नयी शिक्षा नीति2020 A-Z : स्कूल एजुकेशन, बोर्ड एग्जाम, ग्रेजुएशन में बड़े बदलाव, सामाजिक न्याय नदारद

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 31 जुलाई 2020 | जयपुर : केंद्र सरकार ने आरएसएस के दबाव में बुधवार को नयी शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी। करीब 34 साल बाद आयी शिक्षा नीति में स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किये गये हैं। बच्चों पर से बोर्ड परीक्षा का भार कम किया जायेगा तो उच्च शिक्षा के लिए भी अब सिर्फ एक नियामक होगा। पढ़ाई बीच में छूटने पर पहले की पढ़ाई बेकार नहीं होगी। एक साल की पढ़ाई पूरी होने पर सर्टिफिकेट और दो साल की पढ़ाई पर डिप्लोमा सर्टिफिकेट दिया जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में नयी नीति पर मुहर लगायी गयी। इसमें 2030 तक प्री-प्राइमरी से लेकर उच्चतर माध्यमिक तक 100 फीसदी और उच्च शिक्षा में 50 फीसदी प्रवेश दर हासिल करने की बात कही गयी है। शिक्षा पर सरकारी खर्च 4.43 फीसदी से बढ़ाकर जीडीपी का 6 फीसदी तक करने का लक्ष्य है। 1. स्कूलों में 10+2 खत्म, अब शुरू होगा 5+3+3+4 फॉर्मेंट
अब स्कूल के पहले पाँच साल में प्री-प्राइमरी स्कूल के तीन साल और कक्षा एक और कक्षा 2 सहित फाउंडेशन स्टेज शामिल होंगे। इन पाँच सालों की पढ़ाई के लिए एक नया पाठ्यक्रम तैयार होगा। अगले तीन साल का स्टेज कक्षा 3 से 5 तक का होगा। इसके बाद 3 साल का मिडिल स्टेज आएगा यानी कक्षा 6 से 8 तक का स्टेज। अब छठी से बच्चे को प्रोफेशनल और स्किल की शिक्षा दी जायेगी। स्थानीय स्तर पर इंटर्नशिप भी करायी जायेगी। चौथा स्टेज (कक्षा 9 से 12वीं तक का) 4 साल का होगा। इसमें छात्रों को विषय चुनने की आजादी रहेगी। साइंस या गणित के साथ फैशन डिजाइनिंग भी पढ़ने की आजादी होगी। पहले कक्षा एक से 10 तक सामान्य पढ़ाई होती थी, कक्षा 11 से विषय चुन सकते थे। अभी तक सरकारी स्कूल पहली कक्षा से शुरू होते हैं। लेकिन नयी शिक्षा नीति लागू होने के बाद पहले बच्चे को पाँच साल के फाउंडेशन स्टेज से गुजरना होगा। फाउंडेशन स्टेज के आखिरी दो साल पहली कक्षा और दूसरी कक्षा के होंगे। पाँच साल के फाउंडेशन स्टेज के बाद बच्चा तीसरी कक्षा में जायेगा। यानी सरकारी स्कूलों में तीसरी कक्षा से पहले बच्चों के लिए 5 लेवल और बनेंगे। 5 + 3 + 3 + 4 के नए स्कूल एजुकेशन सिस्टम में पहले पाँच साल 3 से 8 साल के बच्चों के लिए, उसके बाद के तीन साल 8 से 11 साल के बच्चों के लिए, उसके बाद के तीन साल 11 से 14 साल के बच्चों के लिए और स्कूल में सबसे आखिर के 4 साल 14 से 18 साल के बच्चों के लिए निर्धारित किये गये हैं। 2. छठी कक्षा से रोजगारपरक शिक्षा
नयी शिक्षा नीति को अंतिम रूप देने के लिए बनाई गयी समिति का नेतृत्व कर रहे डॉ. कस्तूरीरंगन ने कहा, अब छठी कक्षा से ही बच्चे को प्रोफेशनल और स्किल की शिक्षा दी जायेगी। स्थानीय स्तर पर इंटर्नशिप भी करायी जायेगी। व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास पर जोर दिया जायेगा। नयी शिक्षा नीति बेरोजगार तैयार नहीं करेगी। स्कूल में ही बच्चे को नौकरी के जरूरी प्रोफेशनल शिक्षा दी जायेगी। 3. 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा आसान होगी
दसवीं एवं 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में बड़े बदलाव किये जायेंगे। बोर्ड परीक्षाओं के महत्व को कम किया जायेगा। कई अहम सुझाव हैं। जैसे साल में दो बार परीक्षाएँ कराना, दो हिस्सों वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) और व्याख्त्मक श्रेणियों में इन्हें विभाजित करना आदि। बोर्ड परीक्षा में मुख्य जोर ज्ञान के परीक्षण पर होगा ताकि छात्रों में रटने की प्रवृत्ति खत्म हो। यह भी पढ़ें :नयी शिक्षा नीति-3 : शिक्षा बाजार के हवाले, शिक्षा में आरक्षण ख़त्म, आरक्षण का कहीं कोई जिक्र नहीं है बोर्ड परीक्षाओं को लेकर छात्र हमेशा दबाव में रहते हैं और ज्यादा अंक लाने के चक्कर में कोचिंग पर निर्भर हो जाते हैं। लेकिन भविष्य में उन्हें इससे मुक्ति मिल सकती है। शिक्षा नीति में कहा गया है कि विभिन्न बोर्ड आने वाले समय में बोर्ड परीक्षाओं के प्रैक्टिकल मॉडल को तैयार करेंगे। जैसे वार्षिक, सेमिस्टर और मोड्यूलर बोर्ड परीक्षाएँ। नयी नीति के तहत कक्षा तीन, पाँच एवं आठवीं में भी परीक्षाएँ होगीं। जबकि 10वीं एवं 12वीं की बोर्ड परीक्षाएँ बदले स्वरूप में जारी रहेंगी। 4. 5वीं कक्षा तक मातृभाषा में पढ़ाई
नयी शिक्षा नीति में पाँचवीं तक और जहाँ तक संभव हो सके आठवीं तक मातृभाषा में ही शिक्षा उपलब्ध करायी जायेगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मातृभाषा की पहचान कैसे होगी, उसका आधार क्या होगा और पाठ्य-सामग्री कहाँ से आयेगी और कैसे तैयार होगी। 5. स्कूलों में ऐसे होगा बच्चों की परफॉर्मेंस का आकलन
बच्चों की रिपोर्ट कार्ड में बदलाव होगा। उनका तीन स्तर पर आकलन किया जायेग। एक स्वयं छात्र करेगा, दूसरा सहपाठी और तीसरा उसका शिक्षक। नेशनल एसेसमेंट सेंटर-परख बनाया जायेगा जो बच्चों के सीखने की क्षमता का समय-समय पर परीक्षण करेगा। सौ फीसदी नामांकन के जरिए पढ़ाई छोड़ चुके करीब दो करोड़ बच्चों को फिर दाखिला दिलाया जायेगा। 6. ग्रेजुएशन में 3-4 साल की डिग्री, मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम
उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे ने बताया कि नयी नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट (बहु स्तरीय प्रवेश एवं निकासी) व्यवस्था लागू किया गया है। आज की व्यवस्था में अगर चार साल इंजीनियरंग पढ़ने या छह सेमेस्टर पढ़ने के बाद किसी कारणवश आगे नहीं पढ़ पाते हैं तो कोई उपाय नहीं होता, लेकिन मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम में एक साल के बाद सर्टिफिकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और 3-4 साल के बाद डिग्री मिल जायेगी। यह छात्रों के हित में एक बड़ा फैसला है। 3 साल की डिग्री उन छात्रों के लिए है जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है और शोध में नहीं जाना है। वहीं शोध में जाने वाले छात्रों को 4 साल की डिग्री करनी होगी। 4 साल की डिग्री करने वाले स्‍टूडेंट्स एक साल में MA कर सकेंगे। नयी शिक्षा नीति के मुताबिक यदि कोई छात्र इंजीनियरिंग कोर्स को 2 वर्ष में ही छोड़ देता है तो उसे डिप्लोमा प्रदान किया जायेगा। इससे इंजीनियरिंग छात्रों को बड़ी राहत मिलेगी। पाँच साल का संयुक्त ग्रेजुएट-मास्टर कोर्स लाया जायेगा। एमफिल को खत्म किया जायेगा और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में एक साल के बाद पढ़ाई छोड़ने का विकल्प होगा। नेशनल मेंटरिंग प्लान के जरिये शिक्षकों का उन्नयन किया जायेगा। यह भी पढ़ें : नयी शिक्षा नीति-2 : UGC, AICTE और NCTE का युग खत्म, उच्च शिक्षा के लिए अब होगी एक ही रेगुलेटरी बॉडी बीएड 4 साल का होगा। 4 वर्षीय बीएड डिग्री 2030 से शिक्षक बनने की न्यूनतम योग्यता होगी। नीति के अनुसार, पेशेवर मानकों की समीक्षा एवं संशोधन 2030 में होगा और इसके बाद प्रत्येक 10 वर्ष में होगा। शिक्षकों को प्रभावकारी एवं पारदर्शी प्रक्रियाओं के जरिए भर्ती किया जायेगा। पदोन्नति योग्यता आधारित होगी। कई स्रोतों से समय-समय पर कार्य-प्रदर्शन का आकलन किया जायेगा। 7. नयी शिक्षा नीति में एमफिल खत्म
देश की नयी शिक्षा नीति लागू होने के बाद अब छात्रों को एमफिल नहीं करना होगा। एमफिल का कोर्स नयी शिक्षा नीति में निरस्त कर दिया गया है। नयी शिक्षा नीति लागू होने के बाद अब छात्र ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और उसके बाद सीधे पीएचडी करेंगे। 4 साल का ग्रेजुएशन डिग्री प्रोग्राम फिर MA और उसके बाद बिना M.Phil के सीधा PhD कर सकते हैं। नयी शिक्षा नीति के तहत एमफिल कोर्सेज को खत्म किया गया है। इसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। 8. खत्म होंगे UGC, NCTE और AICTE, बनेगी एक रेगुलेटरी बॉडी
यूजीसी एआईसीटीई का युग खत्म हो गया है। उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे ने बताया कि उच्च शिक्षा में यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई की जगह एक नियामक होगा। कॉलेजों को स्वायत्ता (ग्रेडेड ओटोनामी) देकर 15 साल में विश्वविद्यालयों से संबद्धता की प्रक्रिया को पूरी तरह से खत्म कर दिया जायेगा। 9. कॉलेजों को कॉमन एग्जाम का ऑफर
नयी शिक्षा नीति के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए कॉमन एंट्रेंस एग्जाम का ऑफर दिया जायेगा। यह संस्थान के लिए अनिवार्य नहीं होगा। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यह परीक्षा कराएगी। 10. स्कूल में प्री-प्राइमरी लेवल पर स्पेशल सिलेबस तैयार होगा
स्कूल शिक्षा सचिव अनीता करवाल ने बताया कि स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा में दस-दस बड़े सुधारों पर मुहर लगायी गयी है। नयी नीति में तकनीक के इस्तेमाल पर विशेष ध्यान दिया गया है। प्री-प्राइमरी शिक्षा के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया जायेगा। इसके तहत तीन से छह वर्ष तक की आयु के बच्चे आयेंगे। 2025 तक कक्षा तीन तक के छात्रों को मूलभूत साक्षरता तथा अंकज्ञान सुनिश्चित किया जायेगा। मिडिल कक्षाओं की पढ़ाई पूरी तरह बदल जायेगी। कक्षा छह से आठ के बीच विषयों की पढ़ाई होगी। 11. स्कूल, कॉलेजों की फीस पर नियंत्रण के लिए तंत्र बनेगा
उच्च शिक्षण संस्थानों को ऑनलाइन स्वत: घोषणा के आधार पर मंजूरी मिलेगी। मौजूदा इंस्पेक्टर राज खत्म होगा। अभी केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय और प्राइवेट विश्वविद्यालय के लिए अलग-अलग नियम हैं। भविष्य में सभी नियम एक समान बनाए जायेंगे। फीस पर नियंत्रण का भी एक तंत्र तैयार किया जायेगा। 12. नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की तैयारी
सभी तरह के वैज्ञानिक एवं सामाजिक अनुसंधानों को नेशनल रिसर्च फाउंडेशन बनाकर नियंत्रित किया जायेगा। उच्च शिक्षण संस्थानों को बहु विषयक संस्थानों में बदला जायेगा। 2030 तक हर जिले में या उसके आसपास एक उच्च शिक्षण संस्थान होगा। शिक्षा में तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। इनमें आनलाइन शिक्षा का क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेट तैयार करना, वर्चुअल लैब, डिजिटल लाइब्रेरी, स्कूलों, शिक्षकों और छात्रों को डिजिट संसाधनों से लैस कराने जैसी योजनाएँ शामिल हैं। 13. स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा के साथ कृषि शिक्षा, कानूनी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसी व्यावसायिक शिक्षा भी नयी शिक्षा नीति के दायरे में होगा। यह भी पढ़ें : नयी शिक्षा नीति 2020 : 10+2 व्यवस्था ख़त्म, मातृभाषा होगी शिक्षा का माध्यम, निजीकरण पर रहेगा जोर 14. कला, संगीत, शिल्प, खेल, योग, सामुदायिक सेवा जैसे सभी विषयों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जायेगा। इन्हें सहायक पाठ्यक्रम नहीं कहा जायेगा। 15. ऑनलाइन एजुकेशन पर जोर
नए सुधारों में टेक्नोलॉजी और ऑनलाइन एजुकेशन पर जोर दिया गया है। कंप्यूटर, लैपटॉप और फोन इत्यादि के जरिए विभिन्न ऐप का इस्तेमाल करके शिक्षण को रोचक बनाने की बात कही गयी है। 16. हर जिले में कला, करियर और खेल-संबंधी गतिविधियों में भाग लेने के लिए एक विशेष बोर्डिंग स्कूल के रूप में ‘बाल भवन’ स्थापित किया जायेगा 17. अभी हमारे यहाँ डीम्ड यूनविर्सिटी, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज और स्टैंडअलोन इंस्टिट्यूशंस के लिए अलग-अलग नियम हैं। नयी एजुकेशन पॉलिसी के तहते सभी के लिए नियम समान होगा। 18. एमएचआरडी का नाम बदला
मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। 19. त्रि-भाषा फॉर्मूला
विद्यार्थियों को स्कूल के सभी स्तरों और उच्च शिक्षा में संस्कृत को एक विकल्प के रूप में चुनने का अवसर दिया जायेगा। त्रि-भाषा फॉर्मूला में भी यह विकल्‍प शामिल होगा। इसके मुताबिक, किसी भी विद्यार्थी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जायेगी। भारत की अन्य पारंपरिक भाषाएँ और साहित्य भी विकल्प के रूप में उपलब्ध होंगे। विद्यार्थियों को ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत पहल के तहत 6-8 ग्रेड के दौरान किसी समय ‘भारत की भाषाओं पर एक आनंददायक परियोजना / गतिविधि में भाग लेना होगा। कोरियाई, थाई, फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश, पुर्तगाली, रूसी भाषाओं को माध्यमिक स्तर पर पेश किया जायेगा । 20. विदेशी यूनिवर्सिटी को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति और स्कॉलरशिप पोर्टल का विस्तार नयी शिक्षा नीति में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति मिलेगी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे भारत के स्टूडेंट्स विश्व के बेस्ट इंस्टीट्यूट व यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले सकेंगे। उन्हें विदेश नहीं जाना पड़ेगा। एससी, एसटी, ओबीसी और एसईडीजीएस स्टूडेंट्स के लिए नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल को बढ़ाया जायेगा। एनयीपी 2020 के तहत स्कूल से दूर रह रहे लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्य धारा में वापस लाया जायेगा। 21. नयी शिक्षा नीति एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के लिए गलघोटू बीमारी नयी शिक्षा नीति में संवैधानिक आरक्षण के लिए कब्रगाह बनेगी। यह आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को उच्च शिक्षा में आने से रोकती है। स्थायी नियुक्ति प्रक्रिया के बाद 1 साल का प्रोबेशन का कार्यकाल होता था, उसे अब नयी शिक्षा नीति में 5 वर्ष का कर दिया गया है। एक तरफ यह शिक्षक विरोधी नीति का एक उदाहरण है, वहीं दूसरी इसमें संस्था के प्रिंसिपल और वाइस चांसलर के हस्तक्षेप पूरी रहेगा कि वो किसे प्रोबेशन पीरियड के बाद स्थायी नियुक्ति दे या फिर 5 साल के लिए प्रोबेशन पीरियड में रखे। और यह आरक्षित-वर्गों और महिलाओं के लिए सर्वाधिक नुकसानदायक होगा, जो शिक्षा में गलघोटू बीमारी बनकर सामने आयेगा। 22. यही नहीं इसके आगे के नियम और भी खतरनाक है। इसके तहत हर पाँच साल के बाद शिक्षकों के असेसमेंट की प्रक्रिया बनायी गयी है जिसमें प्रिंसिपल के पास शिक्षक की पदोन्नति का एकाधिकार होगा। इससे मनमानी की संभावना बढ़ेगी। अभी तक विश्वविद्यालय / कॉलेज की स्थिति ये है कि वो अपने शिक्षण कार्य के लिए स्थायी नियुक्ति के बाद पूर्णतः स्वतंत्र होता है। यह भी पढ़ें : NEP20 : उच्चशिक्षा में आरक्षण आउट,विदेशी विश्वविद्यालय इन,रिजर्वेशन ख़त्म करने की आरएसएस की मंशा पूरी 23. अब नयी शिक्षा नीति में वह प्रिंसिपल के दबाव में रहकर कार्य करेगा जो उच्च शिक्षा की प्रकृति के विरुद्ध है। इसमें दलित व पिछड़े वर्ग के शिक्षक भेदभाव के कारण हमेशा प्रिंसिपल के निशाने पर रहेंगे। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह से सरकार स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया को 5-5 साल के असेसमेंट में बांधकर उसकी प्रकृति को खत्म कर देना चाहती है। इससे शिक्षक गुलाम की तरह हो जायेगा जहाँ शिक्षण कार्य पूरी तरह प्रभावित होगा। 24. इसके अतिरिक्त कार्य-आधारित वेतनमान की नीति शैक्षिक संस्थानों में चापलूसी की संस्कृति को बढ़ावा देगी। स्वाभिमानी और खुद्दार शिक्षकों का एक पैर शिक्षण-संस्थान में होगा और दूसरा न्यायालयों में न्याय की भीख माँगता फिरेगा। इसमें सर्वाधिक खामियाजा अरक्षित-वर्गों को भुगतना पड़ेगा। वहीं, निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों में सरकार संस्थानों से अधिक वेतन पर बुलाकर यदि योग्य शिक्षकों को रखा जायेगा तो स्वाभाविक है कि सरकारी संस्थान की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगेगा। 25. भारतीय जातिवादी समाज में बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स की व्यवस्था पूर्णत: आरक्षित-वर्गों के खिलाफ रहेगी इसमें कोई भी दोराय नहीं होनी चाहिए। यह व्यवस्था ‘पिक एंड चूज’ और ‘डिवाइड एंड रूल’ के सिद्धांतों की पैरोकार रहेगी इसमें तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए। यह भी पढ़ें : नयी उच्च शिक्षा नीति-2020 : दलित, आदिवासी और पिछड़ा विरोधी, जानें कैसे

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