
मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 24 अगस्त 2024 | दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले ने एससी-एसटी एक्ट कानून के प्रावधानों को फिर से कमजोर किया है। इससे देश एससी एसटी समुदायों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी अनुसूचित जाति-जनजाति के व्यक्ति को उसकी जाति का नाम लिए बगैर अपमानित किया गया है, तो यह मामला SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत अपराध नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट की एससी-एसटी एक्ट कमजोर करने की एक और कोशिश
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने एक ऑनलाइन मलयालम न्यूज चैनल के एडिटर शाजन स्कारिया को अग्रिम जमानत देते हुए यह फैसला सुनाया। स्कारिया पर 1989 एक्ट की धारा 3(1)(R) और 3(1)(U) के तहत केस दर्ज हुआ था।

उन पर आरोप था कि उन्होंने SC समुदाय से आने वाले कुन्नाथुनाड के CPM विधायक पीवी श्रीनिजन को माफिया डॉन कहा था। इस मामले में ट्रायल कोर्ट और केरल हाईकोर्ट ने उन्हें गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार कर दिया था।
कोर्ट ने कहा- वीडियो में अपमान जैसा कुछ नहीं मिला
आरोपी स्कारिया की तरफ से एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और गौरव अग्रवाल ने दलीलें रखीं। जिसे मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा- SC/ST समुदाय के किसी सदस्य का जानबूझकर किया गया हर अपमान और उसे दी गई धमकी जाति आधारित अपमान नहीं माना जाएगा।
हमें ऐसा कुछ नहीं मिला जो साबित करे कि स्कारिया ने यूट्यूब वीडियो में SC/ST समुदाय के खिलाफ दुश्मनी या नफरत को बढ़ावा देने की कोशिश की है। वीडियो का SC या ST के सदस्यों से कोई लेना-देना नहीं है। उनका निशाना केवल शिकायतकर्ता (श्रीनिजन) ही था।
तो फिर किसे जातिगत अपमान माना जायेगा
70 पेज का फैसला लिखते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि केवल उन मामलों में जानबूझकर अपमान या धमकी दी जाती है, जो छुआछूत की प्रथा या ऊंची जातियों के निचली जातियों/अछूतों पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए होते हैं। इन्हें 1989 एक्ट में अपमान या धमकी कहा जा सकता है।
बेंच ने कहा कि अपमानित करने का इरादा वही है, जिसे कई विद्वानों ने हाशिए पर पड़ी जातियों के लिए बताया है। यह कोई साधारण अपमान या धमकी नहीं है जिसे अपमान माना जाए और जिसे 1989 के अधिनियम के तहत दंडनीय बनाने की मांग की गई है।
कोर्ट की सलाह- श्रीनिजन चाहे तो मानहानि का मुकदमा कर सकते हैं
माफिया डॉन के संदर्भ का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा- निंदनीय आचरण और अपमानजनक बयानों को देखते हुए, अपीलकर्ता (स्कारिया) के बारे में केवल यह कहा जा सकता है कि उसने IPC की धारा 500 के तहत मानहानि का अपराध किया है। यदि ऐसा है, तो शिकायतकर्ता (श्रीनिजन) के लिए अपीलकर्ता (स्कारिया) के खिलाफ मुकदमा चलाने के रास्ते हमेशा खुले रहेंगे।
हालांकि, शिकायतकर्ता (श्रीनिजन) केवल इस आधार पर 1989 एक्ट के तहत केस दर्ज करने की अपील नहीं कर सकता, क्योंकि वह अनुसूचित जाति से है और वीडियो की कॉपी में भी यह साबित नहीं हुआ कि स्कारिया का श्रीनिजन का अपमान करना उसकी जाति से प्रेरित था।
पहले भी हुई थी साजिश
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट के कुछ प्रावधानों में बदलाव किया था। इसके विरोध में 3 मार्च को भारत बंद बुलाया गया था। प्रदर्शन के दौरान 10 से ज्यादा राज्यों में हिंसा हुई थी और 15 लोगों की मौत हो गई थी।
कोर्ट के फैसले से देश में गुस्सा और असहजता
सरकार ने लिखित जवाब दायर कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जो फैसला दिया, उससे देशभर में लोगों के बीच हलचल, गुस्सा और असहजता बढ़ी है। इसके अलावा कोर्ट के आदेश से जो भ्रम की स्थिति पैदा हुई है, उसे ठीक करने के लिए फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है।
कोर्ट को लिखित जवाब में केंद्र की तरफ से अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को न्यायिक कानून से संशोधित किया है, जबकि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अपने अधिकार हैं और उनका उल्लंघन नही किया जा सकता।
एससी-एसटी एक्ट: टाइमलाइन
12 अप्रैल: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अपने फैसले पर पुनर्विचार करें, क्योंकि इस फैसले ने एक्ट के कानूनी प्रावधानों को कमजोर किया है।
4 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की। करीब एक घंटे तक चली सुनवाई में बेंच ने कहा कि कोर्ट के आदेश ने एससी-एसटी एक्ट को कमजोर नहीं किया। कोर्ट ने फैसले पुनर्विचार याचिका पर 10 दिन में सुनवाई करने की बात कही।
3 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित संगठनों ने भारत बंद बुलाया। प्रदर्शन हिंसा में बदला 10 राज्यों में 14 लोगों की मौत हुई।
– केंद्र ने भी इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने इस पर फौरन सुनवाई से इनकार कर दिया था।
20 मार्च: सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर फैसले के साथ आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले केसों में अग्रिम जमानत मिले। पुलिस को 7 दिन में जांच करनी चाहिए। सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती।
एससी/एसटी एक्ट के मामले में वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं:
1) एससी/एसटी कानून में कहां पुलिस से शिकायत हुई थी
– महाराष्ट्र में शिक्षा विभाग के स्टोर कीपर ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। स्टोर कीपर ने शिकायत में आरोप लगाया था कि महाजन ने अपने अधीनस्थ उन दो अिधकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी है, जिन्होंने उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में जातिसूचक टिप्पणी की थी।
2) पुलिस से शिकायत होने के बाद कैसे आगे बढ़ा मामला
– पुलिस ने जब दोनों आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी, तो वह नहीं दी गई। इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्ज कर लिया। महाजन का तर्क था कि अगर किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के खिलाफ ईमानदार टिप्पणी करना अपराध हो जाएगा तो इससे काम करना मुश्किल जो जाएगा।
3) एफआईआर के बाद हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में केस कब से
– 5 मई 2017 को काशीनाथ महाजन ने एफआईआर खारिज कराने हाईकोर्ट पहुंचे। पर हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। एफआईआर खारिज नहीं हुई तो महाजन ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस पर शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को उन पर एफआईआर हटाने का आदेश दिया।
4) सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को फैसले में क्या कहा था
– सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के साथ आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले केसों में अग्रिम जमानत मिले। पुलिस को 7 दिन में जांच करनी चाहिए। सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती।
5) क्यों फैसले का विरोध शुरू हुआ, सरकार ने क्या किया
– इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दलित संगठनों और विपक्ष ने केंद्र से रुख स्पष्ट करने को कहा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की।
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6) आखिर इस फैसले के विरोध क्यों हो रहा है
– दलित संगठनों का तर्क है कि 1989 का एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम कमजोर पड़ जाएगा। इस एक्ट के सेक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है।