भारतीय सवर्णों का अमरीका में समानता के लिए प्रदर्शन

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‘अमरीका में प्रदर्शन करने वाले लोगों के परिजनों को, इस देश के अधिकतर सवर्णों को दलितों-आदिवासियों के जिंदा होने से ही समस्या है?’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 24 जुलाई 2020 | जयपुर-केलिफोर्निया : अमरीका में सवर्ण भारतियों के संगठन और सवर्ण मानसिकता के लोगों द्वारा 23.07.2020 को धरना प्रर्दशन किया और हाथों में तख्ती-बैनर लेकर प्रदर्शन किया गया। जो लोग अमरीका में प्रदर्शन करने वाले लोगों के परिजन को इस देश के अधिकतर सवर्णों को दलितों के जिंदा होने से ही समस्या है? इतना ही नहीं हर क्षेत्र ; शिक्षा, अध्यापन, साहित्य, कला, संस्कृति, राजनीति और खेल इत्यादि में भेदभावपूर्ण पूर्ण रवैया अपनाने वाले लोग जब खुद पर बीतती है तो मात्र कुछ ही समय में उनका धैर्य जवाब दे देता है। जातिवादी वर्चस्व को तोड़े बिना नहीं मिटेंगे भेदभाव मानव अधिकारों के लिए होने वाले आंदोलनों का कोई भूगोल नहीं होता है। किंतु, ऐसे आंदोलनों में सोच-वैभिन्न्य बरती गयी हो तो दिलो-दिमाग में कई प्रश्न कौंधते है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जो वर्चस्व और ब्राह्मणवादी मानसिकता भारत में सदियों अपने ही लोगों का जन्म आधारित शोषण कर रही हो, उन पर घोर अमानवीय अत्याचार कर रही हो। वहीं देश के बाहर अमरीका में उन्हीं मानवीय अधिकारों के लिए गुहार लगा रहे हैं जिनके पूर्वज और परिजन आज भी मानव को मानव नहीं मानते हैं। भारत में व्याप्त भेदभाव पर भी बहस होती रही है लेकिन बदलाव की राह आसान नहीं। अमेरिका में दो अश्वेत नागरिकों की मौत और दुनिया में जारी आंदोलनों के बीच भारत की ओर भी ध्यान गया है जहाँ ये भेदभाव अलग अलग ढंग से दिखता है। उन लोगों के बारे में सोचो जो लोग सदियों से अमानवीयतापूर्ण अन्याय, अत्याचार झेल रहे हैं। यानी समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ भेदभाव न पसरा हुआ हो। करियर तबाह हो जाने के किस्से और अपमान की घटनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं। फिल्म उद्योग में सुशांत सिंह राजपूत आज की एक दुखद मिसाल हैं जो मीडिया खबरों के मुताबिक बॉलीवुड के प्रतापियों और वर्चस्ववादियों का शिकार थे। खेल जगत में प्रकट ऐसी घटनाएँ रोज घटती है । संविधान ने शोषितों और वंचितों को बराबरी संविधान ने शोषितों और वंचितों को बराबरी पर लाने के लिए प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की थी, उसे आरक्षण बता-बताकर उसे फुटबॉल बना दिया। ये आरक्षण विरोधी एक्सपर्ट इतने ज्ञानी हैं कि हर वक्ता यह कहता हुआ मिला कि आरक्षण केवल दस वर्ष के लिये था फिर 70 साल तक लागू क्यों? अब तो ब्राह्मणवादी न्यायपालिका हाथ धो-धोकर उसके पीछे पड़ीं है। अमेरिका के नस्लभेद और रंगभेद की तरह ही भारत का जाति आधारित सामाजिक यथार्थ दमन और शोषण से बना है। एक प्रमुख फर्क यही है कि भारतीय स्थिति ज्यादा पेचीदा, परतदार, बहुआयामी और व्यापक हताशा वाली है। दलितों पर क्रूरता और उनसे भेदभाव सवर्णवादी और ब्राह्मणवादी विभाजन ने गरीबों, आदिवासियों और दलितों को बराबरी से हमेशा से वंचित रखा है और अब भी रख रहे हैं। ये बंटवारा न सिर्फ धर्मों और जातियों के भीतर है बल्कि उनमें परस्पर भी है। ये विभाजन अमीर-गरीब, छोटे-बड़े और स्त्री-पुरुष का भी है। यहाँ तक कि कोरोना महामारी की आड़ में भी भेदभाव पनप चुका है, गैर-मरीजों का मरीजों से। आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर क्रूरता और उनसे भेदभाव की घटनाओं में कमी आती नहीं दिखती। ये बात सही है कि संविधान-प्रदत्त अधिकार और कानूनी प्रावधान भी जातीय भेदभाव, उत्पीड़न और अन्याय को खत्म करने में बहुत सफल नहीं रह पाते हैं। क्योंकि सत्ता राजनीति को संचालित करने वाली शक्तियाँ उन अधिकारों और दमित जातियों के बीच में अवरोध की तरह बनी रहती है। यही वजह है कि आईएएस जैसी सर्वोच्च सिविल सेवा में पहुंच जाने के बाद भी अनुसूचित जाति के उम्मीदवार को ताने सहने पड़ते हैं, उच्च शिक्षा हासिल करने का सामाजिक दंश झेलना होता है, समाज में अपनी आर्थिक हैसियत बना लेना एक गंभीर अपराध समझा जाता है और उच्च जाति में प्रेम और विवाह जैसी कोशिश तो मौत के मुंह में धकेल सकती है। सामाजिक बुराई सदियों से और पीढ़ियों से चली आ रही है हिंदी पट्टी हो या देश के गैर हिंदी-भाषी अन्य राज्य, ये सामाजिक बुराई सदियों से और पीढ़ियों से चली आ रही है।एक अदृश्य सवर्णवादी नियंत्रण समाज में स्थापित है और उच्च जातियों के दबंगों को प्रश्रय देता है। जातीय नरसंहार का दौर पीछे छूट चुका है, अब एक नयी तरह की हिंसा पनप चुकी है, लिंचिग की शक्ल में या सरेराह दिनदहाड़े सजा सुना देने को तत्पर एक हिंसक दबंगता में या फिर अपमानजनक हालात में घेरे रखने की साजिश के रूप में। मंदिरों में प्रवेश से लेकर, खाना छू लेने या सार्वजनिक समारोहों में भागीदारी कर लेने भर से गरीबों और दलितों की जिंदगी पर बन आती है। छुआछूत का बोलबाला है और आम जनजीवन में उनकी भूमिका होने के बावजूद उनसे दास की तरह व्यवहार किया जाता है। जातीय, लैंगिक, क्षेत्रीय, वर्गीय, धार्मिक और भाषायी भेदभाव से पगी हुई ऐसी धारणाएँ अपनी प्रगाढ़ता में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हिस्सा बनने लगती हैं।

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