बहुजन नायकों का सम्मान उनकी रचनाओं को पढ़कर,उन्हें आत्मसात करके करें, वही सच्ची श्रद्धांजलि होगी

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मूकनायक मीडिया | 11 अप्रैल 2022 | मुंबई दिल्ली जयपुर : राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले को लेकर चर्चा केवल जयंती और पुण्यतिथि पर ही नहीं होती। वे साल भर किसी न किसी बहाने संविधान की बहसों में उपस्थित रहते हैं। बेशक ग्यारह अप्रैल के अवसर पर उनकी ज़िंदगी और सपनों को लेकर सक्रियता दिखती है। मगर यह उसी दिन तक सीमित नहीं रहती है। आज उनके सपनों को उसी तरह रौंदा जा रहा है जिस तरह अंबेडकर गांधी के सपनों को आज़ादी के समय ही रौंद दिया गया।

संविधान की जिस किताब से देश में संस्थाएँ बनी हैं वो कमज़ोर हो चुके पन्नों की तरह बाहर आ रही हैं। संविधान की किताब अपनी जगह पर रखी नज़र आती है ठीक उसी तरह से जैसे पुस्तकालय में रखी असंख्य किताबें नज़र आती हैं। यही भरोसा है कि किताब को हटाया नहीं गया है। रैक पर रखी हुई किताब दिखाकर संविधान के सपनों को रौंदा जा रहा है। इसके बरक्स फुले के सपनों को उनके नाम पर होने वाले कार्यक्रमों में हस्तांतरित कर दिया गया है ताकि वहाँ आप पुस्तकालय में रखी किताब की तरह उनके सपनों का दर्शन कर सकें। शासन किसी की मर्ज़ी से चल रहा है और किसी के ख़िलाफ़ चल रहा है। सबके लिए नहीं चल रहा है।

सामाजिक न्याय की परिभाषा राजनीतिक होती जा रही है, संवैधानिक नहीं रही। लेकिन रास्ता क्या है, एक रास्ता है आज के हालात को नए चश्मे से देखा जाये, महात्मा फुले की लेखनी को पढ़ा जाये और उसमें से सुंदर भविष्य की कल्पना की जाये और दूसरा रास्ता है अतीत को ठीक से जान लिया जाये। लेकिन अतीत के मोह में पड़ने के लिए नहीं बल्कि इस वर्तमान से निकलने के लिए। बेहतर है आप थोड़ा बिरसा मुंडा, पेरियार, नारायण गुरु, डॉ अंबेडकर सहित सभी बहुजन नायकों को जानने का प्रयास करें। उनकी मूर्ति और तस्वीर देखकर आपको लगता होगा कि सब जानते हैं लेकिन जब उनकी रचनाओं को पढेंगे और उन पर लिखी किताबों को पढेंगे तो लगेगा कि कितना कम जानते हैं। मैं दो पतली किताबों का संदर्भ दे रहा हूँ। महँगी भी नहीं हैं और हिन्दी में हैं।

एक किताब गुलामगिरी और दूसरी है एनिलेशन ऑफ कास्ट। इन दो किताबों को पढ़ने से आप बेसिक जान पाते हैं जिसके बाद विस्तृत रूप से लिखी गई किताबों को पढ़ने और समझने में मदद मिलेगी। ग्यारह और चौदह अप्रैल को आईटी सेल के बेशक दो मीम कम फार्वर्ड करें लेकिन महात्मा फुले और डॉ अंबेडकर पर दो किताब पढ़ लें। देखिएगा आपको किताब पढ़ने में काफ़ी संघर्ष करना पड़ेगा। आज़मा लीजिए और यह भी जान लीजिए कि महात्मा फुले, डॉ अंबेडकर और गांधी जी की हत्याओं की साजिश किसने और क्यों रची। हर महिला फुले दंपति की कर्जदार आज भारत में स्वतंत्र महिलाएं सदियों पुरानी सांस्कृतिक, सामाजिक और पारंपरिक बाधाओं को तोड़ रही हैं। लेकिन ऐसा हमेशा के लिए नहीं था।

आज लड़कियां स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ रही हैं, किसी संगठन में काम कर रही हैं, पुरुषों के समान अवसर प्राप्त कर रही हैं। इसका श्रेय सिर्फ ‘महात्मा ज्योतिराव फुले’ को जाता है। महात्मा और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने अपना पूरा जीवन महिलाओं के उत्थान, लैंगिक समानता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ अर्पण किया। ज्योतिराव का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे में गोविंदराव और चिमनाबाई के घर हुआ था। गोविंदराव और उनके भाई पेशवाओं के लिए फूलवाला के रूप में काम कर रहे थे और इसलिए उन्हें मराठी में ‘फुले’ कहा जाता था। उनका जन्म एक निचली जाति में हुआ था, लेकिन उन्हें कभी भी जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा, क्योंकि परिवार पेशवाओं के लिए मिलकर काम कर रहा था। ज्योतिराव को अपने परिवार की मदद करने के लिए अपनी शिक्षा बंद करनी पड़ी। लेकिन उनकी क्षमता को ध्यान में रखते हुए, उनके पड़ोसियों (एक मुस्लिम शिक्षक और एक ईसाई व्यक्ति) ने उनके पिता को ज्योतिराव की शिक्षा पूरी करने के लिए राजी कर लिया।

इस तरह उन्होंने 1847 में स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में अपनी शिक्षा पूरी की। वहीं, उस समय प्रचलित ‘बाल-विवाह’ के अनुसार 13 वर्षीय ज्योतिराव का विवाह 9 वर्षीय सावित्रीबाई से हुआ था। पहला जातिगत भेदभाव फुले के पेशवाओं के साथ घनिष्ठ संबंध होने के कारण, परिवार को कभी भी जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन सब कुछ पहली बार होता है। 1848 में उन्होंने पहली बार जातिगत भेदभाव का अनुभव किया जब वे अपने ब्राह्मण मित्र के विवाह समारोह में शामिल हुए थे। समारोह में शामिल होने पर दूल्हे के परिजनों ने उनका अपमान किया था। आजादी से 100 साल पहले शुरू किया स्कूल ‘जातिगत भेदभाव’ की घटना का उनके दिमाग पर बहुत प्रभाव पड़ा और उन्होंने एक साल के भीतर अछूतों और लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरू किया। ज्योतिबा ने पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया और इस तरह 1848 में वह पहली महिला शिक्षिका बनीं। उन्होंने अपनी कविताओं में लोगों को शिक्षा के महत्व से अवगत कराया।

इस पहल को समाज ने खुले हाथों से स्वीकार किया। हालांकि, फुले दंपति को काफी आलोचना का भी सामना करना पड़ा। बाद में समाज के खिलाफ जाने के लिए उन्हें अपने माता-पिता का घर छोड़ना पड़ा। सवर्ण विधवाओं के लिए घर उस समय बाल विवाह की प्रथा थी। छोटी लड़कियों की बड़े पुरुषों से शादी कराई जाती थी। जिससे युवा विधवाओं की संख्या में वृद्धि हुई। उच्च जाति की विधवाओं को दयनीय जीवन जीना होता था। जिसमें- विधवा का मुंडन, अपने बच्चे का गर्भपात, रसोई घर में प्रवेश नहीं, इस तरह के कई प्रतिबंध लगाएं जाते थे। इस समस्या को देखते हुए फुले दंपत्ति ने उच्च जाति की विधवाओं के लिए एक घर शुरू किया, जहां वे अपना जीवन यापन कर सकती थीं। उस समय विधवाओं के बच्चों को भी छोड़ दिया जाता था।

इसलिए फुले दंपति ने देश का पहला अनाथालय शुरू किया और बाद में एक बच्चे को गोद भी लिया। इतना ही नहीं उन्होंने विधवा पुनर्विवाह की भी वकालत की। इस पहल के लिए फिर से उनकी खुलेआम आलोचना की गई लेकिन दंपति ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। महात्‍मा की उपाधि समाज सुधारक विट्ठलराव कृष्णजी वाडेकर ने उन्हें समाज के कल्याण में उनके महान योगदान के लिए ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया। दुर्भाग्य से 28 नवंबर, 1890 को महात्मा का निधन हो गया, लेकिन सावित्रीबाई ने पहल जारी रखी। महात्मा को महाराष्ट्र और भारत के अन्य राज्यों में कई बार सम्मानित किया जा चुका है। विश्वविद्यालयों, संग्रहालयों और सब्जी मंडियों सहित कई जगहों का नाम महापुरुष के नाम पर रखा गया है। अब समय आ गया है कि हम असली नायकों का सम्मान करना शुरू करें और आज हम जो हैं उसके लिए उन्हें धन्यवाद दें।

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