शिक्षा नीति का नया अध्याय : आरक्षण का खात्मा, आरक्षितों की उच्च शिक्षा की पढ़ाई व नौकरी से बेदखली

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‘मोदी सरकार की नयी शिक्षा नीति 2020 से आरक्षण ख़त्म, आरक्षित-वर्गों व मज़दूरों के बच्चे पठन-पाठन हेतु यूनिवर्सिटी का मुँह नहीं देख सकेंगे, यूजीसी ख़त्म, होने से शिक्षा व्यवस्था बाज़ार के हवाले, कॉरपोरेट्स तय करेंगे शिक्षा का भविष्य ‘ मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 31 जुलाई 2020 | जयपुर : नयी शिक्षा नीति 2020 के 60 पेजों के नीति-प्रपत्र (Policy Documents) में एक बार भी आरक्षण शब्द का इस्तेमाल हुआ है और ना ही कहीं सामाजिक न्याय की संकल्पना दूर-दूर तक दिखलायी पड़ती है। मतलब साफ है शिक्षा से प्रवेश-प्रक्रिया और सर्विसेज दोनों से आरक्षण ख़त्म करने की बू आ रही है। रही-सही कसर ‘बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स’ की व्यवस्था पूरी कर देगी जो जातिवादी समाज के इशारों पर अपने करतब दिखायेंगे और ‘बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स’ की व्यवस्था पूर्णत: आरक्षित-वर्गों के खिलाफ रहेगी, इसमें कोई भी दोराय नहीं होनी चाहिए। यह व्यवस्था ‘पिक एंड चूज’ और ‘डिवाइड एंड रूल’ के सिद्धांतों की पैरोकार रहेगी इसमें तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए। यही नहीं इसके आगे के नियम और भी खतरनाक है। इसके तहत हर पाँच साल के बाद शिक्षकों के असेसमेंट की प्रक्रिया बनायी गयी है जिसमें प्रिंसिपल और कुलपतियों के पास शिक्षक की पदोन्नति का एकाधिकार होगा। इससे चयन में मनमानी की संभावना बढ़ेगी। अभी तक विश्वविद्यालय / कॉलेज की स्थिति ये है कि वो अपने शिक्षण कार्य के लिए स्थायी नियुक्ति के बाद पूर्णतः स्वतंत्र होता है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि संपूर्ण शिक्षा नीति में सृजित पद अस्थाई और अस्थिरता की प्रकृति होंगे जिनको हर पाँचवे साल पुनर्स्थापित / पुनर्संयोजित किये जायेंगे। ऐसे में अकादमिक पदों पर आरक्षण की संभावना नगण्य है। नयी शिक्षा नीति पर सरसरी निगाह डालने से पता चलता है कि देश में रही सही सरकारी शिक्षा को मोदी सरकार ने पूंजीपतियों के हवाले करने की ठान ली है। दरअसल यही वो पड़ाव हैं जहाँ से शिक्षा के बाज़ारीकरण और शिक्षा में विभाजन का सिलसिला शुरू होता है। सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अनुदान और मेधावी बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए वजीफ़ा देने वाले यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) को ख़त्म करने की घोषणा की है। सारी फंडिंग अब केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय करेगा, अब मुँह देखकर तिलक किये जायेंगे। ठीक वैसे ही जैसे जिओ यूनिवर्सिटी बनाने से पहले ही उसे 1000 करोड़ आवंटित किये गये जबकि तब उसकी नींव भी नहीं पड़ी थी। छंटनी और वीआरएस के माध्यम से सैलरी में भारी कमी लाने की कारगुजारियों के बाद मोदी सरकार ने नयी शिक्षा नीति 2020 का ऐलान कर मज़दूरों के बच्चों का यूनिवर्सिटी कॉलेजों में दाखिले का रास्ता भी रोक दिया। कोरोना की आड़ में स्कूल, कॉलेजों के 31 अगस्त तक बंद कर दिया गया ताकि नयी शिक्षा नीति का कोई विरोध प्रदर्शन न हो सके। इस नीति में मातृभाषा में पाँचवीं कक्षा तक पढ़ाई का लॉलीपॉप देकर, मोदी सरकार ने बीए को चार साल का कर दिया है। एक नज़र नयी नीति पर उच्च शिक्षा को तीन स्तर – रिसर्च यूनिवर्सिटी, टीचिंग यूनिवर्सिटी और डिग्री कॉलेज में बांटा जायेगा। साल 2035 तक यानी अगले 15 सालों में कॉलेजों का विश्विद्यालयों से संबंद्धता (अफिलियेशन) को ख़त्म कर दिया जायेगा। इसका मतलब ये है हुआ कि कॉलेज अनाप शनाप फीस बढ़ाकर अपना फंड खुद इकट्ठा करेंगे। देश में उच्च शिक्षा के 50,000 सरकारी संस्थानों को प्राईवेट कंपनियों के साथ मर्जर, क्लोजर और टेक ओवर की नीति के जरिये बेच दिया जायेगा और सिर्फ 15,000 सरकारी संस्थान बचेंगे। 3000 छात्रों से कम दाखिले वाले कलेजों को बंद कर दिया जायेगा। IIT/IIM/IIMC जैसे विशिष्ट संस्थानों को या तो बंद कर दिया जायेगा या उनमें विशिष्ट विषयों के अलावा सारे विषय पढ़ाये जायेंगे। सरकार हर सरकारी विश्वविद्यालय, कॉलेज, शिक्षण संस्थान को फंड नहीं देगी, उन्हें अपनी व्यवस्था खुद करनी होगी, चाहे वो अपनी ज़मीन बेचे, लोन ले या फ़ीस बढ़ाये। यानी सरकार अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से मुक्त। प्रत्येक सरकारी संस्थान बोर्ड ऑफ गवर्नर के हवाले होगा। वही पैसे के जुगाड़ से लेकर, शिक्षकों वेतन-भत्ते आदि पर फैसला लेगा। यानी संस्थान को सरकार की कठपुतली किसी व्यक्ति की तानाशाही के हवाले कर दिया जायेगा। बीए/बीएससी चार साल का होगा और एमफ़िल को ख़त्म कर दिया जायेगा। पीएचडी के लिए 4 साल की बीए डिग्री काफी होगी। अच्छी नौकरियों के लिए कम से कम बीए डिग्री ज़रूरी होती है। इसे चार साल का करने से मज़दूरों के बच्चे बाहर हो जायेंगे। मानव संसाधन मंत्रालय ख़त्म कर राष्ट्रीय शिक्षा आयोग बनेगा और नेशनल हायर एजुकेशन रिसर्च अथॉरिटी बनाई जायेगी यानी पूरी शिक्षा व्यवस्था अब प्राईवेट कंपनियों के हवाले होगी। शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है जबकि ये 1986 में ये लक्ष्य 10% था। शिक्षा नीति के बाज़ारीकरण से किसको फायदा? मीडिया और न्यूज़ चैनलों में इसे लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे ये कोई मोदी सरकार का ऐतिहासिक कदम है जिससे ग़रीब अमीर के बच्चे एक साथ शिक्षा पा सकेंगे। लेकिन शिक्षा जगत के विशेषज्ञ बताते हैं कि सरकार उच्च शिक्षा को भी बेच खाने की नीति पर चल रही है। कहने का तात्पर्य हैं कि नयी शिक्षा नीति में बाज़ारीकरण इतना इतना जोर दिया गया है कि आम आदमी के लिए उत्तम शिक्षा पाना दुर्लभ हो जायेगा । सरकारी शिक्षण संस्थान घटेंगे, ऑटोनॉमी से शिक्षा महँगी होगी, सरकारी हस्तक्षेप बढ़ेगा, भाषा और सामाजिक विज्ञान के विषयों की बाजार में मांग न होने से इन पर संकट बढ़ेगा। प्रोफेशनल कोर्सेज के संस्थान बंद होंगे और खिचड़ी संस्थान बनेंगे। इसका मतलब ये हुआ कि अब भारतीय उद्योगपतियों को स्किल्ड लेबर की ज़रूरत नहीं रही। बढ़ते ऑटोमेशन के ज़माने में उन्हें एक अनपढ़ व्यक्ति को मशीन के एक पुर्जे की तरह इस्तेमाल करना है। स्थायी नौकरी अब गुज़रे वक्त की बात होगी, एक पद पर नियुक्ति में अलग – अलग वेतन होगा। प्रमोशन बोर्ड ऑफ़ गवर्नर देगा और कार्य दक्षता का मूल्यांकन भी वही करेगा। सरकार के ख़िलाफ़ बोलना मोदी सरकार में पहले ही अपराध बना दिया गया है, इस नीति के लागू होने के बाद नौकरी से हाथ धोना आम बात हो जायेगी। महँगी शिक्षा के कारण बेदखली बढ़ेगी और आरक्षण का कहीं कोई जिक्र नहीं हैं तो आदिवासी, दलित और पिछड़ा तबका अब कभी किसी विश्वविद्यालय में न पढ़ पायेगा, न पढ़ा पायेगा।

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