‘आरएसएस के लिए ‘सेवा’ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का झाँसा, निर्णय समता पूर्णत: ब्राह्मणों के पास’

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो (साभार-कारवां) | 17 जुलाई 2020 | जयपुर-जोधपुर-दिल्ली : नोवेल कोरोनोवायरस महामारी से निपटने के लिए लगाए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के एक महीने बाद 26 अप्रैल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सरसंघचालक मोहन भागवत ने “वर्तमान स्थिति और हमारी भूमिका” शीर्षक से एक भाषण दिया। यह भाषण संघ के यूट्यूब चैनल और फेसबुक लाइव पर लाइव स्ट्रीम किया गया। मुख्यधारा के कई समाचार चैनलों ने भी भागवत के 42 मिनट के भाषण का सीधा और पूरा प्रसारण किया। भाषण के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवकों से देश में जारी लॉकडाउन में लोगों की “सेवा” करने का आग्रह किया। भागवत ने कहा कि स्वयंसेवकों को जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए क्योंकि यह “उनके पवित्र समुदाय की सुरक्षा और उनके विकास के लिए है।” उन्होंने कहा कि “इस सेवा का आधार” समुदाय के साथ “अपनेपन का भाव” होना चाहिए। दुनिया को जकड़ने वाले एक नैतिक संकट के बारे में बेतरतीब दार्शनिक सोच से भरा शुद्ध हिंदी ​में दिया गया भाषण आरएसएस के सदस्यों तक सीमित नहीं था। भागवत ने सभी नागरिकों को संबोधित करने और यह बताने की कोशिश की कि आरएसएस सेवा में विश्वास इसलिए करता है ताकि “समान विचारधारा वाले लोगों” को एकजुट किया जा सके। उन्होंने सुझाव दिया कि लोगों को कोविड-19 के संदर्भ में जीवन के एक नए तरीके को अपनाने के लिए कहने की प्रक्रिया “राष्ट्र के पुनर्निर्माण की एक चल रही प्रक्रिया का ही हिस्सा” है। भागवत ने पुनरुद्धार की उस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए संभावित साधनों के रूप में “सेवा” की वकालत की। रिपोर्टों की इस श्रृंखला में कारवां ने लॉकडाउन की शुरुआत के बाद से आरएसएस के राहत हस्तक्षेपों को ट्रैक किया है। पहली रिपोर्ट में बताया गया था कि सेवा किस तरह की गई थी और आपदा के बाद या एक सामाजिक परियोजना के रूप में आरएसएस ने लोगों का दिल जीतने के लिए और उन्हें एक ऐसे संगठन का हमदर्द बनाने के लिए ​कपटपूर्ण ढंग से काम किया जो 95 साल के अपने इतिहास में तीन बार प्रतिबंधित हुआ। दूसरी रिपोर्ट में आरएसएस के साथ संबद्ध गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की जांच की गई थी जिन्होंने चल रही महामारी के दौरान सरकारी संसाधनों और धन का उपयोग किया। मैंने संघ के “सेवा” दर्शन, इसके विकास और संगठन के लिए कार्य करने के उद्देश्य को लेकर 11 राज्यों के दो दर्जन से अधिक आरएसएस प्रतिनिधियों का साक्षात्कार लिया। ये लोग संगठन की विभिन्न शाखाओं में राज्य और जिला-स्तरीय पदों पर हैं। इसके अलावा, कम से कम चार संघ प्रकाशन- दत्तोपंत ठेंगडी का तीसरा रास्ता, एमजी वैद्य का अंडरस्टैंडिंग आरएसएस, हरिश्चंद्र बर्थवाल की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : एक परिचय और भविष्य का भारत तथा राजनीतिक वैज्ञानिकों के साथ साक्षात्कार ने संगठन के “सेवा” के विचार को समझाने में मदद की। उसकी छवि को लेकर बनती इस धारणा ने आरएसएस के राजनीतिक और सांस्कृतिक लक्ष्य को भारतीय समाज को “हिंदू समाज” के साथ जोड़ कर देखने और ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता बरकरार रखने में मदद की है। आरएसएस के वरिष्ठ सदस्यों ने मुझे बताया कि संघ ने 1970 के दशक में पहली बार दलित और आदिवासी समुदायों और निचली जातियों को हिंदू पंथ में लाने के लिए संगठन में “सेवा” को संस्थागत किया था। यह जाति-पदानुक्रम को बरकरार रखते हुए जनसमर्थन सुनिश्चित करने के लिए था। अपनी स्थापना के बाद से आरएसएस ने दावा किया है कि वह “राष्ट्र का पुनर्निर्माण” कर रहा है। संघ के साहित्य के अनुसार, देश “पुनर्निर्माण” की स्थिति में है जो अंततः आरएसएस के मार्गदर्शन में “संगठित हिंदू समाज” के रूप में होगा। एक धार्मिक इकाई के बजाय, आरएसएस हिंदू शब्द को एक सभ्यतागत पहचान के रूप में देखता है जो हिंदू धर्म से उपजा है। आरएसएस के वरिष्ठ विचारक वैद्य के प्रति मोहन भागवत बढ़चढ़कर सम्मान भाव व्यक्त करते हैं और उन्हें संघ दार्शनिक जीवन का एक जीवित भंडार माना जाता है। वैद्य ने अपनी किताब अंडरस्टैंडिंग आरएसएस में स्पष्ट रूप से लिखा है कि “इस राष्ट्र का भाग्य और भविष्य हिंदुओं के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है।” वैद्य ने लिखा, “हिंदुओं के कमजोर होने का मतलब राष्ट्र का कमजोर होना है ।।। जहां भी हिंदू अल्पसंख्यक हो जाते हैं, वहां उस क्षेत्र का हमारी मातृभूमि से अलग होने का खतरा हो जाता है।” उन्होंने बताया कि संघ को “हिंदुओं” को संगठित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “सामाजिक क्षेत्रों में” संघ के प्रभाव को सुनिश्चित करने से यह हासिल होगा। वैद्य के अनुसार, इस प्रभाव का अर्थ है “संघ के विचारों का प्रभाव और समाज में संघ द्वारा लागू सामाजिक चरित्र की छाप।” राष्ट्र निर्माण के इस लक्ष्य और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के इसके आधार को ध्यान में रखते हुए संघ की संगठनात्मक संरचना दशकों में विकसित हुई है। इसके अपने प्रशासनिक प्रभाग हैं, जो वर्तमान आंतरिक राजनीतिक मानचित्रों, विशिष्ट विभागों, शीर्षकों और सहयोगी कंपनियों के विशाल नेटवर्क से अलग हैं। असम के बौद्धिक प्रमुख शंकर दास ने मुझे बताया कि “सेवा विभाग” “छह स्तंभों” या विभागों में से एक है, जिसका अंतिम उद्देश्य “हिंदू राष्ट्र” की स्थापना के लिए एकजुटता से काम करना है। संघ अपने छह विभागों के माध्यम से कार्य करता है: शारीरिक, संपर्क, प्रचार, बौद्धिक, व्यवस्था और सेवा। इसके अलावा, राष्ट्रीय स्तर पर 46 अन्य शाखाएं हैं जो विभागों के तहत काम करती हैं और सभी को एक साथ संघ परिवार के रूप में जाना जाता है।” दास ने कहा, “इसके अलावा, हर राज्य के अपने संगठन हैं। कुल मिलाकर, 100 से अधिक राष्ट्रीय आरएसएस निकाय एक ही लक्ष्य, हिंदू राष्ट्र का पुनर्निर्माण, के लिए काम कर रहे हैं।” शारीरिक विभाग संघ की शाखाओं का संचालन करता है। सुरूचि प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक संघ: एक परिचय के आठवें संस्करण के अनुसार, 2014 तक देश भर में आरएसएस की 74622 शाखाएं लगती हैं। ये शाखाएं अर्धसैनिक प्रशिक्षण शिविरों के रूप में कार्य करती हैं और “बौद्धिक” प्रशिक्षण प्रदान करती हैं जो हिंदू धर्मग्रंथों से धार्मिक शिक्षाओं पर केंद्रित है। संपर्क विभाग सरकारी अधिकारियों और निजी फर्मों के साथ संपर्क बनाए रखता है। प्रचार अनुभाग संघ की मीडिया उपस्थिति और प्रकाशन को संभालता है। बौद्धिक विभाग नई भर्तियों को समझाता और पदाधिकारियों के भाषणों का प्रबंधन करता है। यह शारीरिक, प्रचार और संपर्क विभाग के साथ मिलकर काम करता है। व्यवस्था विभाग, कार्यक्रमों के आयोजन और संगठन के धन को इकट्ठा करने के लिए जिम्मेदार है जो गुरुदक्षिणा के रूप में सभी स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान होता है। सेवा विभाग के अंतर्गत आने वाले प्रमुख संगठनों में से एक राष्ट्रीय सेवा भारती है। आरएसबी एक छाता संगठन है जिसमें संघ के 900 से अधिक गैर सरकारी संगठन हैं। आरएसबी के राष्ट्रीय सचिव श्रवण कुमार ने मुझे बताया कि “सेवा विभाग” 1989 में आरएसएस के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगेवार के जन्मदिवस पर अस्तित्व में आया था। कुमार ने कहा कि संघ की तत्कालीन मौजूदा परियोजनाएं नए बनाए गए विभाग के दायरे में लाई गईं। इसमें सेवा भारती, आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाली आरएसएस की शाखा वनवासी कल्याण आश्रम, संघ की धार्मिक शाखा विश्व हिंदू परिषद और शैक्षिक मंच विद्या भारती शामिल थे। ब्रिटेन के ओपन यूनिवर्सिटी में धर्म विभाग में प्रोफेसर ग्विलिम बेकरलेग ने 2006 में एक शोध पत्र प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था, “स्वामी विवेकानंद एंड द संघ परिवार : कंवर्जेंट और डायवर्जेंट व्यूज ऑन पॉपुलेशन, रि​लिजन एंड नेशनल आइडेंटिटि” (स्वामी विवेकानंद और संघ परिवार : जनसंख्या, धर्म और राष्ट्रीय पहचान के बारे में समान या अलग विचार)। शोध पत्र में उन्होंने कहा है कि संघ के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने “ईसाई और इस्लाम के खतरे” के खिलाफ संघ की कल्पना की थी। बेकेरलेग ने लिखा है, “संघ परिवार ने भारत के सामने आने वाली चुनौतियों के जवाब के रूप में एकीकृत हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देने और केवल सतही तौर पर खंडित समाज को पुनर्जीवित करने को देखा है। इसने व्यापक सेवा (मानवता की सेवा) सहित कई गतिविधियों के माध्यम से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश की है।” आरएसबी की पंच वर्षीय रिपोर्ट के अनुसार, सेवा विभाग 2014 तक राष्ट्रीय शाखा और पंजीकृत एनजीओ के आरएसबी नेटवर्क के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यावसायिक प्रशिक्षण के क्षेत्र में कम से कम 137000 परियोजनाएं चला रहा है। ये संघ के आपदा-राहत हस्तक्षेपों जैसे कि 1999 में ओडिशा में सुपर चक्रवात और 2001 में गुजरात के भुज में आए भूकंप और बाकियों के अलावा थे। कुमार के अलावा जिस अन्य स्वयंसेवक से मैंने विशिष्ट उदाहरणों के साथ विस्तार से यह बताने की बात की कि हिंदू राष्ट्र की स्थापना में सेवा विभाग का योगदान किस तरह है वह हैं बिप्लव रॉय जो दक्षिण बंगाल के प्रांत प्रमुख हैं। आरएसएस ने अपने प्रशासनिक उद्देश्य के लिए पश्चिम बंगाल राज्य को दो राज्यों, उत्तर और दक्षिण बंगाल, में विभाजित किया है। रॉय ने दावा किया कि 5 अगस्त 2019 को धारा 370 को खत्म कर दिया जाना दशकों से सेवा विभाग द्वारा किए गए काम के कारण संभव हुआ। धारा 370 तत्कालीन जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है। “आपको क्या लगता है कि जम्मू और कश्मीर में ऐसे ही 370 को हटा दिया गया था? जादू की छड़ी घुमाकर? हमारे लोगों ने कम से कम 20 वर्षों तक वहां काम किया है।” रॉय ने कहा कि वह आरएसएस की एक परियोजना का उल्लेख कर रहे हैं जिसे “सेवा धाम” कहा जाता है, जिसके तहत विभिन्न क्षेत्रों के छात्रों को राष्ट्रीय राजधानी में अध्ययन के लिए भेजा जाता है। कुमार ने मुझे बताया कि, “सेवा धाम एक प्रकार का आवासीय विद्यालय है। हमने पहली बार इसे 1986 से 1990 के आसपास शुरू किया था। पूर्वोत्तर के बच्चे, जो अपने क्षेत्रों से आगे की यात्रा नहीं कर सकते थे, उन्हें शिक्षित करने के लिए यहां लाया गया था। इस मॉडल को अब पूरे देश में दोहराया गया है।” कुमार ने कहा कि यह परियोजना पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को “अधिक भारतीय” बनाने में बहुत उपयोगी थी। उन्होंने कहा कि संगठन ने पूर्वोत्तर में कम से कम चार दशक तक संगठन का संचालन किया, जब ​तक कि स्थानीय लोग “मुख्य भूमि के भारतीयों” के साथ दोस्ताना नहीं हो गए। उन्होंने मुझसे कहा, “वे हमें भारतीय कुत्ता कहते थे।” फिर उन्होंने कहा कि जम्मू और कश्मीर में यही परियोजना “उन परिवारों के बच्चों को शिक्षित कर रही थी जो आतंकवादियों से प्रभावित या मारे गए थे ।।। उन्हें यहां (दिल्ली) लाया गया।” हालांकि मैं जम्मू-कश्मीर में सेवा धाम की भूमिका की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका, कुमार और रॉय की अतिशयता संगठन के मकसद- परोपकार के माध्यम से राजनीतिक परिवर्तन का संकेत करती है। दक्षिण बिहार (बिहार में गंगा के दक्षिण का क्षेत्र) के प्रांत प्रमुख प्रधान राजेश पांडे ने एक और उदाहरण पेश किया जहां आरएसएस के राहत कार्य ने इस क्षेत्र में तेज पैठ बनाने में मदद की। पांडे के अनुसार, संघ ने 1966 के अकाल के दौरान बिहार में व्यापक राहत कार्य किया था। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों के काम ने प्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की भी सद्भावना को जीत लिया। इस बात को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सकता है, हालांकि, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की राजनीतिक वैज्ञानिक, मालिनी भट्टाचार्जी की हालिया शोध पुस्तक, आरएसएस डिजास्टर रिलीफ, अकाल के दौरान बिहार में संघ के राहत हस्तक्षेप का संदर्भ देती हैं। 1990 के दशक के दौरान बिहार में बड़े पैमाने पर जाति-हिंसा भड़की। 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे में 58 दलितों की हत्या सहित दलित समुदाय के कई नरसंहारों को अंजाम देने वाली उच्च जाति की मिलिशिया रणवीर सेना ने हत्याकांड को अंजाम दिया था। सेना में मुख्य रूप से भूमिहार शामिल थे जो इस क्षेत्र की भूस्वामी जाति है। पांडे ने बताया कि स्वयंसेवकों द्वारा अकाल-राहत कार्य करने से उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल करने में मदद मिली। उन्होंने कहा कि बाद में संघ ने इसका इस्तेमाल जमींदार मिलिशिया और उनके पीड़ितों के बीच हस्तक्षेप करने और बातचीत करने के लिए किया। “अगर आपको याद हो तो 90 के दशक के दौरान तथाकथित अगड़ी-पिछड़ी की लड़ाई अपने चरम पर थी। यह संघ के लोग थे जिन्होंने जमीन पर लोगों से बात की थी,” पांडे ने मुझे बताया। उन्होंने कहा, “यहां तक ​​कि मामला निपटाने के लिए स्वयंसेवकों ने सभी जातियों के साथ बातचीत की।” पांडे ने कहा कि संघ ने “निचली जातियों और दलितों” को सवर्णों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में मदद की। इस बात को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सकता था, लेकिन बिहार में किया गया कार्य आरएसएस की आंतरिक समझदारी का एक हिस्सा है क्योंकि इससे उन्हें राज्य में राजनीतिक मान्यता मिली। इसके अलावा, इसने यह सुनिश्चित किया कि मौजूदा जाति पदानुक्रम अछूता रहेगा। पांडे ने इस घटना को बिहार में आरएसएस के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना के रूप में याद किया। गर्व के साथ उन्होंने मुझे बताया कि स्वयंसेवकों के काम ने “समाज की कमियों” को दूर करने में मदद की और दलितों ने “बिना किसी जुलूस और नारे के अपनी लड़ाई को छोड़ दिया।” सेवा के माध्यम से आरएसएस का राजनीतिक अंतर्ग्रहण बिहार, जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों तक सीमित नहीं था। हर राज्य में आरएसएस के प्रतिनिधियों की अपनी-अपनी कहानियां थी कि कैसे “सेवा” उन्हें “संगठित हिंदू समाज” के करीब ले आई। उनकी बात पूरी तरह से झूठ नहीं हैं, बावजूद इसके कि कई विद्वानों ने संघ के बारे में शोध किया है और लिखा है और हालांकि स्वयंसेवक अक्सर अपने काम और उसके प्रभाव को बढ़ाचढ़ा कर बताते हैं। लेकिन यह निर्विवाद है कि संघ का हमेशा परोपकार के पीछे एक राजनीतिक मकसद रहा है। इससे उन्हें समुदायों के साथ संपर्क स्थापित करने में मदद मिली और धीरे-धीरे इन समुदायों के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ी। वाराणसी के रहने वाले रामाशीष सिंह जो वर्तमान में बिहार के एक वरिष्ठ प्रचारक हैं (आरएसएस के प्रांत विभाजन में झारखंड भी बिहार में शामिल है)। वह 1970 के दशक के में वर्तमान झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों के प्रभारी थे। उन्होंने मुझे बताया कि “सामाजिक परियोजनाओं” का विचार दो समुदायों पर लक्षित उपकरण के रूप में आया था-आदिवासी समुदाय को “ईसाई धर्म में परिवर्तित करने” से रोकने और दलित समुदाय से “उन्हें हिंदू धर्म का एक हिस्सा महसूस करने के लिए” और उनके खिलाफ की गई अस्पृश्यता की प्रथा को दूर करना। सिंह ने कहा कि तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के नेतृत्व में संघ में एक दर्शन को संस्थागत रूप दिया जाने लगा। “बालासाहेब के छोटे भाई भाऊसाहेब देवरस थे, जो संघ प्रचारक भी थे। यह 1980 में एक समय था। ” उन्होंने कहा, “उस समय झारखंड के भीतर ईसाइयों का बुरा प्रभाव था ।।। मैं झारखंड के एक शहर डाल्टनगंज में एक प्रचारक हुआ करता था।” उन्होंने कहा, “झारखंड के नेतरहाट के पास एक गांव का दौरा करने वाले भैया साहब ने आदिवासियों को भाषण दिया कि हमें अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। हमें ईसाई नहीं बनना चाहिए। ” सिंह ने मुझसे कहा, “भाषण के बाद एक बूढ़ा व्यक्ति हमारे पास आया और कहा कि ‘आप हमें धर्म नहीं सिखाते। हमने अपना धर्म नहीं छोड़ा। लेकिन अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो हमारे बच्चों को शिक्षित करें और हमें फाइलेरिया से मुक्त करें। ” फाइलेरिया एक परजीवी उष्णकटिबंधीय बीमारी है और इस मामले में झारखंड का स्थान देश में तीसरा है। सिंह ने मुझे बताया कि फिर “आरएसएस में सामाजिक कार्य का बीज अंकुरित हुआ।” संघ की समझ से लोकोपकार 1980 के दशक में आरएसएस के राष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा बन गया था, सेवा विभाग के गठन के बाद, एक राजनीतिक उपकरण के रूप में सेवा की धारणा संस्थापक सरसंघचालक हेडगेवार द्वारा लाई गई थी। दक्षिण बंगाल के राज्य प्रमुख रॉय ने मुझे बताया कि 1916 में हेडगेवार “कोलकाता पढ़ने के लिए आए थे। एक डॉक्टर के रूप में अपनी पढ़ाई के बाद वह रामकृष्ण मिशन से जुड़े।” बेकरलेग के शोध पत्र ने मिशन को उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विवेकानंद द्वारा शुरू किए गए एक हिंदू आंदोलन के रूप में वर्णित किया था, जिसका मानना ​​था कि हिंदू आबादी “घटती” जा रही है और उसे “जागृति” की आवश्यकता थी। रॉय के अनुसार, यह हेडगेवार का मिशन के साथ जुड़ाव था, जिसने उन्हें प्रभावित किया और “तब से, संघ ने सेवा के लिए प्रतिबद्धता जताई है।” राजनीतिक विज्ञानी मालिनी भट्टाचार्जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि यह “राष्ट्रवादी नायक स्वामी विवेकानंद थे जिन्होंने सेवा को लोकप्रिय बनाने और औपनिवेशिक काल के दौरान इसे राष्ट्रवाद से परिचित कराने में बहुत योगदान दिया था।” उन्होंने कहा कि संघ की कल्पना में, सेवा को लेकर विवेकानंद की गौरवशाली अवधारणा परोपकार की पश्चिमी अवधारणा के विपरीत है। भट्टाचार्जी का शोध कुछ हद तक आरएसएस की विद्या को दर्शाता है। उन्होंने लिखा कि आरएसएस ने कई सामाजिक-कल्याण मंचों को चालू करना शुरू कर दिया था, जो कि 1950 के दशक में दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर के कार्यकाल के दौरान “नागरिक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में घुसने” लगे थे, हालांकि इसे देवरस के कार्यकाल के दौरान “प्रोत्साहन” मिला। उन्होंने कहा कि गोलवलकर के लिए, सेवा एक “सचेत रणनीति” थी, जो मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या के बाद एक सांप्रदायिक और अर्धसैनिक निकाय के विरोध में “सामाजिक और मानवीय संगठन के रूप में आरएसएस की छवि को फिर से संगठित करने की आवश्यकता से उपजी थी। ” भट्टाचार्जी के अनुसार, सबसे बड़ी घटनाओं में से एक, जिसने देवरस को सामाजिक-कल्याणकारी परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए प्रेरित किया था, वह थी 1981 में तमिलनाडु के मीनाक्षिपुरम जिले में दलित समुदाय के 1500 सदस्यों द्वारा इस्लाम में सामूहिक रूप से धर्मांतरण। भट्टाचार्जी ने दो अन्य शोधकर्ताओं को उद्धृत किया। वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी दामले, जिन्होंने आरएसएस पर, द आरएसएस: ए व्यू टू द इनसाइड नाम से एक किताब लिखी। “एंडरसन और दामले के अनुसार, खासकर देवरस ने पहले की तुलना में आरएसएस में ‘अधिक गहन कार्यकर्ता पथ’ पर नेतृत्व किया क्योंकि उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार किया कि संगठन की ब्राह्मणवादी कीली गैर अभिजात वर्ग के लिए आकर्षक नहीं थी।” प्रचारक सिंह ने को संघ के उच्च-जाति के आधार से परे जाने की आवश्यकता पर विस्तार से बताया और बताया कि आरएसएस को अन्य वर्गों के लिए “सेवा” करने की आवश्यकता क्यों है। “क्योंकि हमारे समुदाय से कई झुग्गियों में रहते हैं,” उन्होंने कहा। फिर उन्होंने कहा, “वे कमजोर लोग हैं जिन्हें हम हिंदू कहते हैं लेकिन आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टिकोणों से, वे अछूत हैं।” सिंह ने कहा, “इस समुदाय के बीच राष्ट्र के प्रति विश्वास और देशभक्ति की भावना पैदा करने के लिए, संघ को उनके बीच जाने के लिए मजबूर है।” आरएसबी के राष्ट्रीय सचिव कुमार ने सिंह की ही तरह बताया कि संघ को दिल्ली में झुग्गियों में रहने वाले लोगों को “संगठित” करने और उन्हें “आत्मनिर्भर” बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस विचार ने संघ को दिल्ली में पहली सेवा भारती इकाई शुरू करने के लिए प्रेरित किया। “यह 1977 में जहांगीरपुरी में एक से बस्ती से शुरू हुआ… उदाहरण के लिए हमने एक सिलाई केंद्र खोला। फिर बच्चों को पढ़ाने के लिए हमने एक बाल संस्कार शुरू किया।” बाल संस्कार शुरुआत में हेडगेवार द्वारा शुरू की गई एक अवधारणा थी, जिसमें दस से बारह साल की उम्र के बच्चों को भर्ती किया जाता था और उन्हें हिंदू राजाओं और हिंदू पौराणिक कथाओं के अलावा अन्य चीजों के बारे में पढ़ाया जाता था। ” फिर, हमने चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उन लोगों को भी दिया जिनके पास स्वास्थ्य सुविधा नहीं है।” कुमार ने आगे बताया, “इसके पीछे वास्तविक कारण यह था कि हमारे समुदायों का एक बड़ा हिस्सा झुग्गियों में रहता है। जो साधारण झोपड़ियों में रहते हैं और समुदाय से अलग-थलग महसूस करते हैं। इसलिए, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए इसे शुरू किया गया था। ”संघ की सेवा का एक और पहलू सार्वजनिक मंचों और मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से संगठन के बार-बार किए गए दावे, कि इसके मानवीय हस्तक्षेप, या तो आपदाओं के दौरान या नियमित परियोजनाओं के माध्यम से, गैर-भेदभावपूर्ण हैं। हालांकि, संघ के सदस्यों के साथ बातचीत में यह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। स्वयंसेवकों के साथ मेरे साक्षात्कार के दौरान, उनमें से अधिकांश ने “मुस्लिम” शब्द का उपयोग करने से भी परहेज किया। यह सवाल किए जाने पर कि क्या वे मुस्लिम समुदाय की सेवा अधिक उत्साह के साथ करेंगे, प्रतिक्रिया आम तौर पर एक समान थी, उनमें से एक ने कहा, “जो कोई भी इस देश से है, हम बिना किसी भेदभाव के उन सभी की मदद करते हैं।” यह कहने वाले स्वयंसेवक पूर्वी दिल्ली, जिसे आरएसएस में आंतरिक रूप से इंद्रप्रस्थ जिला के रूप में जाना जाता है, के जिला प्रमुख महिपाल सिंह थे। लेकिन जब मैंने उनसे और पूछताछ की, तो उन्होंने कहा, “हमारे लिए जो कोई भी भारत माता की जय’ का नारा लगाता है, वह इस देश का है फिर चाहे वह किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च में जाए। लेकिन अब क्योंकि तबलीगियों ने कोरोना फैलाया था इसलिए उस समुदाय में जाने में हिचकिचाहट थी।” वह उन चार हजार से अधिक कोविड-19 मामलों के समूह का जिक्र कर रहे थे जिनका पता एक मुस्लिम पुनरुत्थानवादी संगठन, तबलीगी जमात द्वारा मार्च के प्रारंभ में दिल्ली में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में चला था। जैसे ही खबर सामने आई भारत का मीडिया प्लेटफॉर्म मुस्लिम समुदाय के प्रति लक्षित फर्जी खबरों से भर गया था। “हम अच्छे काम के लिए जाते हैं और अगर कुछ और हो जाता है तो क्या होगा?” जबकि आरएसएस की सेवी परियोजनाओं का प्राथमिक उद्देश्य दलित और आदिवासी समुदायों को हिंदू संरचना के भीतर रखना है, कम से कम दो पूर्व स्वयंसेवकों ने मुझे बताया कि आंतरिक रूप से संघ ब्राह्मणों और अन्य उच्च जातियों द्वारा नियंत्रित और शासित है। उनके अनुसार, निचली जातियों और दलित और आदिवासी समुदायों के सदस्यों को पैदल सैनिकों की भूमिका को भरने के लिए नियोजित किया जाता है – आरएसएस उनका उपयोग तब करता है जब उसे अपनी गतिविधियों के लिए जमीन पर लोगों को जुटाने की आवश्यकता होती है, जिसमें अर्धसैनिक प्रकृति के लोग भी शामिल होते हैं। एक पूर्व स्वयंसेवक भंवर मेघवंशी ने मुझे बताया कि संघ जानता था कि “अगर उन्हें अपना समर्थन बढ़ाना है तो उन्हें दलितों की जरूरत होगी।” मेघवंशी “रामजन्मभूमि आंदोलन” में शामिल रहे थे, जिसके कारण 1992 में बाबरी मस्जिद को नष्ट कर दिया गया। उन्होंने कहा, “जब रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू हुआ तो उन्होंने एक दलित कामेश्वर चौपाल से मंदिर निर्माण के लिए नींव का पत्थर रखवाया।” उनके अनुसार, “यह सब आंदोलन की गर्मी से नहीं हुआ। यह पहले से सुनियोजित था। ” एक अन्य पूर्व स्वयंसेवक सूरज लोलगे, जो कुछ समय के लिए जिला संगठनात्मक सचिव भी बने, ने मुझसे कहा, “संघ के भीतर जातिवाद साप्ताहिक गुरुवार की रणनीतिक बैठक में सबसे अधिक दिखाई देता है। संघ की पहुंच का विस्तार करने के लिए भारतीय जनता पार्टी सहित इसकी विभिन्न शाखाओं द्वारा और क्या किया जाना चाहिए इस पर चर्चा करने के लिए बैठक आयोजित की जाती है।” लोलगे के अनुसार, “इस बैठक में केवल संगठन मंत्री” मौजूद रहते हैं। इस बैठक में केवल ब्राह्मण संगठन सचिवों को आमंत्रित किया जाता है। कोई भी निचली जाति का या दलित, भले ही वह संगठन सचिव हो, इस बैठक में शामिल नहीं हो सकता।” दूसरी ओर कुमार ने कहा कि गुरुवार की रणनीतिक बैठकों में केवल ब्राह्मण के शामिल होने की बात सच नहीं है। उन्होंने मुझे बताया कि वह खुद एक “अग्रवाल” हैं, जो पारंपरिक रूप से व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ा एक उच्च-जाति समुदाय हैं, और “मैंने आरएसएस में कभी भी ऐसा नहीं देखा।” मेघवंशी ने लोलेगे के दावे के साथ सहमति व्यक्त की कि बैठकों में निचली जातियों और दलित समुदाय का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। लेकिन उन्होंने संघ में ब्राह्मणों के जाति आधिपत्य पर एक महत्वपूर्ण विवरण जोड़ा। मेघवंशी ने कहा कि बैठकों में ब्राह्मणों को छोड़कर कभी कोई अन्य सदस्य नहीं होता “क्योंकि आरएसएस में निर्णय लेने वाले लगभग सभी पद ब्राह्मणों के पास होते हैं।” ( लेखक : सागरकारवां के स्‍टाफ राइटर हैं ) Original link

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