाएँ। नमी बनाये रखने के लिए (Mulching) नमी बनाये रखने के लिए क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढकना एक सही तरीका है। सुबह शाम पानी देते रहने से, लगभग 15 – 20 दिन भीतर बीज जम( Germination ) जाते हैं। पौधे की ऊंचाई जब 15 सेंटीमीटर हो तो साथ ही 0.3 % फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए। जब इन पौधों में 4 – 5 पत्तियाँ और ऊँचाई 25 CM हो जाये तो 2 महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए। पौधों के रोपण के लिए खेत को अच्छी तरह तैयार करके 2 x 2 मीटर की दूरी पर 50 x 50 x 50 सेमी आकार के गड्डे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिए। अधिक तापमान व धूप, मिट्टी में उपस्थित हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु इत्यादि नष्ट कर देती है। पौधे लगाने के बाद गड्डे को मिट्टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन (कीटनाशक ) मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10 – 15 सेमी ऊँचा रहे। इससे दीमक का प्रकोप नहीं रहता। रोजाना दोपहर के बाद हलकी सिंचाई करनी चाहिए। खाद व उर्वरक का रखें खास ख्याल खाद और उर्वरक के प्रभाव में पपीते के पौधे अच्छी वृद्धि करते हैं। पौधा लगाने से पहले गोबर की खाद मिलाना एक अच्छा उपाय है, साथ ही 200 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम DAP और 400 ग्राम पोटाश प्रति पौधा डालने से पौधे की उपज अच्छी होती है। इस पुरे उर्वरक की मात्रा को 50 से 60 दिनों के अंतराल में विभाजित कर लेना चाहिए और कम तापमान के समय इसे डालें। पौधे के रोपण के 4 महीने बाद ही उर्वरक का प्रयोग करना उत्तम परिणाम देगा।

पपीते के पौधे 90 से 100 दिनों के अंदर फूलने लगते हैं और नर फूल छोटे-छोटे गुच्छों में लम्बे डंठल युक्त होते हैं। नर पौधे पर पुष्प 1 से 1.3 मीटर के लम्बे तने पर झूलते हुए और छोटे होते हैं। प्रति 100 मादा पौधों के लिए 5 से 10 नर पौधे छोड़ कर शेष नर पौधों को उखाड़ देना चाहिए। मादा पुष्प पीले रंग के 2.5 सेमी लम्बे और तने के नजदीक होते हैं। गर्मियों में 6 से 7 दिनों के अंतराल पर तथा सर्दियों में 10 से 12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई के साथ खरपतवार प्रबंधन, कीट और रोग प्रबंधन करना चाहिए। पपीते के पौधे में रोग नियंत्रण मोजैक लीफ कर्ल, डिस्टोसर्न, रिंगस्पॉट, जड़ व तना सड़ना, एन्थ्रेक्नोज, और कली व पुष्प वृंत का सड़ना आदि रोग लगते हैं। इनके नियंत्रण में ( बोर्डो मिश्रण बनाने के लिए एक किलो ग्राम अनबुझा चूना, 1 किलो नीला थोथा एवं 100 लीटर पानी 1 -1 -100 रखा जाता है। बोर्डो मिश्रण बनाने के लिए सर्वप्रथम नीला थोथा व चुना को अलग-अलग प्लास्टिक के बर्तनों में घोला जाता है जब मिश्रण घुल जाये तब दोनों को एक बर्तन में डाल दिया जाता है। मिश्रण के परीक्षण के लिए छोटे से लोहे के टुकड़े को मिश्रण में डुबाकर 5 मिनट तक रखकर परीक्षण किया जाता है जब लोहे में रंग आ जाये तब मिश्रण सही नहीं बना है इसको सही करने के लिए पुनः थोड़ा चुना मिला लिया जाता है। ) 5 : 5 : 20 के अनुपात का पेड़ों की सड़न गलन को खरोच कर लेप करना चाहिए। अन्य रोग के लिए बलाइटोक्स 3 ग्राम या ड्राईथेन M – 45, 2 ग्राम प्रति लीटर अथवा मैंकोजेब या जिनेव 0.2 % से 0.25 % का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए अथवा कॉपर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या व्रासीकाल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। पपीते के पौधे को कीटों से नुकसान पहुँचता है फिर भी कीड़ें लगते हैं जैसे माहू, रेड स्पाइडर माइट, निमेटोड आदि हैं। नियंत्रण के लिए डाइमेथोएड 30 ई. सी. 1. 5 मिली लीटर या फास्फोमिडान 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से माहू आदि का नियंत्रण होता है।

निमेटोड पपीते को बहुत नुकसान पहुँचाता है और पौधे की वृद्धि को प्रभावित करता है। इथीलियम डाइब्रोमाइड 3 किग्रा प्रति हे. का प्रयोग करने से इस बिमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही अंत्रश्य गेंदा का पौधा लगाने से निमेटोड की वृद्धि को रोका जा सकता है। 9 से 10 महीने में तैयार हो जाती है। पपीते की फसल 9 से 10 महीने के बाद फल तोड़ने जाती है। जब फलों का रंग हरे से बदलकर पीला होने लगे एवं फलों पर नाखून लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलने लगे, तो फलों को तोड़ लेना चाहिए। फलों के पकने पर चिड़ियों से बचाना अति आवश्यक है। अतः फल पकने से पहले ही तोड़ लेना चाहिए। फलों को तोड़ते समय किसी प्रकार के खरोच या दाग-धब्बे से बचाना चाहिए वरना उसके भण्डारण से भी सड़ने सम्भावना होती है।

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