ब्राह्मणों ने महात्मा फुले की हत्या का षड्यंत्र क्यों रचा?जोतिबा के तर्को से पिघला हत्यारों का मन

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मूकनायक मीडिया | 10 अप्रैल 2022 | मुंबई जयपुर : डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ज्योतिबा फुले को अपना गुरु मानते थे, लेकिन 1932 में महात्मा गांधी ने महात्मा फुले को ‘सच्चा महात्मा’ कहा था। फिर तिलक ने गांधी जी को महात्मा की उपाधि देकर फुले से महात्मा का हक छीन लिया। कहते हैं जिस प्रकार गौतम बुद्ध ने डाकू अंगुलिमाल को बौद्ध भिक्षु बना दिया, उसी प्रकार महात्मा फुले की हत्या करने आये दो व्यक्तियों ने भी जोतिबा के तर्को के आगे नतमस्तक होकर सामाजिक कार्यों में महात्मा फुले का साथ दिया था। उनमें से एक महात्मा फुले के अंगरक्षक बने जबकि दूसरे सत्यशोधक समाज के अनुयायी बने और किताबें भी लिखीं। महात्मा फुले ने अपना जीवन महिलाओं, वंचितों और शोषित किसानों के उत्थान के लिए समर्पित किया था। इस काम के चलते उन्हें और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। मनुवादी रूढ़िवादी समाज उन पर ताने मारता था और गाली गलौज भी किया करता था। कुछ लोगों ने उन पर गोबर भी फेंका लेकिन फुले दंपति ने अपना काम नहीं छोड़ा। इन विरोधों का कोई असर न होते देख कुछ लोगों ने फुले को मारने के लिए दो हत्यारों को भेजा। उनमें से एक का नाम रोडे और दूसरे का नाम था पं. धोंडीराम नामदेव था। यह प्रामाणिक घटनाक्रम धनंजय कीर द्वारा लिखित महात्मा फुले की बायोग्राफ़ी में दर्ज है फुले दंपति दिन का काम पूरा करने के बाद आधी रात को आराम कर रहे थे। अचानक नींद टूटने पर मंद रोशनी में दो लोगों की छाया दिखी। ज्योतिबा फुले ने ज़ोर से पूछा कि तुम लोग कौन हो? एक हत्यारे ने कहा, ‘हम तुम्हें ख़त्म करने आए हैं’, जबकि दूसरा हत्यारा चिल्लाया, ‘हमें तुम्हें यमलोक भेजने के लिए भेजा गया है। यह सुनकर महात्मा फुले ने उनसे पूछा, “मैंने तुम्हारा क्या नुकसान किया है कि तुम मुझे मार रहे हो?” उन दोनों ने उत्तर दिया, “तुमने हमारा कोई नुकसान नहीं किया है लेकिन हमें तुम्हें मारने को भेजा गया है।” महात्मा फुले ने उनसे कहा, मुझे मारने से क्या फ़ायदा होगा? “अगर हम तुम्हें मार देंगे, तो हमें एक-एक हज़ार रुपये मिलेंगे,” उन्होंने कहा। यह सुनकर महात्मा फुले ने कहा, “अरे वाह! मेरी मृत्यु से आपको लाभ होने वाला है, इसलिए मेरा सिर काट लो। यह मेरा सौभाग्य है कि जिन ग़रीब लोगों की मैं सेवा कर खुद को भाग्यशाली और धन्य मानता था, वे मेरे गले में चाकू चलायें। चलो! मेरी जान सिर्फ़ दलितों के लिए है और मेरी मौत ग़रीबों के हित में है। उनकी बातें सुनकर हत्या करने आये दोनों ब्राह्मणों को होश आया और उन्होंने महात्मा फुले से माफ़ी मांगी और कहा “अब हम उन लोगों को मार डालेंगे जिन्हें आपको मारने के लिए भेजा था।” इस पर महात्मा फुले ने उन्हें समझाया और यह सीख दी कि बदला नहीं लेना चाहिए। इस घटना के बाद दोनों महात्मा फुले के सहयोगी बन गये।

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