सुंदरता से ज्यादा महत्व अच्छे विचारों और सकारात्मक व्यक्तित्व का होता है

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 26 अगस्त 2024 | जयपुर : सुंदरता से ज्यादा महत्व सकारात्मक व्यक्ति और अच्छे विचारों का होता है। अगर कोई व्यक्ति दिखने में तो बहुत सुंदर है, लेकिन उसका व्यक्तित्व और विचार अच्छे नहीं हैं तो उसकी सुंदरता का महत्व खत्म हो जाता है। सुंदरता थोड़े समय के लिए आकर्षित कर सकती है, लेकिन जब बात लंबे समय तक रिश्ते निभाने की हो तो अच्छे विचारों को महत्व दिया जाता है।

सुंदरता से ज्यादा महत्व अच्छे विचारों और सकारात्मक व्यक्तित्व का होता है

‘सकारात्मक सोच’ वह शक्तिशाली सोच है जो व्यक्ति को उसके जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना के प्रति, एक सकारात्मक दृष्टि कोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है और व्यक्ति अपने ऐसे दृष्टिकोण के कारण जीवन संबंधी घटनाओं को चाहे ये चुनौतीपूर्ण हो अच्छी तरह से सामना कर सकता है । न केवल वह उसका सामना कर पाता है बल्कि सफलता का वरण भी करता है।

सुंदरता से ज्यादा महत्व अच्छे विचारों और सकारात्मक व्यक्तित्व का होता है

सकारात्मक सोच एवं सामाजिक प्रभाव

विचार ही चरित्र का आधार है या यों कह सकते हैं कि विचार बीज है चरित्र उसका फल । अब व्यक्ति में सामाजिक विकास हेतु चरित्र या व्यक्तित्व का अत्यन्त प्रभाव पड़ता है यदि चरित्र सकारात्मक सोच पर आधारित है तो उसका सामाजिक प्रभाव भी अधिक पड़ेगा उदाहरण स्वरूप महात्मा गाँधी जी अपने चारित्रिक प्रभाव के कारण ही सारे विश्व में प्रसिद्ध हुई इसका कारण उनका अद्भुत सकारात्मक सोच चिंतन या विचार ही था।

सकारात्मक सोच के अभाव में व्यक्ति अपना जीवन अत्यंत दयनीय बना लेता है क्योंकि उसकी सोच नकारात्मक होने थे वह घटनाओं के प्रति नकारात्मक परिस्थितियों को ही आकर्षित करती है। जैसा कि ‘आकर्षण का नियम’ दर्शाता है व्यक्ति जैसा विचार रखता है जैसा वह सोचता है–बाह्य परिस्थितियाँ उसी के अनुरूप निर्मित होती है उसके समक्ष उपस्थित होती है।

इस एक उदाहरण के रूप में भी समझा जा सकता है–यदि एक व्यक्ति अपने मस्तिष्क में हमेशा यह विचार रखता है कि उसके जीवन में सब कुछ अच्छा है उसे कहीं किसी प्रकार की कमी नहीं है तो उसके जीवन में घटनाएं जो भी घटित होती है वह उसे विचलित या परेशान नहीं करती क्योंकि उसका हृदय में ‘आंतरिक विश्वास दृढ़ होता है कि जो भी हो रहा है वह अच्छा हो रहा है’ भविष्य में जो भी होगा वह अच्छा ही होगा–वास्तव में ऐसा ही होता उसकी परिस्थितियाँ उसके अनुकूल होते हुए उसके जीवन में सब कुछ अच्छा परिणाम देती हैं।

इस प्रकार इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे सोच अत्यधिक शक्तिशाली एवं प्रभावशाली होते है । हमारी सोच जैसे होते हैं हमें उसी के अनुरूप परिणाम भी प्राप्त होते हैं यह कहना – बिल्कुल सही है कि सोच हमारे जीवन के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक सभी पक्षों को प्रभावित करता है।

सोच की ताकत

सकारात्मक सोच कि शक्ति बहुत बड़ी ताकत होती है। हम जिस विचार से अपने मन को मजबूती देते हैं उसी मजबूती से हम कार्य कर सकते हैं। मन मे अच्छे विचार से भविष्य मे अच्छे कदम उठाने मे बहुत मदद मिलती है। इससे हम किसी भी काम को आसानी से करने मे बहुत मदद मिलती है। हम इसे जिंदगी मे आशा कि किरण भी कह सकते हैं। जो अंधकार या बुरे समय मे हमको बचाये रखती है।

सकारात्मक सोच से ही मनुष्य यह निर्धारित कर सकता है कि भविष्य मे वह कैसा व्यक्ति बनता है। जैसी हमारे सोच होती है हम आगे चलकर वैसे ही बनते हैं जिस तरह से हमारे विचार होंगे उसी तरह से हम होंगे। अब यह हमको सोचना है कि सकारात्मक विचार किस तरह हमारे जीवन को सफल बना देता है।

 

सकारात्मक दृष्टिकोण के उदाहरण

सकारात्मक दृष्टिकोण इस बात को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है कि हम चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से कैसे निपटते हैं, जिससे हम संभावित असफलताओं को विकास के रास्ते में बदल पाते हैं। उदाहरण के लिए, नौकरी छूटने के बाद, सकारात्मक आत्म-चर्चा पर विचार करने और अभ्यास करने में समय बिताने से अनुभव को व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास के अवसर में बदलने में मदद मिल सकती है। अपने आप को सकारात्मक लोगों के साथ घेरना भी लचीलापन और आशावाद को मजबूत कर सकता है।

कार्यस्थल पर तनावपूर्ण स्थितियों में, ध्यान का अभ्यास करना एक महत्वपूर्ण मुकाबला कौशल हो सकता है, जो शांति और ध्यान बनाए रखने में मदद करता है। नकारात्मक लोगों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए उनके निराशावाद को अवशोषित करने से रोकने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना शामिल है।

इसी तरह, ट्रैफ़िक जाम जैसे नियमित कार्यों में आनंद प्राप्त करना, प्रेरक ऑडियो सामग्री के साथ जुड़कर थकाऊ क्षणों को समृद्ध अनुभवों में बदल सकता है। ये रणनीतियाँ बताती हैं कि कैसे एक सकारात्मक मानसिकता, मजबूत मुकाबला कौशल और सही सामाजिक वातावरण द्वारा समर्थित, एक स्वस्थ, अधिक संतोषजनक जीवन की ओर ले जा सकती है।

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अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 26 मार्च 2025 | जयपुर : प्रोफेसर मीना पूर्वी राजस्थान के लिए “अरावली प्रदेश” की स्थापना की वकालत करते हैं। उनकी रणनीति में क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करना और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर बहुजन समुदाय के आर्थिक-सामाजिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है।

भारत की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिए जीवन रेखा के रूप में काम करती रही है। हालाँकि, अवैध खनन, शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण अरावली काफ़ी हद तक क्षरण का सामना कर रही है।

इन दबावों के कारण इस पर्वत श्रृंखला के बड़े हिस्से का क्षरण हुआ है, जिससे रेगिस्तानीकरण, पानी की कमी और जैव विविधता के नुकसान जैसी पर्यावरणीय आपदाएँ हुई हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

 “छोटे राज्यों का गठन” के बारे में चर्चा आम है, जो संभवतः प्रोफेसर राम लखन मीना के “अरावली प्रदेश” प्रस्ताव के संदर्भ में या सामान्य रूप से भारत में छोटे राज्यों के निर्माण की अवधारणा से संबंधित है। इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा और भारतीय संदर्भ में इसके पक्ष-विपक्ष, और प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है। यदि आप इसे “अरावली प्रदेश” तक सीमित रखना चाहते हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

छोटे राज्यों का गठन: एक अवलोकन

भारत में छोटे राज्यों का गठन एक ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रिया रही है, जो मुख्य रूप से भाषाई, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय पहचान, और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर हुई है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत के राज्य पुनर्गठन ने बड़े राज्यों को छोटी इकाइयों में विभाजित करने की माँग को बार-बार देखा है।

ऐतिहासिक उदाहरण

  1. 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम:
    भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ, जैसे आंध्र प्रदेश (तेलुगु), कर्नाटक (कन्नड़), और तमिलनाडु (तमिल)। यह बड़े औपनिवेशिक प्रांतों को छोटी इकाइयों में तोड़ने की शुरुआत थी।
  2. 2000 में तीन नए राज्य:
    • छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश से अलग
    • उत्तराखंड: उत्तर प्रदेश से अलग
    • झारखंड: बिहार से अलग
      इनका गठन क्षेत्रीय उपेक्षा और पहचान के आधार पर हुआ।
  3. तेलंगाना (2014):
    आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना बना, जो विकास में असमानता और सांस्कृतिक पहचान की लंबी लड़ाई का परिणाम था।

छोटे राज्यों के पक्ष में तर्क

  1. प्रशासनिक दक्षता:
    छोटे राज्य सरकार को जनता के करीब लाते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं पर तेजी से ध्यान देना संभव हुआ।
  2. स्थानीय विकास:
    संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का लाभ उठाकर औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।
  3. सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान:
    छोटे राज्य स्थानीय भाषा, परंपराओं और समुदायों को संरक्षित करते हैं। जैसे, तेलंगाना में तेलुगु संस्कृति को अलग पहचान मिली।
  4. राजनीतिक सशक्तिकरण:
    हाशिए पर रहे समुदायों को नेतृत्व का मौका मिलता है। झारखंड में आदिवासी समुदायों की आवाज मजबूत होगी।

छोटे राज्यों के खिलाफ तर्क

  1. आर्थिक व्यवहार्यता:
    छोटे राज्य कभी-कभी स्वतंत्र रूप से आर्थिक रूप से टिक नहीं पाते। मिसाल के तौर पर, झारखंड में विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार और संसाधन प्रबंधन की समस्याएँ बनी रहीं।
  2. प्रशासनिक लागत:
    नए राज्य का ढाँचा—जैसे विधानसभा, सचिवालय, और नौकरशाही—बनाने में भारी खर्च होता है।
  3. विखंडन का खतरा:
    बार-बार विभाजन से राष्ट्रीय एकता पर सवाल उठ सकते हैं। कुछ लोग इसे “बाल्कनीकरण” कहते हैं।
  4. अंतर-राज्य विवाद:
    जल, सीमा, और संसाधनों पर टकराव बढ़ सकता है, जैसे तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच कृष्णा नदी का विवाद।

भारत में गठन की प्रक्रिया

भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को नए राज्यों के गठन का अधिकार है। प्रक्रिया इस तरह है:

  1. माँग की शुरुआत:
    स्थानीय आंदोलन, राजनीतिक दल या समुदाय माँग उठाते हैं।
  2. राज्य विधानसभा की राय:
    संबंधित राज्य विधानसभा से राय ली जाती है (हालाँकि यह बाध्यकारी नहीं है)।
  3. केंद्र सरकार का प्रस्ताव:
    गृह मंत्रालय इसका मूल्यांकन करता है और संसद में विधेयक पेश करता है।
  4. संसदीय मंजूरी:
    दोनों सदनों में साधारण बहुमत से पास होने के बाद राष्ट्रपति की सहमति से यह लागू होता है।
“अरावली प्रदेश” के संदर्भ में प्रोफेसर मीना का प्रस्ताव इस पैटर्न में फिट बैठता है। उनका तर्क है कि पूर्वी राजस्थान की उपेक्षा और बहुजन समुदायों की जरूरतें एक छोटे राज्य से पूरी हो सकती हैं। लेकिन इसके लिए व्यापक जन समर्थन, आर्थिक योजना, और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए—जो अभी प्रारंभिक चरण में लगता है।

छोटे राज्यों का गठन भारत में सफल भी रहा है (तेलंगाना, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़) और चुनौतीपूर्ण भी (झारखंड की आर्थिक अस्थिरता)। यह इस बात पर निर्भर करता है कि नया राज्य अपनी विशिष्टता को कैसे भुनाता है और संसाधनों का प्रबंधन कैसे करता है। यदि आप किसी खास पहलू—आर्थिक प्रभाव या विशिष्ट उदाहरण—पर और जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप “अरावली प्रदेश” पर ही केंद्रित जवाब चाहते हैं या सामान्य चर्चा ठीक है?

“अरावली प्रदेश” के लाभों पर चर्चा करने के लिए प्रोफेसर राम लखन मीना (@ProfRLMeena) के प्रस्तावित विचार को आधार बनाना होगा, जो पूर्वी राजस्थान के जिलों को एक अलग राज्य के रूप में गठित करने की वकालत करता है। यहाँ इसके संभावित लाभों को विस्तार से देखते हैं, जो सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, और पर्यावरणीय पहलुओं पर आधारित हैं:

1. प्रशासनिक दक्षता और स्थानीय फोकस

  • तेज निर्णय प्रक्रिया:
    एक छोटा राज्य होने से सरकार स्थानीय समस्याओं—like ग्रामीण सड़कें, स्कूल, और अस्पताल—पर तेजी से ध्यान दे सकती है। अभी पूर्वी राजस्थान की जरूरतें जयपुर-केंद्रित प्रशासन में दब जाती हैं।
  • जमीनी स्तर तक पहुँच:
    छोटे राज्य में नौकरशाही और जनता के बीच की दूरी कम होगी, जिससे नीतियाँ अधिक प्रभावी होंगी। उदाहरण के लिए, टोंक या दौसा जैसे जिलों की उपेक्षा कम हो सकती है।

2. आर्थिक विकास और संसाधन उपयोग

  • खनिज संपदा का लाभ:
    अरावली क्षेत्र में संगमरमर, ताँबा, जस्ता, और अन्य खनिज प्रचुर हैं। एक अलग राज्य इनका स्थानीय स्तर पर बेहतर उपयोग कर सकता है, जिससे रोजगार और राजस्व बढ़ेगा। अभी ये संसाधन बड़े कॉर्पोरेट्स या राज्य के अन्य हिस्सों की ओर चले जाते हैं।
  • कृषि और पर्यटन:
    पूर्वी राजस्थान की उपजाऊ जमीन और अरावली की पहाड़ियाँ (जैसे रणथंभौर, सरिस्का) पर्यटन और कृषि को बढ़ावा दे सकती हैं। एक समर्पित प्रशासन इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे सकता है।
  • आर्थिक स्वायत्तता:
    स्थानीय कर और निवेश नीतियाँ क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से बनाई जा सकती हैं, बजाय इसके कि पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय मॉडल पर निर्भर रहें।

3. सामाजिक सशक्तिकरण

  • बहुजन समुदायों का उत्थान:
    प्रोफेसर मीना का जोर बहुजन (ओबीसी, एससी, एसटी) समुदायों पर है, जो इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं। एक अलग राज्य उनकी शिक्षा, रोजगार, और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकता है। जैसे, मीणा और गुर्जर समुदायों को नेतृत्व के अधिक अवसर मिल सकते हैं।
  • आरक्षण का प्रभावी कार्यान्वयन:
    छोटे राज्य में आरक्षण नीतियों को स्थानीय स्तर पर बेहतर लागू किया जा सकता है, जिससे जातिगत असमानता कम हो।

4. सांस्कृतिक पहचान और गर्व

  • स्थानीय संस्कृति का संरक्षण:
    अरावली क्षेत्र की सहरिया, भील, मीणा, गुर्जर, और अन्य जनजातीय परंपराएँ राजस्थान की राजपूत-केंद्रित पहचान में दबी रहती हैं। एक अलग राज्य इसे मुख्यधारा में ला सकता है।
  • क्षेत्रीय एकता:
    “अरावली प्रदेश” की पहचान लोगों में गर्व और एकता की भावना जगा सकती है, जैसा कि तेलंगाना या उत्तराखंड में देखा गया।

5. पर्यावरण संरक्षण

  • अरावली पर्वतों की रक्षा:
    अवैध खनन और वन कटाई से अरावली क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है। एक समर्पित राज्य सरकार पर्यावरण नीतियों को सख्ती से लागू कर सकती है, जिससे जैव-विविधता और जल संसाधन बचे रहें।
  • सतत विकास:
    पर्यटन और खनन के बीच संतुलन बनाया जा सकता है, जो अभी बड़े राज्य के ढाँचे में मुश्किल है।

6. शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार

  • शिक्षा पर ध्यान:
    प्रोफेसर मीना शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ हैं। एक छोटा राज्य सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को मजबूत करने पर केंद्रित नीतियाँ बना सकता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • स्वास्थ्य सेवाएँ:
    स्थानीय स्तर पर अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, जो अभी दूर-दराज के इलाकों में कम हैं।

तुलनात्मक उदाहरण

  • छत्तीसगढ़:
    मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद खनिज-आधारित अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ, हालाँकि भ्रष्टाचार एक चुनौती रहा। अरावली प्रदेश भी खनिजों से लाभ उठा सकता है।
  • उत्तराखंड:
    पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरतों पर फोकस से बुनियादी ढाँचा बेहतर हुआ। अरावली के पहाड़ी जिलों को भी ऐसा लाभ मिल सकता है।

संभावित प्रभाव

“अरावली प्रदेश” बहुजन समुदायों के लिए एक प्रयोगशाला बन सकता है, जहाँ सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को संतुलित करने की कोशिश हो। यह क्षेत्र की उपेक्षा को दूर कर सकता है और एक मॉडल राज्य बन सकता है, बशर्ते इसे सही योजना और नेतृत्व मिले।

यदि आप किसी खास लाभ आर्थिक या पर्यावरणीय—पर और गहराई से जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप इसके पक्ष में उनके तर्कों को और विस्तार से पढ़ना-सुनना चाहते हैं?

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सरिस्का के 2 टाइगर्स की दौसा जयपुर में मूवमेंट, बांदीकुई महुखुर्द गांव में 03 लोगों पर टाइगर हमला

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 02 जनवरी 2025 | जयपुर : राजस्थान के दौसा जिले में टाइगर ने एक महिला सहित तीन लोगों पर हमला कर दिया। तीनों की हालत गंभीर है और उन्हें जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) हॉस्पिटल रेफर किया गया है। वहीं, ट्रैंकुलाइज करने पहुंची वन विभाग की टीम पर भी टाइगर ने हमला बोल दिया और गाड़ी के कांच फोड़ दिए।

सरिस्का के 2 टाइगर्स की दौसा जयपुर में मूवमेंट, बांदीकुई महुखुर्द गांव में 03 लोगों पर टाइगर हमला

सरिस्का के 2 टाइगर्स की दौसा जयपुर में मूवमेंट, बांदीकुई महुखुर्द गांव में 03 लोगों पर टाइगर हमला

घटना जिले के बांदीकुई के महुखुर्द गांव में सुबह 7.30 बजे की है। टाइगर के हमले की सूचना के बाद वन विभाग की टीम भी पहुंच गई है। बताया जा रहा है टाइगर सरिस्का सेंचुरी से आया है। रेंजर दीपक शर्मा ने बताया- टाइगर की उम्र करीब 4 साल है। तीन बार इसे ट्रैंकुलाइज करने का प्रयास किया, लेकिन निशाना सही नहीं लग सका।

बुधवार सुबह 11 बजे सरिस्का से वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। टाइगर पलासन नदी की ओर भाग गया, जिसकी लगातार तलाश की जा रही है।

बुधवार सुबह 11 बजे सरिस्का से वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। टाइगर पलासन नदी की ओर भाग गया, जिसकी लगातार तलाश की जा रही है। बीते करीब 20 दिन से सेंचुरी के दो टाइगर गायब हैं और इनकी लोकेशन जयपुर और दौसा के आसपास बताई जा रही है।

हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि हमला करने वाला टाइगर इन्हीं में से एक है। उधर, सरिस्का से वन विभाग की टीम गांव पहुंच गई है। टाइगर को ट्रैंकुलाइज करने की कोशिश की जा रही है। टीम को देखकर वह गली से निकलकर पलासन नदी की ओर भाग गया।

टाइगर के हमले में घायल तीनों लोगों को पहले बांदीकुई के उपजिला हॉस्पिटल ले जाया गया था।

खेत में किया हमला, घर के पास भी दिखा

टाइगर के हमले में घायल तीनों लोगों को पहले बांदीकुई के उपजिला हॉस्पिटल ले जाया गया था। महुखुर्द गांव के सरपंच पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि मुहखुर्द गांव स्थित कोली मोहल्ले के पास एक गली में झाड़ियों के पास टाइगर बैठा हुआ था।

सुबह सात-साढ़े सात बजे आवाज सुनकर सबसे पहले उगा महावर (45) झाड़ियों की तरफ गईं। वह कुछ समझ पातीं, इससे पहले ही टाइगर उनकी पीठ पर हमला कर दिया। इसके बाद शोर-शराबा हुआ।

महिला को बचाने के लिए सुबह करीब 8 बजे विनोद मीणा (42) एवं बाबूलाल मीणा (48) हाथों में डंडा लेकर टाइगर के नजदीक पहुंचे। टाइगर ने इन पर भी हमला कर दिया। तीनों गंभीर रूप से घायल हो गये।

दौसा जिले के बांदीकुई क्षेत्र में टाइगर के हमले के बाद दहशत का माहौल है।

सरिस्का क्षेत्र का टाइगर दौसा पहुंचा

दौसा जिले के बांदीकुई क्षेत्र में टाइगर के हमले के बाद दहशत का माहौल है। सुबह करीब 9 बजे बैजूपाड़ा थाना पुलिस मौके पर पहुंची और ग्रामीणों को वहां से दूर हटाया। सुबह 9:30 बजे बांदीकुई वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और वीडियो देखकर टाइगर होने की पुष्टि की।

बांदीकुई वन रेंजर दीपक शर्मा ने बताया कि इसकी सूचना सरिस्का वन क्षेत्र को दी है। संभावना है कि यह टाइगर सरिस्का क्षेत्र से यहां पहुंचा है और अब हम इसकी जांच कर रहे हैं। टाइगर को ट्रैंकुलाइज कर सुरक्षित स्थान पर भेजा जाएगा।

उन्होंने बताया- टाइगर को रेस्क्यू करने के लिए वन विभाग की टीमें जुटी है। शाम 3:45 बजे टाइगर सरसों के खेत से निकलकर पलासन नदी की ओर भाग गया। इस दौरान दो गाड़ियों में वन विभाग की टीमों ने उसका पीछा किया, लेकिन उसे ट्रैंकुलाइज नहीं किया जा सका।

2 महीने पहले भी आ चुका है बांदीकुई क्षेत्र में टाइगर

बांदीकुई क्षेत्र में 2 महीने पहले भी एक टाइगर सरिस्का से भटक कर मुही गांव के पास आ गया था। वह दो-तीन दिन तक यहां रहा और फिर सरिस्का लौट गया। वन अधिकारियों के अनुसार, मुही गांव सरिस्का जंगल के पास होने के कारण यहां कई बार टाइगर आ जाते हैं। तीन साल पहले भी ऐसा ही हुआ था।

एक टाइगर गुडा कटला और मुही के पास आया था। एक सप्ताह बाद वापस चला गया था। बुधवार सुबह लगभग 11:45 बजे सरिस्का से वन विभाग की टीम बांदीकुई (दौसा) के महुखुर्द गांव पहुंची। टाइगर को ट्रैंकुलाइज करने की कोशिश की जा रही है।

सरिस्का से 30 किमी दूर निकला

अलवर DFO राजेंद्र हुड्डा ने बताया- अलवर के सरिस्का के जंगल से निकलकर टाइगर 30 किलोमीटर दूर रैणी के पास देवती का बास प्रधानों का गवाड़ा गांव में मंगलवार रात को ही घुस गया था। टाइगर को देखने के बाद कुत्ते भौंकने लगे। इसके बाद गांव में भी दहशत का माहौल हो गया।

ग्रामीणों ने छत पर चढ़कर टाइगर का वीडियो बनाया था। उस समय टाइगर गुस्से में दहाड़ा भी। इसके बाद टाइगर पास की पहाड़ी से होता हुआ आगे निकला। बुधवार सुबह दौसा के महुखुर्द गांव में टाइगर ने 3 लोगों पर हमला कर दिया।

वन विभाग की टीमें टाइगर को ट्रैंकुलाइज करने की कोशिश कर रही है। इसी बीच टाइगर एक खेत से निकलकर दूसरे खेत में जा छुपा।

ट्रैंकुलाइज करने के लिए तीन टीमें एक्टिव हुईं

वन विभाग की टीमें टाइगर को ट्रैंकुलाइज करने की कोशिश कर रही है। इसी बीच टाइगर एक खेत से निकलकर दूसरे खेत में जा छुपा। रेंजर शंकर सिंह ने बताया- वन विभाग की तीन टीमें टाइगर को ट्रैंकुलाइज करने की कोशिश कर रही हैं।

महुखुर्द गांव के पास एक सरसों के खेत में टाइगर के देखे जाने के बाद खेत को घेर लिया गया है। टाइगर ST 2402 को रेस्क्यू कर सरिस्का ले जाया जायेगा।

रणथंभौर से भी टीम मौके पर पहुंची, कल शुरू होगा रेस्क्यू

रेंजर दीपक शर्मा ने बताया- बुधवार को देर शाम तक टाइगर का रेस्क्यू करने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। अंधेरा हो जाने के कारण अब रेस्क्यू को रोक दिया गया है। रणथंभौर से भी एक टीम आ गई है।

गुरुवार सुबह सरिस्का और रणथंभौर की टीम मिलकर टाइगर को रेस्क्यू करने का प्रयास करेगी। टीम बुधवार रातभर गांव में ही रहेगी। लोगों को घर में रहने की हिदायत दी गई है। टाइगर की लास्ट लोकेशन एक सरसों के खेत में थी।

दोपहर 1:30 सरसों के खेत में ट्रेंकुलाइज करने के दौरान टाइगर ने वनकर्मियों की पिकअप गाड़ी पर हमला कर दिया। जिससे ड्राइवर साइड वाली सीट का कांच टूट गया। इस दौरान गाड़ी में बैठी टीम बाल-बाल बच गई।

दोपहर 1:30 सरसों के खेत में ट्रेंकुलाइज करने के दौरान टाइगर ने वनकर्मियों की पिकअप गाड़ी पर हमला कर दिया। जिससे ड्राइवर साइड वाली सीट का कांच टूट गया। इस दौरान गाड़ी में बैठी टीम बाल-बाल बच गई।

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