
मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 10 अगस्त 2024 | जयपुर : बांसवाड़ा में विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी परिवार संस्था की ओर से जिला स्तरीय कार्यक्रम खेल मैदान में आयोजित किया गया। बारिश के कारण कार्यक्रम 3 घंटे देरी से शुरू हुआ। इसके बावजूद बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग पहुंचे। लोग आदिवासी लोकगीत गाते, नाचते हुए पारंपरिक वेशभूषा में आए। कुछ युवाओं ने हाथ में तीर-कमान ले रखे थे।
‘होली-दीवाली से भी बड़ा त्योहार है आदिवासी दिवस’ सांसद राजकुमार रोत
सांसद राजकुमार रोत ने कहा- आदिवासी दिवस हमारे त्योहारों होली-दिवाली से भी बड़ा त्योहार है। हमारे इलाके में 2015 से संगठन ने काम किया। संघर्ष किया। 2015 तक यह दिवस भारत के किसी भी कोने में नहीं मनाया जाता था। बारिश के कारण कार्यक्रम 3 घंटे देरी से शुरू हुआ। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।

आदिवासी परिवार संगठन ने आदिवासी दिवस बनाने की शुरुआत की। डूंगरपुर जिले में हमने 2016 में आदिवासी दिवस मनाने के लिए प्रशासन से मैदान मांगा। लेकिन प्रसाशन ने कहा कि ये दिवस नहीं मना सकते। इसके बाद हमने गोकुलपुरा में निजी जमीन पर आदिवासी दिवस मनाया।
कार्यक्रम में मंच से संबोधित करते सांसद राजकुमार रोत। विश्व आदिवासी दिवस पर शुक्रवार को बांसवाड़ा में सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि भील प्रदेश जरूर बनेगा। बीते 5 साल में देशभर में सरकारी प्रोजेक्ट, गोल्ड माइन, टाइगर प्रोजेक्ट, पावर प्लांट के कारण साढ़े 4 लाख आदिवासियों को पलायन करना पड़ा है। यह सरकारी आंकड़ा है।
बांसवाड़ा के खेल मैदान में विशाल पंडाल लगाया गया। बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग पहुंचे। दोपहर 2 बजे बांसवाड़ा-डूंगरपुर सांसद राजकुमार रोत कार्यक्रम स्थल पहुंचे। सासंद का मंच पर पड़गी पहनाकर स्वागत किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत असम के सांस्कृतिक दल से प्रस्तुति देकर की।
सांसद राजकुमार ने कहा कि असम की कल्चरल टीम को डीजे की जरूरत नहीं पड़ती। यही आदिवासी कल्चर है। कार्यक्रम में असम से आदि कलाकारों ने दल ने सांस्कृतिक प्रस्तुति दी।
सांसद ने बताया- UNO ने क्यों घोषित किया विश्व आदिवासी दिवस
सांसद रोत ने कहा- विश्व आदिवासी दिवस घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने 1994 में की थी। उस वक्त मैं दो साल का था। यूएनओ ने इस दिवस की घोषणा इसलिए की क्योंकि पूरी दुनिया में आदिवासी समुदायों, जल जंगल जमीन, आदिवासी संस्कृति, आदिवासी धर्म-परंपराओं और रीति रिवाज को खत्म किया जा रहा था। आदिवासियों के साथ अन्याय और भेदभाव हो रहा था।
9 अगस्त 2018 में डूंगरपुर जाम हो गया था। लाखों लोग आदिवासी दिवस मनाने जुटे। तत्कालीन वसुंधरा सरकार तक मैसेज गया। उसी दौरान वसुंधरा सरकार ने इस दिन ऐच्छिक अवकाश की घोषणा की थी। आदिवासी दिवस मनाया जाना गोविंद गुरु महाराज की मेहरबानी है। मावजी महाराज ने समाज को जागृत किया।
गहलोत सरकार पर दबाव बनाया तो अवकाश घोषित हुआ
सांसद ने कहा- 2019 में राजस्थान विधानसभा में हम दो विधायक थे। हमने तत्कालीन गहलोत सरकार पर दबाव बनाया। उसी साल तत्कालीन गहलोत सरकार ने राजकीय अवकाश घोषित किया। कुछ लोग कहते हैं कि हमने क्या किया। हमने यह किया आज आप आदिवासी दिवस की छुट्टी लेकर घर में बैठे हैं।
अगर यह विचारधारा न होती तो दूसरी पार्टी के लोग आपको कभी आदिवासी दिवस का अवकाश नहीं देते। राजस्थान ने पहल की तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के लोगों ने भी मांग की और वहां भी आदिवासी दिवस का अवकाश हुआ। कार्यक्रम में कई आदिवासी नाचते गाते और पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे।
1995 के बाद आई सरकारों की जिम्मेदारी थी
सांसद रोत ने कहा- 1995 से जो भी सरकारें रहीं। उनकी जिम्मेदारी थी कि आदिवासी दिवस मनाएं। आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकारों के बारे में बताएं। उन्हें आदिवासी आरक्षण का महत्व बताएं। आदिवासियों की योजनाओं, केंद्र से मिलने वाला पैसा, राज्य से मिलने वाला पैसा, इन सबकी जानकारी दें, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
आज राजस्थान में भाजपा सरकार है। सरकार को, मंत्रियों को आदिवासियों के बीच आना चाहिए था। आदिवासियों की समस्याओं के बारे में जानना चाहिए था। लेकिन एक भी मंत्री कहीं भी आदिवासी दिवस नहीं मना रहा है। आदिवासी परिवार संस्था की ओर से कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कहते हैं इस इलाके में माहौल बिगड़ गया है
रोत ने तंज कसते हुए कहा- कुछ लोग कहते हैं कि इस इलाके में माहौल बिगड़ गया है। अब समाज जाग गया है। अपने हकों के लिए लड़ने को तैयार है। तो आपको लगता है कि माहौल खराब हो गया है। कुछ लोग आदिवासी का सर्टिफिकेट लगाकर बड़े अफसर, नेता, मंत्री बन गए हैं।
वे कहते हैं कि आपने हमें कार्यक्रम के लिए निमंत्रण नहीं दिया। हमने कहा कि यहां शादी का कार्यक्रम नहीं है। यह दिवस यूएनओ ने घोषित किया है। यह किसी एक व्यक्ति का कार्यक्रम नहीं। इसे सफल बनना हमारी सबकी जिम्मेदारी है। कार्यक्रम में शामिल लोग। महिलाएं भी बड़ी तादाद में उपस्थित हुईं।
हम संघर्ष नहीं करते तो आज आप बॉस की डांट खा रहे होते
सांसद रोत ने कहा- आज राजकीय अवकाश है। हमारे कई भाई जो कर्मचारी हैं। वे घर जाकर सो रहे हैं। अगर हमारे पुरखों ने काम नहीं किया होता तो आदिवासी दिवस की छुट्टी न हुई होती। हमने 2015 से 2018 तक संघर्ष न किया होता तो आज आप कोई फाइल निपटा रहे होते। बॉस की डांट खा रहे होते। हम कुदरत बचाने लड़ रहे हैं। ये बचा तो सबको फायदा होगा। सब जिंदा रहेंगे।
प्रोजेक्टों के कारण आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है
सांसद राजकुमार रोत ने कहा- आदिवासी भाई बहन किसी के बहकावे में मत आना। हमें विवेक से लड़ाई लड़नी है। कई प्रोजेक्ट के कारण आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। पूरे देश में पावर प्लांट, सोने की खदान, टाइगर प्रोजेक्ट के जरिए 5 साल में साढे 4 लाख आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा।
यह सरकारी आंकड़ा है। इसके खिलाफ हमें संवैधानिक तरीके से लड़ना है। कोई बड़ा प्रोजेक्ट आने पर उसके 100 किमी के एरिया से विस्थापन होता चला जाता है। हमें भील प्रदेश की लड़ाई बुलंद करनी है। आदिवासी दिवस कार्यक्रम में जुटे लोग। पंडाल से बाहर भी बड़ी तादाद में लोग थे।
गोविंद गुरु महाराज के आंदोलन में ताकत है। हम उनके विचारों को आगे बढ़ाएंगे। एक दिन भील प्रदेश जरूर बनेगा। जब नंदलाल मीणा टीएडी मंत्री थे तो कहा था कि भील प्रदेश बनेगा। अब पर्ची मंत्री बने हुए हैं। हमें उनसे नहीं उनके विचारों से लड़ना है।
विवादित बयान, बोले- भारत में भी होंगे बांग्लादेश जैसे हालात
आदिवासी दिवस कार्यक्रम में जाने से पहले सांसद रोत ने बांसवाड़ा शहर में कुशलबाग मैदान के पास स्थित भील राजा बांसिया की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा- देश में जिस तरह हालात हैं इससे यह डर लगने लगा है कि कहीं आने वाले समय में भारत की स्थिति भी बांग्लादेश देश जैसी न हो जाए।
देश में धर्म और जाति की राजनीति हावी होती जा रही है। इसके चलते सभी समाजों में डर फैल गया है। लोग भयग्रस्त हैं। भारत आदिवासी पार्टी और अन्य पार्टियों ने भारतीय जनता पार्टी व एनडीए गठबंधन के नेताओं से धर्म और जाति की राजनीति नहीं करने का आह्वान किया है।
आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने विश्व आदिवासी दिवस को आदिवासियत के तौर-तरीके और सलीके से मानने कि अपील की है
‘विश्व आदिवासी दिवस कैसे मनाया जाये’ प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा
प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने आदिवासी दिवस को मनाने के निम्नांकित सुझाव दिये हैं। कृपया इन्हें पढ़ें और आदिवासी दिवस को इस प्रकार मनाएं, इससे निश्चित रूप से उस समुदाय का लाभ होगा।
आदिवासी समुदाय से जुड़े स्थानीय स्थलों की यात्रा करें:
- अपने दोस्तों के साथ जंगल या आपके गांव, कस्बे और शहर के पास स्थित, लेकिन विकास से वंचित आदिवासी बस्तियों का दौरा करें।
- उनकी समस्याओं पर एक वीडियो बनाएं और इसे सोशल मीडिया पर साझा करें ताकि लोग इस समुदाय की मदद के लिए जागरूक हों।
सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाएं:
- आदिवासी दिवस के अवसर पर सहज और सरल भाषा में बैनर और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करें।
- इससे अन्य लोगों को आदिवासी दिवस के महत्व और आदिवासी समुदाय की स्थिति के बारे में जानकारी मिलेगी।
आदिवासी बहुल ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित करने के लिए सहायता और दान जुटाएं:
- अगर आप किसी संस्था या दानवीर व्यक्ति को जानते हैं, तो उनके साथ मिलकर आदिवासी समुदाय के विकास के लिए धन जुटाएं।
- इकट्ठा किए गए धन से आदिवासी बस्तियों में सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित करने में जाकर उनकी मदद करें।
सरकारी सुविधाओं की जानकारी दें:
- सरकार द्वारा आदिवासी समुदाय के लिए दी गई सुविधाओं के बारे में उन्हें जानकारी दें।
- उन्हें इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करें ताकि उनका विकास हो सके।
समस्याओं का समाधान करें:
- अपने गांव के पास रहने वाले आदिवासी लोगों के लिए एक समिति बनाएं और उनकी समस्याओं का समाधान करें।
- यदि कोई बड़ी समस्या है, तो स्थानीय नेताओं की मदद से उसे हल करने में सहायता करें।
शैक्षिक जागरूकता बढ़ाएं:
- आदिवासी समुदाय और उनके बच्चों के लिए शैक्षिक जागरूकता बढ़ाएं।
- उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में समझाएं ताकि वे भी आगे बढ़ सकें।
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इन सुझावों का पालन करके, आप आदिवासी दिवस को हिंदुत्व वादी तरीके से नहीं बल्कि आदिवासियत के सार्थक तरीके से मना सकते हैं और आदिवासी समुदाय के विकास में अपना योगदान दे सकते हैं। क्योंकि हिंदुत्व ही आदिवासियत का वास्तविक दुश्मन और गुनाहगार है।