व्यक्तित्व : आधुनिक अंबेडकर थे कांशीराम, कांशीराम न होते तो उत्तर भारत अंबेडकर से अपरिचित रह जाता

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 02 अगस्त 2020 | जयपुर : उत्तर भारत में दलित राजनीति के उभार का श्रेय कांशीराम को जाता है। वो आंबेडकर नहीं थे तो आंबेडकर से कम भी नहीं थे दलितों के लिए। उत्तर भारत में जिस सामाजिक परिवर्तन का सपना बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने देखा था, कांशीराम ने उसे अमली जामा पहनाया। कौन नहीं जानता है कि पूर्व पीएम वीपी सिंह की चूलें हिला दी थीं कांशीराम ने। 1988 वी पी सिंह एक बागी नेता थे, उन्होंने राजीव गाँधी की चूलें हिला दी थी, बोफोर्स काण्ड (20शताब्दी का सबसे बड़ा राजनीतिक बल्फ) को एक्सपोज़ कर के। ना केवल राजीव बल्कि पूरा देश और पूरी दुनिया इंतज़ार में थी कि वी पी सिंह क्या करेंगे राजीव का अगर सत्ता में आ गये तो ! देश-दुनिया से झूठ बोलकर वीपी सिंह ने जैसे-तैसे सत्ता तो हथियाली, पर देश से देश का सुनहरा भविष्य छीन लिया, राजीव के रूप में ! चौधरी देवी लाल को पीएम पद पसंद नहीं था, तो उन्होंने पीएम पद का सजा हुआ थाल पीवी सिंह की ओर सरका दिया। यह सब राजनीतिक चक्कलस यूँ सजी कि उस समय अगला लोकसभा इलेक्शन साल डेढ़ साल दूर था, लेकिन चूंकि वी पी सिंह ने लोकसभा से इस्तीफ़ा दे दिया तो तब री-इलेक्शन होना था इलाहाबाद सीट पर। कांग्रेस भी तैयार थी वी पी सिंह को हराने के लिए, उन्होंने पूर्व प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे को टिकट दे दी थी वी पी सिंह के खिलाफ। यह भी पढ़ें : सार्वकालिक है डॉ भीमराव अंबेडकर : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना सबका यह कयास था कि टक्कर इन्ही दोनों में ही होनी थी, और दांव पर थी हिंदुस्तान की सत्ता। शास्त्री के बेटे जीतते तो वी पी सिंह की कहानी ख़त्म थी, पब्लिक में जो विद्रोह और जोश भरा हुआ था वो ठंडा हो लेता, और वी पी जीतते तो वो हीरो बनने तय थे, एक जायंट किलर की तरह ! यानी दोनों ही तरफ बाहुबल और पैसे और पब्लिक सपोर्ट से लबरेज नेता लड़ रहे थे। मगर, यह कयास कोई भी नहीं लगा पा रहा था कि राजनीति का असली ट्विस्ट अभी शेष था और वह लड़ाई अब त्रिकोणीय होने वाली थी। पंजाब का एक दलित नेता भी इस मैदान में कूदने वाला था, उस नेता का नाम था कांशी राम ! कांशीराम कई साल से देश में घूम रहे थे अपने मिशन को लेकर, लेकिन उन्हें अभी तक राजनितिक कामयाबी नहीं मिल पायी थी। और उनका मिशन क्या था ? कांशी राम असल में एक बागी दलित नेता थे। उस समय तक की दलित पॉलिटिक्स कांग्रेस और उस से जुड़े कुछ दलों के आसपास चलती थी। लेकिन ये बात कांशीराम को पसंद नहीं थी। कांशीराम ने ऐसी राजनीति करने वाले जगजीवन राम और पासवान दोनों को चमचा बोला था। उन्होंने एक किताब लिखी थी “द चमचा युग” जिसमें उन्होंने पूर्व में हुए सभी दलित नेताओं की धज्जियाँ उड़ा रखी थी। कांशीराम की फिलोसोफी थी के ऐसे नेताओं के पिछलग्गू बने रहने से दलितों को कभी सत्ता हासिल नहीं होनी और न आज तक हासिल हुई है। यह भी पढ़ें : अछूत समाज की कलियाँ बहुत कम समय में अंकुरित होने लगीं ‘मनोगत’ उनका तर्क था कि दलित-आदिवासियों के सिवाय अन्य समुदायों के साथ जातीय हिंसा नहीं होती है, क्योंकि उनमें समय-समय पर नेतृत्व उभरता रहता है और सत्ता हासिल होती रहती है, जबकि दलितों और आदिवासियों में कभी सत्ता नहीं आती इसलिए उनके साथ जातीय हिंसा होती है । कांशीराम कितने दबंग नेता थे, ये आजकल के युवा कम ही जानते होंगे, क्योंकि दलित-आदिवासी विचार-शून्य समुदाय है ! कांशी राम ने कहा था कि अगर सवर्ण-समाज उनको बैलेट से सत्ता नहीं लेने देगा तो दलित-आदिवासी बुलेट से ले लेंगे ! ऐसा बयान देने की हिम्मत उनके अलावा आज़ाद हिंदुस्तान के इतिहास में दो ही और लोग कर पाये थे, एक थे पंजाब के जरनैल सिंह भिंडरावाले, और दूसरे थे गोरखालैंड मूवमेंट वाले सुभाष घीसिंग। कांशीराम का नारा था की “वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा !” और “ मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गये, जय श्रीराम!” कांशीराम के आप कोई भी बयान देख लीजिये, या उनका विजन और एटिट्युड, आपको किसी दबंग से कम नहीं लगेंगे वो, और दबंग थे भी वो, हर नेता को उसके मुंह पर औकात बता देते थे उसकी, और पत्रकारों को गाली से लेकर थप्पड़ तक सब रसीद कर चुके थे। कांशी राम ने दलितों और ओबीसी को साथ लाने का नारा दिया था कि 85% पापुलेशन अगर सत्ता नहीं ले सकती तो उन्हें डूब मरना चाहिए। उनसे जब पूछा गया कि पैसा कहाँ से आएगा सत्ता परिवर्तन के लिए तो उनका जवाब था। 85% लोग अगर एक एक रुपया भी देंगे तो गिनों कितने हो जाएंगे !” ये भी पढ़ें : ब्राह्मणवाद और अंबेडकरवाद भारतीय चिंतन परंपरा के दो अलग ध्रुव हैं, इनमें से एक घटेगा तो दूसरा बढ़ेगा कांशी राम से जब एक पत्रकार ने पूछा के दलित परिवार में पैदा होकर आप में इस तरह का मिलिट्री वाला और दबंगई वाला एटिट्युड कैसे रखते है ? उनसे पहले के किसी दलित नेता में ये एटिट्युड नहीं था। उनके विरोधी उन्हें फासिस्ट और जातिवादी बुलाते थे, लेकिन कांशीराम विरोधियों को तनिक भी तवज्जो नहीं देते थे। उस सवाल का उन्होंने जवाब दिया था कि उनका परिवार कई पीढ़ी से फौज में है, उनके 8 पूर्वंज पहले विश्व युद्ध में लडे, और दो दूसरे विश्व युद्ध में लड़े थे, और हमेशा से लड़ते आये हैं, उनके दो भाई पैराकमाँडो थे जो कि ऑपरेशन ब्लू स्टार में शहीद हो गये थे। और कांशीराम खुद डिफेंस मिनिस्ट्री में कार्यरत थे। और डिफेन्स मिनिस्ट्री में भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट में, और रिसर्च एंड डेवलपमेंट में भी उच्च विस्फोटक की रिसर्च एंड डेवलपमेंट में ! उन के परिवार को लड़ने से या भिड़ने से कभी परहेज नहीं रहा था। और कांशीराम की कद काठी देख के कोई भी कह सकता है कि कांशीराम जवानी में अच्छे दबंग व्यक्ति रहे होंगे। लेकिन वो अब 54 साल के हो चुके थे। क्या वो अब भी वही वॉरियर एटिट्युड वाले होंगे ? और खासकर क्या वो देश के शायद सबसे हाई प्रोफाइल इलेक्शन में कुछ भी असर डाल पायेंगे ? इलाहबाद की सीट पर 1/3 वोटर दलित थे। कांशीराम को बस उन्हें जगाना था। तो कांशीराम ने साइकिल के जरिये घर घर जाकर प्रचार किया, और ‘हर दलित परिवार से एक रुपया चंदा माँगा’ उनका कहना था कि “मुझे फर्क नहीं पड़ता की आप मुझे कितने पैसे दे रहे हो, लेकिन चाहे मुझे आप 1 भी रुपया दो, लेकिन वो एक रुपया दिल से देना, और अगर आपने मुझे वो 1 रुपया दे दिया, तो दूसरा जो भी कैंडिडेट वोट माँगने आये तो उसके चप्पल फेंककर मारनी है !” कांशीराम शास्त्री के बेटे और वी पी सिंह पर चप्पल फिंकवाना चाहते थे दलित बस्तियों में !
उनका तर्क था कि क्या दूसरी जातियों वाले तुम्हे वोट देंगे ? क्या तुम उनके मोहल्ले में वोट भी माँगने जा सकते हो ? अगर नहीं तो उन्हें भी क्यों आने दे रहे हो ? और वो युद्धकला इत्यादि में कितने महारत रखते थे वो ऐसे देखिये कि उन्होंने ये इलेक्शन लड़ा कैसे था ! उन्होंने इलेक्शन मिलिट्री स्ट्रेटेजी से लड़ा था। उन्होंने ना केवल विरोधियों के दलित इलाकों में घुसने पर हंगामे की हालात पैदा कर दी थी, बल्कि उन्होंने पूरा सेटअप ही मिलिट्री वाला लगा दिया था। एक होटल में उन्होंने 6 कमरे ले रखे थे, जिस से कण्ट्रोल रूम में सारी इनफार्मेशन पास हुआ करती थी। कण्ट्रोल रूम था उनके फॉलोअर जंग बहादुर पटेल का घर। पूरी कोंस्टीटूएंसी को पांच गैरिसन में बांटा हुआ था, हरेक में अपनी अलग गाड़ियों की स्कूटरों की साइकिल की सेना। उन्होंने पंजाब के लंगर के कांसेप्ट को लागू किया था सभी पांच जगहों पर, और ये लंगर लोगों से लिए चंदे से ही लगाये गये थे। ये भी पढ़ें : मूकनायक : डॉ अंबेडकर-मिशन की बुलंद आवाज का दस्तावेज इसके साथ ही उन्होंने अपनी टीम को 7 स्पेशल फोर्सेज में बांटा हुआ था, जिनको लोगों को चैनेलाइज करने का जिम्मा दिया हुआ था। एक पेंटिंग स्क्वाड था, जिसका काम था पूरी कोंस्टीटूएंसी में नीले हाथी की दीवारों पर पेंटिंग बनानी ! एक इंटेलिजेंस स्क्वाड था जिसे अपने इलाके की पूरी इंटेलिजेंस कण्ट्रोल रूम तक पहुंचानी होती थी। इस इंटेलिजेंस स्क्वाड को लीड करने के लिए उन्होंने दलितों के रिटायर्ड IB और RAW के अफसर चुने हुए थे ! उन्हें वी पी सिंह और शास्त्री के कैम्पस में क्या चल रहा है वो भी इनफार्मेशन इकट्ठी करनी होती थी, किस घर में पैसा पहुंचाया जा रहा है सब कुछ। इसके अलावा एक चुटकुला स्क्वाड था, जिन्हें कुछ वी पी और राजीव पर बनाये चुटकुले अपने मोहल्लों में पॉपुलर करने थे ! ये चुटकुले पूरे चुनाव में बनते रहे थे ! और ये सब तैयारी इसलिए करनी पड़ रही थी, क्यूंकि शास्त्री के बेटे सत्ता में थे, जबकि वी पी उस समय देश के दिल की धड़कन थे। जरा भी कमज़ोर दिखाते और कांशीराम की एक भी वोट नहीं आनी थी ! अब कांशी राम को पैसा क्यों नहीं चाहिए था ? क्यूंकि कांशीराम को दलित सरकारी अफसरों से ढेर सारा चंदा पहले से मिलता रहा था, वो देश के सभी दलितों के मसीहा बनकर उभर रहे थे, उस दौर में। और उनके आक्रामक तेवर जातीय प्रताड़ना से जूझ रहे युवाओं के लिए अमृत का काम किया करते थे, बहुत लोगों में विश्वास आने लग गया था कि हमने लड़ना है, जीतना है। कांशीराम कागज़ पर बहुजन नॉट छापते थे और दलित अफसरों को देते थे, और उसके बदले में अफसर उन्हें असली नोट देते थे। उस समय के नोट आज भी बहुत रिटायर्ड अफसरों ने सहेज कर रखे हुए हैं, चाहे वो आज बसपा में हो या कहीं और, कांशीराम के वो नोट और कांशीराम उनके दिल के टुकड़ों की तरह है। यह भी पढ़ें : मूकनायक शताब्दी वर्ष : ‘मूक’ समाज को आवाज देकर डॉ अंबेडकर कैसे बने ‘नायक’ कांशीराम ने कहा कि मैं वी पी सिंह की इज्जत करता हूँ, वो अच्छे नेता हैं, लेकिन मेरी लड़ाई उनसे नहीं है, मेरी लड़ाई कुछ और है, अलग स्केल पर है, अलग लड़ाई है। कांशीराम वो इलेक्शन हार गये, तीसरे नंबर पर रहे। वी पी सिंह चुनाव जीत गये थे। लेकिन पता है उन्हें वोट कितने मिले थे ? 70 हज़ार ! ये 70 हज़ार वोट आज बसपा को मिलने वाले करोड़ों वोट से बहुत बहुत ज्यादा हैं। इन 70 हज़ार वोट का एक एक वोट एक एक कहानी छुपाये है अपने अंदर। एक क्रांति की कहानी, एक विद्रोह की कहानी, किसी के दर्द की कहानी, किसी के मरहम की। और कांशीराम का ये इलेक्शन बेकार नहीं गया। क्यूंकि अगले ही साल हुए लोकसभा चुनाव में वो इटावा लोकसभा सीट से चुनाव जीत गये थे! इसके बाद उन्होंने 1993 में मुलायम की सरकार बनवाकर संघियों को बाबरी के बाद यूपी में जीतने से रोका था। और फिर 1995 में एक दलित लड़की बहिनजी को मुख्यमंत्री बनवाकर उन्होंने अपना और करोड़ों दलितों का सपना पूरा किया था। हालांकि उसके बाद वो ज्यादा राजनीति में सक्रिय नहीं रहे, लेकिन उनकी लिगेसी हमेशा-हमेशा के लिए कायम हो चुकी थी। आप तय करें ‘आप किधर हैं? सबसे बड़ा सच यह है कि उत्तर भारत में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों की मज़बूत आवाज़ बनकर उभरे कांशीराम कांशीराम के अनुसार भारत में लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलने की कोशिश हो रही है, जहां क़ानून के शासन की जगह भीड़ शासन करने लगती है। भीड़ का शासन ही फ़ासीवाद का मूल है। भीड़ के शासन में संवैधानिक लोकतंत्र का कोई मायने नहीं रह जाता। ग्रीक दार्शनिक प्लेटो की लोकतंत्र की आलोचना को आधार बनकर कांशीराम बताते हैं कि जब भीड़ शासन करने लगती है, तो लोकतंत्र सबसे ख़राब शासन प्रणाली बन जाता है। दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को खुद को ऐसी भीड़ बनने-बनानेवाले से रोकना होगा! (आउटकास्ट वेबसाइट से इनपुट साभार)

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