जोहार-धराड़ी संरक्षण दिवस : जल, जंगल, जमीन हमारा, नहीं चलेगा राज तुम्हारा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो (न्यूज़ एजेंसियाँ) | 28 जुलाई 2020 | जयपुर : विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस प्रत्येक वर्ष 28 जुलाई को मनाया जाता है। जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है। विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जहाँ यह तीनों तत्व प्रचुर मात्रा में हों। भारत देश जंगल, वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण विश्व में बड़े ही विचित्र तथा आकर्षक वन्य जीव पाए जाते हैं। हमारे देश में भी वन्य जीवों की विभिन्न और विचित्र प्रजातियाँ पायी जाती हैं। वर्तमान परिपेक्ष्य में कई प्रजाति के जीव जंतु एवं वनस्पति विलुप्त हो रहे हैं। विलुप्त होते जीव जंतु और वनस्पति की रक्षा तथा आदिवासी भाषाओं और संस्कृतियों के संरक्षण का विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर संकल्प लेना ही इसका उद्देश्य है। 1941 की जनगणना के वक्त जनजाति और आदिवासी समुदायों की 176 भाषाएँ थीं और इनमें से केवल बोडो और संथाली को भारतीय राज्य ने मान्यता दी और वह भी साल 2004 में जाकर। आदिवासी भाषाओं का सुव्यवस्थित ढंग से अलग-थलग पड़ना भी एक साजिश के तहत हुआ है जिसके चलते आदिवासियों को अपनी भूमि और संसाधनों पर अधिकार नहीं मिल सके हैं । प्रकृति ने हमें कई उपहार जैसे हवा, पानी, भूमि, धूप, खनिज, पौधों और जानवर दिए है। प्रकृति के ये सभी तोहफ़े हमारे ग्रह को रहने लायक जगह बनाते हैं। इन में से किसी के भी बिना पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का अस्तित्व संभव नहीं होगा। अब, जबकि ये प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर प्रचुरता में मौजूद हैं, दुर्भाग्य से मानव आबादी में वृद्धि के कारण सदियों से इनमें से अधिकांश की आवश्यकता बढ़ गयी है। मुंडारी, मीणा, भीली और गोंडी जैसी प्राचीनतम भाषाओं को इनके भाषायी समुदायों ने अपनी मातृभाषा को संजो कर रखा है, इन्हें भारतीय राज्य की नीतियों में जान-बूझकर अलग-थलग और नदारद कर दी गयी थी । ‘जोहार’ (स्वागत या प्रकृति और पुरखों को आभार व्यक्त करने के लिए) जैसे की संस्कृतियों को मटियामेट करने की साजिशें हो रही हैं । भारतीय राज्य की ब्राह्मणवादी प्रकृति इस बात से पता चलती है कि महज 24000 लोगों द्वारा बोली जाने वाली ब्राह्मण समुदाय की भाषा संस्कृत आठवीं अनुसूची में शामिल है, जबकि लाखों लोगों द्वारा बोली जाने वाली आदिवासी समुदायों की भाषाएँ अब भी संवैधानिक मान्यता प्राप्त करने का इंतजार ही कर रही है । मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो भागों में बाँटा जा सकता है, जिसमें पहला है प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता के अनुसार है। इसमें से कई प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अधिक गति से किया जा रहा है जबकि उनका उत्पादन क्षमता कम है। इस प्रकार प्रकृति के संरक्षण तथा प्रकृति द्वारा उपलब्ध कराये प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की आवश्यकता है। दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति आज आदिवासियों की कब्रगाह बन चुकी है। आदिवासियों की पूरी जमीन डुबोई जा चुकी है। उनके पास रहने के लिए जगह नहीं है। गौ-रक्षा (गाय, गंगा, गणेश) की राजनीति करने वालों ने गायों के चरने की जगह का सौदा कर लिया है, ये मौत के सौदागर हैं। सब बंधुआ मजदूर की स्थिति में पहुँच चुके हैं। वे गाँव से बाहर नहीं निकल सकते। प्रकृति के संरक्षण की अहमियत बताते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने फसेबुक पर शुभकामना संदेश में कहा है कि ‘प्रकृति के संरक्षण से ही धरती पर जीवन संभव है। आज विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर हमारा संकल्प होना चाहिए कि वनस्पति की रक्षा करें, पर्यावरण को प्रदूषण से बचाएं एवं प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से बचें।’ आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा ने कहा कि राजस्थान के अरावली इलाके में हवा, पानी और हमारे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की लड़ाई चल रही है। ऐसी ही लड़ाइयाँ देश के हर कोने में चल रही हैं। हमारे पुरखों की लड़ाई के बाद जिस संविधान का निर्माण हुआ था आज पूरे देश में उसी संविधान का उल्लंघन किया जा रहा है। लेकिन इसके खिलाफ लड़ाई चल रही है। इसमें महिलाओं की एक बहुत बड़ी भूमिका है। आदिवासियों ने पिछले कई सालों से सिर्फ महिलाओं के दम पर दो गाँवों की जमीन को अधिग्रहण से बचा रखा है। उन्होंने कहा कि हमें सभी संघर्षों में भागीदारी निभानी होगी। चाहे वह कश्मीर की समस्या हो या पूर्वोत्तर की या सरदार सरोवर की, हमें हर लड़ाई में अपनी भूमिका निभानी होगी। झारखंड के आलोका कुजूर का कहना है कि पाँचवी अनुसूची को लागूकरने के बारे में कई वर्षों से जल-जंगल-जमीन का कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ संघर्ष चल रहा है। इन संघर्षों पर भीषण दमन किया जाता रहा है। लेकिन अब दमन की रणनीति भी बदल रही है। अब सरकार लाठी गोली की नहीं रह गयी है। अब यह सरकार सीधे संविधान का दुरुपयोग करते हुए संघर्षों को दबाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि झारखंड में चल रहे पत्थलगढ़ी के आंदोलन में लगभग 3,000 लोगों पर फर्जी मुकदमे लगाये जा रहे हैं। पीवीवीयू के चेंनैया गारू का कहना कि हमें आज यह निर्णय लेना होगा कि हम फासीवादियों को देश में खेलने नहीं देंगे। हम इस देश के श्रमिक हैं, हम लाभार्थी नहीं है। हम इस देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं। जो असल में लाभार्थी हैं वह वे हैं जिनका अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं है। खुद को श्रमिक के रूप में न पहचानना ही इस देश के पूँजीपतियों को फायदा पहुँचा रहा है। इसी के दम पर वह देश के श्रम कानून बदल पा रहें हैं ताकि वह मेहनत को और लूट सके। हमें इस लूट के खिलाफ एकजुटता के साथ संघर्ष खड़ा करना होगा। तब (धराड़ी ) प्रकृति का संरक्षण संभव हो सकेगा!

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