ब्राह्मणों ने बहुजनों को जप-तप-अनुष्ठान और देवस्थान, दक्षिणा-आरोपण में कैसे फँसाया : गुलामगिरी

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परिच्छेद : ग्यारह [पुराण सुनाना, झगड़ाखोरी का परिणाम, संस्थानिक, कुलकर्णी, सरस्वती की प्रार्थना, बड़े कुलनामों की सभाएँ आदि के संबंध में] गतांक से आगे… मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 15 जुलाई 2020 | जयपुर : धोंडीराव : तात, यह बात पूरी तरह सत्य है कि इन अधर्मी मदारियों के (ब्राह्मणों के) झगड़ालू पूर्वजों ने इस देश में आ कर हमारे आदि पूर्वजों को (मूल निवासियों को) पराजित किया। फिर उन्होंने उनको अपना गुलाम बनाया। फिर उन्होंने अपनी बाहुओं को प्रजापति बनाया और उनके माध्यम से उन्होंने जहाँ-तहाँ दहशत फैलाई। इसमें उन्होंने अपना कोई बहुत बड़ा पुरूषार्थ दिखाया है, इस बात को मैं कदापि स्वीकार नहीं कर सकता। यदि हमारे पूर्वजों ने ब्राह्मणों के पूर्वजों को पराजित किया होता, तब हमारे पूर्वज ब्राह्मणों के पूर्वजों को अपना गुलाम बनाने में क्या सचमुच में कुछ आनाकानी करते? तात, छोड़ दीजिए इस बात को। बाद में फिर जब ब्राह्मणों ने अपने उन पूर्वजों की धींगामस्ती को, मौका देख कर ईश्वरी धर्म का रूप दे दिया और उस नकली धर्म की छाया में कई ब्राह्मणों ने तमाम अज्ञानी शूद्रों के दिलो-दिमाग में हमारी दयालु, अंग्रेज सरकार के प्रति पूरी तरह से नफरत पैदा करने की कोशिश की, मतलब वे कौन सी बातें थीं? जोतीराव : कई ब्राह्मणों ने सार्वजनिक स्थानों पर बनवाए गए हनुमान मंदिरों में रात-रात बैठ कर बड़ी धार्मिकता का प्रदर्शन किया। वहाँ उन्होंने दिखावे के लिए भागवत जैसे ग्रंथों की दकियानुसी बातें अनपढ़ शूद्रों को पढ़ाई और उनके दिलो-दिमाग में अंग्रेजों के प्रति नफरत की, घृणा की भावना पैदा की। इन ब्राह्मण पंडितों ने उन अनपढ़ शूद्रों को मंदिरों के माध्यम से यही पढ़ाया कि बलि के मतानुयायियों की छाया में भी खड़े नहीं रहना चाहिए। उनका इस तरह का नफरत भरा उपदेश क्या सचमुच में अकारण था? नहीं, बिलकुल अकारण नहीं था; बल्कि उन ब्राह्मणों ने समय का पूरा लाभ उठा कर उसी ग्रंथ की बेतुकी बातें पढ़ा कर सभी अनपढ़ शूद्रों के मन में अंग्रेजी राज के प्रति नफरत की भावना के बीज बो दिए। इस तरह उन्होंने इस देश में बड़ी-बड़ी धींगामस्ती को पैदा किया है या नहीं? धोंडीराव : हाँ, तात, आपका कहना सही है। क्योंकि आज तक जितनी भी धींगामस्ती हुई है, उसमें भीतर से कहो या बाहर से, ब्राह्मण-पंडित-पुरोहित वर्ग के लोग अगुवाई नहीं कर रहे थे, ऐसा हो ही नहीं सकता। इस द्रोह का पूरा नेतृत्व वे ही लोग कर रहे थे। देखिए, उमा जी रामोशी [23] की धींगामस्ती में काले पानी की सजा भोगनेवाले धोंडोपंत नाम के एक (ब्राह्मण) व्यक्ति का नाम आता है। उसी प्रकार कल-परसों के चपाती संग्राम में परदेशी ब्राह्मण पांडे, कोंकण का नाना (पेशवे), तात्या टोपे आदि कई देशस्थ [24] ब्राह्मणों के ही नाम मिलते हैं। जोतीराव : लेकिन उसी समय शूद्र संस्थानिक शिंदे, होलकर आदि लोग नाना फड़णीस से कुछ हद तक सेवक की हैसियत से संबंधित थे। उन्होंने उस धींगामस्ती करनेवालों की कुछ भी परवाह नहीं की और उस मुसीबत में हमारी अंग्रेज सरकार को कितनी सहायता की, इस बात को भी देखिए। लेकिन अब इसे छोड़ दीजिए। इन बातों से हमारी सरकार को ब्राह्मणों की उस धींगामस्ती को तहस-नहस करने की लिए बड़े भारी कर्ज का बोझ भी उठाना पड़ा होगा और उस कर्ज के बोझ को चुकाने के लिए पर्वती [25] जैसे फिजूल संस्थान की आय को हाथ लगाने की बजाय हमारी सरकार ने नए करों का बोझ किस पर डाल दिया? अपराधी कौन हैं और अपराध न करनेवाले लोग कौन हैं? इसकी पहचान किए बगैर ही सरकार ने सारी जनता पर कर (लगान) लगा दिया; किंतु यह इन बेचारे अनपढ़ शूद्रों से वसूल करने का काम हमारी इस मूर्ख सरकार ने किसके हाथों में सौंप दिया, इस बात पर भी हमको सोचना चाहिए। ब्राह्मण लोग अंदर ही अंदर शूद्र संस्थानिकों से जी-जान से इसलिए गाली-गलौज कर रहे थे क्योंकि उन्होंने इनकी जाति के नाना फड़णीस को उचित समय पर मदद नहीं की, जिसकी वजह से उसकी अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए पराजय हुई। अंग्रेज सरकार ने उन लोगों के हाथ में कर-वसूली का काम सौंप दिया, जो शूद्र संस्थानिकों से जी भर कर गाली-गलौज करनेवाले थे, दिन में तीन बार स्नान करके मांगल्यता का ढिंढोंरा पिटनेवाले थे, धनलोलुप और ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण कुलकर्णी थे। अरे, इन कामचोर ग्रामराक्षसों को (ब्राह्मण कर्मचारी), इन मूल ब्रह्मराक्षसों को जिस दिन से सरकारी काम की जिम्मेदारी दे दी गई, उस दिन से उन्होंने शूद्रों की कोई परवाह नहीं की। किसी समय मुसलिम राजाओं ने गाँव के सभी पशुओं पक्षियों की गरदनों को छुरी से काट कर उनको हलाल करने का हुक्म अपनी जाति के मौलानाओं को सौंप दिया था। लेकिन उनकी तुलना में देखा जाए तो स्पष्ट रूप से पता चल जाएगा कि ब्राह्मण-पंडितों ने अपने कलम की नोक पर शूद्रों की गरदनें छाँटने में उस मौलाना को भी काफी पीछे धकेल दिया है, इसमें कोई दो राय नहीं है। इसीलिए तमाम लोगों ने सरकार की बिना परवाह किए इन ग्रामरक्षसों को (ब्राह्मणों) को ‘कलम कसाई’ की जो उपाधि दी है, वह आज भी प्रचलित है। और अपनी मूर्ख सरकार उनका अन्य सभी कामगारों की तरह तबादला करने की बजाय उनकी राय ले कर अज्ञानी लोगों पर लगान (कर) मुकर्रर करने की कारण नोटिस तैयार करती है। बाद में, उसी कुलकर्णी को सभी शूद्र किसानों के घर-घर पहुँचाने के बाद उनसे मिलनेवाले कुलकणियों की सिर्फ स्वीकृति ले कर सरकार उनमें से कई नोटिसों को खारिज कर देती और अनपढ़ लोगों पर लगान बहाल कर देती है। अब इसको कहें भी क्या? धोंडीराव : क्या, ऐसा करने से कुलकर्णियों को कुछ लाभ भी होता होगा? जोतीराव : उससे उन कुलकर्णियों को कुछ फायदा होता होगा या नहीं, यह वे ही जानते हैं। लेकिन उनको यदि किसी वाहियात फतूरिया से कुछ लाभ न भी होता हो, फिर भी वे उन पर इस तरह की नोटिस भिजवा कर कम से कम चार आठ दिन की रूकावट निश्चित रूप से पैदा करते होंगे और आने जाने में सारी शक्ति खर्च करवाते होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। वे उन पर अपना रुतबा जमा करके कामों की उपेक्षा करते होंगे। बाद में उन्होंने शेष सभी काम बगुला भगत कि तरह पूरी आत्मीयता से किया होगा। इसलिए सभी अनपढ़ छोटे-बड़े लोगों और शंकराचार्य जैसे लोगों ने लक्ष्मी की स्तुति की कि ‘हे हमारी सरकारी सरस्वती मैया, तू अपने कानून से रोकती है और लाच खानेवालों को और उसी तरह लाचार हो कर लाच देनेवाले को दंड देती है, इसलिए तू धन्य है।’ इसलिए कई लोग प्रसन्न हुए और उन्होंने कुछ कुलकर्णियों के घरों पर कई दिनों तक लगातार पैसों की बारिश बरसाई। कुछ लोगों ने इसके खिलाफ शोर मचाया। यदि यह बात सच है तब उसकी पूरी जाँच-पड़ताल करनी चाहिए और ऐसे हरामखोर कुलकर्णियों को किसी गधे पर बैठा कर उनको गाँवों के तमाम रास्तों से घुमाने का काम अपनी सरकार का है। धोंडीराव : तात, सुनिए। ब्राह्मणों ने जो टेढ़ी-मेढ़ी हलचल शुरू की थी, उसको कुछ बुद्धिमान गृहस्थों ने अब अच्छी तरह पहचान लिया है, और उस बलि राजा (अंग्रेज सरकार) को अधिकारियों को, मुखिया को इस चालबाजी से अवगत कराया गया। फिर भी सरकार उन पहरेदारों की आँखों में धूल झोंक कर ऐसे कलम-कसाइयों को प्रसन्न करने में लगी हुई है। आज के ब्राह्मणों में कई लोग ऐसे हैं जो शूद्रों के श्रमरुप लगान की वजह से बड़े-बड़े विद्वान हुए हैं। लेकिन वे इस उपकार के लिए शूद्रों के प्रति किसी भी प्रकार की कृतज्ञता प्रदर्शित नहीं करते; बल्कि उन्होंने कुछ दिनों तक मनचाहे मौजमस्ती की है और अंत में अपनी मांगल्यता का दिखावा करके यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि उनकी वेदमंत्रादि जादूविद्या सही है। इस तरह कि झूठी बातों से उन्होंने शूद्रों के दिलो दिमाग पर प्रभाव कायम किया। शूद्रों को उनका पिछलग्गू बनना चाहिए, इसके लिए न जाने किस-किस तरह के पाँसे फेंके होंगे। उन्होंने शूद्रों को अपने पिछलग्गू बनाने की इच्छा से उन्हीं के मुँह से यह कहलवाया कि शादावल के लिंगपिंड के आगे या पीछे बैठ कर किराए पर बुलाए गए ब्राह्मण पुरोहितों के द्वारा जप, अनुष्ठान करवाने की वजह से इस साल बहुत बारिश हुई, और महमारी का उपद्रव भी बहुत कम हुआ। इस जप, अनुष्ठान के लिए आपस में रूपया पैसा भी इकट्ठा किया था। इस तरह उन्होंने जप, अनुष्ठान के आखिरी दिन बैलबंडी पर भात का बली राजा बनवा कर सभी प्रकार के अज्ञानी लोगों को बड़ी-बड़ी, लंबी चौड़ी झूठी खबरें दिलवा कर, बड़ी यात्राओं का आयोजन करवाया। फिर उन्होंने सबसे पहले अपनी जाति के इल्लतखोर ब्राह्मण पुरोहितों को बेहिसाब भोजन खिलाया और बाद में जो भोजन शेष बचा उसको सभी प्रकार के अज्ञानी शूद्रों की पंक्तियाँ बिठा कर किसी को केवल मुट्ठी भर भात, किसी को केवल दाल का पानी, और कइयों को केवल फाल्गुन की रोटियाँ ही परोसी गईं। ब्राह्मणों को भोजन से तृप्त कराने के बाद उनमें से कई ब्राह्मण पुरोहितों ने उन अज्ञानी शूद्रों के दिलो दिमाग पर अपने वेदमंत्र जादू का प्रभाव कायम रखने के लिए उपदेश देना शुरू किया हो, तो इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन वे लोग ऐसे मौके पर अंग्रेज लोगों को प्रसाद लेने के लिए आमंत्रित क्यों नहीं करते? जोतीराव : अरे, ऐसे पाखंडी लोगों ने इस तरह चावल के चार दाने फेंक दिए और थू-थू करके इकठ्ठे किए हुए ब्राह्मण-पुरोहितों ने यदि हर तरह का रूद्र नृत्य करके भों भों किया, तब उन्हें अपने अंग्रेज बहादुरों को प्रसाद देने की हिम्मत होगी? धोंडीराव : तात, बस रहने दीजिए। इससे ज्यादा और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। एक कहावत है कि ‘दूध का जला छाँछ भी फूँक-फूँक कर पीता है।’ उसी तरह इस बात को भी समझ लीजिए। जोतीराव : ठीक है। समझ अपनी-अपनी, खयाल अपना-अपना। लेकिन आजकल के पढ़े लिखे ब्राह्मण अपनी जादूमंत्र विद्या और उससे संबधित जप अनुष्ठान का कितना भी प्रचार क्यों न करें, उस मटमैले को कलई चढ़ाने का कितना भी प्रयास क्यों न करें और तमाम गली कूचों में से भोंकते हुए क्यों न फिरते रहें. लेकिन अब उनसे किसी का कुछ भी कम ज्यादा होनेवाला नहीं है। लेकिन अपने मालिक के खानदान को सातारा के किले में कैद करके रखनेवाले नमकहराम बाजीराव(पेशवे) जैसे हिजड़े ब्राह्मणों ने रात और दिन खेती में काम करने वाले शूद्रों की मेहनत का पैसा ले कर मुँहदेखी पहले दर्जें के जवांमर्द ब्राह्मण सरदारों को सरंजाम बनाया। उन जैसे लोगों को दिए हुए अधिकारपत्र (सनद) के कारणों को देख कर फर्स्ट सॉर्ट टरक्कांड साहब जैसे पवित्र नेक कमिशनर को भी खुशी होगी। फिर वहाँ दूसरे लोगों के बारे में कहना ही क्या? उन्होंने पार्वती जैसे कई संस्थानों का निर्माण करके, उन संस्थानों में अन्य सभी जातियों के अंधे, दुर्बल लोगों तथा उनके बाल-बच्चों की बिना परवाह किए, उन्होंने (ब्राह्मणों) अपनी जाति के मोटे-ताजे आलसी ब्राह्मणों को हर दिन का मीठा अच्छा भोजन खिलाने की पंरपरा शुरू की। उसी प्रकार ब्राह्मणों के स्वार्थी नकली ग्रंथों का अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणों को हर साल यथायोग्य दक्षिणा देने की भी पंरपरा शुरू कर दी। लेकिन खेद इस बात का है कि ब्राह्मणों ने जो पंरपराएँ शुरू की हैं, केवल अपनी जाति के स्वार्थ के लिए। उन सभी पंरपराओं को अपनी (अंग्रेज) सरकार ने जस के तस अभी तक कायम रखा है। इसमें हमको यह कहने में क्या कोई आपत्ति हो सकती है कि उसने अपनी प्रौढ़ता और राजनीति को बड़ा धब्बा लगा लिया है? उक्त प्रकार के फिजूल खर्च से ब्राह्मणों के अलावा अन्य किसी भी जाति को कुछ भी फायदा नहीं हैं; बल्कि उनके बारे में यह कहा जा सकता है कि वे हराम का खा कर मस्ताए हुए कृतघ्न साँड़ हैं। और ये लोग हमारे अनपढ़ शूद्र दाताओं को अपने चुड़ैल धर्म के गंदे पानी से अपने पाँव धो कर वही पानी पिलाते हैं। अरे, कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों के पूर्वजों ने अपने ही धर्मशास्त्रों और मनुस्मृति के कई वाक्यों को काजल पोत कर ऐसे बुरे कर्म कर्म कैसे किए? लेकिन अब तो उन्हें होश में आना चाहिए और इस काम के लिए अपनी भोली-भाली सरकार कुछ न सुनते हुए पार्वती जैसे संस्थानों में इन स्वार्थी ब्राह्मणों में से किसी को भी शूद्रों के पसीने से पकनेवाली रोटियाँ नहीं खानी चाहिए। इसके लिए एक जबर्दस्त सार्वजनिक ब्राह्मण सभा की स्थापना करके उनकी सहायता से इस पर नियंत्रण रखना चाहिए; जिससे उनके ग्रंथों का कुछ न कुछ दबाव पुनर्विवाह उत्तेजक मंडली पर पड़ेगा, यही हमारी भावना थी। किंतु उन्होंने इस तरह की बड़े-बड़े उपनामों की सभाएँ स्थापित करके उनके माध्यम से अपनी आँखों का मोतियाबिंद ठीक करना तो छोड़ दिया और अज्ञानी लोगों को सरकार की आँखों के दोष दिखाने की कोशिश में लगे रहे। यह हुई न बात कि ‘उलटा चोर कोतवाल को डाँटे’ इसको अब क्या कह सकते हैं! अब हमारे अज्ञानी सभी शूद्रों की उस बली राजा के साथ गहरी दोस्ती होनी चाहिए, इसका प्रयास करना चाहिए और उस बली राजा के सहारे से ही इनकी गुलामी की जंजीरें टूटनी चाहिए। ब्राह्मणों की गुलामी से शूद्रों को मुक्ति करने के लिए अमेरिकी स्कॉच और अंग्रेज भाइयों के साथ जो दोस्ती होने जा रही है, उसमें उन्हें कुछ दखलंदाजी करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अब उनकी दौड़धूप बहुत हो गई है। अब हम उनकी गुलामी का निषेध करते हैं।

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