स्मृतिशेष : नेल्सन मंडेला गाँधी और अंबेडकर के शाश्वत संयोग – प्रोफ़ेसर राम लखन मीना

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 18 जुलाई 2020 | जयपुर : नेल्सन मंडेला का जन्म (Nelson Mandela’s Birthplace) दक्षिण अफ्रीका में ट्रांसकी के मर्वेजो गाँव में 18 जुलाई, 1918 को हुआ था। उन्हें लोग प्यार से मदीबा बुलाते थे, जिसका मतलब है पिता। मंडेला का जन्म के समय नाम होलीसाजा मंडेला (Rolihlahla Mandela) था। स्कूल के दिनों में एक शिक्षक ने उनके नाम में नेल्सन जोड़ा। तब से वह नेल्सन होलीसाजा मंडेला हो गये। 95 साल की उम्र में 5 दिसंबर, 2013 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले मंडेला महात्मा गाँधी के बड़े अनुयायी थे। उन्होंने महात्मा गाँधी के आदर्शों पर चलते हुए रंगभेद के खिलाफ अपने आंदोलन में अहिंसा पर जोर दिया। इस मौके पर दक्षिणी अफ्रीका के ‘गाँधी’ यानी नेल्सन मंडेला के बारे में कुछ अनसुनी बातें जानना जरूरी हो जाता है। नेल्सन मंडेला को दक्षिण अफ्रीका का गाँधी कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि उन्होंने गाँधीजी के मार्ग पर चलकर ही रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी। दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से बाहर फेंके जाने की घटना जैसे गाँधी के लिए अहम प्रेरणा बनी, वैसी ही रंगभेद से जुड़ी दो घटनाओं ने मंडेला की लड़ाई को दिशा दी थी। अफ्रीका में समानता की नींव रखने वाले रंगभेद, नस्लभेद व साम्राज्यवाद के खिलाफ आजीवन संघर्षरत रहे नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित भारत रत्न महानायक नेल्सन मंडेला जी को उनके जन्मदिन पर उन्हें कोटि-कोटि नमन शोषित समाज आपके संघर्ष को कभी नहीं भुला सकता है । मंडेला गाँधी जी के विचारों से काफी प्रभावित भी थे। उनके ही विचारों से ही प्रभावित होकर मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ अभियान शुरू किया था। अहिंसा तथा असहयोग के बलबुते उनके अभियान को ऐसी सफलता मिली कि उन्हें ही अफ्रीका का गाँधी पुकारा जाने लगा। अफ्रीका के गाँधी, जिन्होंने खाली हाथ नस्लभेद का किला ढहा करके एक नया इतिहास रच दिया। व्यक्ति का अपने प्रत्येक कार्य से कर्ताभाव विलीन होने से उसके प्रत्येक कार्य ही ईश्वर की सुन्दर प्रार्थना बन जाती है। मंडेला के निधन से चार साल पहले 18 जुलाई को दक्षिण अफ्रीका में मंडेला डे मनाना शुरू हुआ। इस मौके पर दक्षिण अफ्रीका के लोग बड़े पैमाने पर सामाजिक गतिविधियों को अंजाम देते थे। वे विश्व शांति के लिए काम करते थे। इस दृष्टि से रंगभेद के इतिहास में 18 जुलाई का दिन काफी अहम है। रंगभेद के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई, 1918 को हुआ था। उनकी याद में इस दिन को नेल्सन मंडेला डे के तौर पर मनाया जाता है। कॉलेज से निकाले गये मंडेला यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ फोर्ट हारे में आर्ट्स से बैचलर की पढ़ाई कर रहे थे। वह छात्र अधिकारों को लेकर मुखर थे और इस तरह की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। इस वजह से उनको यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया। जब थेम्बु चीफ को यह खबर मिली तो वह काफी गुस्सा हुए। उन्होंने मंडेला की निंदा की और स्कूल लौटने को कहा। थेम्बु चीफ ने मंडेला की शादी करवाने की भी धमकी दी। शादी के डर से मंडेला अपने चचेरे भाई के साथ जोहानिसबर्ग भाग गये और वहाँ खुद से आगे की पढ़ाई की। नेल्सन मंडेला, जिन्होंने संघर्ष के तमाम रास्तों से गुजरकर आखिर में गाँधीवाद को खोजा था। मंडेला ने डॉ अंबेडकर की तरह दुनिया से ज्यादा कुछ नहीं माँगा, बस वे हर एक मनुष्य के लिए स्वत्रंत रूप से जीवन जीने के समान अधिकार चाहते थे। उन्होंने कहा था, ”आखिरकार हम समान राजनीतिक अधिकार चाहते हैं क्योंकि उसके बगैर हम हमेशा पिछड़े रह जायेंगे। मैं जानता हूं कि इस देश-दुनिया के श्वेतों को यह क्रांतिकारी जैसा लग रहा होगा क्योंकि अधिकतर मतदाता अफ्रीकी होंगे। इस बात को लेकर श्वेत लोग लोकतंत्र से डरते हैं।’’ जैसे इंडिया में सवर्ण लोकतंत्र और समानता से डरते हैं। मंडेला भी अंबेडकर की भांति शिक्षा को शेरनी के दूध की तरह मानते थे, इसीलिए उन्होंने जोर देकर कहा ‘शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है जिसका इस्तेमाल दुनिया को बदलने के लिए किया जा सकता है।’ उनका मानना था कि सभी के लिए काम, रोटी, पानी और नमक हो। खुद पीछे रहना और दूसरों को आगे कर नेतृत्व करना बेहतर होता है, खासतौर पर तब जब आप आप कुछ अच्छा होने पर जीत का जश्न मना रहे हों। आप तब आगे आइये जब खतरा हो। तब लोग आपके नेतृत्व की प्रशंशा करेंगे। वे मानवीय संबंधों में प्रगाढ़ता के हिमायती थे और कहते थे ‘यदि आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करें जो वो समझता है, तो बात उसके सर में जाती है , यदि आप उससे उसकी भाषा में बात करते हैं, तो बात उसके दिल तक जाती है। मैं जातिवाद से घृणा करता हूँ, मुझे यह बर्बरता लगती है , फिर चाहे वह अश्वेत व्यक्ति से आ रही हो या श्वेत व्यक्ति से या भारत के परिप्रेक्ष्य में कहे तो जन्म से। मंडेला ने लोकतंत्र, विविधता और सहिष्णुता को बचाए रखने के लिए आजीवन संघर्ष किया। आज के इस दौर में उनके विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गयी है। उन्होंने यह भी कहा कि विश्व के सभी लोगों को एकजुट होकर मंडेला के विचारों और आदर्शों को जीवित रखने के लिए काम करना होगा। नेल्सन मंडेला सेंटर ऑफ़ मेमोरी के साथ साझेदारी में, गूगल सांस्कृतिक संस्थान ने नेल्सन मंडेला के पुरालेख को ऑनलाइन लाने में सहायता की है। मल्टीमीडिया पुरालेख में मिस्टर मंडेला का परिवार, कॉमरेड और मित्रों के साथ पत्र-व्यवहार, अपने 27 साल के कारावास के दौरान लिखी गयी डायरियाँ और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को समाप्त करने वाली वार्ताओं का नेतृत्व करने के दौरान लिखी गयी टिप्पणियाँ शामिल हैं। पुरालेख में मिस्टर मंडेला की सबसे पुरानी ज्ञात फ़ोटो और उनकी अपनी पुस्तक “स्वयं से वार्तालाप’’ और उनकी आत्मकथा की उत्तर कथा “स्वतंत्रता का लंबा मार्ग’’ के पूर्व में कभी नहीं देखे गये मसौदे भी शामिल हैं। साथ मिलकर, हमने दृष्टिगत रूप से शानदार और संवादात्मक ऑनलाइन अनुभव तैयार किया है जो सात प्रदर्शनियों के माध्यम से मिस्टर मंडेला के जीवन और कार्य की कहानी बताता है: पूर्व जीवन, कारागार के वर्ष, राष्ट्रपति काल, सेवा निवृत्ति, मंडेला के बारे में पुस्तकें, युवाओं और महान व्यक्ति के साथ मेरे पल। उनके धरोहर द्वारा लोगों को प्रेरित करने के लक्ष्य के साथ, यह अनुभव सशक्त खोज और ब्राउज़िग अनुभव टूल भी प्रदान करता है जिसके कारण मिस्टर मंडेला की अविश्वसनीय जीवन गाथा का वास्तविक गहराई से अन्वेषण संभव हो पाता है। जोहान्सबर्ग में स्थित, नेल्सन मंडेला सेंटर ऑफ़ मेमोरी दुनिया के महानतम राजनीतिज्ञों में से एक के जीवन और कार्यों के दस्तावेज़ीकरण और दुनिया भर में सामाजिक न्याय के प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है। (लेखक : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के सिंडिकेट सदस्य हैं)

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