जोतिराव गोविंदराव फुले : जोतिबा ‘फुले’ से ‘महात्मा’ तक

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो – द वायर | 20 जुलाई 2020 | जयपुर : आम बहुजन की तरह माली का काम करने की वजह से उनके परिवार को ‘फुले’ के नाम से जाना जाता था। उन्होंने फूलों का गजरा बनाने का कार्य आरंभ किया। उनके नाम में लगे ‘फुले’ का भी इसी से संबंध है। उनका पूरा जीवन क्रांति से भरा था। उन्होंने समाज के निचले तबके को सशक्त बनाने की लड़ाई लड़ी। इसके लिए उनको स्थापित नियमों और परंपराओं के सामने डटकर खड़ा होना पड़ा। उन्होंने महिला शिक्षा के मैदान में भी काफी योगदान दिया। उन्होंने समाज के दबे-कुचले वर्ग के लिए ब्रिटिश शासन से भी टकराने में हिचकिचाहट महसूस नहीं की। देश से छुआछूत को खत्म करने और समाज के वंचित तबके को सशक्त बनाने में अहम किरदार निभाने वाले ज्योतिबा फुले साक्षात् महात्मा है। समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक और क्रांतिकारी ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे में हुआ था और निधन 28 नवंबर, 1890 को हुआ था। वैसे उनका असल नाम जोतिराव गोविंदराव फुले था लेकिन ‘ज्योतिबा फुले’ के नाम से मशहूर हुए। उनका परिवार सतारा से पुणे आ गया था और माली का काम करने लगा था। उनके ब्रिटिश शासन से भिड़ने के रोचक किस्से और दस रोचक तथ्य आज आपको सुनाने जा रहे हैं। ब्रिटिश शाही परिवार को चुनौती एक और ऐसा मौका आया था जब वह गरीब किसानों की आवाज उठाने में पीछे नहीं हटे। ज्योतिबा फुले के एक दोस्त थे जिनका नाम हरि रावजी चिपलुनकर था। उन्होंने ब्रिटिश राजकुमार और उसकी पत्नी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। ब्रिटिश राजकुमार महारानी विक्टोरिया का पोता था। उस कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले भी पहुँचे। वहाँ जाकर किसानों का दर्द बयान कर सके, इसके लिए वह कार्यक्रम में किसानों जैसा कपड़ा पहनकर गये थे और भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में धनाढ्य लोगों पर टिप्पणी की जो हीरे के आभूषण पहनकर अपने वैभव और धन-दौलत का प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने मौके पर मौजूद गणमान्य हस्तियों को चेताते हुए कहा कि ये जो धनाढ्य लोग हैं, वे भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर राजकुमार वाकई में इंग्लैंड की महारानी की भारतीय प्रजा की स्थिति जानना चाहता है तो वह आसपास के गाँवों का दौरा करे। उन्होंने राजकुमार को उन शहरों में भी घूमने का सुझाव दिया जहाँ वे लोग रहते हैं जिनको अछूत समझा जाता है, जिनके हाथ का पानी पीने, खाना खाने, जिसके साथ खड़े होने पर लोग खुद को अपवित्र मानने लगते हैं। उन्होंने राजकुमार से आग्रह किया कि वह उनके संदेश को महारानी विक्टोरिया तक पहुँचा दे और गरीब लोगों को उचित शिक्षा मुहैया कराने का बंदोबस्त करे। ज्योतिबा फुले के इस भाषण से समारोह में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गये थे। प्रेस की आजादी के संरक्षक बने जोतिबा फुले 1876 से 1880 तक भारत का वायसराय था लॉर्ड लिटन। भारतीय राष्ट्रवाद के आंदोलन का वह क्रूरता से दमन करना चाहता था और उसे प्रेस की आजादी सबसे ज्यादा खटकती थी। उसने राष्ट्रवादियों को काबू करने के लिए प्रेस का गला घोंटना सबसे सही कदम माना। 1878 में उसने वर्नाक्युलर ऐक्ट पास करके प्रेस का गला घोंटने की कोशिश की। इस कानून के तहत देसी भाषा में छपने वाले समाचारपत्रों पर कुछ रोक लगा दी गयी और उनकी आजादी छीन ली गयी। सत्यशोधक समाज का हिस्सा रहे दीनबंधु समाचार पत्र की ओर से प्रेस की आजादी छीनने के प्रतिबंध का काफी विरोध हुआ था। इस प्रतिबंध के 2 साल बाद 1880 में लिटन पूना (अब पुणे) का भ्रमण करने वाला था। पूना नगरपालिका का तत्कालीन अध्यक्ष लॉर्ड लिटन का भव्य स्वागत करना चाहता था। इसके लिए वह एक हजार रुपये खर्च करना चाहता था और पूना नगरपालिका के सदस्यों से खर्च के अपने प्रस्ताव को पारित करने में मदद करने का आग्रह किया था। ज्योतिबा फुले को यह बात काफी नागवार गुजरी कि टैक्सपेयर्स का पैसा लिटन जैसे क्रूर आदमी पर खर्च किया जाये। वह बिल्कुल डरे नहीं और पूरे साहस के साथ प्रस्ताव रखा कि लिटन की बजाय उस पैसे को पूना के गरीब लोगों की शिक्षा पर खर्च किया जाये। वह अपने रुख पर अडिग रहे और जब खर्च वाला प्रस्ताव वोटिंग के लिए आया तो उन्होंने प्रस्ताव के विरोध में वोट किया। पूना नगरपालिका में उस समय 32 नामित सदस्य थे जिनमें से अकेले ज्योतिबा फुले थे जिन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया। ज्योतिराव गोविंदराव फुले 19वीं सदी के एक महान भारतीय विचारक, समाज सेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। उनको महात्मा फुले एवं ज्योतिबा फुले के नाम से जाना जाता है। आज ही के दिन यानी 28 नवंबर, 1890 को 63 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था। अछूतोद्धार के लिए ज्योतिबा ने उनके अछूत बच्चों को अपने घर पर पाला और अपने घर की पानी की टंकी उनके लिये खोल दी। परिणामस्वरूप उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। समाज सेवा के कार्यों से उनकी बढ़ती ख्याति देखकर प्रतिक्रियावादियों ने एक बार दो हत्यारों को उन्हें मारने के लिए तैयार किया था, पर वे ज्योतिबा की समाजसेवा देखकर उनके शिष्य बन गये। उन्‍होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया। उन्होंने इसके साथ ही किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1854 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गये तो उनके पिता पर दबाव डालकर पति-पत्नी को घर से निकलवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिये। आइये उनसे जुड़ी खास बातें जानते हैं… महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। इसलिए माली के काम में लगे ये लोग ‘फुले’ के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने महिलाओं एवं विधवाओं के कल्याण के लिए काम किए। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1848 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था।लड़कियों को पढ़ाने के लिए जब कोई योग्य अध्यापिका नहीं मिलीं तो इस काम के लिए उन्होंने अपनी सावित्री फुले को इस योग्य बनाया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की कोशिख की लेकिन जब फुले आगे बढ़ते ही गये तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका जरूर लेकिन शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिये। दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी। वह बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। अपने जीवन काल में उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं- गुलामगिरी उनकी सर्वाधिक प्रसिद्द पुस्तक है। साथ ही, तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत आदि महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘ऐग्रिकल्चर ऐक्ट’ पास किया। ज्योतिराव ने ही ‘दलित’ शब्द का पहली बार प्रयोग किया था जो अंग्रेजी के ‘सप्रेस्ड’ शब्द का सामानांतर है।

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