49सेंट्रल यूनिवर्सिटी में OBCप्रोफेसर और एसो प्रोफेसर शून्य,85% बहुजन RSSके हिंदूमुस्लिम खेलमें मस्त

‘दीगर बात यह है कि प्रधानमंत्री खुद को ओबीसी और राष्ट्रपति एससी का बताते नहीं अघाते हैं’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || दिसंबर 12, 2020 || जयपुर-दिल्ली-हैदराबाद : हाल में एक आरटीआई के जवाब में केंद्र की मोदी सरकार ने उच्च शिक्षा में एससी, एसटी और ओबीसी की भागीदारी के आँकड़े जारी किये हैं। इन आँकड़ों के मुताबिक 49 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एक भी प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर ओबीसी समुदाय से नहीं है, जो सीधी भर्ती में नियुक्त हुए हों। कुछेक विश्वविद्यालयों में करियर एडवांस स्कीम (सीएएस) से प्रमोट होकर बने हैं, वह भी नगण्य ही हैं। इतना ही नहीं दलित और आदिवासी समुदायों की भागीदारी भी ना के बराबर है। इन आँकड़ों ने उच्च शिक्षा में भागीदारी के सवाल पर बहस और तेज कर दी है। पिछड़ा वर्ग के कल्याण के लिए बनी संसदीय समिति ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के वर्गवार आँकड़े माँगे थे। 6 दिसंबर 2020 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से यह आँकड़े जारी किये गये थे। इन आँकड़ों के मुताबिक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 95 फीसदी प्रोफेसर अगड़ी जातियों से आते हैं। वहीं दलित बिरादरी से आने वाले प्रोफेसरों की संख्या महज 3. 54 फीसदी है। आदिवासी समुदाय के प्रोफेसरों की संख्या एक फीसदी से भी कम है। अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई भी प्रोफेसर 49 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नहीं है। एसोसिएट प्रोफेसर के मामले में भी यही रुझान देखने को मिलता है। लगभग 93 फीसदी एसोसिएट प्रोफेसर अगड़ी जातियों से आते हैं। दलित एसोसिएट प्रोफेसरों की संख्या करीब पांच फीसदी है। आदिवासी समुदाय से आने वाले एसोसिएट प्रोफेसरों की संख्या 1 फीसदी से भी कम है। वहीं एक भी एसोसिएट प्रोफेसर अन्य पिछड़ा वर्ग से नहीं आता है। हायर एजुकेशन में टीचिंग के लिहाज से सबसे निचले पायदान की नौकरी असिस्टेंट प्रोफेसर है। इसमें भी आरक्षित वर्ग की भागीदारी कुछ बेहतर लेकिन नाकाफी दिखायी देती है। 100 में से 71 असिस्टेंट प्रोफेसर अगड़ी जातियों से आते हैं। जबकि दलित बिरादरी के असिस्टेंट प्रोफेसर की संख्या 11 फीसदी, आदिवासी समुदाय की भागीदारी 5 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग से 13 फीसदी असिस्टेंट प्रोफेसर ही हैं। सही मायने में आरक्षण व्यवस्था ढ़ाक के तीन पात बनी हुई है। केंद्र की तरफ से सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए 15, आदिवासियों के 7 और पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है। दलित और आदिवासी समुदायों का 13 पॉइंट रोस्टर से बेड़ा गर्क हुआ 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक फैसला आया। इस फैसले के मुताबिक यूनिवर्सिटी में शिक्षकों के पदों की भर्ती 13 पॉइंट के नए रोस्टर के हिसाब से की जाये। इस रोस्टर के दो नुक्शों ने आरक्षित वर्ग के लोगों को नाराज कर दिया। पहला नुक्शा था कि नियुक्ति में विश्वविद्यालय की बजाए डिपार्टमेंट को मूल यूनिट माना जावे। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी यूनिवर्सिटी में कुल 400 असिस्टेंट प्रोफेसर के खाली हैं तो इसका आरक्षित सीटों का बंटवारा डिपार्टमेंट के हिसाब होगा ना कि कुल पदों के हिसाब से। दूसरा नुक्शा था आरक्षित सीटों के निर्धारण का। 13 पॉइंट रोस्टर के हिसाब से पहले से लेकर तीसरे नंबर तक के पद को अनारक्षित रखा गया, चौथा पद ओबीसी को दिया गया, 5वाँ और 6ठा पद फिर से अनरिज़र्व्ड रखा गया, 7वाँ पद अनुसूचित जाति यानी SC के लिए फिक्स रखा गया। 8वाँ पद दोबारा से ओबीसी को दिया गया, 9वाँ, 10वाँ और 11वाँ पद अनरिज़र्व्ड रखा गया, फिर 12वाँ पद ओबीसी और 13वाँ पद फिर से अनरिज़र्व्ड यानी कि अनारक्षित रखा गया, और आखिर में 14वाँ पद ST यानी कि अनुसूचित जनजाति के लिए रखा गया। माने कि दलितों को आरक्षण तब तक नहीं मिलेगा जब तक कोई विभाग अपने यहां कम से कम 7 पदों भर्ती ना निकाले। आदिवासी समुदाय के मामले में पदों की संख्या 14 तक पहुँच जाती है। अगर कोई विभाग महज 3 सीट निकालता है तो कोई भी सीट आरक्षित नहीं होगी। इस 13 पॉइंट रोस्टर को आरक्षित वर्ग ने आरक्षण पर हमला माना। सामाजिक न्याय के प्रति सरकारों की दुर्भावना सामाजिक प्रतिनिधित्व में 1931 की जाति-जनगणना के आँकड़ों की बुनियाद पर अनुसूचित जाति 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 7.5 प्रतिशत, और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) 52 प्रतिशत आबादी का विभाजन किया गया। आज कम से कम 85 प्रतिशत आबादी इन तीनों वर्गों की है। अब इनके उच्च शिक्षा में हिस्सेदारी का आज 2018 का आँकड़ा कमोबेश कुछ इस प्रकार हैं- मोदी सरकार की उदासीनता से 200 पॉइंट्स रोस्टर से भी नहीं बदली तस्वीर देश भर में व्यापक विरोध के कारण पीएम आवास पर हुई कैबिनेट बैठक में 13 प्वॉइंट रोस्टर को खत्म कर 200 प्वॉइंट रोस्टर सिस्टम लागू कर दिया गया। इसके लिए कैबिनेट ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी। कैबिनेट बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इसकी जानकारी दी थी कि सरकार के इस कदम से विश्वविद्यालयों में दलित-आदिवासियों और ओबीसी के आरक्षण में फायदा होगा। किंतु मोदी सरकार कि उदासीनता और उच्च शिक्षा में आधिपत्य जमाये आरएसएस के आकाओं के दिशानिर्देशों की वजह से कोई भी परिवर्तन नहीं आया है।

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