भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उपेक्षित दलित, आदिवासी, पिछड़, अल्पसंख्यक और महिला नायकों की शौर्यगाथा

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‘मूकनायक मीडिया स्वाधीनता संग्राम के दलित-आदिवासी-पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिला नायकों की शौर्यगाथा आप सबके समक्ष ला रहे हैं, जिन्हें इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं दिया गया है.. यदि आपके पास ऐसे गुमनाम नायकों की जानकारी है तो उसे हम तक पहुँचायें, उसे भी प्रकाशित किया जायेगा’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 25 जुलाई 2020 | जयपुर : स्वतंत्रता संग्राम के दलित नायकों की आज हम बात करेंगे। उन दलित- आदिवासियों और पिछड़ों के बारे में जिन नायकों के बारे में इतिहास मौन साढ़े हुए हैं। जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है और जिनके कारण भारत को आज स्वतंत्र भारत कहलाने का दर्जा मिला। वैसे तो कई लोगों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दिये हैं। लेकिन कुछ दलित नायक और अनुसूचित जनजाति के लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी और भारत को आजादी दिलाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मातादीन भंगी :- इन सब आंदोलन और उनसे जुड़े लोगों में मातादीन भंगी प्रेरणा के स्त्रोत हैं। मातादीन भंगी बैरकपुर की एक फैक्ट्री में कारतूस बनाए जाते थे। उसमें कई मजदूर अछूत जातियों से थे। एक दिन एक मजदूर को प्यास लगी तो उसने वहाँ खड़े सैनिक से पीने के लिए मग में पानी मांगा। लेकिन वहाँ खड़े सैनिक ने पानी देने से इनकार कर दिया। उस सैनिक का नाम मंगल पांडे जो जाति से ब्राह्मण था। जिसके बाद उस मजदूर को यह बात अपमान जनक लगी और उसने कहा कि बड़े आए ब्राह्मण के बेटे। जिन कारतूसों का तुम उपयोग करते हो, उन पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती है। जिन्हें तुम अपने दांतो से तोड़कर बंदूक में भरते हो, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ जाता है। धिक्कार है तुम्हारे ब्राह्मण होने पर इसे सुनकर सैनिकों को झटका लगा और अछूत मातादीन भंगी ने भारतीय सैनिकों की आंखें खोली और भारत की आजादी में पहली मशाल जलाई। मातादीन भंगी को 1857 क्रांति का जनक कहा जाता है। मदारी पासी :- मदारी पासी का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला हरदोई तहसील संडीला के गांव मोहनखेड़ा में 1860 में हुआ था। कोई 60 साल की उम्र में गरमपंथी मदारी पासी ने किसान निम्नवर्ग और दबे कुचले लोगों की आवाज को उठाने के लिए एक आंदोलन चलाया। मदारी पासी को केंद्र में रखकर कामनाथ ने एक उपन्यास लिखा है जिसका नाम ‘काल कथा’ है। महंगू राम :- मांगू राम कौन थे यह इतिहास नहीं जानता लेकिन 1942 की अगस्त क्रांति के बहुजन नायक महंगू राम बैलगाड़ी का एक मामूली गाड़ीवान था। महंगू राम अगस्त क्रांति के दौरान अंग्रेजों द्वारा की गयी जगदीश प्रसाद की हत्या के आक्रोश में थे। उन्होंने एक अंग्रेज सिपाही की पीट-पीटकर उसकी जान ले ली। उनके इस कारनामे से चीढ़कर अंग्रेजों ने 14 अगस्त 1942 को महंगू राम को गोली मार दी। पीतांबर और नीलांबर शाही :- पीतांबर और नीलांबर शाही 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पलामू देश का अशांत क्षेत्र था। पलामू में सबसे अधिक समय तक विद्रोह की ज्वाला धधकती रही। विरोध के दौरान पितांबर और नीलांबर शाही के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर दलित और आदिवासियों ने खुद को संगठित कर लिया था। संगठित लोगों ने अंग्रेज समर्थक रघुवर दयाल सिंह जमीदार से कड़ा मुकाबला किया। 1857 में विद्रोही ने राजहरा कंपनी पर हमला कर दिया जिससे अंग्रेजों का काफी नुकसान हुआ। चूहड़ आंदोलन :- चूहड़ आंदोलन झारखंड के आदिवासियों ने रघुनाथ महतो के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जंगल जमीन के बचाव और शोषण से मुक्ति के लिए 1759 मैं आरंभ किया था। 1759 में चूहड़ आंदोलन की चिंगारी भड़की थी। 5 अप्रैल 1778 में रघुनाथ महतो ने लोटा के जंगल में सभा की, जिसमें अंग्रेजी फौज की कार्रवाई के कारण सैकड़ों गिरफ्तार हुए। इसमें कई लोग मरे और रघुनाथ महतो शहीद हो गये। ताना भगत आंदोलन :- ताना भगत आंदोलन ताना भगत आंदोलन की शुरुआत 1914 में बिहार में हुई। इस आंदोलन को लगान में उच्च दर और चौकीदारी के विरोध में शुरु किया गया था। इस आंदोलन के प्रवर्तक जतारा भगत है। जतारा भगत के नेतृत्व में यह ऐलान हुआ कि मालगुजारी नहीं देंगे बेगारी नहीं करेंगे और कर नहीं देंगे। ताना भगत आंदोलन जैसे ही सुर्खियों में आया, अंग्रेजों ने 1914 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें डेढ़ साल की सजा दी गयी। 1940 में नागपुर में बड़ी संख्या में ताना भगत शामिल हुए थे। भिन्नता के कारण ताना भगतों की कई शाखाएं पनप गयी । उनकी प्रमुख शाखा को सदा भगता कहा जाता है। झलकारी बाई :- झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव में 22 नवंबर को हुआ था। इनका विवाह झांसी की सेना में पूरन पोली नामक सिपाही से हुआ था। विवाह पश्चात वह पूरन के साथ झांसी आ गयी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में वह महिला शाखा दल की सेनापति बनी। वह लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थी। इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वह रानी के वेश में भी युद्ध करती थी। रानी के वेश में युद्ध करते हुए वह अपने अंतिम समय में अंग्रेजों के द्वारा पकड़ी गयी और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। उस युद्ध के दौरान एक गोली झलकारी बाई को भी लगी और जय भवानी कहते हुए वह जमीन पर गिर पड़ी ऐसी महान वीरांगना थी झलकारी बाई। तिलका मांझी :- तिलका मांझी संथाल नायक तिलकामांझी ने 1779 में अंग्रेजो के खिलाफ हथियार उठाया था। जिसके बाद 1855 में संथालों ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी स्वाधीनता की। लड़ाई में 1857 की लड़ाई अहम् मानी जाती है। अंग्रेजों को इस लड़ाई में काफी नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना की याद में हर साल 30 जून को हुल क्रांति दिवस मनाया जाता है। उधम सिंह :- जलियांवाला बाग हत्याकांड का नाम सुनकर हर हिंदुस्तानी का खून खौल जाता है। लेकिन उधम सिंह ने इसका बदला अंग्रेजों की जमीन पर जाकर लिया। वह भी 21 सालों के बाद उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरसंहार के समय पंजाब के गवर्नर रहे। माइकल और डायर को उसी की सरजमीं पर जा कर गोलियों से भून डाला और भगत सिंह के अंदाज में आत्मसमर्पण कर दिया उन्होंने माइकल और डायर के अलावा किसी को निशाना नहीं बनाया। जब उनसे पूछा गया कि आपने किसी और को गोली क्यों नहीं मारी। तब उन्होंने कहा कि एक सच्चा भारतीय कभी औरतों और बच्चों पर गोली नहीं चलाता। 4 जून 1940 को इन्हें हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंट विलेज जेल में फांसी दे दी। बिरसा मुंडा :- बिरसा मुंडा का जन्म वर्तमान राज्य झारखंड में 1975 को हुआ उन्होंने यह महसूस किया कि सामाजिक कुरीतियों ने आदिवासी समाज को ज्ञान से दूर कर दिया। बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को मुक्ति दिलाने के लिए तीन स्तरों पर उन्हें संगठित किया। आदिवासियों को शिक्षा का महत्व समझाया। साथ ही सहयोग और सरकार का रास्ता दिखाया। आदिवासियों ने बेगारी प्रथा के खिलाफ जबरजस्त आंदोलन और विरोध किया। सामाजिक और व्यावहारिक चेतना आने के बाद आदिवासी राजनीति के स्तर पर सजग हो गये। ब्रिटिश हुकूमत ने बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जेल में ही 9 जून 1900 को वह शहीद हो गये। टंट्या मामा :- 1842 में मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में टंट्या मामा का जन्म हुआ जवानी में अंग्रेजों के सहयोगी साहूकारों के प्रताड़ना से तंग आकर वह अपने साथियों के साथ जंगल में चले गये माल दारों से माल लूट कर गरीबों में बांटने लगे सभी गरीबों की मदद करने की वजह से टंट्या मामा सबके लिए प्रिय बन गये 19 अक्टूबर 1890 को उन्हें फांसी की सजा सुनायी गयी जहाँ इस वीर पुरुष की समाधि बनी है वहाँ से गुजरने वाली ट्रेनें भी टंट्या मामा को सलाम करती है।

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