‘गलता पीठ को टेकओवर करें राज्य सरकार महंत अवधेशाचार्य की नियुक्ति रद्द’ हाईकोर्ट

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 23 जुलाई 2024 | जयपुर : राजस्थान हाईकोर्ट ने आज जयपुर के प्रसिद्ध गलता पीठ तीर्थ के महंत अवधेशाचार्य की नियुक्ति को रद्द कर दिया है। जस्टिस समीर जैन की एकल पीठ ने अवधेशाचार्य और अन्य की अपील को निस्तारित करते हुए यह फैसला सुनाया है।

‘गलता पीठ को टेकओवर करें राज्य सरकार महंत अवधेशाचार्य की नियुक्ति रद्द’ हाईकोर्ट

कोर्ट ने सरकार से पीठ को टेकओवर करके साल 1943 की स्थिति बहाल करने के निर्देश दिए हैं। गलता पीठ का विकास अयोध्या के राम मंदिर और उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर की तर्ज पर करवाने को कहा है। गलता पीठ की अब तक बेची गई सभी संपत्तियों की बिक्री को भी निरस्त कर दिया है।

गलता पीठ महंत अवधेशाचार्य की नियुक्ति रद्द

कोर्ट ने कहा- गलता पीठ के अवधेशाचार्य स्वयंभू महंत बने हुए हैं। उनकी नियुक्ति पूरी तरह से अवैध है। जयपुर स्टेट ने उनके पिता रामोदाचार्य को महंत नियुक्त किया था। उनके निधन के बाद महंत नियुक्त करने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है।

इसलिए अवधेशाचार्य की नियुक्ति पूरी तरह से अवैध है। महंत अवधेशाचार्य, उनकी मां गायत्री देवी और अन्य ने देवस्थान आयुक्त के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। कोर्ट ने 22 फरवरी को सुनवाई पूरी करके फैसला सुरक्षित रख लिया था। अरावली की पहाड़ियों के बीच गलता जी ऋषि गालव की तपोभूमि है।

अरावली की पहाड़ियों के बीच गलता जी ऋषि गालव की तपोभूमि है।

वंशजों को बना दिया था गलता पीठ की संपत्ति का हकदार

साल 1939 तक गलता पीठ में कोई महंत नहीं था। इसके बाद तत्कालीन जयपुर स्टेट ने प्रस्ताव पास करते हुए महंत के लिए आवेदन मांगे। इसके आधार पर रामोदाचार्य को गलता पीठ का महंत नियुक्त किया गया था। उन्होंने पीठ के नियम के विरुद्ध 1963 में राजस्थान पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट में रजिस्टर्ड करवा लिया।

साल 1999 में रामादोचार्य ने ट्रस्ट के विधान (नियमों) में संशोधन करके इसे वंशानुगत में रजिस्टर्ड करवा लिया था। इसके तहत गलता पीठ की पूरी संपत्ति उनके वंशजों को मिलेगी। वहीं उनके ज्येष्ठ पुत्र उनके बाद महंत होंगे। गलता पीठ की प्रॉपर्टी जयपुर, डीग, भरतपुर सहित प्रदेश के कई शहरों में है।

इसकी जानकारी होने पर पक्षकार रामशरणदास और वकील उमाशंकर शर्मा ने हाईकोर्ट में इसके खिलाफ जनहित याचिका (PIL) लगाई थी। इसमें कहा था कि गलता पीठ सरकार का है। महंत रामोदाचार्य को जयपुर स्टेट ने केवल महंत नियुक्त किया था। उन्हें इसे ट्रस्ट में रजिस्टर्ड कराने और वंशानुगत करने का कोई अधिकार नहीं है। उस पीआईएल में उस समय हाईकोर्ट ने देवस्थान विभाग को मामले की जांच के आदेश दिए थे। तभी से यह विवाद चला आ रहा है।

मामले से जुड़े वकील उमाशंकर शर्मा ने बताया- मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। सुप्रीम कोर्ट ने देवस्थान विभाग के असिस्टेंट कमिश्नर को यह मामला सुनने के आदेश दिए थे। देवस्थान कमिश्नर ने हमारे पक्ष में फैसला दिया था।

गलता पीठ का विकास राम मंदिर और महाकाल मंदिर की तर्ज पर करने के लिए कहा गया।

सरकार को गलता पीठ टेकओवर करने के निर्देश

मामले में अतिरिक्त महाधिवक्ता बसंत सिंह छापा ने बताया- हाईकोर्ट ने सरकार को गलता पीठ और उससे जुड़ी संपत्तियों को टेकओवर करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कहा है कि गलता पीठ जनभावना से जुड़ा हुआ है।

ऐसे में सरकार जयपुर के प्रसिद्ध गलता पीठ का विकास अयोध्या के राम मंदिर और उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर की तर्ज पर करवाए। इसके अलावा कोर्ट ने कहा है कि सरकार गलता पीठ में 1943 की स्थिति बहाल करें। गलता पीठ का विकास राम मंदिर और महाकाल मंदिर की तर्ज पर करने के लिए कहा गया।

गालव ऋषि जी का मंदिर। इस स्थान से देशभर के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है।

ऋषि गालव की तपोभूमि है गलताजी

गलता पीठ रामानुज संप्रदाय की प्रधान पीठ है। मान्यता है कि जयपुर में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित गलता तीर्थ सतयुग के गालव ऋषि की तपोभूमि है। यहां उन्होंने करीब 60 हजार साल तक तपस्या की थी। गालव ऋषि जी का मंदिर। इस स्थान से देशभर के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है।

गलता तीर्थ पर ही करीब 400 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस का अयोध्या कांड लिखा था। तुलसीदास गलता में 3 साल रहे थे और इसी दौरान उन्होंने अयोध्या कांड के प्रसंग लिखे थे।

गलता जी में रोजाना गोस्वामी तुलसीदास के चित्रपट का वैदिक मंत्रों के साथ पूजन होता है।

गलता में आज भी होती है तुलसीदास जी की पूजा

गलता जी में रोजाना गोस्वामी तुलसीदास के चित्रपट का वैदिक मंत्रों के साथ पूजन होता है। तीर्थ के संतों के अनुसार, गलता पीठ में तुलसीदास जी का काफी अलग महत्व है। यहां सुबह गोस्वामी तुलसीदास के चित्रपट का वैदिक मंत्रों के साथ पूजन होता है।

हालांकि, संतों को ये पता नहीं है कि ये पूजन कब से जारी है या इसकी शुरुआत कब हुई थी, लेकिन तुलसीदास जी की पूजा की परंपरा उनके यहां के जुड़ाव के महत्वपूर्ण अध्याय की ओर इशारा करती है। इसके अलावा गलता में तुलसीदास जयंती महोत्सव भी काफी श्रद्धा भाव से मनाया जाता है।

इस महोत्सव का समापन रामचरितमानस के पाठ के साथ किया जाता है। संतों का दावा है कि संत तुलसीदास जी ने गलता पीठ में प्रवास के दौरान रामचरित मानस के अयोध्या कांड की ही नहीं, बल्कि अपने विभिन्न ग्रंथों की रचना की। अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित गलता तीर्थ।

अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित गलता तीर्थ।

अकबर ने भी चढ़ाया था नारियल

गलता में रहस्यों की कमी नहीं है। यहां ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच बने गोमुख से सदियों से प्राकृतिक रूप से जलधारा बहती आई है, जिसका सोर्स आज तक नहीं खोजा जा सका है। वहीं अकबर ने भी जब गलता के महत्व को सुना तो खुद यहां आकर नारियल चढ़ाया था। सूरज की पहली किरण गलता में बने सूर्य मंदिर पर पड़ती है और उसके बाद जयपुर को रोशन करती है।

गलता में पयोहारी ऋषि की गुफा भी थी, अब बंद कर दिया गया है। कहा जाता है कि पयोहारी ऋषि इस गुफा में रहते थे और जो भी भीतर गया, वो लौटकर नहीं आया। इस कारण गुफा को बंद कर दिया गया। ये भी कहा जाता है कि ये गुफा पाताल तक जाती है।

गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर से बना गलता

कहा जाता है कि किसी के तीर्थ संपूर्ण नहीं माने जा सकते, जब तक वह गलता तीर्थ नहीं आए और यहां के कुंड में स्नान नहीं किया जाए। जयपुर की स्थापना से पहले राजा सवाई जयसिंह ने 300 साल पहले वास्तुदोष निवारण के लिए यहां पक्का निर्माण कार्य करवाया था।

गलता जी मंदिर का निर्माण गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर से किया गया था। इसके अंदर गलता जी भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान हनुमान सहित कई सारे देवी देवताओं के मंदिर स्थित हैं। गलता जी में स्थित रामगोपाल मंदिर। एक ही प्रतिमा में राम और कृष्ण दोनों के दर्शन होते हैं।

गलता जी में स्थित रामगोपाल मंदिर। एक ही प्रतिमा में राम और कृष्ण दोनों के दर्शन होते हैं।

धनुष के साथ बांसुरी धारण किए श्रीरामगाेपाल

गलता जी में रामगोपाल मंदिर भी है। यह देश का एकमात्र मंदिर है, जहां एक ही प्रतिमा में प्रभु श्री राम और कृष्ण दोनों के संयुक्त दर्शन होते हैं। हाथ में धनुष और श्रीकृष्ण जैसी मुद्रा में बांसुरी बजाते प्रभु राम यहां भक्तों को आशीष देते हैं। साथ में विराजित हैं मां शक्ति स्वरूपा किशोरी जी।

माता सीता की स्वर्ण प्रतिमा का यह वही रूप है, जिसे अश्वमेघ यज्ञ के समय श्री रामचंद्र जी ने बनाया था, क्योंकि तब मां सीता वन में थीं। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता, इसलिए ऐसी प्रतिमा बनाई गई थी। यह प्रतिमा श्री रामजी के स्वरूप के साथ मां सीता और श्री कृष्ण के स्वरूप के साथ रुक्मणी जी के स्वरूप को साकार करती है।

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अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 26 मार्च 2025 | जयपुर : प्रोफेसर मीना पूर्वी राजस्थान के लिए “अरावली प्रदेश” की स्थापना की वकालत करते हैं। उनकी रणनीति में क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करना और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर बहुजन समुदाय के आर्थिक-सामाजिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है।

भारत की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिए जीवन रेखा के रूप में काम करती रही है। हालाँकि, अवैध खनन, शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण अरावली काफ़ी हद तक क्षरण का सामना कर रही है।

इन दबावों के कारण इस पर्वत श्रृंखला के बड़े हिस्से का क्षरण हुआ है, जिससे रेगिस्तानीकरण, पानी की कमी और जैव विविधता के नुकसान जैसी पर्यावरणीय आपदाएँ हुई हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

 “छोटे राज्यों का गठन” के बारे में चर्चा आम है, जो संभवतः प्रोफेसर राम लखन मीना के “अरावली प्रदेश” प्रस्ताव के संदर्भ में या सामान्य रूप से भारत में छोटे राज्यों के निर्माण की अवधारणा से संबंधित है। इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा और भारतीय संदर्भ में इसके पक्ष-विपक्ष, और प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है। यदि आप इसे “अरावली प्रदेश” तक सीमित रखना चाहते हैं।

अरावली प्रदेश की जोर पकड़ती माँग और “अरावली प्रदेश” के लाभ

छोटे राज्यों का गठन: एक अवलोकन

भारत में छोटे राज्यों का गठन एक ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रिया रही है, जो मुख्य रूप से भाषाई, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय पहचान, और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर हुई है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत के राज्य पुनर्गठन ने बड़े राज्यों को छोटी इकाइयों में विभाजित करने की माँग को बार-बार देखा है।

ऐतिहासिक उदाहरण

  1. 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम:
    भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ, जैसे आंध्र प्रदेश (तेलुगु), कर्नाटक (कन्नड़), और तमिलनाडु (तमिल)। यह बड़े औपनिवेशिक प्रांतों को छोटी इकाइयों में तोड़ने की शुरुआत थी।
  2. 2000 में तीन नए राज्य:
    • छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश से अलग
    • उत्तराखंड: उत्तर प्रदेश से अलग
    • झारखंड: बिहार से अलग
      इनका गठन क्षेत्रीय उपेक्षा और पहचान के आधार पर हुआ।
  3. तेलंगाना (2014):
    आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना बना, जो विकास में असमानता और सांस्कृतिक पहचान की लंबी लड़ाई का परिणाम था।

छोटे राज्यों के पक्ष में तर्क

  1. प्रशासनिक दक्षता:
    छोटे राज्य सरकार को जनता के करीब लाते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं पर तेजी से ध्यान देना संभव हुआ।
  2. स्थानीय विकास:
    संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का लाभ उठाकर औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।
  3. सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान:
    छोटे राज्य स्थानीय भाषा, परंपराओं और समुदायों को संरक्षित करते हैं। जैसे, तेलंगाना में तेलुगु संस्कृति को अलग पहचान मिली।
  4. राजनीतिक सशक्तिकरण:
    हाशिए पर रहे समुदायों को नेतृत्व का मौका मिलता है। झारखंड में आदिवासी समुदायों की आवाज मजबूत होगी।

छोटे राज्यों के खिलाफ तर्क

  1. आर्थिक व्यवहार्यता:
    छोटे राज्य कभी-कभी स्वतंत्र रूप से आर्थिक रूप से टिक नहीं पाते। मिसाल के तौर पर, झारखंड में विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार और संसाधन प्रबंधन की समस्याएँ बनी रहीं।
  2. प्रशासनिक लागत:
    नए राज्य का ढाँचा—जैसे विधानसभा, सचिवालय, और नौकरशाही—बनाने में भारी खर्च होता है।
  3. विखंडन का खतरा:
    बार-बार विभाजन से राष्ट्रीय एकता पर सवाल उठ सकते हैं। कुछ लोग इसे “बाल्कनीकरण” कहते हैं।
  4. अंतर-राज्य विवाद:
    जल, सीमा, और संसाधनों पर टकराव बढ़ सकता है, जैसे तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच कृष्णा नदी का विवाद।

भारत में गठन की प्रक्रिया

भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को नए राज्यों के गठन का अधिकार है। प्रक्रिया इस तरह है:

  1. माँग की शुरुआत:
    स्थानीय आंदोलन, राजनीतिक दल या समुदाय माँग उठाते हैं।
  2. राज्य विधानसभा की राय:
    संबंधित राज्य विधानसभा से राय ली जाती है (हालाँकि यह बाध्यकारी नहीं है)।
  3. केंद्र सरकार का प्रस्ताव:
    गृह मंत्रालय इसका मूल्यांकन करता है और संसद में विधेयक पेश करता है।
  4. संसदीय मंजूरी:
    दोनों सदनों में साधारण बहुमत से पास होने के बाद राष्ट्रपति की सहमति से यह लागू होता है।
“अरावली प्रदेश” के संदर्भ में प्रोफेसर मीना का प्रस्ताव इस पैटर्न में फिट बैठता है। उनका तर्क है कि पूर्वी राजस्थान की उपेक्षा और बहुजन समुदायों की जरूरतें एक छोटे राज्य से पूरी हो सकती हैं। लेकिन इसके लिए व्यापक जन समर्थन, आर्थिक योजना, और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए—जो अभी प्रारंभिक चरण में लगता है।

छोटे राज्यों का गठन भारत में सफल भी रहा है (तेलंगाना, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़) और चुनौतीपूर्ण भी (झारखंड की आर्थिक अस्थिरता)। यह इस बात पर निर्भर करता है कि नया राज्य अपनी विशिष्टता को कैसे भुनाता है और संसाधनों का प्रबंधन कैसे करता है। यदि आप किसी खास पहलू—आर्थिक प्रभाव या विशिष्ट उदाहरण—पर और जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप “अरावली प्रदेश” पर ही केंद्रित जवाब चाहते हैं या सामान्य चर्चा ठीक है?

“अरावली प्रदेश” के लाभों पर चर्चा करने के लिए प्रोफेसर राम लखन मीना (@ProfRLMeena) के प्रस्तावित विचार को आधार बनाना होगा, जो पूर्वी राजस्थान के जिलों को एक अलग राज्य के रूप में गठित करने की वकालत करता है। यहाँ इसके संभावित लाभों को विस्तार से देखते हैं, जो सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, और पर्यावरणीय पहलुओं पर आधारित हैं:

1. प्रशासनिक दक्षता और स्थानीय फोकस

  • तेज निर्णय प्रक्रिया:
    एक छोटा राज्य होने से सरकार स्थानीय समस्याओं—like ग्रामीण सड़कें, स्कूल, और अस्पताल—पर तेजी से ध्यान दे सकती है। अभी पूर्वी राजस्थान की जरूरतें जयपुर-केंद्रित प्रशासन में दब जाती हैं।
  • जमीनी स्तर तक पहुँच:
    छोटे राज्य में नौकरशाही और जनता के बीच की दूरी कम होगी, जिससे नीतियाँ अधिक प्रभावी होंगी। उदाहरण के लिए, टोंक या दौसा जैसे जिलों की उपेक्षा कम हो सकती है।

2. आर्थिक विकास और संसाधन उपयोग

  • खनिज संपदा का लाभ:
    अरावली क्षेत्र में संगमरमर, ताँबा, जस्ता, और अन्य खनिज प्रचुर हैं। एक अलग राज्य इनका स्थानीय स्तर पर बेहतर उपयोग कर सकता है, जिससे रोजगार और राजस्व बढ़ेगा। अभी ये संसाधन बड़े कॉर्पोरेट्स या राज्य के अन्य हिस्सों की ओर चले जाते हैं।
  • कृषि और पर्यटन:
    पूर्वी राजस्थान की उपजाऊ जमीन और अरावली की पहाड़ियाँ (जैसे रणथंभौर, सरिस्का) पर्यटन और कृषि को बढ़ावा दे सकती हैं। एक समर्पित प्रशासन इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे सकता है।
  • आर्थिक स्वायत्तता:
    स्थानीय कर और निवेश नीतियाँ क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से बनाई जा सकती हैं, बजाय इसके कि पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय मॉडल पर निर्भर रहें।

3. सामाजिक सशक्तिकरण

  • बहुजन समुदायों का उत्थान:
    प्रोफेसर मीना का जोर बहुजन (ओबीसी, एससी, एसटी) समुदायों पर है, जो इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं। एक अलग राज्य उनकी शिक्षा, रोजगार, और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकता है। जैसे, मीणा और गुर्जर समुदायों को नेतृत्व के अधिक अवसर मिल सकते हैं।
  • आरक्षण का प्रभावी कार्यान्वयन:
    छोटे राज्य में आरक्षण नीतियों को स्थानीय स्तर पर बेहतर लागू किया जा सकता है, जिससे जातिगत असमानता कम हो।

4. सांस्कृतिक पहचान और गर्व

  • स्थानीय संस्कृति का संरक्षण:
    अरावली क्षेत्र की सहरिया, भील, मीणा, गुर्जर, और अन्य जनजातीय परंपराएँ राजस्थान की राजपूत-केंद्रित पहचान में दबी रहती हैं। एक अलग राज्य इसे मुख्यधारा में ला सकता है।
  • क्षेत्रीय एकता:
    “अरावली प्रदेश” की पहचान लोगों में गर्व और एकता की भावना जगा सकती है, जैसा कि तेलंगाना या उत्तराखंड में देखा गया।

5. पर्यावरण संरक्षण

  • अरावली पर्वतों की रक्षा:
    अवैध खनन और वन कटाई से अरावली क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है। एक समर्पित राज्य सरकार पर्यावरण नीतियों को सख्ती से लागू कर सकती है, जिससे जैव-विविधता और जल संसाधन बचे रहें।
  • सतत विकास:
    पर्यटन और खनन के बीच संतुलन बनाया जा सकता है, जो अभी बड़े राज्य के ढाँचे में मुश्किल है।

6. शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार

  • शिक्षा पर ध्यान:
    प्रोफेसर मीना शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ हैं। एक छोटा राज्य सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को मजबूत करने पर केंद्रित नीतियाँ बना सकता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • स्वास्थ्य सेवाएँ:
    स्थानीय स्तर पर अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, जो अभी दूर-दराज के इलाकों में कम हैं।

तुलनात्मक उदाहरण

  • छत्तीसगढ़:
    मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद खनिज-आधारित अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ, हालाँकि भ्रष्टाचार एक चुनौती रहा। अरावली प्रदेश भी खनिजों से लाभ उठा सकता है।
  • उत्तराखंड:
    पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरतों पर फोकस से बुनियादी ढाँचा बेहतर हुआ। अरावली के पहाड़ी जिलों को भी ऐसा लाभ मिल सकता है।

संभावित प्रभाव

“अरावली प्रदेश” बहुजन समुदायों के लिए एक प्रयोगशाला बन सकता है, जहाँ सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को संतुलित करने की कोशिश हो। यह क्षेत्र की उपेक्षा को दूर कर सकता है और एक मॉडल राज्य बन सकता है, बशर्ते इसे सही योजना और नेतृत्व मिले।

यदि आप किसी खास लाभ आर्थिक या पर्यावरणीय—पर और गहराई से जानना चाहते हैं, तो बताएँ। क्या आप इसके पक्ष में उनके तर्कों को और विस्तार से पढ़ना-सुनना चाहते हैं?

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How to extract gold from unused mobile phones

MOOKNAYAK MEDIA BUREAU | January 02, 2025 | Jaipur : In these days, Cell phone recycling plays a major role in the recycling industry. Cell phone cards have a good quantity of gold. In this tutorial, I explain two types of cell phone recycling. Gold recovery from the cell phone is some critical but this can give you a handsome profit.

To extract the gold, you’ll need to use a chemical process. Aqua regia, a mixture of nitric acid and hydrochloric acid, is commonly used for this purpose. Here’s how you do it: Place the gold-bearing components in a glass container.

How to extract gold from unused mobile phones

BBC report says that Scientists have developed a new technique for recovering precious metals without using toxic chemicals. The team believe their method could help salvage some of the estimated 300 tonnes of gold used in electronic circuitry every year.

How to extract gold from unused mobile phones

Electrical waste is thought to contain as much as 7% of the world’s gold. Existing methods of extracting gold from circuit boards are inefficient and potentially hazardous as they involve toxic chemicals such as cyanide, the researchers said.

By studying the chemistry underpinning the extraction, the team said they were able to develop a compound that could be used to recover gold more effectively. There is actual gold in your phone, used because of its excellent conductivity and resistance to corrosion.

A smartphone might have around 0.034 grams of gold

However, the amount of gold contained in a phone is smaller than one might expect. On average, a smartphone might have around 0.034 grams of gold. “… And processes to extract the gold from the other materials. The extracted gold is then purified. And refined into pure gold bullion that can be sold or used for other purposes….”

Circuit boards are first immersed in a mild acid which dissolves their metal parts. An oily liquid containing the compound is then added, which extracts the gold from other metals. Prof Jason Love, from the university’s school of chemistry, said the discovery could help reduce the environmental impact of gold mining.

He said: “We are very excited about this discovery, especially as we have shown that our fundamental chemical studies on the recovery of valuable metals from electronic waste could have potential economic and societal benefits.”

How to extract gold from mobile phones

  • Hydrometallurgical methods

These methods include precipitation, solvent extraction, and leaching. Microwave pyrolysis can be used as a pre-treatments process to prevent the loss of precious metals. 

  • Chemical compound

Researchers have developed a compound that can be used to recover gold from printed circuit boards (PCBs). The process involves placing the PCBs in a mild acid to dissolve the metal parts, and then adding an oily liquid containing the compound to extract the gold. 

  • Electrolysis

An old laptop charger can be used for electrolysis to recover gold from a solution. Stainless steel can be used as the anode and steel wool as the cathode. After running the cell for a few hours, the gold should electroplate onto the steel wool. 

Existing methods of extracting gold from circuit boards can be inefficient and hazardous because they involve toxic chemicals like cyanide. The amount of gold in a SIM card is usually measured in milligrams or micrograms. For example, a typical SIM card may contain around 8 milligrams of gold. 

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