जयपाल सिंह मुंडा को भारतरत्न दें केंद्र सरकार – प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 06 जुलाई 2024 | जयपुर : मूर्धन्य शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने महामहिम राष्ट्रपति और केंद्र सरकार से माँग कि है कि भारतरत्न के हकदार हैं देश के लिए गोल्ड जीतने वाले जयपाल सिंह मुंडा।

महान, दूरदर्शी और  विद्वान नेता, सामाजिक न्याय के आरंभिक पक्षधरों में से एक, संविधान सभा के सदस्य और हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा का योगदान भारत की जनजातियों के लिए वही है, जो बाबा साहब अंबेडकर का अनुसूचित जातियों के लिए है।

भारतरत्न के हकदार हैं देश के लिए गोल्ड जीतने वाले जयपाल सिंह मुंडा

आदिवासियों के लिहाज़ से कई मायनों में जयपाल सिंह मुंडा के योगदान उनसे ज्यादा भी कहा जा सकता है। 1928 के एमस्टर्डम ओलंपिक खेलों में भारत को पहली बार हॉकी का स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा ही थे। जिन्होंने ने संविधान सभा में ताल थोक कर कहा था ‘मुझे गर्व है, मैं जंगली हूँ।’

ध्यातव्य हो कि उनके व्यक्तित्व और योगदान खिलाड़ी के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी उतना ही महान है। उनकी शैक्षणिक विद्वता का एक प्रमाण यह भी है कि उन्होंने जिस साल भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया, उसी साल उन्होंने आईसीएस की परीक्षा भी पास करके दिखाई, वह परीक्षा जिसे कविगुरु रवींद्रनथ ठाकुर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर,  सुभाषचंद्र बोस और खुद जयपाल सिंह मुंडा ही पास कर पाये थे।

आदिवासी परिवार में 3 जनवरी, 1903 को राँची जिले के खुंटी सब डिवीज़न में तपकरा गाँव में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और उसी दौरान हॉकी की अपनी प्रतिभा दिखाकर लोगों को चमत्कृत करना आरंभ कर दिया था।

इसी कारण उन्हें भारतीय हॉकी टीम की ओलंपिक में कप्तानी सौंपी गयी थी। बाद में, अंग्रेज उन्हें भारत में धार्मिक प्रचार  के काम में लगाना चाहते थे, लेकिन जयपाल सिंह ने आदिवासियों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया।

मरांग गोमके  यानी  ग्रेट लीडर के नाम से लोकप्रिय हुए जयपाल सिंह मुंडा ने 1938-39 में अखिल भारतीय आदिवासी महासभा का गठन करके आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई लड़ने का निश्चय किया। मध्य-पूर्वी भारत में आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए उन्होंने अलग आदिवासी राज्य बनाने की माँग की।

उनके प्रस्तावित राज्य में वर्तमान झारखंड, उड़ीसा का उत्तरी भाग, छत्तीसगढ़ और बंगाल के कुछ हिस्से शामिल थे। उनकी माँग पूरी नहीं हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि इन इलाकों में शोषण के खिलाफ नक्सलवाद जैसी समस्याएँ पैदा हुईं, जो आज तक देश के लिए परेशानी बनी हुई है।

जयपाल सिंह मुंडा आदिवासियों के लिए सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे। संविधान सभा के लिए जब वे बिहार प्रांत से निर्वाचित हुए तो उन्होंने आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए उल्लेखनीय  प्रयास किये जिनका जिक्र आज भी बड़े सम्मान और चाव से किया जाता है।

अगस्त 1947 में जब अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों पर पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो उसमें केवल दलितों के लिए ही विशेष प्रावधान किये गये थे।  दलित और आदिवासी अधिकारों के लिए जयपाल सिंह मुंडा और डॉ अंबेडकर ने एक स्वर में आवाज बुलंद की थी। ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा ने कड़े तेवर दिखाये और संविधान सभा में ज़ोरदार भाषण दिया।

संविधान सभा की गर्म और तीखी हो चुकी बहस के बीच अचानक ‘संविधान सभा में आदिवासियों के प्रतिनिधि के रूप में जयपाल मुंडा उठ खड़े होते हैं । काफी संजीदगी लेकिन बुलंद आवाज में कहते हैं कि ‘सिंधु-लोक मेरी विरासत है।  मैं भूला दिये गये उन हजारों अज्ञात योद्धाओं की ओर से बोल रहा हूँ जो आजादी की लड़ाई में आगे रहे ।

लेकिन उनकी कोई पहचान नहीं है । देश के इन्हीं मूल निवासियों को बहस में कई महाशयों (मावलंकर आदि) ने पिछड़ी  जनजाति, आदिम जनजाति, जंगली, अपराधी कहा है ।  जयपाल सिंह ने अपने ‘आदिम लोगों’ की शिकायतों को स्वर देने में कोई कोताही नहीं बरती।

महाशय, मैं बताना चाहता हूँ कि ‘आपकी  भाषा में मैं जंगली हूँ, और मुझे जंगली होने पर गर्व है । उनका कहना था कि ‘उनके लोगों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है … उनका निरादार हो रहा है और पिछले 6000 सालों से उनकी उपेक्षा की जा रही है।’ कब और कैसे यह सब शुरू हुआ?

आदिवासी लोगों के अपमान और उनकी उपेक्षा के लिए जिम्मेदार ये लोग कौन हैं? उन्होंने कहा ‘आज़ादी की इस लड़ाई में हम सबसे आगे थे, हमने अंग्रेजों से लोहा लेने का साहस देश को दिया है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पहली जनक्रांति कहे जाने वाले संथाल विद्रोह के नायक सिद्धू-कान्हो और उनके परिजनों के लिए उनकी लड़ाई अन्याय ही नियति बनी।’

आप तो बाहर से आये हुए लोग हैं, दिकु हैं, जो देश के संसाधनों को कब्जाने की जुगत में हैं।  तिलका माँझी, सिदो-कान्हू, बिरसा मुंडा से लेकर देश की आजादी तक लड़ाई लड़ी, पर उनको मिला क्या ? तिरस्कारपूर्ण जीवन! शोषण-अत्याचार और ऊपर से आपकी बदनीयती, अब सबको एक साथ चलना चाहिए।

पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे आदिवासी ही हैं।  उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया, लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए।”

जयपाल सिंह के सशक्त हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा को आदिवासियों के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ा। इसका नतीजा यह निकला कि 400 आदिवासी समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया। उस समय इनकी आबादी करीब 7 फीसदी आँकी गयी थी। इस लिहाज से उनके लिए लोकसभा-विधानसभाओं में उनके लिए 7.5% आरक्षण और सामाजिक-आर्थिक न्याय पाने के लिए  नौकरियों  में प्रतिनिधित्व  सुनिश्चित किया गया।

यह समीचीन है कि राजनीतिक आरक्षण की समय-सीमा 10 वर्ष राखी गयी किंतु, नौकरियों में कोई भी समय-सीमा नहीं रखी गयी थी । दुर्भाग्यवश, कुछ संकीर्णतावादी मानसिकताओं ने प्रतिनिधित्व को आरक्षण में तब्दील करने की कोशिशें जोर-शोर से हो रही हैं।  किंतु, प्रतिनिधित्व का सवाल तब तक जारी रहेगा जब तक जाति-व्यवस्था जारी रहेगी क्योंकि जातीय-सोच की वजहों से प्रतिनिधित्व का सवाल उपजा है। वस्तुत: आरक्षण और प्रतिनिधित्व में फर्क है, आरक्षण वह है जो हजारों वर्षों मंदिरों में लिया जा रहा है। आरक्षण वह है जो न्यायपालिका में पीढ़ी-दर-पीढ़ी लिया जा रहा है।

इसके बाद आदिवासी हितों की रक्षा के लिए जयपाल सिंह मुंडा ने 1952 में झारखंड पार्टी का गठन किया। 1952 में झारखंड पार्टी को काफी सफलता मिली थी। उसके 3 सांसद और 23 विधायक जीते थे। स्वयं जयपाल सिंह लगातार चार बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुँचे थे। बाद में, झारखंड के नाम पर बनी तमाम पार्टियाँ उन्हीं के विचारों से प्रेरित हुईं।  

पूर्वोत्तर के आदिवासियों में फैले असंतोष को उस समय भी जयपाल सिंह मुंडा पहचान रहे थे। नागा आंदोलन के जनक जापू पिजो को भी उन्होंने झारखंड की ही तर्ज पर अलग राज्य की माँग के लिए मनाने की कोशिश की थी, लेकिन पिजो सहमत नहीं हुए। इसी का नतीजा ये रहा कि आज तक नागालैंड उपद्रवग्रस्त इलाका बना हुआ है।

जयपाल सिंह मुंडा के ही कारण आदिवासियों  (उनको इच्छाओं के विरुद्ध जनजातियों)  को  संविधान में कुछ विशिष्ट अधिकार मिल सके, हालाँकि, व्यवहार में उनका शोषण अब भी जारी है। खासकर, भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले राज्यों; छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और गुजरात में तो इनके सामूहिक खात्मे का अभियान छिड़ा हुआ है। उनके जल, जंगल, जमीन को छिनने की कुत्सित-मानसिकताओं द्वारा  सरदार पटेल तक का इस्तेमाल किया जा रहा है।  

किसी को भी नक्सली बताकर गोली से उड़ा दिये जाने की परंपरा स्थापित हो चुकी है। यह दु:खद स्थिति खत्म करने के लिए एक बार फिर से जयपाल सिंह मुंडा की विचारधारा का अनुसरण किये जाने की जरूरत है। पूरे जीवन आदिवासी हितों के लिए लड़ते-लड़ते 20 मार्च 1970 को जयपाल सिंह मुंडा का निधन हो गया। दुर्भाग्य की बात है कि उसके बाद उन्हें विस्मृत कर दिया गया।

यह अत्यंत दु:ख की बात है कि आज जिनका कोई इतिहास नहीं है, उन्हें इतिहास के पन्नों से खोज- निकालकर नया इतिहास लिखने की कवायद आरंभ हो चुकी है, जबकि आदिवासियों के सबसे बड़े हितैषी  जयपाल सिंह मुंडा को नई पीढ़ी के लोग जानते तक नहीं हैं। उन्हें साजिशन विस्मृत किया जा रहा है।

जब छोटे-छोटे राजनीतिक हितों के लिए लड़ने वाले राजनेताओं और धन के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों  तक को भारत रत्न से सम्मानित किया जा रहा है, ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा जैसे बहुआयामी व्यक्ति के लिए भारत रत्न की माँग तक कहीं सुनाई नहीं देती है। उन्हें भारतरत्न मिलना चाहिए।

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RCA की बर्बादी के लिए कौन है जिम्मेदार, राजस्थान के क्रिकेटर्स का भविष्य चौपट

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 26 मार्च 2025 | जयपुर :  राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) की एडहॉक कमेटी पर शिकंजा कसता जा रहा है। एडहॉक कमेटी को अब राज्य सरकार ने नोटिस जारी कर पिछले एक साल में हुए खर्चों का ब्योरा मांगा है। आरोप है कि कमेटी पदाधिकारी अपने निजी खर्चों के लिए पैसों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

RCA की बर्बादी के लिए कौन है जिम्मेदार

खेल विभाग के सचिव नीरज कुमार पवन ने बताया- वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत मिली थी। इसलिए पूरे मामले की जांच करने का फैसला किया गया है। खर्चों की पूरी जानकारी मांगी गई है। वहीं नई कमेटी के गठन की प्रक्रिया तेज हो गई है।

RCA की बर्बादी के लिए कौन है जिम्मेदार

वर्तमान की एडहॉक कमेटी का गठन एक साल पहले किया गया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि RCA कि बर्बादी के लिए जिम्मेदार कौन है और राजस्थान के होनहार खिलाडियों का करियर कौन बर्बाद कर रहा है?

“RCA की बर्बादी” से आपका तात्पर्य संभवतः राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (Rajasthan Cricket Association) से है। इस सवाल का जवाब देना जटिल है क्योंकि इसके लिए कोई एक व्यक्ति या समूह को स्पष्ट रूप से जिम्मेदार ठहराना संभव नहीं है बिना ठोस तथ्यों और संदर्भ के। यह एक राय-आधारित प्रश्न है जो राजनीतिक, प्रशासनिक और संगठनात्मक कारकों पर निर्भर करता है।

हाल के घटनाक्रमों के आधार पर, जैसे कि फरवरी 2024 में राज्य खेल परिषद द्वारा RCA के दफ्तर पर ताला लगाने की घटना, कुछ लोग इसे राजनीतिक द्वेष से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया था, क्योंकि उनके बेटे वैभव गहलोत RCA के अध्यक्ष हैं। दूसरी ओर, यह भी संभव है कि संगठन के आंतरिक प्रबंधन, वित्तीय अनियमितताओं या नीतिगत विवादों ने इसके संकट में योगदान दिया हो।

एडहॉक कमेटी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

आईपीएल शुरू होने से ठीक पहले राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) की एडहॉक कमेटी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। कमेटी के सदस्यों पर आरसीए के फंड का दुरुपयोग करने, खुद के लिए महंगे आईफोन खरीदने और अनावश्यक रूप से महंगे समारोह आयोजित करने के आरोप हैं।

राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की बर्बादी के लिए कौन है जिम्मेदार

कमेटी के सदस्यों ने कथित रूप से आरसीए के पैसों से 2 लाख रुपये के महंगे आईफोन खरीदे। इसके अलावा, उन्होंने फंड का उपयोग कर महंगे सूट भी सिलवाए। आरसीए के पास खुद का लक्जरी होटल होने के बावजूद बाहरी महंगे होटलों में समारोह आयोजित किए गए, जिससे अनावश्यक खर्च बढ़ा। एक समारोह में 35 लाख रुपये खर्च करने की जानकारी सामने आई है, जबकि पुरस्कार राशि केवल 5 लाख रुपये थी।

सदस्यों पर फर्जी टीए-डीए लेने का भी आरोप है। नियमों के अनुसार, एडहॉक कमेटी का काम केवल तीन माह में चुनाव कराना होता है, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी चुनाव नहीं कराए गए। साथ ही, राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को कार्यक्रमों में निमंत्रण नहीं भेजा गया और साधारण सभा की बैठक भी नहीं बुलाई गई, जो कि वित्तीय मामलों को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक होती है।

राजस्थान के क्रिकेटर्स का भविष्य चौपट

पहले भी खिलाड़ियों के चयन को लेकर एडहॉक कमेटी पर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं। अब इन नए आरोपों ने राजस्थान के क्रिकेट समुदाय में आक्रोश फैला दिया है। क्रिकेट प्रेमियों और खिलाड़ियों ने सरकार से इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि आरसीए के फंड का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि राजस्थान में क्रिकेट का विकास हो सके।

राजस्थान के क्रिकेटर्स का भविष्य “चौपट” होने की बात एक गंभीर चिंता का विषय हो सकती है, लेकिन इसे समझने के लिए हमें कई पहलुओं पर नजर डालनी होगी। राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के हाल के विवादों और प्रबंधन से जुड़े मुद्दों ने निश्चित रूप से राज्य के क्रिकेट पर असर डाला है।

पिछले कुछ वर्षों में RCA में आंतरिक कलह, नेतृत्व के झगड़े और प्रशासनिक अस्थिरता की खबरें सामने आई हैं। उदाहरण के लिए, 2013 में ललित मोदी और उनके विरोधियों के बीच टकराव ने संगठन को दो खेमों में बांट दिया था, जिसका असर खिलाड़ियों के चयन और विकास पर पड़ा।

हाल ही में, फरवरी 2024 में राज्य खेल परिषद द्वारा RCA दफ्तर पर ताला लगाने की घटना ने भी सुर्खियां बटोरीं, जिसे राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया। ये विवाद युवा क्रिकेटर्स के लिए अनिश्चितता पैदा करते हैं, क्योंकि संगठन की अस्थिरता सीधे तौर पर ट्रेनिंग, कोचिंग और टूर्नामेंट्स की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

इसके अलावा, संसाधनों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को उचित सुविधाएं, कोचिंग और एक्सपोजर नहीं मिल पाता। X पर कुछ यूजर्स ने भी इस ओर इशारा किया है कि स्कूलों में भेजी गई खेल सामग्री की गुणवत्ता घटिया है, जिससे बुनियादी स्तर पर खिलाड़ियों का विकास बाधित हो रहा है। साथ ही, चयन प्रक्रिया में कथित तौर पर जातिवाद और पक्षपात की शिकायतें भी सामने आती रही हैं, जो प्रतिभा को मौका देने के बजाय उसे दबा सकती हैं।

हालांकि, यह कहना कि भविष्य पूरी तरह “चौपट” है, शायद अतिशयोक्ति हो। राजस्थान ने अजिंक्य रहाणे, दीपक हुड्डा और राहुल चाहर जैसे खिलाड़ी दिए हैं, जो राष्ट्रीय और IPL स्तर पर चमके। राज्य में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन RCA को स्थिरता, पारदर्शिता और बेहतर नीतियों की जरूरत है। अगर प्रशासन सुधरे, कोचिंग सिस्टम मजबूत हो और युवाओं को सही मंच मिले, तो राजस्थान के क्रिकेटर्स का भविष्य फिर से उज्ज्वल हो सकता है।

3 महीने में होने चाहिए चुनाव

नीरज कुमार पवन ने कहा- हम यही कोशिश करेंगे कि जो भी सदस्य अब एडहॉक कमेटी में आए। वह अगले तीन महीने में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के लंबित चुनाव की प्रक्रिया को पूरा करे। ताकि क्रिकेट की जो गतिविधियां है। वह सही ढंग और सुचारू रूप से संचालित की जा सकें।

राजस्थान क्रीड़ा परिषद ने जारी किया नोटिस।

लाखों रुपए गलत तरीके से खर्च करने के आरोप

दरअसल, पिछले दिनों राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की एडहॉक कमेटी पर खिलाड़ियों के अवॉर्ड फंक्शन के नाम पर लाखों रुपए गलत ढंग से खर्च करने के आरोप लगे थे। राजस्थान क्रीड़ा परिषद ने जारी किया नोटिस।

इसको लेकर काफी जिला संघों के पदाधिकारियों ने खेल मंत्री और खेल विभाग के सचिव तक भी शिकायत की थी। इसमें उन्होंने बताया था कि खिलाड़ियों के पैसे से एडहॉक कमेटी के पदाधिकारी महंगे मोबाइल फोन खरीदने के साथ ही सूट स्टिच करवा रहे हैं।

इसके साथ ही बेवजह लाखों रुपए खर्च कर फाइव स्टार होटल में प्रोग्राम किया जा रहा है। इसके लिए गलत ढंग से एक इवेंट कंपनी को साढ़े सात लाख रुपए में ठेका भी दिया गया है। खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने राजस्थान के खेल संघ की वित्तीय ऑडिट करने के आदेश दिए थे।

खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने राजस्थान के खेल संघ की वित्तीय ऑडिट करने के आदेश दिए थे।

खेल मंत्री ने किया था ट्वीट

खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने ट्वीट कर कहा था कि खेल परिषद को राज्य के सभी खेल निकायों, जिनमें क्रिकेट भी शामिल हैं। ऐसे सभी खेल संघों के लिए एक उच्च स्तरीय शासन प्रणाली लागू करनी चाहिए। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड द्वारा अपनाई गई नीतियों की तरह राजस्थान में भी खेल संगठनों का संचालन किया जाना चाहिए।

28 मार्च को एडहॉक कमेटी का गठन किया था

राजस्थान सरकार ने आरसीए की कार्यकारिणी को भंग कर सरकार ने 28 मार्च 2024 को एडहॉक कमेटी का गठन किया था। इसे 3 महीने में आरसीए के चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई थी।

लगभग एक साल बाद भी सरकार की ओर से गठित की गई एडहॉक कमेटी आरसीए के चुनाव नहीं करा पाई है। कमेटी में बीजेपी विधायक जयदीप बिहाणी कन्वीनर और धनंजय खींवसर, धर्मवीर सिंह शेखावत, रतन सिंह शेखावत, हरीशचंद्र सिंह और विमल शर्मा ही सदस्य हैं।

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‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ ही है पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का एक मात्र समाधान

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 17 मार्च 2025 | जयपुर : सबसे बड़े भू-भाग वाला प्रदेश- राजस्थान का क्षेत्रफल 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर है जहां 6.85 करोड़ जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का आठवां बड़ा राज्य है व भू-भाग की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य। सात संभाग, 33 जिले, 41353 ग्राम, उत्तर से दक्षिण की लंबाई 826 वर्ग किमी व पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 869 वर्ग किमी है।

‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ ही है पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का एक मात्र समाधान

भारत के अलग अलग भागों में नए राज्यों के निर्माण की मांग उठ रही है जिनमें अरावली प्रदेश सबसे प्रबल है। राष्ट्रीय एकता व अखण्डता, सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक, कृषि, उद्योग इत्यादि की विपुल संभावनाओं के मद्देनजर अरावली प्रदेश निर्माण की दावेदारी सबसे प्रबल है।

‘अरावली प्रदेश का निर्माण’ ही है पूर्वी राजस्थान के सर्वांगीण विकास का एक मात्र समाधान

भारत का सबसे बड़ा भूभाग राजस्थान जो दुनियां के 110 देशों से भी क्षेत्रफल में बड़ा है जिसको बीचों बीच से अरावली पर्वतश्रेणी ने दो भागों में विभाजित किया है जिसका उत्तरी पश्चिमी रेगिस्तानी थार का अरावली स्थल ही अरावली प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

अलग राज्यों की बढ़ती माँग 

राजस्थान की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक इकाईयों में असमानता,आर्थिक विकास एवं राजनैतिक विमूढ़ता का सबसे अधिक नुकसान इस अरावली प्रदेश को उठाना पड़ा है। राजस्थान के इस 61.11% भूभाग के निवासियों के साथ विकास की प्रक्रिया में कभी न्याय नहीं हो पाया। बंजर अरावली स्थल कहकर इस क्षेत्र का सदैव उपहास एवं उपेक्षा की गयी।

60 वर्षों से अधिक इतिहास में राजनीतिज्ञों की नीतियों एवं उपेक्षाओं से यहाँ के निवासियों को अपने अस्तित्व को अलग लेकर अपनी समृद्ध अरावली प्रदेश बनाने की मजबूरन राह पकड़ अरावली प्रदेश बनाने की कुव्वत दिखानी पड़ेगी।

क्यों जरुरी है राजस्थान का “मरु और अरावली प्रदेश” में विभाजन

मरुप्रदेश के 20 जिलों में देश का 27 प्रतिशत तेल, सबसे महंगी गैस, खनिज पदार्थ, कोयला, यूरेनियम, सिलिका आदि का एकाधिकार है। एशिया का सबसे बड़ा सोलर हब और पवन चक्कियों से बिजली प्रोडक्शन यहाँ हो रहा है।

राजस्थान का “मरु और अरावली प्रदेश” में विभाजन

गौरतलब है कि एक तरफ जहां राजस्थान में प्रति व्यक्ति तो ज्यादा है, लेकिन पश्चिम राजस्थान के जिलों में रहने वालों का एवरेज निकाला जाये तो उनकी आय काफी कम है। राजस्थान की भौगोलिक और सांस्कृतिक इकाईयों में असमानता, आर्थिक विकास और राजनैतिक विमूढ़ता का सबसे ज्यादा नुकसान इस इलाके को उठाना पड़ा है।

राजस्थान के इस 61.11% भूभाग के निवासियों के साथ विकास की प्रक्रिया में कभी न्याय नहीं हो पाया। अरावली प्रदेश मुक्ति मोर्चा के संयोजक प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि देश का विकास छोटे राज्यों से ही हो सकता है। राज्य जब तक बड़े राज्य रहे हैं, तब तक विकास से महरूम रहे हैं।

झारखंड, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड बेहतरीन उदहारण है, क्योंकि बिहार, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में रहते हुए विकास की डगर वहां तक नहीं पहुँच पायी थी। मगर जैसे ही अलग राज्य बने तो विकास की राह में ये राज्य अपने मूल राज्यों से आगे निकल गये। 

अलग अरावली प्रदेश की तार्किक माँग

अलग अरावली प्रदेश की माँग करने का तर्क है कि पूर्वी राजस्थान का ये क्षेत्र राज्य के अन्य हिस्सों के मुकाबले शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। इन जिलों से अरबों रुपयों की रॉयल्टी सरकार कमा रही है, लेकिन इन जिलों में पीने का पानी, रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, स्पोर्ट्स और सैनिक स्कूल, खेतों को नहरों का पानी जैसी समस्यायों से आम जनता जूझ रही है। 

अलग अरावली प्रदेश की तार्किक माँग

इसका प्रमुख कारण भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति अलग है। इस हिस्से की जलवायु, कृषि, उद्योग और जनसंख्या का वितरण भी अलग है। यदि यह भू-भाग नए राज्य के रूप में सामने आयेगा तो इस क्षेत्र के विकास में तेजी आयेगी। “अरावली में बग़ावत” शीर्षक पुस्तक के लेखक प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने लिखा है कि अरावली भूमि का सम्पूर्ण विकास तभी होगा जब अरावली प्रदेश अलग राज्य बनेगा। अरावली के संसाधनों की लूट रुकेगी।

प्रोफ़ेसर मीणा कहते हैं, ”आज़ादी से पहले जहां अरावली का इलाक़ा विकास की दौड़ में शामिल था। वहीं आज़ादी के बाद सभी पार्टियों की सरकारों और चतुर-चालाक मारवाड़ी व्यवसाइयों ने इसके प्रति बेरुख़ी दिखायी। जबकि प्राकृतिक संसाधनों प्रचुरता से ये एरिया ख़ूब मालामाल है। खनिज के हिसाब से देखें तो इस क्षेत्र में कोयला, जिप्सम, क्ले और मार्बल निकल रहा है। वहीं, जोधपुर जैसे शहर में पीने का पानी अरावली क्षेत्र से ट्रेन से भर-भर कर ले जाकर वहाँ के लोगों की प्यास बुझायी जाती थी।

बीसलपुर बाँध का पानी पाली, अजमेर और जोधपुर के गाँवों तक पहुँचाया जा रहा है और अब जैसी ही बाड़मेर में तेल और गैस के भंडार मिले हैं, वैसे ही मरू प्रदेश की माँग जोर-शोर से उठायी जा रही है। जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्रियों और उनकी सरकारों ने अरावली भू-भाग (पूर्वी राजस्थान) से रेवेन्यू तो भरपूर लिया है, लेकिन विकास को हमेशा अनदेखा किया है।

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी का 70% हिस्सा अरावली प्रदेश से आता है और उसको 80% से भी अधिक पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में खर्च किया जाता रहा है। इसके समर्थन में आंकड़े गवाह हैं, जो बताते हैं कि कैसे जोधपुर को शिक्षा की नगरी बनाया गया। एक-आध को छोड़कर सारे-के-सारे केंद्रीय शिक्षण संस्थानों (20 से अधिक) को जोधपुर ले जाया गया।

अरावली के दक्षिणी छोर से लेकर उत्तरी छोर तक 500 किलोमीटर में एक भी केंद्रीय संस्थान नहीं है। एक तरफ, नर्मदा का पानी रेगिस्तान को हरा-भरा कर रहा है और वहीं दूसरी तरफ, अरावली प्रदेश (भू-भाग) एक-एक बूँद पानी के लिए तरस रहा है।

राजस्थान के बजट में सकल राजस्व और आमदनी

अरावली प्रदेश के भोले-भाले लोग तो यह भी नहीं जानते कि कैसे मंडरायल (करौली) में लगने वाली सीमेंट फेक्ट्री को जैतपुर (पाली) ले जाया गया जबकि मंडरायल में सब कुछ फाइनल हो चुका था। सवाई माधोपुर सीमेंट फेक्ट्री को कैसे बंद किया गया।” 

जब वर्ष 2000-01 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 03 राज्य नए बनाये तो उस समय के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत जी ने भी पत्र लिख कर कहा था कि पूरे राजस्थान का विकास व देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए राज्य के दो भाग किये जाये। इसके बाद भी समय समय पर अनेको क्षेत्रीय नेताओ ने इस माँग का समर्थन किया लेकिन पार्टियों की गुलामी के चलते मुखर विरोध नहीं कर सके।

चहुँओर चमकेगी उन्नति, जब बनेगा अरावली प्रदेश

अरावली पर्वत माला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जिसकी गिनती विश्व की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में भी होती है। यह भूवैज्ञानिक दृष्टि से अरबों वर्षों पुरानी है और भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल और इतिहास का अभिन्न हिस्सा है।

राजस्थान इस पर्वतमाला का मुख्य केंद्र है। अरावली यहाँ के परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे राज्य के पश्चिमी और पूर्वी भागों को विभाजित करने वाली प्राकृतिक दीवार भी कहा जाता है। पूर्वी राजस्थान; अरावली के पूर्व में स्थित यह क्षेत्र अपेक्षाकृत उपजाऊ है और यहाँ मैदानी भाग पाये जाते हैं।

पश्चिमी राजस्थान; अरावली के पश्चिम में थार मरुस्थल स्थित है, जो राज्य के लगभग 60% क्षेत्र को कवर करता है। पूर्वी राजस्थान में कृषि के लिए उपयुक्त भूमि है, जहाँ रबी और खरीफ दोनों फसलें उगाई जाती हैं। पश्चिमी राजस्थान का अधिकांश भाग मरुस्थलीय या अर्द्धमरुस्थलीय है। 

अरावली पर्वत श्रृंखला की कुल लंबाई गुजरात से दिल्ली तक 692 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 550 किलोमीटर राजस्थान में स्थित है। अरावली पर्वत श्रृंखला का लगभग 80% विस्तार राजस्थान में 22 जिलों में पूर्ण रूप से ओर कुछ जिलों में थोड़ा सा हिस्सा फैला हुआ है।

अरावली प्रदेश के 22 जिलों में जयपुर, दौसा, करौली, धौलपुर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां, अलवर, टोंक, भीलवाड़ा, सीकर, झुंझुनूं , चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, राजसमंद, उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर शामिल होंगे। 

अरावली प्रदेश का प्रतावित मैप

राजस्थान के मुख्यमंत्रियों पर क्षेत्रवाद हमेशा हावी रहा है और इसमें अशोक गहलोत सबसे आगे हैं। क्षेत्रवाद एक विचारधारा है जो किसी ऐसे क्षेत्र से सबंधित होती है जो धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिये जाग्रत हो और अपनी पृथकता को बनाए रखने का प्रयास करता रहता है।

राज्य में भी विकास-प्रक्रिया में विषमता व्यापक रूप से विद्यमान है। इसी कारण राजस्थान में  नए राज्य के गठन की मांग की चिंगारी सुलग रही है। राजस्थान में बजट आवंटन की दृष्टि से पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रों का अनुपात क्रमशः लगभग 20 प्रतिशत, 70 प्रतिशत 10 फीसदी है, जो कहीं से भी तार्किकतापूर्ण नहीं है।

  • सीकर, झुंझुनू शिक्षा व आर्मी की राजधानी, अलवर स्पोर्ट्स का हब, करौली-सवाई माधोपुर कृषि आधारित उद्योगों व सब्जी-फलों का हब होगा। टोंक-केकड़ी-भीलवाड़ा-राजसमंद मार्बल-ग्रनाईट चतुर्भुज के रूप में विकसित होंगे। बारां-झालावाड़-कोटा औद्योगिक हब बनेंगे। पशुपालन, खेती में अव्वल होगा। बाड़मेर, पाली, जालौर हमारा उधोगो व निवेश जोन के रूप में विकसित होकर आर्थिक राजधानी होंगे। चित्तौड़गढ़-उदयपुर टूरिज्म-निवेश की राजधानी बनेंगे। भरतपुर-धौलपुर इजराइल तकनीक की खेती, मिनरलस, और खान पान के शिरमोर होंगे। जयपुर-दौसा आईटी हब बनेंगे। सीकर-झुंझुनू देश भर में शिक्षा में अपना परचम लहरायेंगे। विकास से महरूम डूंगरपुर-बाँसवाड़ा आदिवासियत के केंद्र के रूप में वैश्विक पहचान बनायेंगे।

शैक्षणिक विकास में असंतुलन

उदाहरण के रूप में देखिए अकेले जोधपुर जिला मुख्यालय पर आईआईटी, नेशनल लो युनिवर्सिटी, एम्स, काजरी, आफरी, आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय, पुलिस विश्वविद्यालय, कृषि विश्वविद्यालय और जेएनव्यास विश्वविद्यालय, एनआइएफटी, एमबीएम युनिवर्सिटी, राज्य होटल मैनेजमेंट संस्थान, राजकीय होम्योपैथिक महाविद्यालय इत्यादि स्थित हैं जबकि पूर्वी राजस्थान के दस जिलों अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, दौसा, सवाई माधोपुर, टोंक, बारां, झालावाड़ में एक भी केंद्रीय शिक्षण संस्थान नहीं है। जबकि जनसँख्या की दृष्टि से राज्य की 60-70% जनता यहाँ रहती है।

वैसे ही दक्षिणी राजस्थान में केवल उदयपुर में केवल एक केंद्रीय शिक्षण संस्थान है। ऐसे ही, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, टोंक, बारां, झालावाड़, दौसा जैसे एससी-एसटी बहुल जिलों में एक भी राज्य स्तरीय शिक्षण संस्थान नहीं है, जो क्षेत्रीय टकराव को बढ़ावा देने वाला है तो इसे रोकने के प्रयास किये जाने चाहिये।

विडंबनाओं की पराकाष्ठा देखिए जोधपुर में 400 करोड़ से डिजिटल यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा बजट 20-21 की है जबकि आईटी हब बंगलुरू और हैदराबाद के समक्ष जयपुर के विकसित होने की प्रबलतम संभावनाएँ हैं।

संसाधनों की उपलब्धता में असंतुलन

राजस्थान को भौगोलिक एवम् प्रशासनिक की दृष्टि से तीन प्रमुख हिस्सों में बाँट सकते हैं, जिनमें  पूर्वी राजस्थान, पश्चिम राजस्थान और दक्षिणी राजस्थान प्रमुख हैं। राज्य सरकार के मुखिया के रूप में उन की अलग-अलग जवाबदेही तय करने की बात लंबे अरसे से होती चली आ रही है। सैद्धांतिक रूप से देखें तो यह जवाबदेही लगभग तय है, लेकिन व्यवहार में इसका प्रभाव वह बिलकुल नहीं दिखायी देता है, जो होना चाहिए।

ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्रियों ने ‘मुखिया मुख सो चाहिए’ की उक्ति को हमेशा नजरंदाज किया है और अपने क्षेत्र विशेष को तरजीह और प्रमुखता दी है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। वे जवाबदेह हैं, लेकिन स्वयं और अपने ही क्षेत्रों के प्रति। सीधे जनता के प्रति उनकी जवाबदेही सभी क्षेत्रों में समान रूप से बनती  है। इससे केवल जनता ही नहीं, कई राजनेता भी दुखी हैं।

बजट आवंटन में असंतुलन

केंद्र से राज्य को मिलने वाले फंड को लेकर मुख्यमंत्रियों ने हमेशा पक्षपात किये है, और उनकी पार्टियों के आलाकमान भी इस पर ध्यान नहीं देते हैं । बुद्धिजीवियों ने इस पर अनेक बार अपना  दुख प्रकट किया है और चिंता भी जताई है ।

प्रोफ़ेसर मीणा कहते हैं कि केंद्र की ओर से राज्य को जारी होने वाले फंड को अधिकांशत: पश्चिमी राजस्थान में खर्च किया जाता रहा है जिसने स्तिथियों को और अधिक पेचीदा बना दिया है। इस कारण राज्य का संतुलित विकास नहीं हो पा रहा है और अपेक्षित लक्ष्य हासिल करने में बहुत समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार आम तौर पर इन सवालों का कोई जवाब ही नहीं देती।

हमें यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि राज्य का सामाजिक-आर्थिक विकास संतुलित ढंग से किया जा सके। सबको अपना वाजिब हक मिल सके और कोई भी अपने-आपको वंचित महसूस न करने पाए। आज आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य का संतुलित विकास दिखाई नहीं देता है। पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान संसाधन बहुल होने के बाद भी अपेक्षित विकास से महरूम हैं और पश्चिमी राजस्थान के विकास में संसाधनों का दुरूपयोग किया जा रहा है।

अरावली प्रदेश की मांग मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिणी – पूर्वी हिस्से में रहने वाले लोगों द्वारा की जा रही है, जो इस क्षेत्र के सर्वांगीण विकास और बेहतर प्रशासन की जरूरत को लेकर उठाई जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं:
  1. भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता: अरावली पर्वत श्रृंखला राजस्थान को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटती है – पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र और दक्षिणी – पूर्वी उपजाऊ मैदानी क्षेत्र। दक्षिणी – पूर्वी राजस्थान, जिसमें अलवरसे लेकर डूंगरपुर – बाँसवाड़ा तक के जिले शामिल हैं, की जलवायु, कृषि, और संस्कृति पश्चिमी राजस्थान से काफी भिन्न है। इस विशिष्टता के कारण लोग मानते हैं कि एक अलग राज्य उनकी जरूरतों को बेहतर ढंग से संबोधित कर सकता है।
  2. विकास में असमानता: राजस्थान के मौजूदा ढांचे में पश्चिमी और दक्षिणी – पूर्वी क्षेत्रों के बीच संसाधनों और विकास के अवसरों का असमान वितरण देखा जाता है। दक्षिणी – पूर्वी राजस्थान के लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि राज्य सरकार का ध्यान पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्रों पर अधिक रहता है, जबकि दक्षिणी – पूर्वी क्षेत्र की संभावनाएं – जैसे कृषि, पर्यटन, और उद्योग – उपेक्षित रहती हैं। एक अलग अरावली प्रदेश इस असमानता को दूर करने का दावा करता है।
  3. प्रशासनिक सुविधा: राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है क्षेत्रफल के हिसाब से, जिसके कारण प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है। दक्षिणी – पूर्वी राजस्थान के दूरदराज के इलाकों तक सरकारी योजनाओं और सेवाओं का लाभ पहुंचाने में देरी या कमी रहती है। एक छोटा, केंद्रित राज्य बनाने से प्रशासन को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने की उम्मीद की जाती है।
  4. आर्थिक संभावनाएं: अरावली क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधन, जंगल, और खनिजों की प्रचुरता है। साथ ही, यह दिल्ली-एनसीआर के करीब होने के कारण औद्योगिक और पर्यटन विकास के लिए उपयुक्त है। मांग करने वाले मानते हैं कि एक अलग राज्य इन संसाधनों का बेहतर उपयोग कर आर्थिक समृद्धि ला सकता है।
  5. जन आंदोलन और राजनीतिक समर्थन: पिछले कुछ समय से इस मांग ने जन आंदोलन का रूप लिया है, जिसमें स्थानीय नेता, सामाजिक संगठन, और आम लोग शामिल हैं। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा चर्चा में है, जहां लोग इसे पूर्वी राजस्थान के हितों की रक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं।

हालांकि, इस मांग का विरोध भी होता है, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि इससे राजस्थान की एकता और संसाधनों का बंटवारा प्रभावित हो सकता है। फिर भी, समर्थकों का तर्क है कि यह कदम क्षेत्रीय असंतुलन को खत्म कर समग्र विकास को बढ़ावा देगा। यह मांग अभी चर्चा के शुरुआती चरण में है और इसे लागू करने के लिए संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।

कुल मिलाकर, अरावली प्रदेश की माँग एक जटिल और बहुआयामी मुद्दा है, जो विकास, संस्कृति और स्वशासन की आकांक्षाओं को दर्शाता है। इसके भविष्य का निर्धारण इस बात पर निर्भर करेगा कि यह आंदोलन कितना संगठित और प्रभावी ढंग से अपनी बात को आगे बढ़ा पाता है।

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