हिंदू कोड बिल को ईमानदारी से लागू करने से ही हिंदू धर्म का वास्तविक कल्याण होगा

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‘10 अक्टूबर 1951 को जब आंबेडकर ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया, तो इसकी वजह केवल तंगदिल ब्राह्मणवादियों द्वारा किया जा रहा हिंदू कोड बिल का विरोध नहीं था, आंबेडकर इस बात से भी क्षुब्ध थे कि पिछड़ों के लिए आयोग का गठन नहीं किया जा रहा है’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 25 जुलाई 2020 | जयपुर : ‘हिंदू कोड बिल’ का मसौदा 24 फरवरी, 1949 को संसद में पेश किया गया था। इस बिल के कई किरदार हैं जिन्होंने इसको पास करवाने और पास अन्हीं होने देने के लिए ऐढ़ी-छोटी की जोर आजमाइश की। डॉ अंबेडकर ने बिल को पास करवाने के लिए बहुत-कुछ दाव पर लगाया पर तंगदिल ब्राह्मणवादी ताकतों, डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बिल को रूकवाने में कोरकसर नहीं छोड़ी और रही- सही कसर नेहरू ने पूरी कर दी जब वे डॉ अंबेडकर का साथ छोड़कर राजेंद्रबाबु की तरफ हो गये। लेकिन, नेहरूजी ने इतना धर्म निभाया कि टुकड़ों में हिंदू कोड बिल के कुछ हिस्से पास करवा दिये। पर, देश की आधी आबादी रूपी महिलाएँ गुलामी की जंजीरों को आज तक नहीं तोड़ पायीं। स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री अंबेडकर ने भारत में सभी जातियों और धर्मों की महिलाओं को दमनकारी मानदंडों और परंपराओं से मुक्त करने के लिए हिंदू कोड बिल मसौदा लिखा था। इसमें हिंदू विधवाओं और लड़कियों को पिता की संपत्ति में पुत्र के बराबर की हिस्सेदारी, हिंदू पुरुष द्वारा उप-स्त्री रखने या पत्नी के प्रति क्रूर व्यवहार रखने या पुरुष के किसी वीभत्स बीमारी से ग्रसित होने की हालत में पत्नी को अलग होने और गुज़ारा भत्ता मिलने का अधिकार, विवाह संबंधों में किसी भी प्रकार के जातीय भेदभाव को ख़त्म करना, अमानवीय व्यवहार, विवाहेत्तर संबंध, न ठीक होने वाली बीमारी की हालत में पति-पत्नी दोनों को तलाक मिलने का अधिकार, अमानवीय व्यवहार, विवाहेत्तर संबंध, न ठीक होने वाली बीमारी की हालत में पति-पत्नी दोनों को तलाक मिलने का अधिकार, सिर्फ एक जीवनसाथी रखने की छूट, किसी अन्य जाति के बच्चे को गोद लेने का अधिकार इत्यादि के महत्वपूर्ण तथ्य शामिल थे । ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि वस्तुत: जवाहरलाल नेहरू और डॉ भीमराव अंबेडकर हिंदुस्तान में यूनिफार्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता लागू करवाना चाहते थे। जब इस मुद्दे पर बहस छिड़ी तो संविधान समिति लगभग बिखर ही गयी। ब्राह्मणवादी ताकतों ने डॉ राजेंद्र प्रसाद को चालाकी से अपने पक्ष में कर लिया और राजेंद्र बाबू ने नेहरू को अपनी ओर मोड़ लिया। किंतु , इस सबके बावजूद डॉ अंबेडकर अपने हिंदू कोड बिल को पास करवाने के अपने इरादे पर अडिग थे क्योंकि उनका मानना था कि हिंदू-समाज अन्य किसी भी बात को स्वीकार कर लेगा, लेकिन अपनी सामाजिक संरचना में शूद्रों और महिलाओं की दासता में परिवर्तन कदापि करने को तैयार नहीं होगा। और इसी वजह से शूद्रों ; दलित, आदिवासी और पिछड़ों के उत्थान के लिए कानून को प्रभावी बनाने की महती जरुरत है, तब ही हिंदू समाज आगे बढ़ सकता है। अंबेडकर ने इस हिंदू कोड बिल पर 4 साल, 1 महीने और 26 दिन काम किया। यह बिल 1947 से इसे फरवरी 1949 में संसद में पेश किया गया था। डॉ अंबेडकर एक प्रसिद्ध वकील थे। स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री के रूप में, उन्होंने हिंदू कोड बिल पर कई महीनों तक काम किया। उन्होंने महसूस किया कि महिलाओं को जाति व्यवस्था में कम आंका जा रहा है और इसके लिए हिंदू कोड बिल को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि महिलाओं को समान अधिकार मिले। डॉ अंबेडकर को इस बात की चिंता नहीं थी कि कुछ वर्ग या विशेष जाति की महिलाएँ इससे लाभान्वित होंगी। उन्हें सभी जातियों और वर्गों की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। डॉ अंबेडकर का मानना ​​था कि देश के विकास के लिए, सभी क्षेत्रों के लोगों को समानता का अधिकार होना चाहिए। स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में, डॉ अंबेडकर ने 1948 में संविधान सभा में हिंदू कोड बिल पेश किया। उन्होंने अपने बिल में महिलाओं के तलाक के साथ-साथ विधवा और बेटी को संपत्ति के अधिकार का प्रस्ताव दिया। इसमें, उन्होंने प्रस्ताव किया कि हिंदू पुरुषों और महिलाओं द्वारा प्राप्त संपत्ति को कानून द्वारा उन लोगों की संपत्ति में विभाजित किया जाना चाहिए जिन्होंने अपनी इच्छा नहीं बनाई है। यह कानून मृतक के सभी बेटे और बेटियों को समान अधिकार देता है। बिल में आठ अधिनियम शामिल हैं, जो निम्न हैं – 1) हिंदू विवाह अधिनियम 2) विशेष विवाह अधिनियम 3) दत्तक ग्रहण, अल्पायु जीवन – संरक्षण अधिनियम 4) हिंदू वारिस अधिनियम 5) कमजोर और वंचित परिवार के सदस्यों का रखरखाव अधिनियम 6) अस्वीकार्य संरक्षण अधिनियम 7) उत्तराधिकारी अधिनियम 8) हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम इस कानून ने विवाह से संबंधित प्रावधान को बदल दिया है। यह दो प्रकार के विवाह, सांस्कृतिक और कानूनी अनुमति देता है। यह हिंदू पुरुषों को एक या अधिक महिलाओं से शादी करने से रोकता है और सजा का प्रावधान करता है। इसमें हिंदू महिलाओं को तलाक का अधिकार दिया गया था। यह तथ्य सौ फीसदी सही है कि धार्मिक सुधारों का सबसे बड़ा फ़ायदा महिला वर्ग को होता है। यह बिल हिंदू धर्म से ऐसे सभी कुरीतियों को दूर कर रहा था जो परंपरा के नाम पर कुछ कट्टरपंथियों को जिंदा रखना चाहते थे। बिल का कड़ा विरोध किया गया। बिल 9 अप्रैल, 1948 को चयन समिति को भेजा गया था। डॉ अंबेडकर और नेहरू के समर्थन के सभी तर्कों के बावजूद, इसे महत्व नहीं मिला।

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