मौतों का कब्रगाह बना दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे वजह ख़राब क्वालिटी

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 14 जुलाई 2024 | जयपुर : देश का सबसे बड़ा दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे राजस्थान में हादसों का हाईवे बना हुआ है। लगातार हो रही दुर्घटनाओं में अब तक 156 लोगों की मौत हो चुकी है।

मौतों का कब्रगाह बना दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे वजह ख़राब क्वालिटी

अकेले दौसा में ही 50 से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं। एक्सप्रेस-वे पर कुछ ऐसे पॉइंट्स हैं, जहां बार-बार एक्सीडेंट हो रहे हैं। मई और जून के महीने में सबसे ज्यादा 15 एक्सीडेंट यहीं हुए, जिनमें 23 की मौत हुई, जबकि 55 लोग घायल हुए।

मौतों का कब्रगाह बना दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे वजह ख़राब क्वालिटी

खौफनाक हादसों वाले ये पॉइंट्स कौनसे हैं? आखिर यहीं सबसे ज्यादा एक्सीडेंट क्यों हो रहे हैं? क्या एक्सप्रेस-वे में इंजीनियरिंग खामियां हैं? ऐसे ही सवालों का जवाब तलाशने हम एक्सपर्ट इंजीनियर-रिसर्चर की टीम को साथ लेकर हादसे वाले पॉइंट्स पर ग्राउंड रिपोर्ट के लिए पहुंचे। 

15 किलोमीटर के सर्किल में कुछ दूरी में हुए हादसे

भास्कर रिपोर्टर ने मई और जून महीने में हुए 15 बड़े एक्सीडेंट की डिटेल निकाली। इस डिटेल के आधार पर राजस्थान के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट में से एक मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MNIT), जयपुर के एक्सपट्‌र्स, शोधार्थी और सीनियर प्रोफेसर की मदद से स्टडी की।

एक्सपट्‌र्स ने राजस्थान के 7 जिलों से गुजर रहे 373 किलोमीटर लंबे 8 लेन एक्सप्रेस-वे का पूरा नक्शा खंगाला। सबसे ज्यादा हादसे वाली जगहों को नक्शे में ही चिह्नित किया। रिसर्च में सामने आया कि भांडारेज से एंट्री करने के बाद सबसे ज्यादा एक्सीडेंट बांदीकुई इलाके के 15 किलोमीटर रेंज में ही हुए हैं।

रूट मैप तैयार होने के बाद एक्सपट्‌र्स को साथ लेकर दौसा से एक्सप्रेस-वे पर दाखिल हुए और सबसे ज्यादा हादसे वाले सभी पॉइंट्स का मौका मुआयना किया। हादसों की 7 वजहें सामने आईं…

1. जहां-जहां घुमाव, एक्सीडेंट उन्हीं घुमावों के आस-पास

हम सबसे पहले दौसा के भांडारेज पर बने एंट्री पॉइंट से एक्सप्रेस-वे पर दाखिल हुए। हमने करीब 20 किलोमीटर लंबा सफर तय किया। हादसे वाले पॉइंट्स का मिलान करने के बाद MNIT के रिसर्चर अंकित गुप्ता ने बताया कि नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने जामरोली से लेकर सोमाड़ा गांव के बीच 15 किलोमीटर एरिया में ही 3 जगह घुमाव बना रखे हैं। करीब 90 फीसदी एक्सीडेंट घुमाव वाली जगह पर हो रहे हैं।

दो दिन पूर्व दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर कुंतलवास पुलिया के पास एक स्कॉर्पियो बेकाबू होकर पलट गई। हादसे में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।

दो दिन पूर्व दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर कुंतलवास पुलिया के पास एक स्कॉर्पियो बेकाबू होकर पलट गई। हादसे में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। ये घुमाव 120 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार के पैरामीटर पर बिल्कुल सही बने हैं। लेकिन, गाड़ियां तेज रफ्तार में आती हैं और जैसे ही घुमाव को क्रॉस करने लगती हैं, बैलेंस बिगड़ने पर आगे और पीछे के वाहनों से टकरा जाती हैं।

दरअसल, एक्सप्रेस-वे को गांवों के बाहर से निकालने के लिए हाईवे अथॉरिटी ने ये घुमाव बनाए हैं। कुछ जगहों पर अरावली की पहाड़ियां भी बीच में आ रही थीं। एक्सपट्‌र्स का कहना है कि ऐसे घुमाव पर स्पीड लिमिट 100 या इससे भी कम करने की जरूरत है।

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर कई घुमाव हैं, जहां वाहन चालक सावधानी नहीं रख पाते।

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर कई घुमाव हैं, जहां वाहन चालक सावधानी नहीं रख पाते। MNIT में सिविल डिपार्टमेंट के सीनियर प्रोफेसर महेश स्वामी ने बताया कि जहां घुमाव हैं, वहां NHAI को स्पीड कंट्रोल के साइन बोर्ड लगाने चाहिए। साथ ही चालकों को भी ऐसे घुमाव पर स्पीड बैलेंस करनी चाहिए, ताकि हादसा नहीं हो।

2. कई पॉइंट्स पर सड़क खराब, गलत पैचवर्क भी जानलेवा

भांडारेज से करीब 15 किलोमीटर आगे रेस्ट एरिया को क्रॉस करने के बाद एक अंडरपास बना हुआ है। यहां हमने देखा कि सड़क के बीच दूसरी लेन में एक लंबा पेच वर्क बना हुआ था। एक्सपर्ट अंकित गुप्ता ने गाड़ी को रुकवाया।

एक्सप्रेस-वे पर हुए पैचवर्क का ड्रोन शॉट।

एक्सप्रेस-वे पर हुए पैचवर्क का ड्रोन शॉट। हम उतर कर पैचवर्क वाली जगह के करीब पहुंचे और उसके ऊपर से गुजरने वाले वाहनों को देखा। नोटिस में आया कि ज्यादातर वाहनों का बैलेंस बिगड़ रहा था। पैचवर्क के कारण वाहन अपनी लेन बदल रहे थे।

अंकित गुप्ता ने बताया- यहां पैचवर्क गलत है। NHAI के नियमों के हिसाब से एक ही लेन में इतना लंबा पैचवर्क स्क्वायर शेप में नहीं कर सकते। मान लीजिए चार लेन हैं और उसमें से एक लेन में कोई छोटा-सा भी गड्ढा हो जाए तो उतने एरिया में हटाने के बाद क्रॉस मैथड (पैरलेलग्रैम) से पैचवर्क करते हैं।

यानी समानांतर चतुर्भुज बनाया जाता है। पैचवर्क को पूरी तरह से पुरानी सड़क के लेवल तक मिलाया जाता है। वो सड़क पर बिल्कुल भी उभरा हुआ नहीं होना चाहिए, ताकि रफ्तार में आने वाली गाड़ियों का बैलेंस नहीं बिगड़े।

3. एक्सप्रेस-वे पर जहां भी अंडरपास, वहां बिगड़ रहा वाहनों का बैलेंस

एक्सप्रेस-वे पर कई जगह एनीमल पास या फिर अंडरपास बनाए गए हैं। कई अंडरपास घुमाव वाली जगहों पर भी हैं। इन्हें बनाने में पूरे पैरामीटर का ध्यान रखा गया है। लेकिन, जब कोई वाहन 120 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड को क्रॉस करते हुए इन अंडरपास के ऊपर से गुजरता है तो बैलेंस बिगड़ जाता है।

हमने अंडरपास पर खड़े होकर 100 से ज्यादा गाड़ियों काे निकलते हुए नोटिस किया। कई वाहनों का बैलेंस बिगड़ रहा था।

हमने अंडरपास पर खड़े होकर 100 से ज्यादा गाड़ियों काे निकलते हुए नोटिस किया। कई वाहनों का बैलेंस बिगड़ रहा था। अंकित गुप्ता ने बताया कि अंडरपास पर चढ़ते समय कोई दिक्कत नहीं आती, लेकिन ढलान पर लोग स्पीड कम नहीं करते। इससे गाड़ी के सस्पेंशन और टायरों पर अचानक से प्रेशर पड़ता है। इससे गाड़ी एकदम थोड़ा-सा नीचे दब जाती है।

4. ओवर स्पीड बन रही मौत की वजह, 180 KMPH से भी क्रॉस कर रहे लोग

एक्सप्रेस-वे पर एक्सीडेंट की सबसे बड़ी वजह है वाहनों का स्पीड लिमिट क्रॉस करना। हमने एक्सप्रेस-वे की दोनों लेन पर खड़े होकर देखा। कई वाहनों की स्पीड 120 किलोमीटर प्रतिघंटा से भी कहीं अधिक थी। तेज स्पीड में ही कई गाड़ियों को ओवरटेक करते हुए भी देखा।

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर स्पीड की लिमिट तो 120 किलोमीटर प्रति घंटा की है, लेकिन वाहन चालक इसे क्रॉस करने से नहीं हिचकते।

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर स्पीड की लिमिट तो 120 किलोमीटर प्रति घंटा की है, लेकिन वाहन चालक इसे क्रॉस करने से नहीं हिचकते। भांडारेज पॉइंट पर बने कंट्रोल रूम के पास पेट्रोलिंग कर रहे ऑफिसर नीरज चौहान ने बताया कि ओवर स्पीड ही एक्सीडेंट की सबसे बड़ी वजह है।

पेट्रोलिंग वाहनों के जरिए हम लगातार ओवर स्पीड वाहनों को मॉनिटर कर उनके खिलाफ चालान भी कर रहे हैं। कई चालान तो ऐसे हैं जिनकी स्पीड 180 किलोमीटर प्रति घंटा की पाई गई। 90 फीसदी से ज्यादा चालान में वाहनों की स्पीड 150 किलोमीटर प्रति घंटा पाई गई है।

पेट्रोलिंग ऑफिसर नीरज चौहान ने बताया ज्यादातर हादसों की वजह 180 किलोमीटर प्रति घंटा से भी ज्यादा की रफ्तार है।

पेट्रोलिंग ऑफिसर नीरज चौहान ने बताया ज्यादातर हादसों की वजह 180 किलोमीटर प्रति घंटा से भी ज्यादा की रफ्तार है। कंट्रोल रूम में स्पीड चेक करने के लिए कैमरे लगे हुए हैं। 120 किलोमीटर की सीमा पार करने वालों को स्पीड मीटर की फोटो के साथ चालान भेजा जाता है। किसी तरह का एक्सीडेंट होने पर 1033 की गाड़ियां और एंबुलेंस 10 से 15 मिनट में ही तुरंत मौके पर पहुंच जाती है। लेकिन, फिर भी बहुत लोग स्पीड लिमिट का पालन नहीं करते।

5. अचानक लेन बदल रही गाड़ियां, स्टीयरिंग से हाथ उठाया तो मौत!

एक्सप्रेस-वे पर हुए कुछ हादसों के सीसीटीवी फुटेज खंगालने पर सामने आया कि तेज गति से आ रही गाड़ियां अचानक से लेन बदल लेती हैं और फिर पलटते हुए हादसे का शिकार हो जाती हैं। आखिर ऐसा क्यों है?

एक्सप्रेस-वे पर 50 से ज्यादा बार दिल्ली का सफर कर चुके सुरजीत सिंह ने हमें एक्सपेरिमेंट करके दिखाया। उन्होंने हमारी कार को 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ाया। जरा सा स्टीयरिंग से हाथ हटाने पर हमारी कार अचानक ही तीसरी लेन से पहली लेन की तरफ मुड़ रही थी। सुरजीत सिंह ने बताया कि ऐसा उनके साथ कई बार हो चुका है।

एक्सपर्ट अंकित गुप्ता ने कारण जानने के लिए कार रुकवाई और कुछ देर मुआयना किया। फिर बताया कि देश के ज्यादातर हाईवे पर बरसात के पानी को निकालने के लिए लेफ्ट साइड में ढलान (स्लोप) दिया जाता है। लेकिन, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर कुछ जगहों पर ढलान राइट हैंड (अंदर की तरफ) साइड दी गई है। यह केवल उन जगहों पर एक्सप्रेस-वे के बीच ग्रीन बेल्ट है।

इसका मकसद है बारिश का पानी सड़क पर नहीं भरे और ग्रीन बेल्ट में लगे पौधों को मिल जाए। ये ढलान बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन तेज गति से आ रहे वाहनों के लिए तब खतरनाक हो जाती है, जब कोई रिलेक्स होकर या स्टीयरिंग से हाथ हटा लेता है। गाड़ी तीसरी या चौथी लेन से अंदर की तरफ घुस जाती है और हादसे हो जाते हैं।

6. मई-जून में सबसे ज्यादा हादसे और मौतें, 50 डिग्री! का पारा बड़ा कारण

स्टडी में सामने आया कि सबसे ज्यादा हादसे मई और जून के महीने में हुए हैं। अधिकांश हादसों की वजह एक्सप्रेस-वे पर टायरों का ब्रस्ट होना यानी फटना है।

एमएनआईटी के एक्सपर्ट शोधार्थी अंकित गुप्ता के मुताबिक गर्मियो में डामर की सड़क तपने लगती हैं। इससे गाड़ियों के टायर फटने का डर बना रहता है।

एमएनआईटी के एक्सपर्ट शोधार्थी अंकित गुप्ता के मुताबिक गर्मियो में डामर की सड़क तपने लगती हैं। इससे गाड़ियों के टायर फटने का डर बना रहता है। एक्सपर्ट अंकित गुप्ता ने बताया कि एक तो एक्सप्रेस-वे 300 किलोमीटर से ज्यादा लंबा है। जब गाड़ी बिना रुके इतने लंबे डामर रूट पर चलती हैं तो टायर गर्मी से काफी गर्म हो जाते हैं।

टायर अगर घिसे हुए हैं तो वे लगातार चलने पर फट जाते हैं। मई-जून के महीने में इस बार कई शहरों में तापमान 48 डिग्री से ऊपर चला गया था। अधिक तापमान से सड़क भी काफी तपने लग जाती हैं। पहले NHAI का दावा था कि एंट्री पॉइंट्स पर टायरों की कंडीशन का चेकअप किया जाएगा। अगर टायर ज्यादा कमजोर हुए तो ऐसे वाहनों को एक्सप्रेस-वे पर जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

7. एंट्री पॉइंट्स पर टायरों में नाइट्रोजन का चेकअप नहीं

हम दौसा के भांडारेज में NHAI एक्सप्रेस-वे के एंट्री पॉइंट पर पहुंचे। एक्सप्रेस-वे पर चढ़ने से पहले एंट्री पाइंट पर टोल प्लाजा बना हुआ है। एक्सपर्ट अंकित गुप्ता ने बताया- NHAI ने पहले दावा किया था कि एक्सप्रेस-वे पर चलने वाली गाड़ियों के टायरों में नाइट्रोजन हवा का चेकअप करेंगे। टायरों में नाइट्रोजन हवा होना अनिवार्य किया जाएगा।

एक्सपर्ट के मुताबिक एक्सप्रेस-वे पर टायर फटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।

एक्सपर्ट के मुताबिक एक्सप्रेस-वे पर टायर फटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। जिन वाहनों के टायरों में नाइट्रोजन हवा नहीं होगी, उनकी एंट्री नहीं होगी। क्योंकि नाइट्रोजन गैस टायर को ठंडा रखती है। सामान्य गैस टायरों को गर्म कर देती है, जिससे टायर फट जाते हैं। लेकिन, अभी ऐसी कोई बाध्यता नहीं लगाई गई है।

एक्सप्रेस-वे पर पैदल चलते हुए वाहन से टकराए तो क्लेम भी नहीं

एक्सप्रेस-वे को पूरी तरह से पैदल आवागमन से फ्री रखा गया है। किसी तरह की क्रॉसिंग लाइन और रेड लाइट नहीं है। अगर एक्सप्रेस-वे को पार करते समय किसी व्यक्ति को स्पीड में आ रहा वाहन टक्कर मार देता है तो मौत पर भी इंश्योरेंस कंपनी से क्लेम नहीं मिल सकता है।

अंकित गुप्ता ने बताया कि एक्सप्रेस-वे को पूरी तरह से सेफ तरीके से बनाया गया है। यह देश के बेहतरीन हाईवे में से एक है। लेकिन, चालकों को अपने वाहनों की मेंटेनेंस और एक्सप्रेस-वे पर आते समय स्पीड पर कंट्रोल रखना चाहिए।

एक्सप्रेस-वे के आस-पास एक्सीडेंट के बाद कचरे को हटाया नहीं गया है। इन कारणों से भी हादसों से इनकार नहीं किया जा सकता।

एक्सप्रेस-वे के आस-पास एक्सीडेंट के बाद कचरे को हटाया नहीं गया है। इन कारणों से भी हादसों से इनकार नहीं किया जा सकता।

दौसा में NHAI के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डीके चौधरी से सवाल-जवाब

1. एक्सप्रेस-वे पर जहां कर्व हैं, वहां एक्सीडेंट सबसे ज्यादा हुए हैं?

जवाब : एक्सप्रेस-वे का कंस्ट्रक्शन IRCSP-99 के मानकों के अनुसार हुआ है। ऐसे में कर्व को एक्सीडेंट का कारण नहीं मान सकते। पिछले दिनों में हुए अधिकांश एक्सीडेंट में वाहन ड्राइवर को नींद आना सबसे बड़ा कारण था।

2. कई जगह अंडरपास के आगे-पीछे सड़क का लेवल डाउन होने से भी हादसे हुए हैं?

जवाब : निर्माण के दौरान कई जगह गांवों के लोगों ने उनके आवागमन की सहूलियत के लिए लेवल नहीं बढ़ाने दिया। ऐसी जगहों पर लेवल डाउन है, लेकिन उससे हादसे नहीं हो सकते।

3. एक्सप्रेस-वे पर आवारा जानवर भी हादसे का कारण हैं, जबकि सुरक्षित सफर का दावा किया गया था?

जवाब : पिछले दिनों एक एक्सीडेंट आवारा पशु की वजह से हुआ था। इसकी जांच करने पर सामने आया कि आसपास के लोग आवागमन के लिए सुरक्षा दीवार को खोल देते हैं। इससे आवारा पशु चढ़ जाते है, इन्हें रोकने के निर्देश दिए हैं।

दौसा स्थित नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया के दफ्तर की तस्वीर।
दौसा स्थित नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया के दफ्तर की तस्वीर

4. वाहनों की ओवर स्पीड पर क्या कार्रवाई की जाती है?

जवाब : कमर्शियल वाहनों की स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटा और फोर व्हीलर की 120KMPH तय की हुई है। इससे तेज स्पीड चलने वाले वाहनों की सीसीटीवी कैमरे से मॉनिटरिंग कर NIC के जरिए चालान की व्यवस्था की गई है। उनसे अनुबंध हो गया है, अब जल्द ही चालान शुरू किया जाएगा।

1355 किलोमीटर लंबा होगा दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे

दिल्ली से मुंबई तक 1355 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेस-वे बनाया जा रहा है। एक्सप्रेस-वे को बनाने के लिए पांच राज्यों में 1500 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया था। एक्सप्रेस-वे की गुजरात में लंबाई 426 किलोमीटर, राजस्थान में लंबाई 373 किलोमीटर, मध्यप्रदेश में 244 किलोमीटर, महाराष्ट्र में 171 लंबाई, हरियाणा में 129 किलोमीटर की लंबाई रहेगी। एक्सप्रेस-वे राजस्थान के 7 जिलों से होकर निकल रहा है, जिनमें अलवर, दौसा, भरतपुर, कोटा, बूंदी, सवाईमाधाेपुर और टोंक हैं।

दैनिक भास्कर से साभार : जनहित में संपादित रिपोर्टिंग 

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‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का समाधान

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 29 मार्च 2025 | जयपुर : सबसे बड़े भू-भाग वाला प्रदेश- राजस्थान का क्षेत्रफल 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर है जहां 6.85 करोड़ जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का आठवां बड़ा राज्य है व भू-भाग की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य। सात संभाग, 33 जिले, 41353 ग्राम, उत्तर से दक्षिण की लंबाई 826 वर्ग किमी व पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 869 वर्ग किमी है।

‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का समाधान

भारत के अलग अलग भागों में नए राज्यों के निर्माण की मांग उठ रही है जिनमें अरावली प्रदेश सबसे प्रबल है। राष्ट्रीय एकता व अखण्डता, सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक, कृषि, उद्योग इत्यादि की विपुल संभावनाओं के मद्देनजर अरावली प्रदेश निर्माण की दावेदारी सबसे प्रबल है। भारत का सबसे बड़ा भूभाग राजस्थान जो दुनियां के 110 देशों से भी क्षेत्रफल में बड़ा है जिसको बीचों बीच से अरावली पर्वतश्रेणी ने दो भागों में विभाजित किया है जिसका उत्तरी पश्चिमी रेगिस्तानी थार का अरावली स्थल ही अरावली प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का समाधान

विश्वनाथ सुमनकेंद की सैद्धांतिक सहमति के बाद तेलंगाना ऐसा मुद्दा बन गया है, जिसके बल पर राजनीतिक दल काफी लंबे समय तक सियासी मैदान में दौड़ लगा सकते हैं। तेलंगाना के मुद्दे ने उन राजनीतिक दलों और गुटों को दोबारा जिंदा कर दिया है, जो छोटे राज्य बनाने के हिमायती हैं और जिनकी राजनीति हाल तक उनके असर वाले इलाकों में ही धूल फांक रही थी। आंध्र के बंटवारे के साथ यूपी को तीन हिस्सों में तोड़ने, महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिम बंगाल में गोरखा लैंड और असम में बोडो लैंड बनाने की आवाज भी तेज हो गई। पृथक गोरखा लैंड के मुद्दे पर केंद्र सरकार, गोरखा जन मुक्ति मोर्चा और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच त्रिपक्षीय वार्ता शुरू हो चुकी है। पर इन सबके साथ, यह बहस भी गरमा गई है कि विकास के लिए छोटे राज्यों का निर्माण होना जरूरी है या यह मसला किसी वर्ग, नस्ल या क्षेत्र विशेष के लोगों को संतुष्ट करने का आसान जरिया भर है।

आजादी के बाद रजवाड़ों के भारतीय गणराज्य में विलय के साथ नए राज्यों के गठन का आधार तैयार होने लगा था। 1953 में स्टेट ऑफ आंध्र वह पहला राज्य बना, जिसे भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट से अलग किया गया। इसके बाद दिसंबर 1953 में पंडित नेहरू ने जस्टिस फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया। एक नवंबर 1956 में फजल अली आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हो गया और भाषा के आधार पर देश में 14 राज्य और सात केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए। मध्य प्रांत के शहर नागपुर और हैदराबाद के मराठवाड़ा को बॉम्बे स्टेट में इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि वहां मराठी बोलने वाले अधिक थे। इसके बाद लगातार कई राज्यों का भूगोल बदलता रहा और नए तर्कों व मानकों के आधार पर नए राज्य बनते गए। त्रिपुरा को असम से भाषा के आधार पर अलग किया गया तो मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड का गठन नस्ल के आधार पर किया गया।

सन 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के बंटवारे के आधार भी विकास नहीं बल्कि परोक्ष रूप से नस्ल और भाषा ही बनी। आज भारत में 28 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश हैं।नया राज्य बनाने से पहले उन राज्यों की स्थिति का जायजा लिया जाना चाहिए, जो बड़े-बड़े दावों के आधार पर बनाए गए थे। यह आकलन का विषय है कि मूल प्रदेश से अलग होने के बाद क्या उन राज्यों में क्रांतिकारी बदलाव आए? निर्माण के दशकों बाद भी पूर्वोत्तर के राज्य विकास की बाट जोह रहे हैं। मणिपुर और नगालैंड में अलगाववादियों को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है। आज इन राज्यों की सरकारें पांच साल पूरा कर लेती हैं, तो उसे अचीवमेंट माना जाता है।आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि यूपी से अलग होने के बाद उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई।

 बिहार में प्रति व्यक्ति आय 10,570 रुपये ही है जबकि झारखंड में यह आंकड़ा 20,177 रुपये तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ में प्रति व्यक्ति आय 29,000 है, जबकि मध्य प्रदेश में औसत आय 18,051 रुपये ही है। आंकड़े जो चाहे कहें, मगर इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस कागजी समृद्धि के पीछे राज्य के विकास की जगह बंटवारे के बाद जनसंख्या में आई औसत कमी का योगदान अधिक है। इन राज्यों की जमीनी हालात में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है। इन राज्यों की सरकारों ने न तो सिस्टम में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है और ऐसी योजनाएं बनाई हैं, जिनसे प्रदेश की जनता की स्थिति में सुधार हुआ हो। आज भी छत्तीसगढ़ और झारखंड में नक्सली हमले जारी हैं। वहां के निवासियों को उन दिक्कतों से निजात नहीं मिली है, जो 2000 से पहले वहां थीं।

वहां आज भी लोग स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क बिजली, पानी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। चाहे पंजाब से अलग हुआ हरियाणा हो या उत्तराखंड, ये राज्य आर्थिक मदद के लिए हमेशा दिल्ली की ओर टकटकी लगाए रखते हैं। इन सबके बीच इन प्रदेशों में लालबत्ती लगी गाड़ियों और नए सरकारी दफ्तरों की तादाद में खासा इजाफा हुआ। संसाधनों की बंदरबांट पहले की तरह जारी है, बस, बांटने वालों के चेहरे बदल गए हैं। सचाई यह है कि नए राज्यों की मांग के पीछे दिए जाने वाले ज्यादातर तर्कों का स्वरूप नकारात्मक है। मसलन, हरित प्रदेश की मांग इसलिए की जा रही है कि भारी राजस्व जुटाने के बाद भी वेस्टर्न यूपी को बुंदेलखंड और पूर्वांचल की समस्याओं का साझा बोझ उठाना पड़ रहा है। गोरखा लैंड में बसने वाले बंगाली नहीं होंगे। विदर्भ और तेलंगाना को उपेक्षित रहने का मलाल है। इन तर्कों के साथ चल रहे आंदोलनों ने वैमनस्य की स्थिति पैदा कर दी है। एक हकीकत यह भी है कि इन राज्यों में पृथक राज्य के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठनों के पास विकास के लिए स्वीकार्य रोडमैप नहीं है।

सवाल है कि क्या गोरखा लैंड चाय और पर्यटन के सहारे अपने खर्चे जुटा लेगा। महाराष्ट्र से अलग होने के बाद विदर्भ के किसानों की स्थिति सुधर जाएगी? बुंदेलखंड और पूर्वांचल का पेट कैसे भरेगा? अगर इन नए प्रदेशों को गठन कर भी दिया जाए, तो वहां विकास का खाका खींचने में ही कई दशक गुजर जाएंगे। इसलिए झारखंड, उत्तराखंड और नॉर्थ ईस्ट से सबक लेने की जरूरत है। अगर इन राज्यों में डिवेलपमेंट की सही प्लानिंग की गई होती और बंटवारे का मकसद सियासी लाभ लेना नहीं होता तो इन नए नवेले राज्यों की सूरत कुछ और होती। राज्य छोटे हों या बड़े, यदि शासन करने वालों की नीति और नीयत साफ हो तो राज्य का आकार मायने नहीं रखता। अमेरिका में 50 राज्य हैं जबकि उसकी आबादी भारत से कम है। सही गवर्नेंस के लिए वहां भी एक नए राज्य की गठन की तैयारी चल रही है, बिना शोर-शराबे के। वहां किसी राजनीतिक दल को अनशन और आंदोलन करने की जरूरत नहीं पड़ी। वहां की पॉलिटिकल पार्टियों में इसके लिए क्रेडिट लेने मारामारी भी नहीं है। भारत में भी छोटे राज्य बनाने में कोई हर्ज नहीं, बशर्ते राज्यों का गठन विकास के लिए हो, न कि किसी जाति या और राजनीतिक गुट को खुश करने के लिए।

क्यों जरुरी है राजस्थान का “मरु और अरावली प्रदेश” में विभाजन

मरुप्रदेश के 20 जिलों में देश का 27 प्रतिशत तेल, सबसे महंगी गैस, खनिज पदार्थ, कोयला, यूरेनियम, सिलिका आदि का एकाधिकार है। एशिया का सबसे बड़ा सोलर हब और पवन चक्कियों से बिजली प्रोडक्शन यहाँ हो रहा है। गौरतलब है कि एक तरफ जहां राजस्थान में प्रति व्यक्ति तो ज्यादा है, लेकिन पश्चिम राजस्थान के जिलों में रहने वालों का एवरेज निकाला जाये तो उनकी आय काफी कम है। राजस्थान की भौगोलिक और सांस्कृतिक इकाईयों में असमानता, आर्थिक विकास और राजनैतिक विमूढ़ता का सबसे ज्यादा नुकसान इस इलाके को उठाना पड़ा है।

राजस्थान के इस 40.11% भूभाग के निवासियों के साथ विकास की प्रक्रिया में कभी न्याय नहीं हो पाया। अरावली प्रदेश मुक्ति मोर्चा के संयोजक प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि देश का विकास छोटे राज्यों से ही हो सकता है। राज्य जब तक बड़े राज्य रहे हैं, तब तक विकास से महरूम रहे हैं। झारखंड, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड बेहतरीन उदहारण है, क्योंकि बिहार, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में रहते हुए विकास की डगर वहां तक नहीं पहुँच पायी थी। मगर जैसे ही अलग राज्य बने तो विकास की राह में ये राज्य अपने मूल राज्यों से आगे निकल गये।

अलग अरावली प्रदेश की तार्किक माँग

अलग अरावली प्रदेश की माँग करने का तर्क है कि पूर्वी राजस्थान का ये क्षेत्र राज्य के अन्य हिस्सों के मुकाबले शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। इन जिलों से अरबों रुपयों की रॉयल्टी सरकार कमा रही है, लेकिन इन जिलों में पीने का पानी, रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, स्पोर्ट्स और सैनिक स्कूल, खेतों को नहरों का पानी जैसी समस्यायों से आम जनता जूझ रही है।

इसका प्रमुख कारण भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति अलग है। इस हिस्से की जलवायु, कृषि, उद्योग और जनसंख्या का वितरण भी अलग है। यदि यह भू-भाग नए राज्य के रूप में सामने आयेगा तो इस क्षेत्र के विकास में तेजी आयेगी। “अरावली में बग़ावत” शीर्षक पुस्तक के लेखक प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने लिखा है कि अरावली भू-भाग का सम्पूर्ण विकास तभी होगा जब अरावली प्रदेश अलग राज्य बनेगा। अरावली के संसाधनों की लूट रुकेगी।

प्रोफ़ेसर मीणा कहते हैं, ”आज़ादी से पहले जहां अरावली का इलाक़ा विकास की दौड़ में शामिल था। वहीं आज़ादी के बाद सभी पार्टियों की सरकारों और चतुर-चालाक मारवाड़ी व्यवसाइयों ने इसके प्रति बेरुख़ी दिखायी। जबकि प्राकृतिक संसाधनों प्रचुरता से ये एरिया ख़ूब मालामाल है। खनिज के हिसाब से देखें तो इस क्षेत्र में कोयला, जिप्सम, क्ले और मार्बल निकल रहा है। वहीं, जोधपुर जैसे शहर में पीने का पानी अरावली क्षेत्र से ट्रेन से भर-भर कर ले जाकर वहाँ के लोगों की प्यास बुझायी जाती थी। बीसलपुर बाँध का पानी पाली, अजमेर और जोधपुर के गाँवों तक पहुँचाया जा रहा है और अब जैसी ही बाड़मेर में तेल और गैस के भंडार मिले हैं, वैसे ही मरू प्रदेश की माँग जोर-शोर से उठायी जा रही है। जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्रियों और उनकी सरकारों ने अरावली भू-भाग (पूर्वी राजस्थान) से रेवेन्यू तो भरपूर लिया है, लेकिन विकास को हमेशा अनदेखा किया है।

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी का 70% हिस्सा अरावली प्रदेश से आता है और उसको 80% से भी अधिक पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में खर्च किया जाता रहा है। इसके समर्थन में आंकड़े गवाह हैं, जो बताते हैं कि कैसे जोधपुर को शिक्षा की नगरी बनाया गया। एक-आध को छोड़कर सारे-के-सारे केंद्रीय शिक्षण संस्थानों (20 से अधिक) को जोधपुर ले जाया गया। अरावली के दक्षिणी छोर से लेकर उत्तरी छोर तक 500 किलोमीटर में एक भी केंद्रीय संस्थान नहीं है। एक तरफ, नर्मदा का पानी रेगिस्तान को हरा-भरा कर रहा है और वहीं दूसरी तरफ, अरावली प्रदेश (भू-भाग) एक-एक बूँद पानी के लिए तरस रहा है।

अरावली प्रदेश के भोले-भाले लोग तो यह भी नहीं जानते कि कैसे मंडरायल (करौली) में लगने वाली सीमेंट फेक्ट्री को जैतपुर (पाली) ले जाया गया जबकि मंडरायल में सब कुछ फाइनल हो चुका था। सवाई माधोपुर सीमेंट फेक्ट्री को कैसे बंद किया गया।” जब वर्ष 2000-01 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 03 राज्य नए बनाये तो उस समय के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत जी ने भी पत्र लिख कर कहा था कि पूरे राजस्थान का विकास व देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए राज्य के दो भाग किये जाये। इसके बाद भी समय समय पर अनेको क्षेत्रीय नेताओ ने इस माँग का समर्थन किया लेकिन पार्टियों की गुलामी के चलते मुखर विरोध नहीं कर सके।

चहुँओर चमकेगी उन्नति, जब बनेगा अरावली प्रदेश

अरावली पर्वत माला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जिसकी गिनती विश्व की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में भी होती है। यह भूवैज्ञानिक दृष्टि से अरबों वर्षों पुरानी है और भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल और इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। राजस्थान इस पर्वतमाला का मुख्य केंद्र है। अरावली यहाँ के परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे राज्य के पश्चिमी और पूर्वी भागों को विभाजित करने वाली प्राकृतिक दीवार भी कहा जाता है। पूर्वी राजस्थान; अरावली के पूर्व में स्थित यह क्षेत्र अपेक्षाकृत उपजाऊ है और यहाँ मैदानी भाग पाये जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान; अरावली के पश्चिम में थार मरुस्थल स्थित है, जो राज्य के लगभग 60% क्षेत्र को कवर करता है। पूर्वी राजस्थान में कृषि के लिए उपयुक्त भूमि है, जहाँ रबी और खरीफ दोनों फसलें उगाई जाती हैं। पश्चिमी राजस्थान का अधिकांश भाग मरुस्थलीय या अर्द्धमरुस्थलीय है।

अरावली पर्वत श्रृंखला की कुल लंबाई गुजरात से दिल्ली तक 692 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 550 किलोमीटर राजस्थान में स्थित है। अरावली पर्वत श्रृंखला का लगभग 80% विस्तार राजस्थान में 22 जिलों में पूर्ण रूप से ओर कुछ जिलों में थोड़ा सा हिस्सा फैला हुआ है। अरावली प्रदेश के 22 जिलों में जयपुर, दौसा, करौली, धौलपुर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां, अलवर, टोंक, भीलवाड़ा, सीकर, झुंझुनूं , चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, राजसमंद, उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर शामिल होंगे।

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अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 26 मार्च 2025 | जयपुर : प्रोफेसर मीना पूर्वी राजस्थान के लिए “अरावली प्रदेश” की स्थापना की वकालत करते हैं। उनकी रणनीति में क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करना और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर बहुजन समुदाय के आर्थिक-सामाजिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है।

भारत की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिए जीवन रेखा के रूप में काम करती रही है। हालाँकि, अवैध खनन, शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण अरावली काफ़ी हद तक क्षरण का सामना कर रही है।

इन दबावों के कारण इस पर्वत श्रृंखला के बड़े हिस्से का क्षरण हुआ है, जिससे रेगिस्तानीकरण, पानी की कमी और जैव विविधता के नुकसान जैसी पर्यावरणीय आपदाएँ हुई हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

 “छोटे राज्यों का गठन” के बारे में चर्चा आम है, जो संभवतः प्रोफेसर राम लखन मीना के “अरावली प्रदेश” प्रस्ताव के संदर्भ में या सामान्य रूप से भारत में छोटे राज्यों के निर्माण की अवधारणा से संबंधित है। इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा और भारतीय संदर्भ में इसके पक्ष-विपक्ष, और प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है। यदि आप इसे “अरावली प्रदेश” तक सीमित रखना चाहते हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

छोटे राज्यों का गठन: एक अवलोकन

भारत में छोटे राज्यों का गठन एक ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रिया रही है, जो मुख्य रूप से भाषाई, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय पहचान, और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर हुई है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत के राज्य पुनर्गठन ने बड़े राज्यों को छोटी इकाइयों में विभाजित करने की माँग को बार-बार देखा है।

ऐतिहासिक उदाहरण

  1. 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम:
    भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ, जैसे आंध्र प्रदेश (तेलुगु), कर्नाटक (कन्नड़), और तमिलनाडु (तमिल)। यह बड़े औपनिवेशिक प्रांतों को छोटी इकाइयों में तोड़ने की शुरुआत थी।
  2. 2000 में तीन नए राज्य:
    • छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश से अलग
    • उत्तराखंड: उत्तर प्रदेश से अलग
    • झारखंड: बिहार से अलग
      इनका गठन क्षेत्रीय उपेक्षा और पहचान के आधार पर हुआ।
  3. तेलंगाना (2014):
    आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना बना, जो विकास में असमानता और सांस्कृतिक पहचान की लंबी लड़ाई का परिणाम था।

छोटे राज्यों के पक्ष में तर्क

  1. प्रशासनिक दक्षता:
    छोटे राज्य सरकार को जनता के करीब लाते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं पर तेजी से ध्यान देना संभव हुआ।
  2. स्थानीय विकास:
    संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का लाभ उठाकर औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।
  3. सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान:
    छोटे राज्य स्थानीय भाषा, परंपराओं और समुदायों को संरक्षित करते हैं। जैसे, तेलंगाना में तेलुगु संस्कृति को अलग पहचान मिली।
  4. राजनीतिक सशक्तिकरण:
    हाशिए पर रहे समुदायों को नेतृत्व का मौका मिलता है। झारखंड में आदिवासी समुदायों की आवाज मजबूत होगी।

छोटे राज्यों के खिलाफ तर्क

  1. आर्थिक व्यवहार्यता:
    छोटे राज्य कभी-कभी स्वतंत्र रूप से आर्थिक रूप से टिक नहीं पाते। मिसाल के तौर पर, झारखंड में विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार और संसाधन प्रबंधन की समस्याएँ बनी रहीं।
  2. प्रशासनिक लागत:
    नए राज्य का ढाँचा—जैसे विधानसभा, सचिवालय, और नौकरशाही—बनाने में भारी खर्च होता है।
  3. विखंडन का खतरा:
    बार-बार विभाजन से राष्ट्रीय एकता पर सवाल उठ सकते हैं। कुछ लोग इसे “बाल्कनीकरण” कहते हैं।
  4. अंतर-राज्य विवाद:
    जल, सीमा, और संसाधनों पर टकराव बढ़ सकता है, जैसे तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच कृष्णा नदी का विवाद।

भारत में गठन की प्रक्रिया

भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को नए राज्यों के गठन का अधिकार है। प्रक्रिया इस तरह है:

  1. माँग की शुरुआत:
    स्थानीय आंदोलन, राजनीतिक दल या समुदाय माँग उठाते हैं।
  2. राज्य विधानसभा की राय:
    संबंधित राज्य विधानसभा से राय ली जाती है (हालाँकि यह बाध्यकारी नहीं है)।
  3. केंद्र सरकार का प्रस्ताव:
    गृह मंत्रालय इसका मूल्यांकन करता है और संसद में विधेयक पेश करता है।
  4. संसदीय मंजूरी:
    दोनों सदनों में साधारण बहुमत से पास होने के बाद राष्ट्रपति की सहमति से यह लागू होता है।
“अरावली प्रदेश” के संदर्भ में प्रोफेसर मीना का प्रस्ताव इस पैटर्न में फिट बैठता है। उनका तर्क है कि पूर्वी राजस्थान की उपेक्षा और बहुजन समुदायों की जरूरतें एक छोटे राज्य से पूरी हो सकती हैं। लेकिन इसके लिए व्यापक जन समर्थन, आर्थिक योजना, और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए—जो अभी प्रारंभिक चरण में लगता है।

छोटे राज्यों का गठन भारत में सफल भी रहा है (तेलंगाना, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़) और चुनौतीपूर्ण भी (झारखंड की आर्थिक अस्थिरता)। यह इस बात पर निर्भर करता है कि नया राज्य अपनी विशिष्टता को कैसे भुनाता है और संसाधनों का प्रबंधन कैसे करता है। यदि आप किसी खास पहलू—आर्थिक प्रभाव या विशिष्ट उदाहरण—पर और जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप “अरावली प्रदेश” पर ही केंद्रित जवाब चाहते हैं या सामान्य चर्चा ठीक है?

“अरावली प्रदेश” के लाभों पर चर्चा करने के लिए प्रोफेसर राम लखन मीना (@ProfRLMeena) के प्रस्तावित विचार को आधार बनाना होगा, जो पूर्वी राजस्थान के जिलों को एक अलग राज्य के रूप में गठित करने की वकालत करता है। यहाँ इसके संभावित लाभों को विस्तार से देखते हैं, जो सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, और पर्यावरणीय पहलुओं पर आधारित हैं:

1. प्रशासनिक दक्षता और स्थानीय फोकस

  • तेज निर्णय प्रक्रिया:
    एक छोटा राज्य होने से सरकार स्थानीय समस्याओं—like ग्रामीण सड़कें, स्कूल, और अस्पताल—पर तेजी से ध्यान दे सकती है। अभी पूर्वी राजस्थान की जरूरतें जयपुर-केंद्रित प्रशासन में दब जाती हैं।
  • जमीनी स्तर तक पहुँच:
    छोटे राज्य में नौकरशाही और जनता के बीच की दूरी कम होगी, जिससे नीतियाँ अधिक प्रभावी होंगी। उदाहरण के लिए, टोंक या दौसा जैसे जिलों की उपेक्षा कम हो सकती है।

2. आर्थिक विकास और संसाधन उपयोग

  • खनिज संपदा का लाभ:
    अरावली क्षेत्र में संगमरमर, ताँबा, जस्ता, और अन्य खनिज प्रचुर हैं। एक अलग राज्य इनका स्थानीय स्तर पर बेहतर उपयोग कर सकता है, जिससे रोजगार और राजस्व बढ़ेगा। अभी ये संसाधन बड़े कॉर्पोरेट्स या राज्य के अन्य हिस्सों की ओर चले जाते हैं।
  • कृषि और पर्यटन:
    पूर्वी राजस्थान की उपजाऊ जमीन और अरावली की पहाड़ियाँ (जैसे रणथंभौर, सरिस्का) पर्यटन और कृषि को बढ़ावा दे सकती हैं। एक समर्पित प्रशासन इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे सकता है।
  • आर्थिक स्वायत्तता:
    स्थानीय कर और निवेश नीतियाँ क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से बनाई जा सकती हैं, बजाय इसके कि पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय मॉडल पर निर्भर रहें।

3. सामाजिक सशक्तिकरण

  • बहुजन समुदायों का उत्थान:
    प्रोफेसर मीना का जोर बहुजन (ओबीसी, एससी, एसटी) समुदायों पर है, जो इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं। एक अलग राज्य उनकी शिक्षा, रोजगार, और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकता है। जैसे, मीणा और गुर्जर समुदायों को नेतृत्व के अधिक अवसर मिल सकते हैं।
  • आरक्षण का प्रभावी कार्यान्वयन:
    छोटे राज्य में आरक्षण नीतियों को स्थानीय स्तर पर बेहतर लागू किया जा सकता है, जिससे जातिगत असमानता कम हो।

4. सांस्कृतिक पहचान और गर्व

  • स्थानीय संस्कृति का संरक्षण:
    अरावली क्षेत्र की सहरिया, भील, मीणा, गुर्जर, और अन्य जनजातीय परंपराएँ राजस्थान की राजपूत-केंद्रित पहचान में दबी रहती हैं। एक अलग राज्य इसे मुख्यधारा में ला सकता है।
  • क्षेत्रीय एकता:
    “अरावली प्रदेश” की पहचान लोगों में गर्व और एकता की भावना जगा सकती है, जैसा कि तेलंगाना या उत्तराखंड में देखा गया।

5. पर्यावरण संरक्षण

  • अरावली पर्वतों की रक्षा:
    अवैध खनन और वन कटाई से अरावली क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है। एक समर्पित राज्य सरकार पर्यावरण नीतियों को सख्ती से लागू कर सकती है, जिससे जैव-विविधता और जल संसाधन बचे रहें।
  • सतत विकास:
    पर्यटन और खनन के बीच संतुलन बनाया जा सकता है, जो अभी बड़े राज्य के ढाँचे में मुश्किल है।

6. शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार

  • शिक्षा पर ध्यान:
    प्रोफेसर मीना शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ हैं। एक छोटा राज्य सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को मजबूत करने पर केंद्रित नीतियाँ बना सकता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • स्वास्थ्य सेवाएँ:
    स्थानीय स्तर पर अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, जो अभी दूर-दराज के इलाकों में कम हैं।

तुलनात्मक उदाहरण

  • छत्तीसगढ़:
    मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद खनिज-आधारित अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ, हालाँकि भ्रष्टाचार एक चुनौती रहा। अरावली प्रदेश भी खनिजों से लाभ उठा सकता है।
  • उत्तराखंड:
    पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरतों पर फोकस से बुनियादी ढाँचा बेहतर हुआ। अरावली के पहाड़ी जिलों को भी ऐसा लाभ मिल सकता है।

संभावित प्रभाव

“अरावली प्रदेश” बहुजन समुदायों के लिए एक प्रयोगशाला बन सकता है, जहाँ सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को संतुलित करने की कोशिश हो। यह क्षेत्र की उपेक्षा को दूर कर सकता है और एक मॉडल राज्य बन सकता है, बशर्ते इसे सही योजना और नेतृत्व मिले।

यदि आप किसी खास लाभ आर्थिक या पर्यावरणीय—पर और गहराई से जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप इसके पक्ष में उनके तर्कों को और विस्तार से पढ़ना-सुनना चाहते हैं?

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