मैं हैरान हूँ – महादेवी वर्मा (इतिहास में छिपाई गई एक कविता)

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 27 जुलाई 2020 | जयपुर : ”मैं हैरान हूँ यह सोचकर , किसी औरत ने क्यों नहीं उठाई उंगली ? तुलसी दास पर, जिसने कहा , “ढोल ,गंवार ,शूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।” मैं हैरान हूँ , किसी औरत ने क्यों नहीं जलाई “मनुस्मृति” जिसने पहनाई उन्हें गुलामी की बेड़ियाँ ? मैं हैरान हूँ , किसी औरत ने क्यों नहीं धिक्कारा ? उस “राम” को जिसने गर्भवती पत्नी सीता को , परीक्षा के बाद भी निकाल दिया घर से बाहर धक्के मार कर। किसी औरत ने लानत नहीं भेजी उन सब को, जिन्होंने ” औरत को समझ कर वस्तु” लगा दिया था दाव पर होता रहा “नपुंसक” योद्धाओं के बीच समूची औरत जाति का चीरहरण ? महाभारत में ? मैं हैरान हूँ यह सोचकर , किसी औरत ने क्यों नहीं किया ? संयोगिता अंबा-अंबालिका के दिन दहाड़े, अपहरण का विरोध आज तक ! और मैं हैरान हूँ , इतना कुछ होने के बाद भी क्यों अपना “श्रद्धेय” मानकर पूजती हैं मेरी माँ – बहने उन्हें देवता – भगवान मानकर? मैं हैरान हूँ, उनकी चुप्पी देखकर इसे उनकी सहनशीलता कहूँ या अंध श्रद्धा , या फिर मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा ?”

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