1984 के दंगों की दर्दनाक कहानी, सिखों का कत्लेआम के लिए दंगाई टॉर्च लेकर घूमते थे, जो लड़की पसंद आती उसे उठा ले जाते

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | अक्टूबर 20, 2022 | जयपुर-दिल्ली : सैकड़ों की भीड़, सबके हाथ में लाठी-तलवार और मशालें। पहले लाठियों से पीटते, फिर जलता हुआ टायर गले में माला की तरह डाल देते। चुन-चुनकर परिवार के पुरुषों को मारा, फिर जनानियों की बारी आई। खुले में सबको बैठाया और छंटनी होने लगी। जो औरत उन्हें पसंद आती, उसे उठाकर ले जाते। कितनी गैंग रेप से मरीं, कितनी शर्म से- कुछ पता नहीं।

ये बताते हुए तकरीबन 55 साल की पप्पी कौर की दमदार आवाज थरथराती है। आंसू कपाट तोड़कर बाहर ढुलकने लगते हैं। दुपट्टे से आंखें पोंछते हुए वे कहती हैं- यही मौसम था। अक्टूबर का आखिर, जब पूरे परिवार ने साथ बैठकर रोटी खाई।

फिर सब बदल गया। छह फीट से भी ऊंचे जिस पिता को देखकर हम डरते, वे हाथ जोड़कर जान की भीख मांगते दिखे। गले में फंसी टायर के बीच धू-धू जलते दिखे। पूरे तीन दिनों तक गलियों में मौत नाचती रही। जब तक आर्मी आई, सब खत्म हो चुका था। कुछ जली हुई लाशें थीं, और कुछ जिंदा लाशें।

दिल्ली का तिलक विहार, बेहद घनी आबादी वाली इस बस्ती को लोकेशन ट्रैकर पर डालो, तो लिखा दिखेगा- ‘विडो कॉलोनी’। करीब 2 हजार फ्लैट्स वाले इस इलाके की यही पहचान है। यहां विधवाएं रहती हैं या फिर विधवाओं के बच्चे।

ये वे लोग हैं, जिनके परिवार के तकरीबन सभी पुरुष सदस्य 1984 में मारे गए। 31 अक्टूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिख बॉडीगार्ड्स ने गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके बाद देश के कई हिस्सों में सिख-विरोधी दंगे भड़क उठे।

3 नवंबर तक इस समुदाय के हजारों लोगों की हत्या हुई, सैकड़ों बलात्कार हुए और कितने ही बेघर हो गए। बाद में पश्चिमी दिल्ली में इन्हें मकान अलॉट हुए। जलते हुए पति-बेटों को अपनी आंखों के सामने तड़पकर मरता देख चुकी विधवाओं को दफ्तरों में चपरासी का काम मिला। बस, इतना ही। न उन्हें इंसाफ मिला, न किसी ने जख्मों पर रूई का फाहा रखा।

इन्हीं लोगों से मिलने हम तिलक विहार पहुंचे। विडो कॉलोनी पूछने पर चौदह-पंद्रह साल के लड़के ने उंगली से इशारा करते हुए कहा- बिना प्लास्टर की दीवारें दिख रही हैं, ये सब विडो कॉलोनी के मकान हैं।

मैं गौर करती हूं- ज्यादातर घरों के बाहर रंगाई-पुताई नहीं। संकरी-पतली गलियां, जहां जर्द चेहरे वाले लोग अपने-अपने काम-धंधे पर निकल रहे हैं। यहीं हमारी मुलाकात निर्मल कौर से होनी है, जो हमें बाकियों से मिलवाएंगी। तीन मंजिला इमारतों वाले ये फ्लैट्स 1984 में मारे गए सिखों के परिवार को अलॉट हुए। इनमें से ज्यादातर के पुराने घरों पर दंगाइयों ने कब्जा कर लिया।

कॉल करने पर तीसरी मंजिल से झांकते हुए कहती हैं कि मैं ऊपर ही चली आऊं। निर्मल के बाएं पैर में महीनेभर पहले चोट लगी थी, जिसका दर्द अब उन्हें आसानी से ऊपर-नीचे होने नहीं देता। घरेलू बातों से गुजरते हुए मैं मुद्दा छूती हूं।

1984… सुनते ही पहले वे लड़खड़ाती हैं और फिर संभलकर बोलने लगती हैं। 31 तारीख को इंदिरा गांधी की मौत की खबर आई। उससे पहले सब ठीक था। हमने रोज की तरह मिलकर खाना खाया और गप्पें लगाते रहे। फिर माहौल बदलने लगा। गलियों में कभी एकदम से शोर मचने लगता, कभी सन्नाटा छा जाता। जमीन की नीचे तबाही मचा देने वाले भूकंप की तैयारी चल रही थी। सब कुछ गुपचुप ताकि संभलने का मौका न मिले।

1 नवंबर की सुबह गुरुद्वारे पर हमला हुआ। वहां से होती हुई भीड़ हमारी गली तक पहुंची। हमने लकड़ी का अपना दरवाजा जोरों से बंद कर रखा था। दरवाजा जितनी जोर से पिटता, हमारा दिल उतनी ही जोरों से धड़कता। दंगाइयों ने आखिरकार पिताजी को पकड़ लिया। वे कभी हिंदी, कभी पंजाबी में रहम की भीख मांग रहे थे, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। उन पर कोई पावडर डाला गया और बालों में आग लगा दी गई।

हमारे सामने वो आग में धू-धूकर जल रहे थे। जलन से चीख रहे थे। मैं बचाने लपकी, लेकिन भीड़ में से कुछ हाथों ने मुझे खींचकर अलग फेंक दिया। बचाते हुए मेरा हाथ, कुहनी तक जल गया था। कुहनी दिखाते हुए 50 से ऊपर की ये महिला फूटकर रो पड़ती है।

जवान भाई को मारा। चाचा-ताऊ को मारा। मौसा को मारा। वे एक-एक करके परिवार में सारे रिश्ते गिना रही हैं, जो 37 साल पहले खत्म हो गए। हमारे शरीर तो बच निकले, लेकिन दिल उसी आग में जल गया। टायरों में फंसकर जलते अपने पिता-भाइयों के साथ।

3 नवंबर को आर्मी और पुलिसवाले पहुंचे और जले हुए लोगों को ट्रक में पटकने लगे। इनमें कई जिंदा थे। कइयों मुंह से पानी-पानी की बुदबुदाहट आ रही थी। सबको ट्रक में डालकर जमुना में फेंक दिया गया।

आपको कैसे पता कि बहुत लोग जिंदा थे? सवाल क्रूर, लेकिन जरूरी लगा। …क्योंकि बहुतों की ‘मुंडियां’ हिल रही थीं। उन्हें भी मुर्दों के साथ भरकर नदी के ठंडे पानी में बहा दिया गया। नवंबर का महीना था। अधजला शरीर। बची-खुची जान सर्दी में चली गई होगी।

घर जल चुके थे। हम महीने कैंपों में रहे। कभी खाना मिलता, कभी पानी। सलवार-कुरती का एक बेमेल जोड़ा चार-चार महीनों तक पहना। अपनी ही गंध से नाक भन्नाती, लेकिन कपड़े तो पहनने थे।

इस बीच एक और बात देखी। एक जनानी का बच्चा प्यास से तड़प रहा था। उस रोज किसी के पास पानी नहीं जुट सका। आखिरकार उसने अपनी ही पेशाब छोटे बच्चे को पिला दी ताकि प्यास से उसकी जान न जाए।

बताते हुए निर्मल रो पड़ती हैं। उनके हाथ अपने टूटे हुए पैर को सहला रहे थे। मैं सोचना चाहती हूं कि शायद वे यादों से कम, पैर की टीस से ज्यादा रो रही हों।

हालांकि उनकी अगली ही बात मेरा भ्रम तोड़ देती हैं। सालभर जैसे-तैसे कट जाता है, लेकिन अक्टूबर आते-आते दिल बेचैन होने लगता है। अच्छे-भले खाने से भी इंसानी शरीर के जलने की गंध आती है। तब याद आता है कि कैसे अपनी आंखों के सामने हमने पूरे परिवार को जिंदा जलते देखा।

आगे हमारी मुलाकात होती है, 55 पार की पप्पी कौर से। सब्जी के ठेले पर खड़ी ये महिला खासी दबंग है। खुली हुई आवाज में पॉलिटिक्स पर राय देती हैं, महंगाई की बात करती हैं, लेकिन सिख कत्लेआम का जिक्र आते ही चेहरे की मजबूत रेखाएं खोने-सी लगती हैं।

वे आए और सबसे पहले मोहल्ले की बिजली काट दी। फिर घरों के दरवाजे तोड़े। सबके हाथ में लाठियां थीं। जिनके हाथ खाली थे, उन्होंने जोर लगाकर हैंडपंप के हत्थे तोड़ डाले। मुझे याद है कि लक्कड़ (लकड़ी) के दरवाजे पर सांकल चढ़ाकर हमने पूरे घर का भारी सामान टिका दिया था कि दरवाजा देर से खुले। दूसरे रास्ते से घर की औरतें नेकदिल पड़ोसियों के यहां भेजी जा रही थीं। मैं भी एक घर में छिपा दी गई। वहीं से मैंने सब कुछ देखा।

अपने पापा को जलते। 18 साल के भाई को जलते। जले-अधजले शरीर जमीन पर बिखरे पड़े थे, जिन्हें फर्लांगकर हम एक घर से निकलकर दूसरे घर भाग रहे थे। हर तरफ मारो-मारो की आवाजें आ रही थीं। तभी हम औरतों को भी पकड़ लिया गया। अब सबकी-सब लाइन लगाकर खुले में बैठा दी गईं, और दंगाई टॉर्च लिए घूमने लगे। वे एक-एक चेहरे पर रोशनी डालते। सबके शरीर को ऊपर से नीचे तक घूरते। पसंद आने पर उनको उठाकर ले जाते।

एक-एक औरत को चार-चार जने उठाकर ले गए। कितनी तो वापस ही नहीं लौटीं। जो लौटीं, वे फिर पहले सी नहीं हो सकीं। दहशत में पूरे पेट वाली औरतों के बच्चे हो गए। ज्यादातर मुर्दा!

रोते हुए ही ये महिला दर्द की पूरी तस्वीर उकेर जाती है। दंगे शांत होने के बाद कैंप में गए, लेकिन वहां न खाना मिलता, न पानी। हम अपने उन्हीं जले हुए घरों में लौट गए। पुलिस ने दरवाजे लगवा दिए थे, लेकिन दीवारों की कालिख बाकी थी।

रात सोते तो चीखने-चिल्लाने की आवाजें आतीं। कई बार रोने की आवाज से नींद खुलती। ध्यान से देखो तो मां किसी कोने में बैठकर रोती मिलती। उसका पति और जवान बेटा चला गया था। पता नहीं कौन सा पावडर छिड़ककर आग लगाई गई कि मिनटों में भुनकर खाक हो गए।

‘पावडर’ की बात तकरीबन सभी कहते हैं। पूछने पर किसी के पास खास जानकारी नहीं। इंटरनेट पर खोजती हूं तो पता लगा कि कत्लेआम की गवाही देने वालों ने भी इंक्वायरी कमीशन के सामने किसी सफेद पावडर के छिड़काव की बात कही। इसके बाद ही जलता हुआ टायर डाला जाता था।

कहीं-कहीं ये दावा भी है कि ये पावडर और कुछ नहीं, बल्कि वाइट फॉस्फोरस था। बेहद खतरनाक वो केमिकल, जो चमड़ी से होते हुए हड्डियां तक जला देता है। यहां तक कि इसका सांस से होते हुए शरीर में जाना भी जानलेवा हो सकता है। यही वजह है कि यूनाइटेड नेशन्स से इस पर बैन लगा दिया। हालांकि, गुपचुप इसका इस्तेमाल तब भी होता रहा।

सफेद पावडर डालकर आग लगाने की बात विडो कॉलोनी का हर पीड़ित कहता है, ये अलग बात है कि सिख कत्लेआम पर इंक्वायरी कमीशन की ओपन रिपोर्ट में वाइट फॉस्फोरस का जिक्र नहीं।

मेरा अगला पड़ाव कॉलोनी के बीचों-बीच बना वो गुरुद्वारा है, जहां दंगों में मारे गए लोगों की तस्वीरें लगी हैं। गुरु साहब को मत्था टेकने आए लोग यहां भी जाते हैं। यहीं हमारी मुलाकात जितेंदर सिंह सोनू से हुई, जिन्होंने उस दंगे में अपना सब कुछ गंवा दिया था। वही कहानी, वही दर्द, बस चेहरा अलग था।

तिलक विहार के बीचों-बीच बने गुरुद्वारे में दंगों में मारे गए लोगों की तस्वीरें लगी हैं। लोग यहां आते और नई पीढ़ी के बच्चों को उनके पूर्वजों से मिलवाते हैं। ‘एंटी-सिख दंगा’ कहने पर वे टोकते हैं- दंगे में दोनों तरफ मारपीट होती है। वो कत्लेआम था। सिखों को चुन-चुनकर मारा गया। ऐसे कि उनकी पीढ़ियां बर्बाद हो जाएं। यही हुआ भी। घरों में रोती हुई औरतें ही बाकी रहीं। किसी-किसी के हाथ में छोटे बच्चे थे।
मांएं आंसुओं में डूबी थीं। बच्चे नशे में डूब गए। बकौल जितेंदर, विडो कॉलोनी की बड़ी आबादी में अब भी नशे की लत है। उनके पास घर तो है, लेकिन न जीने की वजह है, न उम्मीद। ज्यादातर बच्चों की मांएं कोर्ट के चक्कर काटते हुए खत्म हो गईं। कई औरतें इतने गहरे डिप्रेशन में गईं कि बच्चों की सुध ही न ले सकीं। जितेंदर और भी कई बातें कहते हैं। कुछ बातें राजनीति पर थीं। कुछ का जिक्र यहां नहीं हो सकता। लेकिन हरेक बात दर्द में लिथड़ी हुई।

कॉलोनी से निकलते हुए हम ज्ञान कौर से मिलते हैं, जिनके पति को गले में टायर डालकर जला दिया गया। 90 साल की ये महिला ज्यादा बात नहीं कर पाती, तब भी परिवार के हर पुरुष सदस्य का नाम गिना देती है कि उन्हें कैसे मारा गया। वे कहती हैं- इतने साल हुए। अब तो मैं बुड्ढी होकर जाने को हूं, लेकिन तब भी इंसाफ नहीं मिला। बोलने से कलेजा फटता है।

ज्ञान कौर के माचिसनुमा घर में उनके पति की हाथ से बनी तस्वीर लगी है। पास ही बैठी उनकी बेटी बताती हैं कि एलबम घर के साथ ही फुंक गया। दूर के रिश्तेदार के घर पिताजी की एक छोटी फोटो थी, उसे ही देखकर हाथ से स्केच बनवाया गया। तब रोटी के पैसे नहीं थे, लेकिन मां तस्वीर बनवाने की जिद पर रही। कॉलोनी से बाहर आकर कैब बुक करती हूं तो लोकेशन दिखती है- विडो कॉलोनी! ये नाम अपने-आप में वो जख्म है, जो शायद कभी न भर सके।

1984 सिख दंगा : पूर्व PM मनमोहन सिंह ने सदन में मांगी थी माफी

31 अक्टूबर 1984 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। अगले दिन यानी 1 नवंबर 1984 को दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे। दंगे में कितने लोगों की मौत हुई, इस पर अलग-अलग रिपोर्ट सामने आ चुकी है। PTI के मुताबिक तब सिर्फ दिल्ली में ही करीब 2700 लोग मारे गए थे, जबकि देशभर में मरने वालों का आंकड़ा 3500 के करीब था।

मई 2000 में दंगों से जुड़े केस की जांच के लिए जी. टी. नानावती कमिशन का गठन किया गया। 24 अक्टूबर 2005 को CBI ने नानावती कमिशन की सिफारिश पर केस दर्ज किया। 1 फरवरी 2010 को ट्रायल कोर्ट ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार, बलवान खोकर, महेंद्र यादव, कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल, किशन खोकर, महा सिंह और संतोष रानी को आरोपी के तौर पर समन जारी किया।

30 अप्रैल 2013 को कोर्ट ने सज्जन कुमार को बरी कर दिया। इसके बाद 19 जुलाई 2013 को सीबीआई ने हाईकोर्ट में सज्जन कुमार को बरी किए जाने के खिलाफ अपील की। 22 जुलाई 2013 को हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को CBI की याचिका पर नोटिस जारी किया।

17 दिसंबर 2018 को हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। बलवान खोकर, भागमल और गिरधारी लाल की उम्रकैद की सजा बरकरार रही। महेंद्र यादव और किशन खोकर की सजा बढ़ाकर 10 साल अदालत ने की।

दंगों के 21 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में इसके लिए माफी मांगी थी। उन्होंने कहा था कि जो कुछ भी हुआ, उससे उनका सिर शर्म से झुक जाता है।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

Leave a Reply

Recent Post

Blog
Professor Ram Lakhan Meena

राहुल गांधी लीडर ऑफ अपोजिशन का पद स्वीकार करेंगे या नहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता बने तो कांग्रेस को मिल सकती है नई दिशा और ऊर्जा

राहुल गांधी लीडर ऑफ अपोजिशन का पद स्वीकार करेंगे या नहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता बने तो कांग्रेस को मिल सकती है नई दिशा और ऊर्जा

Read More »
Blog
MOOKNAYAK MEDIA - मूकनायक मीडिया

डिंपल मीणा की मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट में एसएसएस में इलाज के दौरान जहर देने से मौत की पुष्टि – बलात्कार की नहीं, संदिग्ध आरोपी ललित शर्मा का पुलिस करवायेगी नार्को पॉलीग्राफी टेस्ट

डिंपल मीणा की मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट में एसएसएस में इलाज के दौरान जहर देने से मौत की पुष्टि – बलात्कार की नहीं, संदिग्ध आरोपी ललित शर्मा का पुलिस करवायेगी नार्को पॉलीग्राफी टेस्ट

Read More »
India
MOOKNAYAK MEDIA - मूकनायक मीडिया

डॉ किरोड़ीलाल ने सरकारी गाड़ी और ऑफिस जाना छोड़ा, कृषि मंत्री पद से जल्द दे सकते हैं मंत्री पद से इस्तीफा, लोकसभा चुनाव रिजल्ट के दिन लिखा ‘प्राण जाइ पर वचन न जाइ’

डॉ किरोड़ीलाल ने सरकारी गाड़ी और ऑफिस जाना छोड़ा, कृषि मंत्री पद से जल्द दे सकते हैं मंत्री पद से इस्तीफा, लोकसभा चुनाव रिजल्ट के दिन लिखा ‘प्राण जाइ पर वचन न जाइ’

Read More »
Blog
MOOKNAYAK MEDIA - मूकनायक मीडिया

ओबीसी आरक्षण पर कलकत्ता उच्च न्यायालय का फैसला सवाल क्यों उठाता है?, मुसलमानों से जुड़े ओबीसी आरक्षण पर चला कलकत्ता उच्च न्यायालय का हथौड़ा

ओबीसी आरक्षण पर कलकत्ता उच्च न्यायालय का फैसला सवाल क्यों उठाता है?, मुसलमानों से जुड़े ओबीसी आरक्षण पर चला कलकत्ता उच्च न्यायालय का हथौड़ा

Read More »
Crime
MOOKNAYAK MEDIA - मूकनायक मीडिया

खोटा सोना से बनी गोल्ड की लौंग-चूड़ी खरीद रहीं महिलाएँ, गाँव-कस्बों में 91.6% सोना बताकर बेचा जा रहा है 20-30% सोना

खोटा सोना से बनी गोल्ड की लौंग-चूड़ी खरीद रहीं महिलाएँ, गाँव-कस्बों में 91.6% सोना बताकर बेचा जा रहा है 20-30% सोना

Read More »
Crime
MOOKNAYAK MEDIA - मूकनायक मीडिया

बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ POCSO केस में गैर-जमानती अरेस्ट वारंट, पूर्व CM पर रेप केस में मदद मांगने आयी नाबालिग से यौन शोषण का आरोप

बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ POCSO केस में गैर-जमानती अरेस्ट वारंट, पूर्व CM पर रेप केस में मदद मांगने आयी नाबालिग से यौन शोषण का आरोप

Read More »
MOOKNAYAK MEDIA
Professor Ram Lakhan Meena

ओडिशा के दूसरे आदिवासी मुख्यमंत्री होंगे मोहन चरण माझी, माझी संथाल आदिवासी समुदाय से 12 जून को भुवनेश्वर में शपथ ग्रहण होगा

ओडिशा के दूसरे आदिवासी मुख्यमंत्री होंगे मोहन चरण माझी, माझी संथाल आदिवासी समुदाय से 12 जून को भुवनेश्वर में शपथ ग्रहण होगा

Read More »

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This

1984 के दंगों की दर्दनाक कहानी, सिखों का कत्लेआम के लिए दंगाई टॉर्च लेकर घूमते थे, जो लड़की पसंद आती उसे उठा ले जाते