सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण में वर्गीकरण, पेशवाई राज की ओर पहला कदम

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 05 अगस्त 2024 |  जयपुरमाननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए इस निर्णय से संविधान में SC/ST को दिए आरक्षण की मूल भावना का ही खात्मा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व में दिए निर्णय को ही उच्च बेंच के माध्यम से बदल दिया। आखिरी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पीछे कौन हैं?

सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण में वर्गीकरण, पेशवाई राज की ओर पहला कदम

सुप्रीम कोर्ट के सात न्यायधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को एक संविधान विरोधी दुर्भाग्यपूर्ण फैसला दिया। इसमें कहा गया कि राज्य को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण करने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण में वर्गीकरण, पेशवाई राज की ओर पहला कदम

जब आरएसएस-बीजेपी और तमाम मनुवादी ताकतें उनकी मंशा ठीक नहीं है, एससी और एसटी को दिए गए आरक्षण को खुद खत्म करने के बजाय, वे इसे कोर्ट के जरिए से खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं और अब वे इसमें अधिकांशत: सफल भी हो गये हैं। 

सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण में वर्गीकरण, पेशवाई राज की ओर पहला कदम

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अमानवीय निर्णय से पेशवा राज की ओर पहला कदम बाधा दिया है। इसी तरह का एक क्रूर नियम पेशवाई और त्रावणकोर के ब्राह्मण शासकों द्वारा दलितों और आदिवासियों पर थोपा गया था। दलितों को सड़क पर चलते वक्त अपने पीछे एक झाडू बांध कर चलना होता था ताकि वे जिस रास्ते से गुजर रहे हों उसे साफ करते चलें। इन सभी बातों को आप बी आर अंबेडकर की किताब “एनहिलेशन ऑफ कास्ट” में पढ़ सकते हैं।

बता दें कि पेशवा के शासन में दलितों पर कई अमानवीय नियम थोपे गए थे। इस दौर में सार्वजनिक जगहों पर चलते समय दलितों को गले में हांडी लटकाकर चलना पड़ता था। उनके लिए ये नियम बनाए गए थे कि वे कहीं खुले में थूक नहीं सकते हैं और अगर उन्हे थूकना है तो वे अपने गले में लटकती हांडी में थूकें।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से भी कमोवेश वैसी ही हालात बनेंगे क्योंकि एससी-एसटी में जो लोग थोड़े सक्षम हैं। वे कमजोर लोगों के साथ खड़े नहीं हो सकेंगे और मनुवादी ताकतें कमजोर लोगों पर पेशवाई राज चलायेंगे। साथ ही सरकारी नौकरियों में न्यूनतम अर्हताएँ लागू कर कमजोर वर्गों से उनके अवसर छीन लेंगे।

आज भी अधिकांश नौकरियों में एनएफएस (NFS) किया जा रहा है। क्या सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कभी कोई संज्ञान लिया ? जैसे कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर लिया था जिसमें बिना किसी डेटा के आरक्षण को वैध ठहरा दिया गया है। 

अब सुप्रीम कोर्ट के दिए इस निर्णय के बाद राज्य सरकारें SC/ST/OBC के आरक्षण की राजनीतिक लाभ के लिए धज्जियाँ उड़ायेंगे। मतलब साफ है सुप्रीम कोर्ट के संविधान की मूल भावना के खिलाफ दिए इस निर्णय से आरक्षण के खात्मे की शुरुआत है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद राज्य सरकारें अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस निर्णय का पूरी तरह दुरुपयोग करेंगी। मुझे लगता है इसकी शुरुआत आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश से होने वाली है। जहां OBC के आरक्षण में categorisation होना तय है। यहां से शुरुआत होगी फिर देश भर मे कई राज्य सरकारों के द्वार खुल जायेंगे।

उसके बाद एक एक करके राज्य सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए SC/ST/OBC के आरक्षण में Categorisation करने लगेंगे। तब सुप्रीम कोर्ट को भी समझ आयेगा कि बहुत गलत निर्णय हो गया है। वंचितों का आरक्षण तो संविधान में सामाजिक भेदभाव के कारण दिया गया था..ना कि शैक्षिक और गरीबी से पिछड़ेपन के कारण…फिर ये कैसा निर्णय दिया है, समझ से बिल्कुल परे हैं।

इस निर्णय के लिए कई ताकतें कई वर्षों से प्रयास कर रही थी लेकिन सफल अब हुए हैं। सबको पता है कि वो कौनसी ताकतें हैं जो यह निर्णय पूरी शिद्दत से चाहती थी। सच कहूँ तो इस निर्णय के बाद संविधान में वंचितों के लिए कुछ नहीं बचा है।

जब संविधान में आरक्षण की मूल भावना ही खत्म हो जाए तो वंचितों के लिए आरक्षण खत्म ही मानिये। वंचितों को तो हर कोई अपने मौकों के हिसाब से मारना ही चाहता है आज तो वंचितों का संविधानिक खात्मा ही कर डाला है।

यह फैसला भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनाया है। इसके जरिए 2004 में ईवी चिन्नैया मामले में दिए गए पांच जजों के फैसले को पलट दिया। बता दें कि 2004 के निर्णय में कहा गया था कि एससी/एसटी में उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है।

2004 में ईवी चिन्नैया मामले के प्रमुख बिंदु:

पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अनुसूचित जाति वर्ग में सभी अनुसूचित जातियों का समान प्रतिनिधित्त्व सुनिश्चित करने के लिये कुछ को अधिमान्य उपचार देने के पक्ष का समर्थन किया है।
वर्ष 2005 ‘ई. वी. चिनैय्या बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (E V Chinnaiah v State of Andhra Pradesh and Others) मामले में पाँच न्यायाधीशों की एक पीठ ने निर्णय दिया था कि राज्य सरकारों के पास आरक्षण के उद्देश्य से अनुसूचित जातियों की उप-श्रेणियाँ बनाने की कोई शक्ति नहीं है।

कोर्ट ने उप-वर्गीकरण को समानता के अधिकार का उल्लंघन माना। तर्क दिया कि संविधान कुछ जातियों को एक अनुसूची में वर्गीकृत करता है जिनसे अतीत में छूआ-छूत के कारण भेदभाव हुआ। इसलिए इस समूह में एक-दूसरे से अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 341 का भी हवाला दिया…जो आरक्षण के उद्देश्य से एससी समुदायों को सूचीबद्ध करने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को देता है। पीठ ने इसी आधार पर व्यवस्था दी थी कि इस सूची में किसी तरह के हस्तक्षेप या बदलाव करने का राज्यों को कोई अधिकार नहीं है।

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प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली सात-सदस्यीय संविधान पीठ ने 6:1 के बहुमत के फैसले के जरिये ‘‘ई वी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार’’ मामले में शीर्ष अदालत की पांच-सदस्यीय पीठ के 2004 के फैसले को खारिज कर दिया। फैसले में कहा गया था कि अनुसूचित जातियों (एससी) के किसी उप-वर्गीकरण की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि वे अपने आप में स्वजातीय समूह हैं।

वस्तुत: इस सारे षड्यंत्र की शुरुआत 2020 से हुई जब जस्टिस अरुण मिश्रा बैंच ने कहा कि चूंकि समान शक्ति (इस मामले में पाँच न्यायाधीश) की एक पीठ पिछले निर्णय को रद्द नहीं कर सकती, अत: मामले में निर्णय लेने के लिये इसे एक बड़ी संवैधानिक पीठ को भेजा गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा स्थापित की गई बड़ी खंडपीठ दोनों निर्णयों (अनुसूचित जातियों की उप-श्रेणियाँ बनाने तथा इस संबंध में राज्यों को अधिकार) पर पुनर्विचार करेगी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी वाई चंद्रचूड़ से एससी एसटी उप वर्गीकरण पर कुछ सवाल:-

1. सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में उप-वर्गीकरण के लिए याचिका डाली गई थी, तो फिर अनुसूचित जनजाति (ST) में उप-वर्गीकरण का फैसला किस आधार पर दिया गया है?

2. अनुसूचित जनजाति (ST) में आर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़ी जनजातियों के लिए उप-वर्गीकरण, जैसा कि अत्यंत कमजोर जनजातीय समूह (PVGT) विकास और कल्याण के लिए पहले से लागू है, जिसमें 750 में से लगभग 75 जनजातियां शामिल हैं। फिर नए उप-वर्गीकरण का क्या औचित्य है?

3. उप-वर्गीकरण के माध्यम से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के भीतर विभाजन पैदा करना इस उद्देश्य के विपरीत है। यह न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है, बल्कि समाज में समानता और न्याय की भावना को भी कमजोर करता है। क्या आप संविधान पर हमला नहीं कर रहे हैं?

4. संविधान का अनुच्छेद 341 अनुसूचित जातियों (SC) की सूचियों और अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों (ST) की सूचियों से संबंधित है। इन सूचियों को केवल राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया जाता है और इसमें राज्यों को हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है। आप राष्ट्रपति की शक्तियों का अप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं?

5. एससी एसटी के लोगों के आर्थिक रूप से संपन्न हो जाने के बावजूद उनके जातीय उत्पीड़न को नहीं रोका जा सका है जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स की महत्ती भूमिकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। एपेक्स कोर्ट इन वर्गों के लोगों को न्याय मुहैया करवाने में आज भी कन्नी काट रहे हैं।

6. आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समानता स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है। फिर आपके द्वारा उप-वर्गीकरण आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर किया जाना गलत नहीं है?

क्रीमी लेयर की अवधारणा:

  • सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि आरक्षण का लाभ ‘सबसे कमज़ोर लोगों को’ (Weakest of the Weak) प्रदान किया जाना चाहिये। 
  • वर्ष 2018 में ‘जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले‘ में अनुसूचित जनजातियों के भीतर एक ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा के निर्णय को कायम रखा गया।
  • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने ही 12 वर्ष पुराने ‘एम. नागराज बनाम भारत’ सरकार मामले में दिये गए पूर्ववर्ती निर्णय पर सहमति व्यक्त की गई थी।
    • एम. नागराज मामले में सर्वोच्च न्यायालय का मानना था कि अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) को मिलने वाला लाभ समाज के सभी वर्गों को मिल सके इसके लिये आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा का प्रयोग करना आवश्यक है।
  • वर्ष 2018 में पहली बार अनुसूचित जातियों की पदोन्नति में क्रीमी लेयर’ की अवधारणा को लागू किया गया था।
  • केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 के जरनैल सिंह मामले में निर्णय की समीक्षा की मांग की है और मामला वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।

उप-वर्गीकरण के विपक्ष में तर्क: अनुसूचित जातियाँ  एक वर्ग

  • 1976 के ‘केरल राज्य बनाम एन. एम. थॉमस मामले’ में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि ‘अनुसूचित जातियाँ (SC) कोई जाति नहीं हैं, अपितु वे वर्ग हैं।
  • इस मामले में यह तर्क दिया गया कि ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन’ की शर्त को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं किया जा सकता है।
  • अस्पृश्यता के कारण सभी अनुसूचित जातियों को विशेष उपचार दिया जाना चाहिये। 

उप-वर्गीकरण के विपक्ष में तर्क: वोट बैंक की राजनीति संभव

  • आरक्षण के उप-वर्गीकरण में सरकार द्वारा लिये जाने वाले निर्णय वोट बैंक की राजनीति के आधार पर हो सकते हैं।
  • इस तरह के संभावित मनमाने बदलाव से बचने के लिये अनुच्छेद- 341 में राष्ट्रपति की सूची की परिकल्पना की गई थी। 

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‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का समाधान

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 29 मार्च 2025 | जयपुर : सबसे बड़े भू-भाग वाला प्रदेश- राजस्थान का क्षेत्रफल 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर है जहां 6.85 करोड़ जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का आठवां बड़ा राज्य है व भू-भाग की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य। सात संभाग, 33 जिले, 41353 ग्राम, उत्तर से दक्षिण की लंबाई 826 वर्ग किमी व पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 869 वर्ग किमी है।

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भारत के अलग अलग भागों में नए राज्यों के निर्माण की मांग उठ रही है जिनमें अरावली प्रदेश सबसे प्रबल है। राष्ट्रीय एकता व अखण्डता, सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक, कृषि, उद्योग इत्यादि की विपुल संभावनाओं के मद्देनजर अरावली प्रदेश निर्माण की दावेदारी सबसे प्रबल है। भारत का सबसे बड़ा भूभाग राजस्थान जो दुनियां के 110 देशों से भी क्षेत्रफल में बड़ा है जिसको बीचों बीच से अरावली पर्वतश्रेणी ने दो भागों में विभाजित किया है जिसका उत्तरी पश्चिमी रेगिस्तानी थार का अरावली स्थल ही अरावली प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

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विश्वनाथ सुमनकेंद की सैद्धांतिक सहमति के बाद तेलंगाना ऐसा मुद्दा बन गया है, जिसके बल पर राजनीतिक दल काफी लंबे समय तक सियासी मैदान में दौड़ लगा सकते हैं। तेलंगाना के मुद्दे ने उन राजनीतिक दलों और गुटों को दोबारा जिंदा कर दिया है, जो छोटे राज्य बनाने के हिमायती हैं और जिनकी राजनीति हाल तक उनके असर वाले इलाकों में ही धूल फांक रही थी। आंध्र के बंटवारे के साथ यूपी को तीन हिस्सों में तोड़ने, महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिम बंगाल में गोरखा लैंड और असम में बोडो लैंड बनाने की आवाज भी तेज हो गई। पृथक गोरखा लैंड के मुद्दे पर केंद्र सरकार, गोरखा जन मुक्ति मोर्चा और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच त्रिपक्षीय वार्ता शुरू हो चुकी है। पर इन सबके साथ, यह बहस भी गरमा गई है कि विकास के लिए छोटे राज्यों का निर्माण होना जरूरी है या यह मसला किसी वर्ग, नस्ल या क्षेत्र विशेष के लोगों को संतुष्ट करने का आसान जरिया भर है।

आजादी के बाद रजवाड़ों के भारतीय गणराज्य में विलय के साथ नए राज्यों के गठन का आधार तैयार होने लगा था। 1953 में स्टेट ऑफ आंध्र वह पहला राज्य बना, जिसे भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट से अलग किया गया। इसके बाद दिसंबर 1953 में पंडित नेहरू ने जस्टिस फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया। एक नवंबर 1956 में फजल अली आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हो गया और भाषा के आधार पर देश में 14 राज्य और सात केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए। मध्य प्रांत के शहर नागपुर और हैदराबाद के मराठवाड़ा को बॉम्बे स्टेट में इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि वहां मराठी बोलने वाले अधिक थे। इसके बाद लगातार कई राज्यों का भूगोल बदलता रहा और नए तर्कों व मानकों के आधार पर नए राज्य बनते गए। त्रिपुरा को असम से भाषा के आधार पर अलग किया गया तो मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड का गठन नस्ल के आधार पर किया गया।

सन 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के बंटवारे के आधार भी विकास नहीं बल्कि परोक्ष रूप से नस्ल और भाषा ही बनी। आज भारत में 28 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश हैं।नया राज्य बनाने से पहले उन राज्यों की स्थिति का जायजा लिया जाना चाहिए, जो बड़े-बड़े दावों के आधार पर बनाए गए थे। यह आकलन का विषय है कि मूल प्रदेश से अलग होने के बाद क्या उन राज्यों में क्रांतिकारी बदलाव आए? निर्माण के दशकों बाद भी पूर्वोत्तर के राज्य विकास की बाट जोह रहे हैं। मणिपुर और नगालैंड में अलगाववादियों को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है। आज इन राज्यों की सरकारें पांच साल पूरा कर लेती हैं, तो उसे अचीवमेंट माना जाता है।आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि यूपी से अलग होने के बाद उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई।

 बिहार में प्रति व्यक्ति आय 10,570 रुपये ही है जबकि झारखंड में यह आंकड़ा 20,177 रुपये तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ में प्रति व्यक्ति आय 29,000 है, जबकि मध्य प्रदेश में औसत आय 18,051 रुपये ही है। आंकड़े जो चाहे कहें, मगर इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस कागजी समृद्धि के पीछे राज्य के विकास की जगह बंटवारे के बाद जनसंख्या में आई औसत कमी का योगदान अधिक है। इन राज्यों की जमीनी हालात में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है। इन राज्यों की सरकारों ने न तो सिस्टम में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है और ऐसी योजनाएं बनाई हैं, जिनसे प्रदेश की जनता की स्थिति में सुधार हुआ हो। आज भी छत्तीसगढ़ और झारखंड में नक्सली हमले जारी हैं। वहां के निवासियों को उन दिक्कतों से निजात नहीं मिली है, जो 2000 से पहले वहां थीं।

वहां आज भी लोग स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क बिजली, पानी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। चाहे पंजाब से अलग हुआ हरियाणा हो या उत्तराखंड, ये राज्य आर्थिक मदद के लिए हमेशा दिल्ली की ओर टकटकी लगाए रखते हैं। इन सबके बीच इन प्रदेशों में लालबत्ती लगी गाड़ियों और नए सरकारी दफ्तरों की तादाद में खासा इजाफा हुआ। संसाधनों की बंदरबांट पहले की तरह जारी है, बस, बांटने वालों के चेहरे बदल गए हैं। सचाई यह है कि नए राज्यों की मांग के पीछे दिए जाने वाले ज्यादातर तर्कों का स्वरूप नकारात्मक है। मसलन, हरित प्रदेश की मांग इसलिए की जा रही है कि भारी राजस्व जुटाने के बाद भी वेस्टर्न यूपी को बुंदेलखंड और पूर्वांचल की समस्याओं का साझा बोझ उठाना पड़ रहा है। गोरखा लैंड में बसने वाले बंगाली नहीं होंगे। विदर्भ और तेलंगाना को उपेक्षित रहने का मलाल है। इन तर्कों के साथ चल रहे आंदोलनों ने वैमनस्य की स्थिति पैदा कर दी है। एक हकीकत यह भी है कि इन राज्यों में पृथक राज्य के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठनों के पास विकास के लिए स्वीकार्य रोडमैप नहीं है।

सवाल है कि क्या गोरखा लैंड चाय और पर्यटन के सहारे अपने खर्चे जुटा लेगा। महाराष्ट्र से अलग होने के बाद विदर्भ के किसानों की स्थिति सुधर जाएगी? बुंदेलखंड और पूर्वांचल का पेट कैसे भरेगा? अगर इन नए प्रदेशों को गठन कर भी दिया जाए, तो वहां विकास का खाका खींचने में ही कई दशक गुजर जाएंगे। इसलिए झारखंड, उत्तराखंड और नॉर्थ ईस्ट से सबक लेने की जरूरत है। अगर इन राज्यों में डिवेलपमेंट की सही प्लानिंग की गई होती और बंटवारे का मकसद सियासी लाभ लेना नहीं होता तो इन नए नवेले राज्यों की सूरत कुछ और होती। राज्य छोटे हों या बड़े, यदि शासन करने वालों की नीति और नीयत साफ हो तो राज्य का आकार मायने नहीं रखता। अमेरिका में 50 राज्य हैं जबकि उसकी आबादी भारत से कम है। सही गवर्नेंस के लिए वहां भी एक नए राज्य की गठन की तैयारी चल रही है, बिना शोर-शराबे के। वहां किसी राजनीतिक दल को अनशन और आंदोलन करने की जरूरत नहीं पड़ी। वहां की पॉलिटिकल पार्टियों में इसके लिए क्रेडिट लेने मारामारी भी नहीं है। भारत में भी छोटे राज्य बनाने में कोई हर्ज नहीं, बशर्ते राज्यों का गठन विकास के लिए हो, न कि किसी जाति या और राजनीतिक गुट को खुश करने के लिए।

क्यों जरुरी है राजस्थान का “मरु और अरावली प्रदेश” में विभाजन

मरुप्रदेश के 20 जिलों में देश का 27 प्रतिशत तेल, सबसे महंगी गैस, खनिज पदार्थ, कोयला, यूरेनियम, सिलिका आदि का एकाधिकार है। एशिया का सबसे बड़ा सोलर हब और पवन चक्कियों से बिजली प्रोडक्शन यहाँ हो रहा है। गौरतलब है कि एक तरफ जहां राजस्थान में प्रति व्यक्ति तो ज्यादा है, लेकिन पश्चिम राजस्थान के जिलों में रहने वालों का एवरेज निकाला जाये तो उनकी आय काफी कम है। राजस्थान की भौगोलिक और सांस्कृतिक इकाईयों में असमानता, आर्थिक विकास और राजनैतिक विमूढ़ता का सबसे ज्यादा नुकसान इस इलाके को उठाना पड़ा है।

राजस्थान के इस 40.11% भूभाग के निवासियों के साथ विकास की प्रक्रिया में कभी न्याय नहीं हो पाया। अरावली प्रदेश मुक्ति मोर्चा के संयोजक प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि देश का विकास छोटे राज्यों से ही हो सकता है। राज्य जब तक बड़े राज्य रहे हैं, तब तक विकास से महरूम रहे हैं। झारखंड, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड बेहतरीन उदहारण है, क्योंकि बिहार, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में रहते हुए विकास की डगर वहां तक नहीं पहुँच पायी थी। मगर जैसे ही अलग राज्य बने तो विकास की राह में ये राज्य अपने मूल राज्यों से आगे निकल गये।

अलग अरावली प्रदेश की तार्किक माँग

अलग अरावली प्रदेश की माँग करने का तर्क है कि पूर्वी राजस्थान का ये क्षेत्र राज्य के अन्य हिस्सों के मुकाबले शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। इन जिलों से अरबों रुपयों की रॉयल्टी सरकार कमा रही है, लेकिन इन जिलों में पीने का पानी, रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, स्पोर्ट्स और सैनिक स्कूल, खेतों को नहरों का पानी जैसी समस्यायों से आम जनता जूझ रही है।

इसका प्रमुख कारण भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति अलग है। इस हिस्से की जलवायु, कृषि, उद्योग और जनसंख्या का वितरण भी अलग है। यदि यह भू-भाग नए राज्य के रूप में सामने आयेगा तो इस क्षेत्र के विकास में तेजी आयेगी। “अरावली में बग़ावत” शीर्षक पुस्तक के लेखक प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने लिखा है कि अरावली भू-भाग का सम्पूर्ण विकास तभी होगा जब अरावली प्रदेश अलग राज्य बनेगा। अरावली के संसाधनों की लूट रुकेगी।

प्रोफ़ेसर मीणा कहते हैं, ”आज़ादी से पहले जहां अरावली का इलाक़ा विकास की दौड़ में शामिल था। वहीं आज़ादी के बाद सभी पार्टियों की सरकारों और चतुर-चालाक मारवाड़ी व्यवसाइयों ने इसके प्रति बेरुख़ी दिखायी। जबकि प्राकृतिक संसाधनों प्रचुरता से ये एरिया ख़ूब मालामाल है। खनिज के हिसाब से देखें तो इस क्षेत्र में कोयला, जिप्सम, क्ले और मार्बल निकल रहा है। वहीं, जोधपुर जैसे शहर में पीने का पानी अरावली क्षेत्र से ट्रेन से भर-भर कर ले जाकर वहाँ के लोगों की प्यास बुझायी जाती थी। बीसलपुर बाँध का पानी पाली, अजमेर और जोधपुर के गाँवों तक पहुँचाया जा रहा है और अब जैसी ही बाड़मेर में तेल और गैस के भंडार मिले हैं, वैसे ही मरू प्रदेश की माँग जोर-शोर से उठायी जा रही है। जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्रियों और उनकी सरकारों ने अरावली भू-भाग (पूर्वी राजस्थान) से रेवेन्यू तो भरपूर लिया है, लेकिन विकास को हमेशा अनदेखा किया है।

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी का 70% हिस्सा अरावली प्रदेश से आता है और उसको 80% से भी अधिक पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में खर्च किया जाता रहा है। इसके समर्थन में आंकड़े गवाह हैं, जो बताते हैं कि कैसे जोधपुर को शिक्षा की नगरी बनाया गया। एक-आध को छोड़कर सारे-के-सारे केंद्रीय शिक्षण संस्थानों (20 से अधिक) को जोधपुर ले जाया गया। अरावली के दक्षिणी छोर से लेकर उत्तरी छोर तक 500 किलोमीटर में एक भी केंद्रीय संस्थान नहीं है। एक तरफ, नर्मदा का पानी रेगिस्तान को हरा-भरा कर रहा है और वहीं दूसरी तरफ, अरावली प्रदेश (भू-भाग) एक-एक बूँद पानी के लिए तरस रहा है।

अरावली प्रदेश के भोले-भाले लोग तो यह भी नहीं जानते कि कैसे मंडरायल (करौली) में लगने वाली सीमेंट फेक्ट्री को जैतपुर (पाली) ले जाया गया जबकि मंडरायल में सब कुछ फाइनल हो चुका था। सवाई माधोपुर सीमेंट फेक्ट्री को कैसे बंद किया गया।” जब वर्ष 2000-01 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 03 राज्य नए बनाये तो उस समय के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत जी ने भी पत्र लिख कर कहा था कि पूरे राजस्थान का विकास व देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए राज्य के दो भाग किये जाये। इसके बाद भी समय समय पर अनेको क्षेत्रीय नेताओ ने इस माँग का समर्थन किया लेकिन पार्टियों की गुलामी के चलते मुखर विरोध नहीं कर सके।

चहुँओर चमकेगी उन्नति, जब बनेगा अरावली प्रदेश

अरावली पर्वत माला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जिसकी गिनती विश्व की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में भी होती है। यह भूवैज्ञानिक दृष्टि से अरबों वर्षों पुरानी है और भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल और इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। राजस्थान इस पर्वतमाला का मुख्य केंद्र है। अरावली यहाँ के परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे राज्य के पश्चिमी और पूर्वी भागों को विभाजित करने वाली प्राकृतिक दीवार भी कहा जाता है। पूर्वी राजस्थान; अरावली के पूर्व में स्थित यह क्षेत्र अपेक्षाकृत उपजाऊ है और यहाँ मैदानी भाग पाये जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान; अरावली के पश्चिम में थार मरुस्थल स्थित है, जो राज्य के लगभग 60% क्षेत्र को कवर करता है। पूर्वी राजस्थान में कृषि के लिए उपयुक्त भूमि है, जहाँ रबी और खरीफ दोनों फसलें उगाई जाती हैं। पश्चिमी राजस्थान का अधिकांश भाग मरुस्थलीय या अर्द्धमरुस्थलीय है।

अरावली पर्वत श्रृंखला की कुल लंबाई गुजरात से दिल्ली तक 692 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 550 किलोमीटर राजस्थान में स्थित है। अरावली पर्वत श्रृंखला का लगभग 80% विस्तार राजस्थान में 22 जिलों में पूर्ण रूप से ओर कुछ जिलों में थोड़ा सा हिस्सा फैला हुआ है। अरावली प्रदेश के 22 जिलों में जयपुर, दौसा, करौली, धौलपुर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां, अलवर, टोंक, भीलवाड़ा, सीकर, झुंझुनूं , चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, राजसमंद, उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर शामिल होंगे।

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अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 26 मार्च 2025 | जयपुर : प्रोफेसर मीना पूर्वी राजस्थान के लिए “अरावली प्रदेश” की स्थापना की वकालत करते हैं। उनकी रणनीति में क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करना और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर बहुजन समुदाय के आर्थिक-सामाजिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है।

भारत की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिए जीवन रेखा के रूप में काम करती रही है। हालाँकि, अवैध खनन, शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण अरावली काफ़ी हद तक क्षरण का सामना कर रही है।

इन दबावों के कारण इस पर्वत श्रृंखला के बड़े हिस्से का क्षरण हुआ है, जिससे रेगिस्तानीकरण, पानी की कमी और जैव विविधता के नुकसान जैसी पर्यावरणीय आपदाएँ हुई हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

 “छोटे राज्यों का गठन” के बारे में चर्चा आम है, जो संभवतः प्रोफेसर राम लखन मीना के “अरावली प्रदेश” प्रस्ताव के संदर्भ में या सामान्य रूप से भारत में छोटे राज्यों के निर्माण की अवधारणा से संबंधित है। इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा और भारतीय संदर्भ में इसके पक्ष-विपक्ष, और प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है। यदि आप इसे “अरावली प्रदेश” तक सीमित रखना चाहते हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

छोटे राज्यों का गठन: एक अवलोकन

भारत में छोटे राज्यों का गठन एक ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रिया रही है, जो मुख्य रूप से भाषाई, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय पहचान, और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर हुई है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत के राज्य पुनर्गठन ने बड़े राज्यों को छोटी इकाइयों में विभाजित करने की माँग को बार-बार देखा है।

ऐतिहासिक उदाहरण

  1. 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम:
    भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ, जैसे आंध्र प्रदेश (तेलुगु), कर्नाटक (कन्नड़), और तमिलनाडु (तमिल)। यह बड़े औपनिवेशिक प्रांतों को छोटी इकाइयों में तोड़ने की शुरुआत थी।
  2. 2000 में तीन नए राज्य:
    • छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश से अलग
    • उत्तराखंड: उत्तर प्रदेश से अलग
    • झारखंड: बिहार से अलग
      इनका गठन क्षेत्रीय उपेक्षा और पहचान के आधार पर हुआ।
  3. तेलंगाना (2014):
    आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना बना, जो विकास में असमानता और सांस्कृतिक पहचान की लंबी लड़ाई का परिणाम था।

छोटे राज्यों के पक्ष में तर्क

  1. प्रशासनिक दक्षता:
    छोटे राज्य सरकार को जनता के करीब लाते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं पर तेजी से ध्यान देना संभव हुआ।
  2. स्थानीय विकास:
    संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का लाभ उठाकर औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।
  3. सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान:
    छोटे राज्य स्थानीय भाषा, परंपराओं और समुदायों को संरक्षित करते हैं। जैसे, तेलंगाना में तेलुगु संस्कृति को अलग पहचान मिली।
  4. राजनीतिक सशक्तिकरण:
    हाशिए पर रहे समुदायों को नेतृत्व का मौका मिलता है। झारखंड में आदिवासी समुदायों की आवाज मजबूत होगी।

छोटे राज्यों के खिलाफ तर्क

  1. आर्थिक व्यवहार्यता:
    छोटे राज्य कभी-कभी स्वतंत्र रूप से आर्थिक रूप से टिक नहीं पाते। मिसाल के तौर पर, झारखंड में विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार और संसाधन प्रबंधन की समस्याएँ बनी रहीं।
  2. प्रशासनिक लागत:
    नए राज्य का ढाँचा—जैसे विधानसभा, सचिवालय, और नौकरशाही—बनाने में भारी खर्च होता है।
  3. विखंडन का खतरा:
    बार-बार विभाजन से राष्ट्रीय एकता पर सवाल उठ सकते हैं। कुछ लोग इसे “बाल्कनीकरण” कहते हैं।
  4. अंतर-राज्य विवाद:
    जल, सीमा, और संसाधनों पर टकराव बढ़ सकता है, जैसे तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच कृष्णा नदी का विवाद।

भारत में गठन की प्रक्रिया

भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को नए राज्यों के गठन का अधिकार है। प्रक्रिया इस तरह है:

  1. माँग की शुरुआत:
    स्थानीय आंदोलन, राजनीतिक दल या समुदाय माँग उठाते हैं।
  2. राज्य विधानसभा की राय:
    संबंधित राज्य विधानसभा से राय ली जाती है (हालाँकि यह बाध्यकारी नहीं है)।
  3. केंद्र सरकार का प्रस्ताव:
    गृह मंत्रालय इसका मूल्यांकन करता है और संसद में विधेयक पेश करता है।
  4. संसदीय मंजूरी:
    दोनों सदनों में साधारण बहुमत से पास होने के बाद राष्ट्रपति की सहमति से यह लागू होता है।
“अरावली प्रदेश” के संदर्भ में प्रोफेसर मीना का प्रस्ताव इस पैटर्न में फिट बैठता है। उनका तर्क है कि पूर्वी राजस्थान की उपेक्षा और बहुजन समुदायों की जरूरतें एक छोटे राज्य से पूरी हो सकती हैं। लेकिन इसके लिए व्यापक जन समर्थन, आर्थिक योजना, और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए—जो अभी प्रारंभिक चरण में लगता है।

छोटे राज्यों का गठन भारत में सफल भी रहा है (तेलंगाना, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़) और चुनौतीपूर्ण भी (झारखंड की आर्थिक अस्थिरता)। यह इस बात पर निर्भर करता है कि नया राज्य अपनी विशिष्टता को कैसे भुनाता है और संसाधनों का प्रबंधन कैसे करता है। यदि आप किसी खास पहलू—आर्थिक प्रभाव या विशिष्ट उदाहरण—पर और जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप “अरावली प्रदेश” पर ही केंद्रित जवाब चाहते हैं या सामान्य चर्चा ठीक है?

“अरावली प्रदेश” के लाभों पर चर्चा करने के लिए प्रोफेसर राम लखन मीना (@ProfRLMeena) के प्रस्तावित विचार को आधार बनाना होगा, जो पूर्वी राजस्थान के जिलों को एक अलग राज्य के रूप में गठित करने की वकालत करता है। यहाँ इसके संभावित लाभों को विस्तार से देखते हैं, जो सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, और पर्यावरणीय पहलुओं पर आधारित हैं:

1. प्रशासनिक दक्षता और स्थानीय फोकस

  • तेज निर्णय प्रक्रिया:
    एक छोटा राज्य होने से सरकार स्थानीय समस्याओं—like ग्रामीण सड़कें, स्कूल, और अस्पताल—पर तेजी से ध्यान दे सकती है। अभी पूर्वी राजस्थान की जरूरतें जयपुर-केंद्रित प्रशासन में दब जाती हैं।
  • जमीनी स्तर तक पहुँच:
    छोटे राज्य में नौकरशाही और जनता के बीच की दूरी कम होगी, जिससे नीतियाँ अधिक प्रभावी होंगी। उदाहरण के लिए, टोंक या दौसा जैसे जिलों की उपेक्षा कम हो सकती है।

2. आर्थिक विकास और संसाधन उपयोग

  • खनिज संपदा का लाभ:
    अरावली क्षेत्र में संगमरमर, ताँबा, जस्ता, और अन्य खनिज प्रचुर हैं। एक अलग राज्य इनका स्थानीय स्तर पर बेहतर उपयोग कर सकता है, जिससे रोजगार और राजस्व बढ़ेगा। अभी ये संसाधन बड़े कॉर्पोरेट्स या राज्य के अन्य हिस्सों की ओर चले जाते हैं।
  • कृषि और पर्यटन:
    पूर्वी राजस्थान की उपजाऊ जमीन और अरावली की पहाड़ियाँ (जैसे रणथंभौर, सरिस्का) पर्यटन और कृषि को बढ़ावा दे सकती हैं। एक समर्पित प्रशासन इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे सकता है।
  • आर्थिक स्वायत्तता:
    स्थानीय कर और निवेश नीतियाँ क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से बनाई जा सकती हैं, बजाय इसके कि पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय मॉडल पर निर्भर रहें।

3. सामाजिक सशक्तिकरण

  • बहुजन समुदायों का उत्थान:
    प्रोफेसर मीना का जोर बहुजन (ओबीसी, एससी, एसटी) समुदायों पर है, जो इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं। एक अलग राज्य उनकी शिक्षा, रोजगार, और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकता है। जैसे, मीणा और गुर्जर समुदायों को नेतृत्व के अधिक अवसर मिल सकते हैं।
  • आरक्षण का प्रभावी कार्यान्वयन:
    छोटे राज्य में आरक्षण नीतियों को स्थानीय स्तर पर बेहतर लागू किया जा सकता है, जिससे जातिगत असमानता कम हो।

4. सांस्कृतिक पहचान और गर्व

  • स्थानीय संस्कृति का संरक्षण:
    अरावली क्षेत्र की सहरिया, भील, मीणा, गुर्जर, और अन्य जनजातीय परंपराएँ राजस्थान की राजपूत-केंद्रित पहचान में दबी रहती हैं। एक अलग राज्य इसे मुख्यधारा में ला सकता है।
  • क्षेत्रीय एकता:
    “अरावली प्रदेश” की पहचान लोगों में गर्व और एकता की भावना जगा सकती है, जैसा कि तेलंगाना या उत्तराखंड में देखा गया।

5. पर्यावरण संरक्षण

  • अरावली पर्वतों की रक्षा:
    अवैध खनन और वन कटाई से अरावली क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है। एक समर्पित राज्य सरकार पर्यावरण नीतियों को सख्ती से लागू कर सकती है, जिससे जैव-विविधता और जल संसाधन बचे रहें।
  • सतत विकास:
    पर्यटन और खनन के बीच संतुलन बनाया जा सकता है, जो अभी बड़े राज्य के ढाँचे में मुश्किल है।

6. शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार

  • शिक्षा पर ध्यान:
    प्रोफेसर मीना शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ हैं। एक छोटा राज्य सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को मजबूत करने पर केंद्रित नीतियाँ बना सकता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • स्वास्थ्य सेवाएँ:
    स्थानीय स्तर पर अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, जो अभी दूर-दराज के इलाकों में कम हैं।

तुलनात्मक उदाहरण

  • छत्तीसगढ़:
    मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद खनिज-आधारित अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ, हालाँकि भ्रष्टाचार एक चुनौती रहा। अरावली प्रदेश भी खनिजों से लाभ उठा सकता है।
  • उत्तराखंड:
    पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरतों पर फोकस से बुनियादी ढाँचा बेहतर हुआ। अरावली के पहाड़ी जिलों को भी ऐसा लाभ मिल सकता है।

संभावित प्रभाव

“अरावली प्रदेश” बहुजन समुदायों के लिए एक प्रयोगशाला बन सकता है, जहाँ सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को संतुलित करने की कोशिश हो। यह क्षेत्र की उपेक्षा को दूर कर सकता है और एक मॉडल राज्य बन सकता है, बशर्ते इसे सही योजना और नेतृत्व मिले।

यदि आप किसी खास लाभ आर्थिक या पर्यावरणीय—पर और गहराई से जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप इसके पक्ष में उनके तर्कों को और विस्तार से पढ़ना-सुनना चाहते हैं?

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