मूकनायक मीडिया की प्रतिबद्धताएँ : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना

9 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 12 जुलाई 2020 | जयपुर : पीड़ितों और शोषितों की पत्रकारिता की प्रतिबद्धता का प्रतीक है- मूकनायक मीडिया जो आपके स्वाभिमान, स्वबल, समानता, अधिकार, स्वाधीनता, स्वराज, स्वतंत्रता, सुदृढ़ता, संघर्ष, संगठन की प्रतीकात्मक शक्ति है । डॉ अंबेडकर महात्मा बुद्ध, कबीर और जोतिबा फुले को अपना गुरु मानते थे। कबीरपंथी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से कबीर तीसरे गुरु थे। समय के अंतराल में जैसे-जैसे बाबासाहब का अध्ययन व्यापक हुआ, तब वे कहने लगे कि मैंने शून्य से काम करना नहीं शुरू किया।

शून्य से काम शुरू किया था महात्मा ज्योतिबा फूले ने, मैंने उनके आगे काम करना शुरू किया है और अंततः महात्मा ज्योतिबा फूले को वे अपना दूसरा गुरू मानने लगे। 31 जनवरी 1920 को डॉ भीमराव अंबेडकर के भावी महान कार्य, विचारों की झलक दिखलाता समाचार पत्र मूकनायक का प्रकाशन हुआ था, यह साल उसका शताब्दी वर्ष है। सौ साल बीत जाने के बाद भी बाबासाहब के विचार वर्तमान दौर को सटीक राय दे रहे है। मूकनायक के कुल19 अंक निकले जिनमें शुरू के 12 अंक के प्रकाशन का संपादकीय स्वयं डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने किया। यह भी पढ़ें : पेरियार की नजर में भविष्य की दुनिया हालांकि संपादक के रूप में उनका नाम नहीं है क्योंकि उस समय वे सिडहेम कॉलेज के प्रोफेसर थे।

पर पत्र में उनके विचारों की झलक, कार्यो की भागीदारी सुस्पष्टता से नजर आती है। दत्तोबा पवार डॉ अंबेडकर को पेपर निकालने की आर्थिक सहायता राशि के लिए राजर्षि शाहू महाराज के पास लेकर गये, उसी धन राशि से मूकनायक पाक्षिक निकला। आर्थिक संकटों और अप्रिय प्रसंगों के साथ-साथ डॉ अंबेडकर को शिक्षा के लिए लंदन जाने के कारण मूकनायक को बंद होना पड़ा। बाद में, मूकनायक का नाम बदलकर ‘बहिष्कृत भारत’ रखा। उसके 15 मार्च, 1930 के अंक में उन्होंने अफ्रीका में अछूतों की स्थिति पर टिप्पणी लिखी थी जिसमें विवेकानंद को उधृत करते हुए उन्होंने लिखा कि विवेकानंद का संदेश है, ‘उठो! मर्द बनो! प्रगति के रास्ते में प्रतिरोध करने वाले भिक्षुक, पुरोहित वर्ग को ठोकर मारकर उड़ा दो क्योंकि इस वर्ग में सुधार की कोई संभावना नहीं है। इस वर्ग का अंत:करण कभी भी विशाल हो नहीं सकता। यह वर्ग सैकड़ों वर्षों से रूढिय़ों तथा अत्याचारों का गुलाम है। सबसे पहले पुरोहितशाही को नष्ट करें। उठो! मर्द बनो!

अपने संकुचित दम घोटनेवाले घोंसले से बाहर निकलो तथा चारों ओर नजर फेंको।’ ये भी पढ़ें – मूकनायक : डॉ अंबेडकर-मिशन की बुलंद आवाज का दस्तावेज 7 जून, 1933 के अंक में उन्होंने लिखा, ‘‘अपने स्वावलंबन तथा भविष्य के राजनैतिक अधिकारों के लिए इस पत्रिका को बनाए रखना, इसे समृद्ध और सम्पन्न बनाना हमारी जिम्मेदारी है। आज भले ही ‘जनता’ पत्र का महत्व आप समझ नहीं पा रहे हो, तो भी इसका सही अहसास निकट भविष्य में होगा।’’ क्योंकि यह समाचार पत्र बहिष्कृत समाज की बुलंद आवाज का दस्तावेज भी है। मूकनायक के प्रकाशन की सौ वीं वर्षगांठ पूरी दुनिया में धूमधाम से मनायी गयी। इस मौके पर महानायक डॉ अंबेडकर की पत्रकारिता और उनके व्यक्तित्व को याद किया गया। आज की पत्रकारिता को मूकनायक से मानदंड, मूल्य और वैचारिकी को सीखना व समझना चाहिए ।

पूरी जिंदगी पीड़ा, परिस्थिति, तकलीफ, और शोषण का शिकार पत्रकार क्या लिखेगा और क्या लिख सकता है। इन सब का जवाब मूकनायक में मिल जाता है। इन सब से जूझते हुए बाबासाहब ने लिखा और ऐसा लिखा जो पत्रकारिता के मानवीय मूल्य, मापदंड, और विचार बने हुए हैं, किंतु वर्तमान दौर की मीडिया में गुम है। भले ही मीडिया में अलग-अलग प्लेटफार्म आ गये हैं लेकिन जातिवादी राष्ट्रीय मीडिया आज भी इस भेदभाव को बरकरार बनाये हुए है जो डॉ अंबेडकर ने उस समय सोचे थे। वो तो भला हो सस्ती सोशल मीडिया का जिस पर वंचित समाज की आवाज पढ़ने-सुनने-देखने को मिल जाती है। डॉ अंबेडकर की सबसे बड़ी चिंता का विषय था, अछूतों का अपमान और इससे मुक्ति के लिए मूकनायक का प्रकाशन शुरू किया गया ।

मूकनायक की शुरुआत डॉ अंबेडकर ने तुकाराम की इन पंक्तियों से की ; ‘अभी मैं इच्छा धारण करके क्या करूं, दर्द तोमड़ी बजाकर क्या करूं, संसार में खामोश लोगों की कोई नहीं सुनता, अभी कोई लाज, हित सार्थक नहीं।’ मूकनायक समाचार पत्र दलितों की सदियों की खामोशी को तोड़ने के लिए शुरू किया और 7 महीने के समय में ही उन्होंने दलितों की आवाज मूकनायक के माध्यम से देश के साथ-साथ विश्व पटल पर पहुँचा दी। मूकनायक ने नये स्वराज्य को बहिष्कृत समाज की सुधारी का प्रश्न व केंद्रीय चिंता का प्रश्न बताया । शोषित, पीड़ित, बहिष्कृत, स्वराज, स्वाभिमान, सम्मान, समान अधिकार की बात करने वाला समाचार पत्र था – मूकनायक। बाबा साहब भारत में ब्रिटिश शासन की समाप्ति से पूर्व ही इन समस्याओं को हल करना चाहते थे । इस मामले में वे स्वराजियों का विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे।

इसी बीच साउथबरो कमेटी जो मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार कार्यक्रम के तहत भारत आयी थी । इस कमेटी ने बाबा साहेब डॉ अंबेडकर से हजारों पिछड़ी जातियों के मताधिकार के संबंध में सुझाव मांगे। इस संदर्भ में बंबई टाइम्स को लिखे अपने एक पत्र में अंबेडकर ने लिखा स्वराज जैसे ब्राह्मणों का अधिकार है वैसा ही महारो का । इसे वर्तमान में देख भी सकते हैं न्यायलयों में जजों की संख्या, कैबिनेट मंत्रियों ,केंद्रीय सचिव ,विश्वविद्यालय के कुलपतियों के रूप में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति क्या हालत है। आज भी शिक्षा ,सत्ता ,संपति में सबसे अधिक शोषण इन्हीं वर्गों के साथ हो रहा है। सरकारे इन पिछडो वर्गों के लिए मूक बनी रहती है। शोषित पिछड़ा समाज आज भी सत्ता, शिक्षा,स्वास्थ, सम्मान ,विकास की मुख्यधारा में पिछड़ा है।

डॉ अंबेडकर के स्वाधीनता संग्राम का दायरा स्वराज की दायरे से गहरा और व्यापक था। यह भी पढ़ें : डॉ अंबेडकर का ऐतिहासिक भाषण इसी संदर्भ में गेलओम वेट लिखती है की डॉ अंबेडकर का जीवन काल बीसवीं सदी के प्रथम भाग में पड़ता है। यहीं वह अवधि थी जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम अपने निर्णायक चरण में था। अंबेडकर की बुनियादी लड़ाई एक अलग स्वाधीनता की लड़ाई थी । यह लड़ाई भारतीय समाज की सर्वाधिक समान तरक्की की लड़ाई थी । यह संघर्ष भारतीय समाज से भारतीय समाज के लिए था। उनका स्वाधीनता संग्राम उपनिवेशवाद के विरुद्ध चलाए जा रहे स्वाधीनता संग्राम से वृहत और गहरा था। उनकी नजर नव राष्ट्र के निर्माण पर थी। डॉ अंबेडकर को अहसास था कि अछूतों को हक दिलाने के लिए अनेक स्तरों पर आंदोलन करने पड़ेंगे । बहिष्कृत समाज को एक तरफ ब्रिटिश सत्ता से अपने हक की मांग करनी है , दूसरी तरफ स्वराज्य से संघर्ष करना पड़ेगा । ऐसा तभी संभव होगा जब शोषित समाज के लोग शिक्षित और संगठित होंगे।

मूकनायक में शोषित पिछड़े बहिष्कृत लोगों की अवनति के कारणों और उससे बाहर निकलने के उपायों को विस्तार से प्रकाशित करते थे। मूकनायक के चलते शाहू महाराज ने डॉ अंबेडकर को अपना मित्र कहा और महाराज महानायक पर चर्चा करते थे । शाहू जी महाराज शिकार छोड़ कर डॉ अंबेडकर के भाषण सुनते थे उन्हें अंबेडकर के भाषण अच्छे लगते थे क्योंकि अंबेडकर सभी पिछड़ी जातियों का परामर्श लेते थे । उस गुलामी के दौर में यह अपने आप में अनोखी सर्वश्रेष्ठ बात थी। जन्मसिद्ध अयोग्यता और अभद्रता के कारण इन पिछड़ी जातियों की स्थिति चिंताजनक हो गयी। पिछड़े शोषित बहिष्कृत अस्पृश्य समाज को सदियों से अयोग्य और अपवित्र मान लेने के कारण समाज का नैतिक दृष्टि से स्वबल और स्वाभिमान नष्ट हो गया है ।

“पत्रकारिता और पीड़ितों का स्वाभिमान स्वबल है”- अंबेडकर का मूकनायक मनुष्य की उन्नति के लिए स्वाभिमान और स्वबल का होना आवश्यक है। डॉ अंबेडकर अपने निजी दावों की अपेक्षा देश के दावों को सदैव ऊंचा दर्जा देते थे । डॉ अंबेडकर इस देश के लोगों के जेहन में इस विषय में कोई संदेश नहीं छोड़ना चाहता कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता और यह निष्ठा सुद्रढ़ है। यह निष्ठा इस समुदाय के प्रति है जिसमें मैं खुद पैदा हुआ हूँ । इसी में आता हूँ और आशा करता हूँ कि इस निष्ठा को कभी नहीं छोडूँगा, ना कभी छोड़ पाऊँगा। मूकनायक में उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है । डॉ अंबेडकर के अध्येता क्रिस्टॉफ जाफर लो लिखते हैं कि डॉ अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को पूरी तरह नकार दिया ,इतना ही नहीं वे एक कदम और आगे गये, उन्होंने भक्ति परंपरा द्वारा सुझाए गये मार्ग को भी खारिज कर दिया।

डॉ अंबेडकर द्वारा मूकनायक के संपादक के 7 महीने बहिष्कृत समाज की मुक्ति के रास्ते की तलाश के 7 महीने है जो नये राष्ट्र के निर्माण का रास्ता भी । मूकनायक पत्रकारिता का पहला कर्तव्य है बिना किसी प्रयोजन के समाचार देना निर्भयता पूर्वक उन लोगों की निंदा करना जो गलत रास्ते पर जा रहे हो फिर चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हो, पूरे समुदाय की रक्षा करने वाली नीति की प्रतिपादित करते थे। डॉ अंबेडकर ने हिंदू धर्म के मिथकों ,रहस्यवाद और खोखली प्रथाओं का खुलासा करने के लिए इसका प्रभावी इस्तेमाल किया। इन्हीं मिथक परंपराओं प्रथाओं का इस्तेमाल भारतीय समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था को उचित ठहराने के लिए किया। यह भी पढ़ें : ‘अबुआ दिशोम रे अबुआ राज’ बिरसा मुंडा का सपना कब पूरा होगा!

डॉ अंबेडकर ने पारंपरिकता धार्मिक आडंबर अंधविश्वास की जंजीरों को तोड़ा। उन्होंने ब्राह्मणवादी धर्म की संपूर्ण व्यवस्था को सिरे से खारिज किया। अपने क्रांतिकारी विचारों, अनुभवों और विभिन्न विषयों पर अपनी राय को समाचार पत्रों के जरिए जनता के सामने रखें जिसका उनको विरोध भी झेलना पड़ा। मूकनायक की प्रकाशन की खबर समाचार पत्र केसरी ने छापने से इंकार कर दिया । मूकनायक के पहले अंक में अंबेडकर ने अखबार के प्रकाशन के उद्देश्य को सरल भाषा में अत्यंत प्रभावी और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा भारत विभिन्न असमानताओं की भूमि है। अंबेडकर ने भारतीय समाज को ऐसी बहुमंजिला इमारत बताया जिसमें एक मंजिल से दूसरी मंजिल जाने के लिए कोई खिड़की और गेट नहीं है । जो व्यक्ति जिस मंजिल में जन्म लेता है उसी मंजिल में मरता है।

डॉ अंबेडकर ने ऐसे स्वराज को दासत्व कहा जिसमें मूल अधिकारों की गारंटी न हो। मूकनायक के जरिए डॉ अंबेडकर ने सामाजिक न्याय और जनसंचार के नये युग की शुरुआत की।मीडिया का मानव विकास के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने वालों के लिए डॉ अंबेडकर के विचार आचरण उनकी पत्रकारिता एक आदर्श है । वर्तमान दौर की मीडिया खबरों को सनसनीखेज बनाने, तार्किक विचारों के स्थान पर गैर तार्किक और जुनूनी बातें लिखने और जिम्मेदार लोगों की बुद्धि को जागृत करने की वजह गैर जिम्मेदार लोगों की भावनाओं को भड़काने में मीडिया का आम काम हो गया है । व्यक्ति की खातिर व्यक्ति विशेष की पूजा उनका मुख्य कर्तव्य बन गया है जो देश के हित में विवेकहींन बल है ।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This