
मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 17 जुलाई 2024 | कैलाश मानसरोवर : 2020 के बाद यह लगातार पांचवां साल है, जब चीन भारतीयों को कैलाश मानसरोवर जाने से रोक रहा है। अभी भारत से कैलाश मानसरोवर जाने के दो रास्ते हैं। फिलहाल इन दोनों रास्तों पर रोक है। सबसे बड़ी बात यह है कि मोदी सरकार इस मसाले पर चुप्पी साधे हुए है। विदेश मंत्री भी चुप हैं। लगता है शिवभक्त हिंदुओं को कैलाश मानसरोवर के दर्शन दूरबीन से करने पड़ेंगे।
चीन ने कैलाश मानसरोवर का रास्ता रोका बनाया मिसाइल-बेस पर मोदी की चुप्पी
15 जुलाई 2024 को मोदी सरकार 2.1 ने एक RTI के जवाब में कहा है कि पवित्र धार्मिक स्थल पर जाने से रोककर चीन दो अहम समझौते को तोड़ रहा है। इसके अलावा चीन इसी इलाके में एक मिसाइल साइट्स भी बना रहा है। पर मोदी की ऐतिहासिक चुप्पी बरक़रार है!

भारत से गलवान और पैंगोंग झील इलाके में मुंह की खाने के बाद भी चीन अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। चीनी एयरफोर्स भारत से सटे समूचे बॉर्डर पर हवाई किलेबंदी को मजबूत कर रही है।
वहीं, ताजा सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन कैलास मानसरोवर के पास जमीन से हवा में मार करने वाली (SAM Missile) मिसाइलों को तैनात किया है। माना जा रहा है कि भारतीय वायुसेना में राफेल लड़ाकू विमानों के शामिल होने के बाद से डरा चीन अपनी हवाई सीमा को सुरक्षित बनाने में जुट गया है।
मानसरोवर के पास बनाया मिसाइल साइट
ओपन सोर्स इंटेलिजेंस detresfa की सैटलाइट तस्वीरों के अनुसार, चीन कैलास मानसरोवर के इलाके में न केवल अपनी सैन्य तैनाती को बढ़ाया है। बल्कि, वह मानसरोवर के पास एक मिसाइल साइट का निर्माण भी कर रहा है।
इस इलाके में 100 किमी की GEOINT स्कैनिंग से पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की ऐक्टिविटी का पता चला है। Epoch Times के अनुसार, चीन की बॉर्डर इलाके में मिसाइल साइट बनाने की चाल उसकी आक्रमक रवैये से बिलकुल मेल खाता है। चीन नहीं चाहता कि सीमा पर शांति हो। ताजा सैटेलाइट तस्वीरों से सीमा पर तनाव और बढ़ने की उम्मीद है।
सवाल 1: कैलाश मानसरोवर कहां है?
जवाब: कैलाश मानसरोवर का ज्यादातर एरिया तिब्बत में है। वही तिब्बत, जिस पर चीन अपना अधिकार बताता है। कैलाश पर्वत श्रेणी कश्मीर से भूटान तक फैली हुई है। इस इलाके में ल्हा चू और झोंग चू नाम की दो जगहों के बीच एक पहाड़ है। यहीं पर इस पहाड़ के दो जुड़े हुए शिखर हैं। इसमें से उत्तरी शिखर को कैलाश के नाम से जाना जाता है।
इस शिखर का आकार एक विशाल शिवलिंग जैसा है। उत्तराखंड के लिपुलेख से यह जगह सिर्फ 65 किलोमीटर दूर है। फिलहाल कैलाश मानसरोवर का बड़ा इलाका चीन के कब्जे में है। इसलिए यहां जाने के लिए चीन की अनुमति चाहिए होती है।
सवाल 2: कैलाश मानसरोवर का क्या महत्व है और इसको लेकर अभी विवाद क्यों शुरू हुआ है?
जवाब: हिंदू धर्म में ये मान्यता है कि भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। यही वजह है कि हिंदुओं के लिए ये बेहद पवित्र जगह है। जैन धर्म में ये मान्यता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ ने यहीं से मोक्ष की प्राप्ति की थी। 2020 से पहले हर साल करीब 50 हजार हिंदू यहां भारत और नेपाल के रास्ते धार्मिक यात्रा पर जाते हैं।
2020 से चीन, भारतीयों को कैलाश मानसरोवर की यात्रा की इजाजत नहीं दे रहा है। इसी महीने भारत सरकार ने एक RTI के जवाब में कहा है कि कैलाश मानसरोवर जाने से रोककर चीन 2013 और 2014 में हुए दो प्रमुख समझौते तोड़ रहा है।
न्यूज 18 के मुताबिक मोदी सरकार ने कहा है कि चीन अपने मनमुताबिक एकतरफा फैसला लेकर इन समझौतों को नहीं तोड़ सकता है। अगर चीन को भारत के साथ किए इस समझौते में कोई बदलाव करना है तो वह भारत सरकार के साथ सहमति से ही ऐसा कर सकता है।
सवाल 3: कैलाश मानसरोवर जाने के लिए भारत और चीन के बीच हुए किन दो समझौतों को चीन तोड़ रहा है?
जवाब: कैलाश मानसरोवर जाने के लिए भारत और चीन के बीच दो प्रमुख समझौते हुए हैं…
पहला समझौता: 20 मई 2013 को भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रा मार्ग से होकर कैलाश मानसरोवर जाने के लिए ये समझौता हुआ। उस समय के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच यह समझौता हुआ था। इससे यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रा मार्ग खुल गया।
दूसरा समझौता: 18 सितंबर 2014 को नाथूला के जरिए कैलाश मानसरोवर जाने वाले रास्ते को लेकर भारत और चीन में ये समझौता हुआ था। विदेश मंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री वांग यी के साथ ये समझौता किया था।
दोनों समझौते की भाषा लगभग एक समान है। ये समझौते दोनों देशों के विदेश मंत्री के पेपर पर हस्ताक्षर के दिन से लागू हैं। हर 5 साल के बाद ऑटोमेटिक तरीके से इसकी समय सीमा बढ़ाने की बात समझौते में लिखी है।
ऐसा तब तक होगा, जब तक कि कोई भी पक्ष समझौते को तोड़ने के अपने इरादे के बारे में समाप्ति की तारीख से छह महीने पहले लिखित रूप में दूसरे देश को नोटिस न दे।
इस समझौते में ये भी कहा गया है कि दोनों पक्ष जरूरत के हिसाब से आम सहमति से प्रोटोकॉल में बदलाव भी कर सकते हैं। भारत सरकार का कहना है कि चीन ने 6 महीने पहले बताए बिना ही भारतीयों लोगों के कैलाश मानसरोवर जाने पर रोक लगा दी है। यह एकतरफा फैसला है, जो गलत है।
सवाल 4: क्या नेपाल से होकर भारतीय कैलाश मानसरोवर जा सकते हैं और इसके लिए चीन का वीजा जरूरी है?
जवाब: किसी भी रास्ते से कैलाश मानसरोवर जाने के लिए भारतीयों के पास चीन का वीजा होना जरूरी है। भारत से कैलाश मानसरोवर जाने के दो रास्ते हैं, जबकि कुछ लोग नेपाल के रास्ते भी यहां जाते हैं।
नेपाल के अखबार काठमांडू पोस्ट का दावा है कि पिछले साल नेपाल से होकर कैलाश मानसरोवर जाने वाले 50 हजार यात्रियों को चीन ने इजाजत नहीं दी। इनमें नेपाल और भारत दोनों देशों के लोग शामिल हैं। भारतीयों के लिए नियम कड़े कर दिए हैं। ये नियम इतना ज्यादा कड़े हैं कि भारतीयों के लिए नेपाल से होकर भी कैलाश मानसरोवर जाना मुश्किल हो गया है।
मई 2023 में एसोसिएशन ऑफ कैलाश टूर ऑपरेटर्स नेपाल (AKTON) ने नेपाल में चीनी राजदूत चेन सोंग को पत्र लिखकर कैलाश यात्रा पर जाने वाले यात्रियों के लिए नियम में बदलाव की मांग की थी। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि इस कड़े नियम की वजह से उनके परिवार की आमदनी न के बराबर हो गई है।
‘विऑन न्यूज वेबसाइट’ के मुताबिक भारतीय तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर भेजने वाली नेपाली कंपनियों को 60,000 डॉलर यानी 8 मिलियन नेपाली रुपए चीन सरकार के पास एडवांस में जमा करने होते हैं। चीन ने ये नियम 2020 के बाद बाद बनाए हैं।
चीन कब्जे वाले तिब्बत पर्यटन ब्यूरो ने भारतीयों के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा पैकेज की कीमत एक व्यक्ति के लिए 1800 अमेरिकी डॉलर यानी 1.5 लाख से बढ़ाकर 3000 अमेरिकी डॉलर यानी 2.50 लाख कर दी है। इतना ही नहीं नेपाल में कैलाश मानसरोवर जाने के लिए आवेदन करने वाले लोगों को खुद मौजूद रहना जरूरी है।
उनके बायोमेट्रिक लिए जाते हैं। इस तरह अब नियम इतने कड़े हो गए हैं कि भारतीयों के लिए यहां जाना लगभग असंभव है। जनवरी 2024 में 38 भारतीय नेपाल के नेपालगंज से चार्टर्ड विमान के जरिए ‘कैलाश मानसरोवर दर्शन के लिए गए थे।
सवाल 5: चीन भारतीयों को कैलाश मानसरोवर जाने से क्यों रोक रहा है?
जवाब: ORF के फेलो और विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन कहते हैं कि पहली बात तो ये है कि चीन ऐसा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है। कैलाश मानसरोवर का हिस्सा उसके कब्जे में है, ऐसे में वह चाहे तो आपको वहां जाने देगा और नहीं चाहेगा तो नहीं जाने देगा। भले ही इससे किसी की भी धार्मिक भावनाएं आहत हों।
किसी धार्मिक स्थल पर जाने को लेकर कोई इंटरनेशनल कानून नहीं, बल्कि उस देश का कानून लागू होता है। कल को पाकिस्तान चाहे तो करतारपुर कॉरिडोर बंद कर सकता है। इसी तरह सऊदी अरब मक्का मदीना जाने वालों को लेकर कानून बनाता है।
अब दूसरी बात ये है कि अगर चीन भारत के साथ किए 2 समझौते को तोड़कर भारतीयों को कैलाश मानसरोवर जाने से रोक रहा है तो इसका मतलब है कि दोनों देशों के रिश्ते सही नहीं हैं। चीन यह बताने की कोशिश कर रहा है कि भारत अगर ताइवान, साउथ चाइना शी में चीन के खिलाफ जाएगा तो उसे LAC पर ही इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।
वहीं, डिफेंस एक्सपर्ट जे.एस. सोढी का कहना है कि 2019 में आर्टिकल 370 खत्म होने के बाद चीन ने दो आक्रामक फैसले लिए…
- गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों से झड़प।
- कैलाश मानसरोवर जाने वाले भारतीय लोगों पर रोक।
सोढ़ी का कहना है कि LAC पर 50 हजार जवानों की तैनाती। कई मौकों पर अलग-अलग जगहों पर सैनिकों में भिड़ंत। 2025 तक पूरे जिंजियांग प्रांत में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाकर तैयार करने का लक्ष्य और अब कैलाश मानसरोवर जाने से भारतीयों को रोकना। ये सारी बातें इस ओर इशारा कर रही हैं कि भारत और चीन के संबंध काफी बुरे दौर की तरफ बढ़ रहे हैं।
सवाल 6: भारत सरकार ने कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने के लिए क्या प्रयास किए हैं?
जवाब: 26 जून 2017 में आखिरी बार चीन ने ये बयान जारी किया था कि कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर उसकी भारत सरकार के साथ बातचीत हो रही है। चीन ने अपने बयान में कहा कि लिपुलेख के रास्ते यात्री कैलाश पर्वत तक जा सकेंगे, लेकिन फिलहाल सिक्किम के नाथूला से होकर कैलाश मानसरोवर जाने वाले रास्ते पर रोक लगाई गई है। 1981 में लिपुलेख से होकर मानसरोवर जाने की यात्रा शुरू हुई थी।
नाथूला से होकर कैलाश पर्वत जाने पर पाबंदी दोनों देशों की सेनाओं के बीच झड़प की वजह से लगाई गई थी। 2020 के बाद से दोनों देशों के बीच यात्रा शुरू करने को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है।
भारत सरकार ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से 90 किलोमीटर दूर धारचूला में ओल्ड लिपुपास चोटी पर भी एक ऐसी जगह को विकसित किया है, जहां से कैलाश पर्वत की चोटी नजर आती है। इस जगह से कैलाश पर्वत करीब 50 किलोमीटर दूर है।
5 जुलाई को पिथौरागढ़ की जिलाधिकारी रीना जोशी ने बताया है कि 15 सितंबर से लिपुलेख के पास ओल्ड लिपुपास चोटी से कैलाश पर्वत के दर्शन शुरू हो जाएंगे। सीधे कैलाश पर्वत की चोटी यहां से नजर आती है।
इसके अलावा यात्री दूरबीन के जरिए भी यहां से कैलाश पर्वत और कैलाश मानसरोवर के खूबसूरत हिस्से को देख सकेंगे। पूजा-पाठ की व्यवस्था भी यहां की जा रही है। ओल्ड लिपुपास जाने के लिए लिपुलेख तक गाड़ी से और फिर कैलाश पर्वत को देखने के लिए लगभग 800 मीटर पैदल चलना होता है।
सवाल 7: क्या चीन कैलाश मानसरोवर के पास मिसाइल तैनात करने की कोशिश कर रहा है?
जवाब: अगस्त 2020 में ‘दि प्रिंट’ ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि भारतीयों को कैलाश मानसरोवर जाने से रोककर चीन यहां मिसाइल साइट्स बना रहा है। एक सैटेलाइट इमेज में भारतीय सीमा लिपुलेख से 100 किलोमीटर की दूरी पर चीन एक मिसाइल साइट्स बनाता दिख रहा है। रिपोर्ट में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों यानी SAM की तैनाती के लिए ये साइट्स बनाए जाने का दावा किया गया।
चीन ने 7 जगहों पर तैनात कीं SAM मिसाइलें
चीन ने लद्दाख से सटे अपने रुटोग काउंटी, नागरी कुंशा एयरपोर्ट, उत्तराखंड सीमा पर मानसरोवर झील, सिक्किम से सटे शिगेज एयरपोर्ट और गोरग्गर हवाई ठिकाने, अरुणाचल प्रदेश से सटे मैनलिंग और लहूंजे में सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें तैनात की हैं।
इन ठिकानों पर चार से पांच मिसाइल लॉन्चर तैनात हैं। इसके अलावा उनकी मदद के लिए रेडॉर और जेनेटर भी दिखाई दे रहे हैं। कुछ तस्वीरों में नजर आ रहा है कि चीनी मिसाइलें भारत से होने वाले किसी हवाई हमले के खतरे को देखते हुए पूरे अलर्ट मोड में है।
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